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राजेन्द्र यादव की विरासत

साहित्य

 

राजेन्द्र यादव की विरासत

भारत यायावर


राजेन्द्र यादव अस्सी की उम्र पार करने के बाद भी साहित्य में सक्रिय हैं. कहानियाँ तो दो-चार वर्षों में एक-दो अब भी लिख डालते हैं और 'चालीस बरस पहले' के अपने यौन-संबंधों को याद कर लेते हैं. किन्तु 'हंस' में हर महीना अपना संपादकीय अवश्य लिखते हैं. संपादकीय स्तम्भ का शीर्षक है- 'मेरी, तेरी, उसकी बात'. किन्तु, प्राय: उनका लेख एकालाप ही होता है, उसमें 'तेरी' और 'उसकी बात' नहीं होती. वे 'अपनी बात' ही लिखते हैं और 'दिल से' लिखते हैं. 'हंस' का हर पाठक उसे पढ़ता है. पढ़ते हुए मेरा भी पच्चीसवाँ वर्ष गुजर रहा है, और अगस्त, 1986 ई. में मैं जवान था, अब बूढ़ा हो रहा हूँ. किन्तु एक ताजगी के साथ 'मेरी, तेरी ....' हर महीने पढ़ता हूँ. गुनता हूँ. राजेन्द्र यादव के दुख, खीझ और गुस्से को समझता हूँ और गहराई से अनुभव करता हूँ.

राजेंद्र यादव

हिन्दी में, नहीं दिल्ली में, दो बुजुर्ग साहित्यकार हैं- नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव ! ( वैसे तो दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकार कई हैं. मसलन, रामदरश मिश्र. ये चालीस वर्षों से वृद्ध दीख रहे हैं और इन्होंने साहित्य की हर विधा में विपुल साहित्य लिखा है और अच्छा लिखा है. फिर, कुँवरनारायण, जो चिंतक कवि हैं और ज्ञानपीठ से नवाजे जा चुके हैं. साहित्यिक दुनिया से कुछ ऊपर रहते हैं. केदारनाथ सिंह भी अस्सी की उम्र के करीब हैं लेकिन कोई उनको बुजुर्ग नहीं समझता, वे चिर नवीन हैं. लेकिन, चर्चा सिर्फ दो की ही होती है - नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव. ये हिन्दी साहित्य में 'मील के पत्थर' हैं और दोनों मठाधीश या महंत हैं. 'पाखी' ने नामवर सिंह पर एक स्थायी महत्व का बड़ा विशेषांक निकाला है और अब राजेन्द्र यादव की बारी है.) इन दोनों को दिल्ली की प्राय: साहित्यिक गोष्ठियों, पुस्तक-विमोचन-समारोहों में आदर के साथ बुलाया जाता है. कई सम-सामयिक विषयों पर इनके विचार लिए जाते हैं, इनके साक्षात्कार प्रकाशित होते हैं. कभी-कभी किसी 'विवाद-प्रसंग' में टेली-मिडिया में भी इनकी पूछ होती है.

हिन्दी साहित्य की वर्तमान अवस्था में वृद्धावस्था के ये दो सुमन हैं, जिनके आशीर्वचनों को लोग अपने गले में लटकाये फिरते हैं. इन्हें माल, मान, यश हद से ज्यादा (बेहद) मिला.

नामवर सिंह को हिन्दी से, हिन्दी वालों से कोई शिकायत नहीं, किन्तु राजेन्द्र यादव को है. उनकी शिकायतों की फेहरिश्त लम्बी है. उनकी पहली शिकायत है कि हिन्दी वाले हर विषय पर उनकी राय क्यों पूछते हैं ? क्या वृद्ध होने का यह अभिशाप नहीं है ? दिसम्बर, 2010 की 'मेरी, तेरी ....' में वे लिखते हैं - ''वरिष्ठ और बुजुर्ग होने का यही अभिशाप है कि दुनिया के हर विषय पर आपकी राय होनी ही चाहिए. शायद यही आक्रमण नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी पर भी रोज होता होगा, वे मुझसे ज्यादा प्रबुद्ध और आर्टिकुलेट (शब्दवीर !) हैं. लेकिन मैं इधर बार-बार उन्हीं सवालों और जवाबों के दुहराव से आजिज आ गया हूँ: न कोई नई बात, न कोई मौलिक कोण-खास तौर से साहित्य-केंद्रित लोगों के पास तो निश्चय ही कुछ भी विचारोत्तोजक नहीं बचा है. सभी कुछ पूर्व-ज्ञात और घिसा-पिटा है.''

राजेन्द्र यादव इस 'घिसे-पिटे' हिन्दी साहित्य से आजिज आ गए हैं. वे मानते हैं कि हिन्दी की गोबर-पट्टी में पिछड़ेपन की बदबू से बजबजाते परिवेश की एक तरफ घिनौनी तस्वीर है और दूसरी तरफ- ''अपने छायावादी संसार में आंतरिक सुकून खोजते निरुपाय बुद्धिजीवी अपनी-अपनी पुस्तकों और गोष्ठियों में छटपटाते अकेलों की यह बेचैन भीड़, आपस में संवाद खोजती और फिर कछुए की तरह वापस खोल में सिमटती हुई.''

उनकी खीझ का दूसरा कारण है कि विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग अभी तक पुराने साहित्य से चिपके हुए हैं. इस तरह वे आधुनिक नहीं हैं. 'पाखी' के जनवरी, 2011 अंक में प्रकाशित 'संवाद' में वे कहते हैं- ''सन् सैंतालीस से पहले का या बीसवी सदी से पहले का जो साहित्य है, वह सब हमें छोड़ देना चाहिए क्योंकि उस जबान को जिसमें वह लिखा गया, कोई नहीं समझता.''

अब पहले वाक्य पर गौर करें. यहाँ दो विकल्प हैं - सैंतालीस के पहले और दूसरा बीसवीं शताब्दी के पहले. यदि सैंतालीस के पहले के साहित्य को छोड़ दिया जाए तो महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक, प्रेमचन्द, अज्ञेय, जैनेन्द्र, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा जैसे कथाकार, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर, बच्चन जैसे कवि को भी छोड़ देना पड़ेगा. इससे हंगामा मच सकता है.

यदि बीसवीं शदी के पूर्व के साहित्य को छोड़ दिया जाए तो मध्यकालीन लोकभाषाओं में रचित भक्ति-साहित्य और भारतेन्दुयुगीन साहित्यकार छुट जाएँगे. यादवजी मानते हैं कि जो पुराना सामंती या धर्माधारित है, उसे सिर्फ इतिहास की चीज बना देना चाहिए और उसे अल्मारियों में बन्द कर देना चाहिए. पर यादवजी की बात कोई मानता नहीं. वे हिन्दीवाले, गोबरपट्टी के लोग कब आधुनिक होंगे? वे अभी तक कबीर, सूर, तुलसी से लिपटे हैं.

नामवर सिंह 'कबीर का दुख' लेख लिख रहे हैं, मैनेजर पाण्डेय सूर पर किताब छपवा रहे हैं और क्या हो गया इस प्रतिभाशाली प्रखर आलोचक को, जो 'अकथ कहानी प्रेम की' शीर्षक देकर कोई मजेदार कहानी नहीं लिखकर कबीर का एक नया पाठ-विश्लेषण कर रहा है ? इस पुरुषोत्तम अग्रवाल की बुद्धि क्यों भ्रष्ट हो गई? और वह दलित चिन्तक डॉ. धर्मवीर 'जारज-सम्बन्ध' खोजता फिर रहा है, वह तो ठीक, किन्तु कबीर पर इतनी सारी पुस्तकें क्यों लिख डाली ? एक तो कबीर की भाषा को समझना मुश्किल है. अहिन्दी भाषी लोग 'गुरु गोविन्द दोऊ' का मतलब 'गुरुगोविन्द अंकल' समझते हैं !

बेचारे राजेन्द्र यादव इस तरह की आलोचना से क्षुब्ध हैं. अब उनकी सुनिए. क्या कह रहे हैं वे- ''इस बासीपने को सबसे ज्यादा समृद्ध किया है विश्वविद्यालयों से जुड़े तथाकथित आलोचकों ने. कोई कबीर का कबाड़ा करने पर तुला है तो कोई भारतेन्दु-मैथिलीशरण को धोबीपाट दे रहा है. किसी को निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय ने काटा है तो कोई नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल के प्राण लिए ले रहा है. चार कवियों का शताब्दी वर्ष क्या हुआ, अशोक वाजपेयी विस्मरण के खिलाफ झंडा लेकर निकल पड़े; मुक्तिबोध, अज्ञेय, नागार्जुन और केदारनाथ के कीर्तन कराने. अब जिसे देखो, वह इन्हीं में से किसी पर जगराता आयोजित कर रहा है.''
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

शिवकुमार सिंह कौशिकेय [sk.kaushikey@gmil.com] बलिया उ0प्र0 - 2011-07-11 04:36:00

 
  भारत जी , राजेन्द्र जी के बहाने आपने साहित्य जगत मे व्यात विसंगतियों और मठाधीशी को उकेरा है , उससे साहित्य जगत मे हाथ पांव मार रहे हम जैसे लोगों को काफ़ी सकून मिलता है कि चलो इस क्षेत्र मे हम अकेले नही लड़ रहे है हमारे जैसे हजारों लोग हर जगह इसी तरह से संघर्षरत है । इन्ही संघर्षो से अपने लिए राह बनानी है । धन्यवाद  
   
 

dr.ramesh [dr.rk1976@yahoo.in] azamgarh - 2011-06-12 10:46:05

 
  भारत जी ने राजेंद्र जी के श्वेत और श्याम पक्ष को सहज और सरल तरीके से रखा है.राजेंद्र जी आज के दौर के नायक हैं या खलनायक इसको तो वक़्त बताएगा लेकिन उन्होंने स्त्री विमर्श और दलित चेतना पर काफी काम किया है. क्या यह काफी नहीं है? 
   
 

pramathew agnivansh [bharatyayawar@yahoo.com] hazaribag - 2011-06-05 06:28:09

 
  What is a tragedy ? The fall of greatness of course.Rajendra Yadav was once Hindi\\\'s most talented and progressive writer ,but like any great man the tragic flaw in his character(hyper sensuality) caused his literary downfall. This article points out his tragic (and to an extent humorous)flaws,for which the writer deserves just appreciation. PS :I do not know how to type Hindi,please forgive me for English typing 
   
 

सौरभ पाण्डेय (Saurabh Pandey) [saurabh312@gmail.com] इलाहाबाद (Allahabad) - 2011-06-04 07:36:03

 
  सराहें ’श्रीराम’ को, या, सराहें ’सिया राम’ को..
भारतजी अपने से 25 वर्ष ’बुजुर्ग’ की ऑटोप्सी कर डाली और भनक तक न लगने दी कि किसी ’जिन्दे’ में यों खुदेबुद कर डालना उसके ’मुर्दपन’ का आवाहन है.
इन ’शब्दों’ से कोई बिदके तो बिदके.. (क्या यादवजी की यह विरासत नहीं है?)
 
   
 

अनिल जनविजय [aniljanvijay@gmail.com] मास्को, रूस - 2011-06-03 15:46:09

 
  बहुत ख़ूब । भारत यायावर इतना अच्छा व्यंग्य भी लिख सकते हैं, मुझे मालूम नहीं था।
लेकिन व्यंग्य होते हुए भी यादव जी के प्रति पूरी आत्मीयता और सम्मान । यादव जी, इसे पढ़कर ख़ुश हो रहे होंगे। मुझे तो लगता है, यह राजेन्द्र जी और भारत जी की मिलीभगत है, तभी तो भारत जी ने अपने मित्र के बारे में इतना उत्तम लेख लिख दिया है कि मित्रवर फिर से चर्चा में आ जाएँ।
 
   
 

उमेश चौहान [] नई दिल्ली - 2011-06-03 06:01:41

 
  \"हर आदमी नर है और औरत मादा. इनके बीच सिर्फ, सिर्फ यौनिकता का रिश्ता है. अपनी माँ की सगी बहन भी उस नर के लिए सिर्फ मादा है. यही है राजेन्द्र यादव की क्रांतिकारी दृष्टि की विरासत. इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने \'हंस\' पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन प्रारम्भ किया.\" यह निष्कर्ष भारत जी कहाँ से निकाल कर लाए हैं, मुझे पता नहीं, लेकिन यह राजेन्द्र यादव जी के तथा \'हंस\' के साहित्यिक योगदान का सबसे बड़ा अवमूल्यन होगा। अगर यह सही है तो राजेन्द्र जी के विचारों के अनुरूप ही अन्य विरासतों की तरह हिन्दी-साहित्य की इस विरासत को भी लोग क्यों सेटेंगे?  
   
 

शशिभूषण [gshashibhooshan@gmail.com] तक्कोलम - 2011-06-03 02:42:40

 
  भारत जी ने बहुत अच्छा लिखा है...पर अंत में उपाधि प्रदान कर अपने ही लिखे का सत्यानाश कर दिया। लगता है भारत जी भी उन्हीं चरित्रवान शिरोमणि लोगों में खुद को गिनते हैं जो किसी को अंत में यौनविषयक सलाह देने में देर नहीं करते। क्या यह भी राजेन्द्र यादव की ही विरासत नहीं है कि वे स्त्री विमर्श को देह विमर्श तक ले गये? 
   
 

श्यामबिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] varanasi - 2011-06-03 00:54:46

 
  पुरानी पीढ़ी के अग्रणी रचनाकार राजेन्द्र यादव के प्रति असहमतियों का बयान बेलौस-बेबाक और बेखौफ किंतु इसके समानान्तर उनके प्रति प्रेम-सम्मान भी अपनी जगह अक्षुण्ण और अनाहत प्रतिबिम्बित! ऐसी विरल अभिव्यक्ति भारत यायावर जैसे वाणी-सिद्ध रचनाकार से ही संभव है! सचमुच अद्भुत पीस! आपने यह सामग्री उपलब्ध कराके पाठकों का उपकार किया है। लेखक व ‘रविवार’ को ढेरों बधाइयां! 
   
 

shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] ranchi - 2011-06-02 15:13:55

 
  कुछ प्रसंगों को पढ़ते हुये लगता है कि कहीं व्यक्तिगत खुन्नस तो नहीं निकाली जा रही ? बावजूद राजेन्द्र यादव के बहाने ही सही, लेख की पठनीयता तो है ही. तफ्सील में जा कर ढ़ेरों सवाल जेहन में बरसों तक रह जायेंगे. 
   
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