रामदेव प्रसंगः कानून के सवाल
मुद्दा
रामदेव प्रसंगः कानून के सवाल
कनक तिवारी
बाबा रामदेव ने राजनीति के ठहरे हुए सरोवर में एक बड़ा पत्थर फेंक दिया है. उठ रही
लहरें उन्मत्त होकर खुद को समुद्र की लहरें समझ रही हैं. केन्द्र सरकार को आठ-दस
मांगों का कच्चा चिट्ठा सौंपा गया है. सरकार ने उस पर सधी हुई संक्षिप्त भाषा में
सहमति का इजहार किया है. उसमें असहमति को ज़्यादा स्पेस मिल गया है. दोनों पक्ष उसे
अपनी अपनी और परस्पर विजय बता सकते हैं. जनता संशय के ऐसे पाठ सदियों से पढ़ती रही
है. एक बड़ा राजनीतिक तमाशा हो रहा है. उसके चरित्र को समझना इतिहास, कानून, राजनीति
और समाजशास्त्र की दृष्टि से नागर समाज के लिए आवश्यक होगा-
1. बाबा रामदेव के प्रयत्नों और वचनों में गांधी जी का सायास उल्लेख किया जाता है.
गांधी वैश्य दीवान के बेटे थे. उन्होंने फकीरी का चोला ओढ़ लिया था. रामकृष्ण यादव
हरियाणा के एक गांव में अकिंचन के घर जन्मे. पिछले 7-8 वर्षों में उन्होंने देश
विदेश में अचल संपत्तियां बनाने के साथ ग्यारह हजार करोड़ रुपयों से अधिक का
साम्राज्य खड़ा कर लिया है. मासूमियत में कहते हैं कि उनके नाम न तो एक इंच ज़मीन है
और न ही एक रुपया. सब कुछ पातंजलि योगपीठ और स्वाभिमान ट्रस्ट वगैरह के नाम पर है.
दोनों संस्थाएं उनकी मानस संतानें हैं. टू. जी. स्पेक्ट्रम घोटाले में भी तो अनिल
अंबानी और रतन टाटा की कंपनियों पर अवैध लाभ का आरोप लगाया गया. उनके मुलाजिम बेचारे
पकड़े गए. ये दोनों महान उद्यमी खुद सी. बी. आई. द्वारा बरी कर दिए गए. ऐसे में बाबा
की संस्थाओं के विरुद्ध आरोप लगने पर यदि बाबा साफ बच जाते हैं तो क्या वे देशहित
में यह कहेंगे कि टाटा और अंबानी ठीक ही छोड़ दिए गए हैं.
2. रामलीला मैदान में ताजा इतिहास की सबसे बड़ी और महंगी रामलीला हुई है. अविवाहित
राम ने राक्षसों से साधुओं को बचाने का उपक्रम किया. राम अपने भाइयों के साथ गुरु
के आश्रम में उसी तरह रहते थे जिस तरह आदिवासी और दलित बच्चे गांवों की पाठशालाओं
में पढ़ते हैं. रामदेव लाखों लोगों के सामने करोड़ों रुपयों की फिजूलखर्ची के दम पर
एकालाप करते हैं. यह आन्दोलन अरण्य रोदन बनेगा अथवा क्रांति की ललकार-इसका फैसला
होना बाकी है. योग शिविर के नाम पर ही मैदान एक माह के लिए आरक्षित किया गया. योग
क्रियाएं वहां बराएनाम चलीं. मुख्यतः महत्वाकांक्षा की राजनीति का नाटक चला.
3. बाबा ने सहयोगी बालकृष्ण के जरिए सरकार को सहमति पत्र लिखकर दिया. उसमें कहीं नहीं
लिखा कि यदि सरकार ने उनकी किसी बची खुची मांग को नहीं माना तो वे अनशन जारी रख
सकेंगे. वैसे भी बाबा को तीन जून का सहमति पत्र लिखने के बाद चार जून की सुबह वायदे
के अनुसार तप ही करना चाहिए था, अनशन नहीं. कपिल सिब्बल द्वारा चार जून की शाम सात
बजे बाबा की चिट्ठी जगजाहिर की गई. तब तक बाबा निजी संविदा के अनुसार यदि तप के बदले
अनशन कर रहे थे तो वह संविदा का स्पष्ट उल्लंघन है. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872
में तो ऐसा ही लिखा है.
4. बाबा कपिल सिब्बल पर विश्वासघात का आरोप लगाते हैं कि उनसे उपरोक्त पत्र
प्रधानमंत्री को दिखाने के नाम पर लिखवाया गया था. पत्र में लेकिन ऐसा कुछ नहीं लिखा
है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में यही लिखा है कि मौखिक साक्ष्य के अभाव में
दस्तावेजी साक्ष्य पर निर्भर करना होगा. कानूनी जुमला है कि दस्तावेज खुद बोलते
हैं. जब दस्तावेज सहमति का सुर अलाप रहा हो तो बाबा असहमति का प्रलाप करने के लिए
साक्ष्य अधिनियम द्वारा प्रतिबंधित हैं. उसे जन न्यायालय कभी स्वीकार नहीं करेगा.
5. बाबा ने पत्र के उजागर होने के ठीक पहले चीख चीखकर बार बार कहा कि उनकी सरकार से
निन्नानबे प्रतिशत मुद्दों पर सहमति हो गई है. केवल एक प्रतिशत सहमति की प्रतीक्षा
है. कानून कहता है कि यदि किसी मुद्दे पर निन्नानबे प्रतिशत सहमति हो जाए, तो उसे
सहमति ही माना जाएगा.
6. बाबा का यह हठयोग है कि विदेशों में जमा काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने
के लिए अध्यादेश लाया जाए. संघ परिवार खुलकर बाबा का समर्थन कर रहा है. बाबा ने संघ
परिवार के ख्यातनाम वकीलों राम जेठमलानी, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, महेश जेठमलानी
आदि से एक वैधानिक नोट लिखवाकर क्यों जारी नहीं किया जिससे उनकी इस मांग की
वैधानिकता जनता के जेहन में उतारी जा सकती. कथित धन विदेशी बैंकों में जमा है. उस
पर तत्समय प्रवृत्त देशी विदेशी और अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू होते हैं. इनमें कई
अंतर्देशीय संधियां भी शामिल हैं. लोकसभा का मानसून सत्र निकट ही है. बाबा ने कानूनी
पचड़े से बचते हुए यह मांग अन्ना हजारे की तरह क्यों नहीं की कि मानसून सत्र में
उनकी मांग के अनुरूप विधेयक लाया जाए. ऐसा करने से संसद की गरिमा, भूमिका और देश के
प्रति जवाबदेही को भी उनकी मांग के तहत समझा जा सकता था.
7. स्वामी रामदेव भ्रष्टाचारियों के लिए मृत्यु दंड की मांग करते हैं. साथ-साथ
अहिंसा के पुजारी को अपने उच्चारण में भूलते नहीं हैं. भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम,
1988 में दस वर्ष से कम अवधि की सजाओं का प्रावधान है. इस अधिनियम में अधिकतर तृतीय
और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ही पकड़े जाते हैं. बड़े अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा
चलाने के लिए राज्य सरकारें अमूमन अनुमति ही नहीं देती हैं.
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देश में सैकड़ों आई. ए.
एस. और आई. पी. एस. के अधिकारी भ्रष्टाचार के मुकम्मिल अन्वेषित मामलों में सिद्ध
भ्रष्ट हैं. उनके खिलाफ सरकारों ने मामला चलाने की अनुमतियां नहीं दी हैं. क्या
बाबा के जमावड़े ने सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत ऐसे कथित अभियुक्तों की
सूची सरकारों से मांगी है ताकि भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में बाबा समर्थकों की
प्रामाणिकता उजागर हो सकती.
8. भारतीय दंड संहिता, 1860 में हत्या और बड़ी डकैती तक के मामलों तक में मृत्यु दंड
के विकल्प के रूप में आजीवन सजा का प्रावधान है. क्या किसी भी सामान्य भ्रष्टाचारी
को हत्या के आरोपी से ज़्यादा सज़ा देने का कानून मानव अधिकारों और संयुक्त राष्ट्र
संघ के निर्देशों और समझौतों के खिलाफ नहीं होगा? क्या ऐसी मांग अल्प शिक्षित
भारतीय समाज में सनसनी पैदा करने का हेतु नहीं है?
9. तकनीकी पढ़ाई में सरकारी अधिनियम के द्वारा हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं के
माध्यम को लेकर रामदेव ने मांग उठाई है. बाबा को यह मालूम होना चाहिए कि भारतीय
संविधान सभा में गांधी के चेलों और संघ परिवार के पूर्वज श्यामाप्रसाद मुखर्जी के
रहते हुए भी प्रादेशिक भाषाओं के समर्थकों ने अंगरेजी मेम की गुलामी तो स्वीकार की
लेकिन हिन्दी को मां का दर्जा नहीं मिलने दिया. बाबा भारतीय संविधान की आठवीं
अनुसूची से अंगरेज़ी को हटाए जाने का आंदोलन क्यों नहीं चलाते? भारतीय उच्च
न्यायालयों में हिन्दी के क्षेत्रों में भी अंगरेज़ी माध्यम की भाषा है. वेद प्रताप
वैदिक जैसे हिन्दी के पुरोधा थिंक टैंक बाबा से यह मांग क्यों नहीं जुड़वा पाए? क्या
बाबा महाविद्यालयों के उन बच्चों की रायशुमारी करना चाहेंगे जो विदेशी भाषा में
भारतीय जनता के गाढ़े की कमाई से वसूले गए टैक्स पर इसलिए पढ़ाई करते हैं ताकि
विदेशों में जाकर अपना नसीब बना सकें.
10. बाबा विदेशों में धन जमा करने को ‘देशद्रोह‘ या ‘राष्ट्रद्रोह‘ की परिभाषा में
रखना चाहते हैं. भारतीय दंड संहिता सहित आतंकवाद और नक्सलवाद विरोधी कानूनों में भी
‘राजद्रोह‘ शब्द का इस्तेमाल किया गया है. राष्ट्र एक सांस्कृतिक बोध है और देश एक
भौगोलिक-राजनीतिक बोध. वैश्वीकरण के दौर में बाबा की कानूनी बुद्धि को यह भी स्पष्ट
करना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के चलते यदि किसी व्यक्ति का धन विदेशी बैंकों
में जमा किया जाता है तो उसे अपराध की श्रेणी में कैसे रखा जाएगा. अवैध और काले धन
को दुनिया के कुछ सुरक्षित देशों के बैंकों में ही जमा किया जाता रहा है. इसलिए इस
संबंध में एक स्पष्ट और अमल में लाने योग्य कानून का प्रारूप बनाकर बाबा के कानूनी
समर्थक केन्द्र सरकार को कटघरे में क्यों नहीं खड़ा पाते हैं?
11. बाबा ने लगातार भाषणों में उन घोटालों का तो ज़िक्र किया है जिसका संज्ञान
भारतीय न्यायालय ले रहे हैं. बाबा ने भाजपा शासित राज्यों के घोटालेबाजों के खिलाफ
जेहाद क्यों नहीं किया है? मसलन भाजपा से समर्थन लेने के समय बाबा ने यह क्यों
स्पष्ट नहीं किया कि उनकी राय येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं को लेकर क्या है.
कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने इन महानुभावों की जांच की है. हेगड़े ने साध्वी
ऋतंभरा द्वारा बाबा को समर्थन देने पर ऐतराज भी नहीं किया है. क्या देश हित में
बाबा हेगड़े की रिपोर्टों को लोकायुक्त संस्था के प्रति सम्मान दिखाने के लिए कुबूल
करेंगे जिससे सिद्ध भ्रष्टों को लेकर उनका विवेक निष्पक्ष रहे?
12. यह क्या बात है कि रामदेव को समर्थन देने वाली भाजपा लखनऊ के राष्ट्रीय अधिवेशन
में उसी दिन प्रधानमंत्री को लगभग भ्रष्ट कहते हुए इस्तीफे की मांग करती है. रामदेव
इसके विपरीत लगातार बाकी मंत्रियों को गरियाते हुए प्रधानमंत्री को ईमानदार घोषित
करते हैं. बल्कि उन्हें सोनिया गांधी द्वारा रिमोट से संचालित मानते हैं. कानूनी
नैतिकता होती है और नैतिक कानून भी होते हैं. रामदेव भाजपा से समर्थन लेते वक्त
नैतिक कानूनों के तहत भाजपा से प्रधानमंत्री के चरित्र को लेकर खुली असहमति क्यों
नहीं व्यक्त करते?
13. कृषि के क्षेत्र में रामदेव कुछ गोल मोल सी बातें करते हैं. संविधान की
व्यवस्था के अनुसार कृषि का बहुत बड़ा भार राज्यों पर ही है. पश्चिम बंगाल और केरल
में साम्यवादियों ने बेहतर भूमि सुधार किए हैं. अपने संभावित कृषि-दर्शन में रामदेव
ने इन राज्यों की प्रशंसा क्यों नहीं की. कृषि के क्षेत्र में केन्द्र के संवैधानिक
अधिकार जांच और जिरह का विषय हैं. इस सिलसिले में भी बाबा को एक विशेषज्ञ नोट क्यों
नहीं जारी करना चाहिए था?
14. कई ऐसे कानूनी मुद्दे भी हैं जिनसे समाज के उपेक्षित और शोषित वर्ग का सीधा
संबंध है. मसलन भू-अर्जन अधिनियम, 1894 एक बर्तानवी कोढ़ है जो भारतीय जिस्म पर फैला
हुआ है. वेदांता, टाटा, पोस्को, जिन्दल, रिलायंस, वगैरह सहित देशी विदेशी उद्योगपति
किसानों और आदिवासियों की छोटी छोटी जोत की कृषि भूमियों को सरकारों के दमन चक्र के
सहारे हड़प रहे हैं. भट्टा पारसौल में हाल ही में बाबा की आंखों के नीचे क्या यह सब
नहीं हुआ. भारतीय किसानों के पक्ष में भू-अर्जन अधिनियम को ध्वस्त करने के संबंध
में बाबा के आंदोलन में ममता बनर्जी का कोई उल्लेख क्यों नहीं है?
15. रामदेव अपनी चपल बुद्धि के चलते बार बार महिलाओं के समर्थन को रेखांकित करते
हैं. राष्ट्रीय स्वाभिमान के आंदोलन को यह मालूम है कि देश की अदालतों में लाखों
करोड़ों ऐसी परित्यक्त महिलाओं और अवयस्क बच्चों के भरण पोषण के मुकदमे लंबित हैं
जिनमें मौत और चरित्रहीनता ज़िंदगी पर हावी हो रही हैं. कई युवतियों को तो मामलों
में देरी होने के कारण अपनी अस्मत और अस्मिता के लिए भी पराजित होता संघर्ष करना पड़
रहा है.
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दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 वह मवाद घर है जहां देश की
परित्यक्त महिलाओं और बच्चों के जीवन में सड़ांध ने कब्ज़ा कर लिया है. इनका समर्थन
तो सबको चाहिए, लेकिन कौन इनका समर्थन करेगा?
16. क्या वजह है कि रामदेव के आंदोलन में डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर के क्रांतिकारी
विचारों का कोई उल्लेख नहीं होता. उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रशंसा
किए बिना देश का कोई भी आंदोलन दलित जन विचारकों की उपेक्षा या अनदेखी करके क्या हो
भी सकता है? अंबेडकर का सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप गांधी के कार्यक्रम के लिए भी
एक बड़ा भूचाल था. देश में असंगठित मजदूर वर्ग सहित धर्म के आडंबरों के खिलाफ डॉ.
अंबेडकर का संघर्ष इतिहास की बेमानी वस्तु नहीं है. रामदेव के समर्थकों में अंबेडकर
समर्थकों का टोटा दिखाई पड़ता है. डॉ. अंबेडकर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष
थे और भविष्यमूलक भी. क्या बाबा रामदेव ने भाजपा के नेता अरुण शौरी की किताब
‘वर्शिपिंग दि फॉल्स गॉड्स‘ के बारे में सुनकर ही भाजपा से समर्थन स्वीकार किया है?
17. काले धन के मामले में सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार में वैधानिक संवाद चल रहा
है. यह भारत का सुप्रीम कोर्ट है जो देश में जंगलों को बचाने, तकनीकी शिक्षा की
पढ़ाई को व्यवस्थित करने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए गरीबी रेखा के नीचे रहने
वाले हितग्राहियों को अनाज मुहैया कराने, टू. जी. स्पेक्ट्रम घोटाले के प्रकरण की
मॉनिटरिंग करने, नक्सलवादी इलाकों में सलवा जुडूम और विशेष पुलिस बल जैसी अवैधानिक
व्यवस्थाओं की समीक्षा करने तथा काले धन को लेकर हसन अली जैसे कुख्यात दलाल को
सीखचों में बंद कर सरकार पर दबिश देने के काम में लगा है. इस तरह काले धन का मामला
भी न्यायिक विचारण में है. क्या रामदेव की बात मानकर सरकार यदि मिली जुली कुश्ती की
तरह कोई अध्यादेश ला भी देती है तो क्या यह प्रयत्न सुप्रीम कोर्ट की पैनी निगाह से
बचकर काले धनधारियों को नए कानून बनने के पहले सरकार से डील करने का आरोप नहीं पैदा
करेगा?
18. देश में नागरिक सुरक्षा के विरुद्ध कई कठोर कानून केन्द्र और राज्य सरकारों ने
बना रखे हैं. इनमें महाराष्ट्र, असम और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य हैं. मानव अधिकार
कार्यकर्ताओं की कई रिपोर्टें इस बात को उजागर करती हैं कि नागरिक अधिकारों का
क्षरण हो रहा है. देश की सीमाओं और केन्द्र में हिंसा की ताकतें इसलिए भी सिर उठा
रही हैं कि नागरिक आज़ादी का अन्यथा भी कोई अर्थ नहीं है. हर बात में मृत्युदंड और
आजीवन कारावास की सजा का आह्वान करने से किस तरह की गांधी थीसिस उजागर होती है?
हिंसा, आक्रोश, उत्तेजना वगैरह की भाषा में हरियाणा के ही कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने
गीता का उपदेश नहीं दिया था. उसी प्रदेश में रामकृष्ण यादव का जन्म हुआ है. कृष्ण
उनकी तरफ खड़े थे जिन्हें अधिकार होने पर भी सुई की नोक के बराबर भूमि नहीं मिली थी.
रामदेव को वे लोग लाखों करोड़ों का चंदा दे रहे हैं जो अकिंचन वर्ग की भूमियां छीन
रहे हैं. बिजली और टैक्स की चोरी कर रहे हैं. जिन पर ढेरों मुकदमे कायम हैं. संसद
की शुचिता के लिए यह मांग की जाती है कि किसी भी अपराधी व्यक्ति को सदस्यता नहीं
मिलनी चाहिए. रामदेव ऐसे शपथ पत्र का प्रारूप क्यों नहीं छपवाते कि वे उनसे ही
आर्थिक, दैहिक और वैचारिक सहयोग लेंगे जिनके विरुद्ध अपराधिक प्रकरण लंबित नहीं
हों?
19. रामदेव के पास युवा नीति का कैसा प्रारूप है? राजीव गांधी के कारण देश में 18
वर्ष के युवजन को वोट देने का अधिकार मिल गया है. युवाओं की संख्या मतदाताओं में
आधी से ज़्यादा है. गलत चिट्ठी लिखने वाले बालकृष्ण को छोड़कर रामदेव के आंदोलन में
युवा शक्ति सिरे से नदारद है. भाजपा से निष्कासित गोविंदाचार्य, वैचारिकी के संघर्ष
से संन्यस्त वेद प्रताप वैदिक, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी अजित डोभाल, पूंजीवाद
समर्थक आर्थिक प्रौढ़ विचारक गुरुमूर्ति, संविधान की दक्षिणपंथी व्याख्या के समर्थक
अधिवक्ता महेश जेठमलानी वगैरह युवा विचारों के प्रतिनिधि नहीं हैं. उनके लिए रामदेव
एक समर्थ मुअक्किल की तरह उभरे हैं. रामदेव भी इतने खुले हुए नहीं हैं कि अपनी
विचारधारा का ऐसा निर्धारण करें कि खुले दिमाग के युवा उनके साथ आएं.
20. धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यकों की विशेष राजनीतिक और भौतिक उपस्थिति है.
गुलदस्तों की तरह मंच पर दाढ़ी, चोटी, टोपी, वगैरह का प्रबंधन सेक्युलरिज़्म के
सिद्धांत को आगे नहीं बढ़ाता. जो मुसलमान और ईसाई वगैरह संघ परिवार में भी
अल्पसंख्यकों की हैसियत में हैं, उनके रामदेव के साथ आने से पंथ निरपेक्षता का
सिद्धांत कैसे परवान चढ़ेगा. रामदेव के लिए तैयार किए गए राजनीतिक चिंतन पर कांग्रेस
महासचिव दिग्विजय सिंह की टिप्पणी का समर्थन किया जाना चाहिए कि खुद रामदेव को उनके
द्वारा उठाए गए कई मामलों की व्यापक समझ नहीं है. दिग्विजय सिंह को मानसिक रोगी
करार देना उनकी तार्किकता का उत्तर नहीं है. कृष्ण जैसे योगी ने तो महाभारत में
द्रौपदी के वस्त्र उतरते देखकर भी संयम नहीं छोड़ा था. दिग्विजय के तर्क दुःशासन के
कृत्य की तरह तो नहीं हैं.
देश में भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था और अत्याचार से निपटने के लिए हर आंदोलन का समर्थन
होना चाहिए और सरकारी इरादों का भी. इतिहास इतने वर्षों बाद भारतीय राजनीति में
विवेकानन्द, गांधी, भगतसिंह और डॉ. लोहिया वगैरह की याद को इसलिए जीवंत रखता है
क्योंकि अपनी तमाम प्रतिबद्धता के बावजूद ये महान जननेता असाधारण बौद्धिक थे.
तार्किकों के सहयोग से यदि जन आंदोलन आगे बढ़ते हैं तो उनके सुखी भविष्य की सबको
कामना करनी चाहिए.
06.06.2011, 01.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | N.S.Chouhan [adnschouhan@gmail.com] Indore - 2011-07-09 08:35:51 | |
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बाबा छल कर रहे हैं. काला धन से छल कर रहे हैं. बाबा की कथनी और करनी में अंतर है. | |
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| | prem kamboj [premwakeel@gmail.com] HA - 2011-07-02 11:45:15 | |
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आपने बाबा रामदेव को बहुत ही बड़ी चुनौतियों के लिए उत्साहित किया है.आपकी भूमिका मात्र लेख लिखने तक ही सिमित है या कुछ करने की.यदि तन्त्र भ्रष्ट है तो आप भी कुछ नहीं कर पायेगे.भ्रष्टाचार को दूर करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है.यहीं से वो सब त्रुटियाँ दूर होगीं, जिनका आपने अपने विभिन्न पैरा में उल्लेख किया है .इस आयोजन में आप अपना योगदान दें.अन्यथा इस बात को ध्यान में रखें कि आपकी उपस्थिति आपके पडोसी को बुरी तरह से खल रही है.यदि ये भ्रष्ट व्यवस्था चलती रही तो पडोसी को आपकी लोकतंत्र प्रणाली को समाप्त करने में देरी नहीं लगेगी.लोकतत्र एक जीवन व्यवस्था है जिसे संभाल कर रखने में प्रतियेक भारतीये को योगदान करना चाहिए न कि भ्रष्ट व्यवस्था का समर्थन.
रामदेव एक सन्यासी व्यक्ति है,बनाई गई सम्पति एक ट्रस्ट के नाम से है . किसी की व्यक्तिगत सम्पति नहीं है उसे राष्ट्रीय सम्पति ही माने.महात्मा गाँधी का समये लाचारी का समय था.आज हमारी व्यवस्था पटरी पर है.यदि हम उसमे सुधार कर सकते हैं तो हमें हर प्रकार से सुधार करने के प्रयत्न करने चाहिए.आप जानते है कि हजारों व्यक्ति एक तरफ भूखे मर रहे हैं . दूसरी तरफ लाखों क्विंटल गेहूं गोदामों में पड़ी गल जाती है और जानवरों के खाने के लायक ही नहीं रह जाती. इंसान भूखा मरता हाथों में हथियार उठा लेता है और हिंसा पर उतारू हो जाता है.आपके हिसाब से ये काम बाबा रामदेव को करना चाहिए,सरकार को नहीं. सरकार के भ्रष्ट होने के कारण ही ये काम नही हो रहा. | |
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| | Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-06-06 18:02:01 | |
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सटीक और सार्थक सवाल जो सही समय पर उठाये गये है ... माना सरकार भ्रष्ट है राजनीति चौपट है मगर जो इसे खतम करके व्यवस्था परिवर्तन चाहते है उनकी नियत और क्षमता का सबूत और प्रमाण माँगा ही जाना चाहिये !
चाहे बाबा हो या अन्ना हो इनमे प्रशासन मैनेजमेंट व्यवहारिकता और विजन की जबरदस्त कमी है जिसे अन्ना अक्सर अपनी ईमानदारी मे ढाँकने की कोशिश करते हैं...और बाबा तो खैर ईमानदार भी नही हैं !
यह ईमानदारी भी अभी परखी नही गयी है क्योकि इसकी असली परख वर्तमान राजनीति है फिर यह ईमानदारी इतना बडा शब्द नही है कि जो व्यक्तित्व के बाकि तमाम आयाम के रिक्त स्थानो को भर सके और इन बाकि आयामो में बाबा और अन्ना सिर्फ डेश डेश ही हैं !
अन्ना बाबा जिस तरह सरकार को विविध-भारती समझकर अपने फामाइशी धमकी भेज रहे है, आज उन्हे प्रधानमँत्री बना दिया जाये तो क्या वे कोई समाधान खोज पायेँगे ? ...ये ठीक और संतुलित सिवील सोसायटी तक नही बना पाये है ! मै दावे से कहता हुँ ये सरदार जी से गये बीते साबित होंगे ...इन्हें सिर्फ एक ही बात पता है और वो है अनशन-अनशन और अनशन ..मैंने कहा था अन्ना को बाबा को हमेशा के लिये नमस्कार करना सीख लेना चाहिये ...इन्होंने नही सीखा तो अब हम अन्ना को नमस्कार करते है ...अन्ना एँड बाबा : गुडबाय !! | |
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| | एम अखलाक [analhaque2007@gmail.com] मुजफ्फरपुर (बिहार) - 2011-06-06 17:18:08 | |
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ठग रामदेव की कलई खोलती इस शानदार रपट के लिए लेखक को बधाई। | |
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| | GS Bisht [] Delhi - 2011-06-06 12:16:01 | |
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TOTAL ONE SIDED STORY .. | |
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