पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >राजनीति >बात Print | Share This  

मत गांधी को बदनाम करो

मुद्दा

 

मत गांधी को बदनाम करो

कनक तिवारी


पानी, भात, रोटी, आलू, शक्कर, नमक और गांधी हर मुसीबतज़दा भारतीय के जीवन के सात सुर हैं. ये सब सस्ते ही हैं बनिस्बत बाकी चीज़ों और व्यक्तियों के. इन पर सभी मनुष्यों का एकाधिकार है. ये जीवन रक्षक तो हैं लेकिन धीरे धीरे केवल इस्तेमाल की वस्तु प्रचारित हो गए हैं. ये आसानी से सड़ते या खराब नहीं होते. कहीं भी मिल जाते हैं और देह में रचते, पचते, बसते जाते हैं. ये कंट्रोल की वस्तु नहीं बन पाते भले ही सरकार कभी कभी कोशिश करती रहे.

ramdev-and-gandhi

रामदेव और अन्ना हजारे प्रसंग में गांधी का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. अन्ना के सात्विक अनशन के वक्त देश को गांधी की याद आई. कुछ ने अन्ना में गांधी ढूंढ़ना शुरू भी कर दिया. अन्ना हजारे भले मानुष हैं. उन्होंने ऐसी चाटुकारिता को खारिज करते हुए सत्य कहा कि वे तो गांधी के पैर की धूल के बराबर भी नहीं हैं. इसके बरक्स बाबा रामदेव बहुत चतुराई के साथ अपने अनशन आंदोलन को गांधीवादी नस्ल का करार दे रहे हैं. वे बात बात में गांधी जी की याद करने लगते हैं जिससे लोग रामदेव के मार्फत गांधी को नहीं भूले. ऐसा करने से गांधी का नुकसान और रामदेव का फायदा तो होता है.

फिलवक्त रामदेव कैमरे के सामने बार बार एकालाप कर रहे हैं कि गांधी होते तो दिल्ली पुलिस की बर्बरता देखकर रोने लगते. इतिहास में गांधी कभी नहीं रोए. अलबत्ता वे लोगों की आंखों से बहने वाले आंसू पोछते रहे. गांधी आत्म क्रूर व्यक्ति थे. उन्होंने अपनी भावनाओं पर मनसा वाचा कर्मणा नियंत्रण कर लिया था. साबरमती आश्रम के एक कुष्ठ रोगी का मलमूत्र साफ करने से इंकार करने पर गांधी ने अपनी उस बड़ी बहन को आश्रम निकाला दे दिया जिसे मातृविहीन गांधी अपनी माता कहते थे. अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ उन्होंने ऐसा ही सलूक किया था. करोड़ों की दवाइयां बेचने वाले स्वामी रामदेव के आश्रम या योगपीठ में कितने कुष्ठ रोगियों की मुफ्त सेवा हो रही है?

अद्भुत सांस्कृतिक विचारक राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि त्रेता के राम रोऊ थे. पत्नी सीता के अपहरण के बाद वे जंगल में पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से रो रोकर सीता का पता पूछते थे. इसके बरक्स द्वापर के कृष्ण कभी नहीं रोए. जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था केवल तब कृष्ण की आंखें डबडबाई थीं. रामदेव ने तो खुद का चीरहरण किया और रोए भी. भट्टा पारसौल में जब मायावती की पुलिस स्त्रियों का चीरहरण कर रही थी तब रामदेव दूरदर्शन पर क्यों नहीं रोए? भट्टा पारसौल के निकट नोएडा में अनशन करने के लिए उन्होंने मायावती से क्या इसलिए अनुमति मांगी है कि वे टेलीविजन चैनलों के मुख्यालयों के नज़दीक होने के कारण हंस हंसकर अपनी प्रचार दुकान सजाएं?

गांधी ने महाभारत के अठारह अध्याय पढ़े थे, अठारह पुराण भी. वे शांति पर्व को महाभारत का निकष बताते हैं. वे तो यहां तक कहते हैं कि गीता युद्ध की निस्सारता का दस्तावेज है. इससे गांधी के समकालीन संघ परिवार के पूर्वज सावरकर सहमत नहीं थे. सहमत तो लोकमान्य तिलक भी नहीं थे.

आज जो लोग हिन्दुस्तान की राजनीति में धार्मिक नफरत, जातीय विद्वेष और आतंकवादी हिंसा घोलने के पंजीबद्ध अभियुक्त हैं, वे भी. रामदेव अपने मंच पर उनका सम्मान क्यों करते हैं. गांधी कभी भी चार्टर्ड हवाई जहाज या हेलिकॉप्टर से यात्रा नहीं करते थे. रामदेव द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में यात्रा क्यों नहीं करते? अरबपति लोग और फिल्मी तारिकाएं उनके चेले चेलियां क्यों हैं? बाबा ने विदेशों में जमीन क्यों ले ली है. बाबा ढेरों कंपनियों के निर्माता क्यों हैं?

गांधी तो सादगी के पुजारी थे. यदि उन्हें आंदोलन करना भी होता तो वे अठारह करोड़ रुपया खर्च कर देश के इतिहास की सबसे बड़ी रामलीला आयोजित नहीं करते. पता नहीं रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण पर कितना खर्च हुआ होगा? चंपारण का नील सत्याग्रह हो. दांडी का नमक मार्च हो या देश में की गई हरिजन यात्रा हो-गांधी ने वह सब तामझाम कहां दिखाया, रामलीला मैदान जिसका इतिहास में पूंजीवादी प्रस्थान बिंदु होगा.

गांधी के मुंह में तो क्या मन में भी अंगरेजों के लिए कोई नफरत नहीं थी. अंगरेजियत से उनको अलबत्त नफरत थी. बाबा को अपने आलोचकों, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह वगैरह से नफरत क्यों है? गांधी ने तो कभी भी अंगरेज प्रधानमंत्री और भारतीय वाइसरॉय से बोलचाल की खुट्टी नहीं की. चर्चिल ने ही तो गांधी को ‘नंगा फकीर‘ कहा था. गांधी ने इतिहास में सिद्ध किया कि वे वास्तव में दिगंबर फकीर हैं. अंगरेज के पास शब्दों का टोटा था इसलिए उसने दिगंबर शब्द का उच्चारण नहीं किया. रामदेव भगवा फकीर क्यों नहीं कहलाना चाहते जिसके प्रवर्तक विवेकानन्द हैं?

कृषि, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी वगैरह की पढ़ाई के लिए बाबा रामदेव भारत सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह हिन्दी और भारतीय भाषाओं में भी पढ़ाई जाए. गांधी गुजराती मां के बेटे थे. व्याकरण सम्मत हिन्दी तक बोलना उन्हें नहीं आता था. फिर भी उन्होंने हिन्दी विरोधी दक्षिण में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सफल दफ्तर खोले.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

LaxmiNarainSharma [laxminarain.sharma@yahoo.com] Kotputli - 2011-06-13 16:41:21

 
  योग के सच्चे अर्थों में न तो बाबा और ना ही नेता सही हैं. ये दुनिया है, सब जानती है.योग के अथाह अंग हैं.यम और नियम योग की नींव हैं. यम का सीधा-सा अर्थ है कि इससे यमराज या यमदूत अथवा पूलिस पास नहीं आये. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रहाम्चर्य एवं अपरिग्रह, क्या कथित बाबा ने इनका पालन किया है? मनवा तो पंछी हुआ उड़कर चला आकाश, ऊपर ही से गिर पड़ा मन माया के पास.साधुन-दासी-चोरन-खाँसी, प्रेम बिना से हाँसी! खुसरो वाकी बुद्धि विनासे, रोटी खाए जो बासी!!... समझदार को इशारा ही काफी है. 
   
 

के. रवींद्र [] रायपुर - 2011-06-12 12:17:56

 
  गांधी तो सादगी के पुजारी थे. यदि उन्हें आंदोलन करना भी होता तो वे- अठारह करोड़ रुपया खर्च कर देश के इतिहास की सबसे बड़ी रामलीला आयोजित नहीं करते. बढ़िया आलेख, गांधी और बाबा की तुलना करना ही मूर्खता है.
गांधी से अधिकतर असहमत रहने के बावजूद तमीज़ से ही पेश आते थे.-तिवारी जी शायद मूर्खता और तमीज किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं होती.
 
   
 

vinod babbar [rashtrakinkar@gmail.com] delhi - 2011-06-08 16:02:03

 
  हूजूर, रामदेव को नहीं, रात में बिना नोटिस लाठी चलने वालो को कोसिये. यह सच है कि रामदेव राजनीति कर रहे हैं पर राजनीति कौन नहीं कर रहा. तथाकथित गाँधी परिवार राजनीति नहीं करता क्या? रामदेव का मैदान छोड़कर भागना गलत है पर भ्रष्टाचार का विरोध उचित है. वैसे मजबूर पीएम से इस से ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह अपनी पहली वफ़ादारी कुर्सी के असली मालिको के प्रति निभाए. 
   
 

Biju Toppo [biju.toppo@gmail.com] Ranchi - 2011-06-08 05:35:05

 
  @sandish, तुम्हारे जैसे गंदे कुसंस्कारी लोगों के कारण ही बाबा रामदेव अपना मानसिक संतुलन नहीं बना पा रहे हैं. तुम जैसे लोगों के अंदर आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं है. जो लोग सच्ची बात कह रहे हैं, तुम्हारे जैसे बाबा रामदेव के एजेंट उन पर पैसा खाने का आरोप लगा दे रहे हैं. मतलब ये कि बाबा का समर्थन करो तो ठीक, न करो तो पैसे खाये हैं. वाह रे बाबा के चेले. बाबा ने सुबोध कांत सहाय से कितने पैसे खाये हैं ? रांची में दिये बाबा के भाषण सुनो, जहां बाबा सुबोध कांत को धरती का सबसे महान नेता बताते फिरते थे. 
   
 

Sanjeev Tiwari [sanjeev.tiwari.2001@gmail.com] Delhi - 2011-06-08 05:23:31

 
  लेखक ने बाबा जी को लेकर बहुत अच्छे विचार व्यक्त किये हैं. काश कि बाबा जी के भक्तगण उन्हें यह लेख पढ़ा देते. 
   
 

sandish [sansdesh@gmail.com] USA - 2011-06-08 02:09:35

 
  लगता है कि बहुत पैसे खाये हैं इस लेख को लिखने के लिये. आज कल बहुत सारे तथाकथित लेखक आ गये हैं जो पैसे खा कर ऐसा लिखते हैं. 
   
 

अरुण कान्त शुक्ला [shukla.arunkant@gmail.com] रायपुर - 2011-06-07 19:10:58

 
  आज रामदेव को भगतसिंह और गांधी याद आ रहे हैं | पर, उन्हें अपनी करतूतों की तुलना देश के इन सम्मानित और कुरबानियां देने वालों से करके, उनका अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है| कुछ लोग कहते हैं कि जनांदोलनों का कोई अनुभव नहीं होने की वजह से उनसे कुछ अनाड़ीपन हो गया| रामदेव ने जो किया, वह अनाडीपन नहीं , बल्कि उससे भी बड़ा और गंभीर अपराध है| वे कोई गोरिल्ला युद्ध या भगतसिंह जैसी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे| भगतसिंह ने एक विदेशी शासन का , जबकि वे जानते थे कि उनकी मौत निश्चित है, बहादुरी से मुकाबला किया था| उन्हें जेल से भागने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने मना कर दिया था| गांधी ने भी कभी भी गिरफ्तारी से बचने के लिये मुँह छिपाकर भागने का रास्ता नहीं अपनाया| गांधी आज सरकार की लाठियां चलने पर रोते या नहीं, जैसा के रामदेव कह रहे हैं, मैं नहीं जानता पर रामदेव के भागने पर जरुर रोते| रामदेव एक जनांदोलन का नेतृत्व कर रहे थे , जिसकी अपनी जिम्मेदारियां होती हैं, जिसे वे पूरा नहीं कर पाए| कनक जी एक सुंदर लेख के लिये बधाई | 
   
 

Harsh Dhar Diwan [harshdhardiwan@yahoo.com] Raipur - 2011-06-07 18:20:30

 
  लोकतंत्र = भीड्तंत्र. चुनाव सीमित. भ्रष्ट उम्मीदवारों में से एक का ज्यादा वोट.किसी भी गुणवत्ता के ज्यादा लोगों का समर्थन किसी भी गुणवत्ता के उम्मीदवार को मिल जाये, वो हमारे बेहतर जीवन के लिये कानून अपने हिसाब से बनायेगा. एक सांसद ज्यादा से ज्यादा 5-6 लाख या एक विधायक 1-2 लाख लोगों को सिर्फ वोट देते वक्त 1 मिनिट के लिये प्रभावित करके 5 साल तक हम पर राज कर सकता है लेकिन करोड़ों लोगों के लगातार समर्थन के साथ अन्ना या बाबा हमारे बेहतर जीवन के लिये कानून हमारे हिसाब से कानून क्यों नहीं बना सकते ?  
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-06-07 15:52:59

 
  आपने सही कहा कि-विचारों की ऐसी कॉकटेल से अहंकार का नशा तो हो सकता है लेकिन नशे के अहंकार को जीवन का सत्य नहीं कहा जाता.
सार्थक और जरुरी बातें !!
 
   
 

piyush manush [jungleclub@gmail.com] Salem, Tamilnadu - 2011-06-07 10:41:24

 
  Baba Ramdev, Answers please – Going backwards. You appeared in public on the 5th afternoon in a women’s robe which you claimed to have changed in the commotion that ensued when the police arrived to kill you in a encounter in full public gaze. Why do you feel that such grave danger lurks around when no minister is in jail because of your actions nor have have you caused any financial loss to any corporates or others ?

For two hours or more you disguised yourself & stayed in hiding adding to the anxiety of the thousands in the Ram Lila Maidan, do you not feel that as a leader & the sole leader that you have projected yourself , you should have stayed in full public view & handled the
situation better ? When in a interview you had claimed that hundred percent of your demands have been accepted why did you continue with the fast? You termed that this assault was the worst in Indian history worse than the Jallia Wallan Bagh, do u still stand by that?

Before the fast began the parley of talks that were held with the government thru its ministers in different locations such as Airport & Hotels with regard to the demands that your group had raised were any of the members of the IAC (India against Corruption) invited to join in the talks ? Prior to the satyagraha launched by the IAC group in jantar mantar in the press meet that was jointly organized a effort was made to hijack the whole event by putting posters of Bharat Swabhiman in the background as if the group has released the Jan LokPal Bill & also several statements made by you revealed that you had formulated the Jan LokPal Bill. Then suddenly why have you distanced yourself from the whole process of drafting the bill?

You have claimed that you are supported by crores of countrymen & that count would account for thousands in each town & city. With such a huge following one case in a life time by each follower would ensure that corruption would be wiped out completely. How many cases have been filed by your group & followers till date? Repeated feelers were sent to your group with regard to capital punishment for cow slaughter & the differences that prevailed by dalit & atheist groups in your visit to tamilnadu. Did you try meeting the dissident voice ?

Death sentence for Corrupt people is your firm demand. Is it not violence at its most regressive form? Have you verified the number of cases that are taken up by the police & in courts whether they are true or false. While the administration goes on filling false cases on dissenting voice, won’t the death sentence for corruption embolden the state to kill dissenting voices easily?

Sadhvi Rithambra, RSS the organization which killed Mahatma Gandhi (your ideal politician) BJP all have partnered with you in the fight against corruption. You seem to have no discomfort with their support. How do you claim yourself to be non-communal while your demand for Hindi as a language, Death for cow slaughter, saffronisation of society etc all point towards affiliation to one religion & enforcing the same thru law?

Seeking Answers & Hoping for a dialogue.
 
   
 

संतोष त्रिवेदी [chanchalbaiswari@gmail.com] नई दिल्ली - 2011-06-07 10:37:15

 
  अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए गाँधी को अच्छे या बुरे दोनों रूपों में आज के बाबा और नेता याद करते हैं.दर-असल न वे बाबा हैं और न नेता !
अब लोग समझदार हैं,उन्हें गाँधी का दर्शन और आज के उनके तथाकथित अनुयायियों का उद्देश्य बखूबी समझ आता है !
 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in