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रामदेव प्रसंगः कानून के सवाल

मुद्दा

 

रामदेव प्रसंगः कानून के सवाल

कनक तिवारी


बाबा रामदेव ने राजनीति के ठहरे हुए सरोवर में एक बड़ा पत्थर फेंक दिया है. उठ रही लहरें उन्मत्त होकर खुद को समुद्र की लहरें समझ रही हैं. केन्द्र सरकार को आठ-दस मांगों का कच्चा चिट्ठा सौंपा गया है. सरकार ने उस पर सधी हुई संक्षिप्त भाषा में सहमति का इजहार किया है. उसमें असहमति को ज़्यादा स्पेस मिल गया है. दोनों पक्ष उसे अपनी अपनी और परस्पर विजय बता सकते हैं. जनता संशय के ऐसे पाठ सदियों से पढ़ती रही है. एक बड़ा राजनीतिक तमाशा हो रहा है. उसके चरित्र को समझना इतिहास, कानून, राजनीति और समाजशास्त्र की दृष्टि से नागर समाज के लिए आवश्यक होगा-

बाबा रामदेव


1. बाबा रामदेव के प्रयत्नों और वचनों में गांधी जी का सायास उल्लेख किया जाता है. गांधी वैश्य दीवान के बेटे थे. उन्होंने फकीरी का चोला ओढ़ लिया था. रामकृष्ण यादव हरियाणा के एक गांव में अकिंचन के घर जन्मे. पिछले 7-8 वर्षों में उन्होंने देश विदेश में अचल संपत्तियां बनाने के साथ ग्यारह हजार करोड़ रुपयों से अधिक का साम्राज्य खड़ा कर लिया है. मासूमियत में कहते हैं कि उनके नाम न तो एक इंच ज़मीन है और न ही एक रुपया. सब कुछ पातंजलि योगपीठ और स्वाभिमान ट्रस्ट वगैरह के नाम पर है. दोनों संस्थाएं उनकी मानस संतानें हैं. टू. जी. स्पेक्ट्रम घोटाले में भी तो अनिल अंबानी और रतन टाटा की कंपनियों पर अवैध लाभ का आरोप लगाया गया. उनके मुलाजिम बेचारे पकड़े गए. ये दोनों महान उद्यमी खुद सी. बी. आई. द्वारा बरी कर दिए गए. ऐसे में बाबा की संस्थाओं के विरुद्ध आरोप लगने पर यदि बाबा साफ बच जाते हैं तो क्या वे देशहित में यह कहेंगे कि टाटा और अंबानी ठीक ही छोड़ दिए गए हैं.

2. रामलीला मैदान में ताजा इतिहास की सबसे बड़ी और महंगी रामलीला हुई है. अविवाहित राम ने राक्षसों से साधुओं को बचाने का उपक्रम किया. राम अपने भाइयों के साथ गुरु के आश्रम में उसी तरह रहते थे जिस तरह आदिवासी और दलित बच्चे गांवों की पाठशालाओं में पढ़ते हैं. रामदेव लाखों लोगों के सामने करोड़ों रुपयों की फिजूलखर्ची के दम पर एकालाप करते हैं. यह आन्दोलन अरण्य रोदन बनेगा अथवा क्रांति की ललकार-इसका फैसला होना बाकी है. योग शिविर के नाम पर ही मैदान एक माह के लिए आरक्षित किया गया. योग क्रियाएं वहां बराएनाम चलीं. मुख्यतः महत्वाकांक्षा की राजनीति का नाटक चला.

3. बाबा ने सहयोगी बालकृष्ण के जरिए सरकार को सहमति पत्र लिखकर दिया. उसमें कहीं नहीं लिखा कि यदि सरकार ने उनकी किसी बची खुची मांग को नहीं माना तो वे अनशन जारी रख सकेंगे. वैसे भी बाबा को तीन जून का सहमति पत्र लिखने के बाद चार जून की सुबह वायदे के अनुसार तप ही करना चाहिए था, अनशन नहीं. कपिल सिब्बल द्वारा चार जून की शाम सात बजे बाबा की चिट्ठी जगजाहिर की गई. तब तक बाबा निजी संविदा के अनुसार यदि तप के बदले अनशन कर रहे थे तो वह संविदा का स्पष्ट उल्लंघन है. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 में तो ऐसा ही लिखा है.

4. बाबा कपिल सिब्बल पर विश्वासघात का आरोप लगाते हैं कि उनसे उपरोक्त पत्र प्रधानमंत्री को दिखाने के नाम पर लिखवाया गया था. पत्र में लेकिन ऐसा कुछ नहीं लिखा है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में यही लिखा है कि मौखिक साक्ष्य के अभाव में दस्तावेजी साक्ष्य पर निर्भर करना होगा. कानूनी जुमला है कि दस्तावेज खुद बोलते हैं. जब दस्तावेज सहमति का सुर अलाप रहा हो तो बाबा असहमति का प्रलाप करने के लिए साक्ष्य अधिनियम द्वारा प्रतिबंधित हैं. उसे जन न्यायालय कभी स्वीकार नहीं करेगा.

5. बाबा ने पत्र के उजागर होने के ठीक पहले चीख चीखकर बार बार कहा कि उनकी सरकार से निन्नानबे प्रतिशत मुद्दों पर सहमति हो गई है. केवल एक प्रतिशत सहमति की प्रतीक्षा है. कानून कहता है कि यदि किसी मुद्दे पर निन्नानबे प्रतिशत सहमति हो जाए, तो उसे सहमति ही माना जाएगा.

6. बाबा का यह हठयोग है कि विदेशों में जमा काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने के लिए अध्यादेश लाया जाए. संघ परिवार खुलकर बाबा का समर्थन कर रहा है. बाबा ने संघ परिवार के ख्यातनाम वकीलों राम जेठमलानी, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, महेश जेठमलानी आदि से एक वैधानिक नोट लिखवाकर क्यों जारी नहीं किया जिससे उनकी इस मांग की वैधानिकता जनता के जेहन में उतारी जा सकती. कथित धन विदेशी बैंकों में जमा है. उस पर तत्समय प्रवृत्त देशी विदेशी और अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू होते हैं. इनमें कई अंतर्देशीय संधियां भी शामिल हैं. लोकसभा का मानसून सत्र निकट ही है. बाबा ने कानूनी पचड़े से बचते हुए यह मांग अन्ना हजारे की तरह क्यों नहीं की कि मानसून सत्र में उनकी मांग के अनुरूप विधेयक लाया जाए. ऐसा करने से संसद की गरिमा, भूमिका और देश के प्रति जवाबदेही को भी उनकी मांग के तहत समझा जा सकता था.

7. स्वामी रामदेव भ्रष्टाचारियों के लिए मृत्यु दंड की मांग करते हैं. साथ-साथ अहिंसा के पुजारी को अपने उच्चारण में भूलते नहीं हैं. भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 में दस वर्ष से कम अवधि की सजाओं का प्रावधान है. इस अधिनियम में अधिकतर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ही पकड़े जाते हैं. बड़े अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकारें अमूमन अनुमति ही नहीं देती हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

N.S.Chouhan [adnschouhan@gmail.com] Indore - 2011-07-09 08:35:51

 
  बाबा छल कर रहे हैं. काला धन से छल कर रहे हैं. बाबा की कथनी और करनी में अंतर है. 
   
 

prem kamboj [premwakeel@gmail.com] HA - 2011-07-02 11:45:15

 
  आपने बाबा रामदेव को बहुत ही बड़ी चुनौतियों के लिए उत्साहित किया है.आपकी भूमिका मात्र लेख लिखने तक ही सिमित है या कुछ करने की.यदि तन्त्र भ्रष्ट है तो आप भी कुछ नहीं कर पायेगे.भ्रष्टाचार को दूर करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है.यहीं से वो सब त्रुटियाँ दूर होगीं, जिनका आपने अपने विभिन्न पैरा में उल्लेख किया है .इस आयोजन में आप अपना योगदान दें.अन्यथा इस बात को ध्यान में रखें कि आपकी उपस्थिति आपके पडोसी को बुरी तरह से खल रही है.यदि ये भ्रष्ट व्यवस्था चलती रही तो पडोसी को आपकी लोकतंत्र प्रणाली को समाप्त करने में देरी नहीं लगेगी.लोकतत्र एक जीवन व्यवस्था है जिसे संभाल कर रखने में प्रतियेक भारतीये को योगदान करना चाहिए न कि भ्रष्ट व्यवस्था का समर्थन.
रामदेव एक सन्यासी व्यक्ति है,बनाई गई सम्पति एक ट्रस्ट के नाम से है . किसी की व्यक्तिगत सम्पति नहीं है उसे राष्ट्रीय सम्पति ही माने.महात्मा गाँधी का समये लाचारी का समय था.आज हमारी व्यवस्था पटरी पर है.यदि हम उसमे सुधार कर सकते हैं तो हमें हर प्रकार से सुधार करने के प्रयत्न करने चाहिए.आप जानते है कि हजारों व्यक्ति एक तरफ भूखे मर रहे हैं . दूसरी तरफ लाखों क्विंटल गेहूं गोदामों में पड़ी गल जाती है और जानवरों के खाने के लायक ही नहीं रह जाती. इंसान भूखा मरता हाथों में हथियार उठा लेता है और हिंसा पर उतारू हो जाता है.आपके हिसाब से ये काम बाबा रामदेव को करना चाहिए,सरकार को नहीं. सरकार के भ्रष्ट होने के कारण ही ये काम नही हो रहा.
 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-06-06 18:02:01

 
  सटीक और सार्थक सवाल जो सही समय पर उठाये गये है ... माना सरकार भ्रष्ट है राजनीति चौपट है मगर जो इसे खतम करके व्यवस्था परिवर्तन चाहते है उनकी नियत और क्षमता का सबूत और प्रमाण माँगा ही जाना चाहिये !
चाहे बाबा हो या अन्ना हो इनमे प्रशासन मैनेजमेंट व्यवहारिकता और विजन की जबरदस्त कमी है जिसे अन्ना अक्सर अपनी ईमानदारी मे ढाँकने की कोशिश करते हैं...और बाबा तो खैर ईमानदार भी नही हैं !
यह ईमानदारी भी अभी परखी नही गयी है क्योकि इसकी असली परख वर्तमान राजनीति है फिर यह ईमानदारी इतना बडा शब्द नही है कि जो व्यक्तित्व के बाकि तमाम आयाम के रिक्त स्थानो को भर सके और इन बाकि आयामो में बाबा और अन्ना सिर्फ डेश डेश ही हैं !
अन्ना बाबा जिस तरह सरकार को विविध-भारती समझकर अपने फामाइशी धमकी भेज रहे है, आज उन्हे प्रधानमँत्री बना दिया जाये तो क्या वे कोई समाधान खोज पायेँगे ? ...ये ठीक और संतुलित सिवील सोसायटी तक नही बना पाये है ! मै दावे से कहता हुँ ये सरदार जी से गये बीते साबित होंगे ...इन्हें सिर्फ एक ही बात पता है और वो है अनशन-अनशन और अनशन ..मैंने कहा था अन्ना को बाबा को हमेशा के लिये नमस्कार करना सीख लेना चाहिये ...इन्होंने नही सीखा तो अब हम अन्ना को नमस्कार करते है ...अन्ना एँड बाबा : गुडबाय !!
 
   
 

एम अखलाक [analhaque2007@gmail.com] मुजफ्फरपुर (बिहार) - 2011-06-06 17:18:08

 
  ठग रामदेव की कलई खोलती इस शानदार रपट के लिए लेखक को बधाई। 
   
 

GS Bisht [] Delhi - 2011-06-06 12:16:01

 
  TOTAL ONE SIDED STORY ..  
   
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