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सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

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माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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और-और नंदीग्राम

मुद्दा

 

और-और नंदीग्राम

मनीष शांडिल्य पटना से


एक घायल युवक जमीन पर बेसुध पड़ा हो और फायरिंग करने वाली पुलिस का एक जवान उस पर प्रतिशोध में कूदे और उसे बेरहमी से रौंदे और वहां मौजूद पुलिस कप्तान से लेकर पूरा-का-पूरा पुलिस व प्रसाशन का कुनबा बस तमाशबीन ही बना रहे. क्या एक 'लोकतांत्रिक' देश की पुलिस से ऐसे कुकृत्य की कल्पना की जा सकती है?

बिहार पुलिस

स्वाभाविक तौर पर हरेक का जबाव न होगा. लेकिन बिहार के भजनपुर गांव में पुलिस का जो अमानवीय, क्रूर और बर्बर चेहरा बेनकाब हुआ है, उसके बाद ऊपर पूछे गये सवाल का जबाव खुद-ब-खुद पलट जाता है. साथ ही रोंगटे खड़े कर देने वाली यह बर्बरता हरेक जागरूक व संवेदनशील जनता को यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम कैसे छद्म लोकतंत्र में जी रहे हैं. एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें घायल को इलाज मुहैया कराने के बजाए पुलिस का जवान उसके जिस्म पर 'तांडव नृत्य' करता है, उपस्थित अधिकारी मूकदर्शक भर बने रहते हैं और वीडियो फुटेज के कारण जब पुलिस बेनकाब होती है तो सरकार मात्र उस कूदने वाले जवान पर कार्रवाई करने की खानापूर्ति कर वहां मौजूद बाकी सभी को बचाने की कोशिश करती है.

बिहार का भजनपुर गांव, जहां पुलिस का दमन अपने क्रूरतम रूप में सामने आया है, राज्य में एक-एक कर उग रहे नंदीग्रामों की कड़ी में एक नया नाम भर है. यह गांव राज्य के अररिया जिले के फारबिसगंज अनुमंडल के अंतर्गत आता है. विगत तीन जून को यहां चार ग्रामीण पुलिस की गोली का शिकार हुए और लगभग दर्जन भर घायल. घायलों में से एक और युवक की मौत घटना के दूसरे दिन चार जून को हुई. मरने वालों में एक महिला और आठ महीने का बच्चा भी शामिल हैं. सभी मृतक मुस्लिम समुदाय से हैं. इनका कसूर बस इतना भर था कि ये ग्रामीण उद्योग के लिए सरकार द्वारा आवंटित जमीन से होकर आने-जाने का अधिकार मांग रहे थे क्योंकि आवंटित किये जाने के पहले इसी जमीन से होकर गुजरने वाला रास्ता उन्हें आस-पास के इलाकों से जोड़ता था.

इस गोलीबारी के दूसरे दिन एक टीवी चैनल द्वारा इस घटना से संबंधित एक वीडियो फुटेज जारी करने के बाद भारतीय लोकतंत्र और इसके नये उभरते नायक नीतीश कुमार के सरकार के ‘सुशासन’ का यह वीभत्स चेहरा सामने आया है.

भजनपुर में पुलिस एक निजी कंपनी की जमीन की सुरक्षा करने के लिये गई थी, जो पिछले कुछ सालों में बिहार पुलिस की लगभग ड्यूटी-सी हो गई है. इन निजी कंपनियों की सुरक्षा में लगे जवान हमेशा ही कहर बरपाते रहे हैं. पिछले एक साल में ही राज्य में किसान कई बार पुलिस का शिकार बने हैं. पटना जिले के बिहटा, औरंगाबाद के नबीनगर और मुजफ्फरपुर के मड़वन इलाके में फोर-लेन सड़क, थर्मल पावर प्लांट और एस्बेस्टस फैक्ट्री का विरोध करने पर किसानों पर पुलिस का कहर बरपना कुछ उदाहरण भर हैं. औरंगाबाद में किसान मारे भी गये थे.

इसके अलावा पिछले छह सालों के दौरान अन्य कई मौकों पर भी पुलिस बर्बर कार्रवाई कर चुकी है. कहलगांव में साल 2008 के जनवरी महीने में नियमित बिजली की मांग कर रहे लोगों में से तीन शहरी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे. साल 2007 में भागलपुर में चोरी के आरोपी औरंगजेब का 'स्पीडी ट्रायल' करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने उसे अपने मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर घसीटा था. कोसी इलाके में उचित मुआवजा और पुनर्वास की मांग करने वाले बाढ़-प्रभावित भी पुलिस की गोली का निशाना बने थे.

भजनपुर की हालिया घटना में पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई की पृष्टभूमि कुछ यूं है कि बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार (बियाडा) ने भजनपुर गांव के पास मैसर्स औरो सुन्दरम इंटरनेशनल को स्टार्च और ग्लूकोज फैक्ट्री स्थापित करने के लिए 36.65 एकड़ जमीन आवंटित की थी. इस कंपनी में सत्तारूढ़ भाजपा के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पुत्र सौरभ अग्रवाल भी साझेदार हैं.

कंपनी ने जब इस जमीन पर निर्माण कार्य शुरू किया तो ग्रामीणों के काम आने वाला रास्ता बंद कर दिया गया. इस कारण भजनपुरा के गांववाले उद्योग के लिए चिह्नित जमीन से होकर रास्ता बहाल किये जाने की मांग पर गोलबंद होने लगे. मगर हमेशा की तरह जिला प्रशासन ने इस मसले पर तुरंत गंभीरता नहीं दिखाई, समय रहते मामला सुलझाया नहीं. नतीजतन 03 जून को गांववालों ने फैक्ट्री के सामने सरकारी दावे के अनुसार हिंसक प्रदर्शन शुरू किया, मशीनों में आग लगाई, तैनात पुलिस बल पर फायरिंग की. इसके जबाव में पुलिस को ‘आत्मरक्षार्थ’ जब गोली चलानी पड़ी और 5 लोग मारे गये. सरकारी अधिकारीयों के अनुसार इस घटना में अररिया के एसपी और मजिस्ट्रेट सहित 27 पुलिसकर्मी और दर्जन भर ग्रामीण भी घायल हुए हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

मिसिर [misirkatya55@gmail.com] sitapur,uttar pradesh - 2011-06-13 15:11:22

 
  पुष्ट हुआ कि देश में सत्ता पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली मात्र है, जो सब कुछ लूट लेने को बेसब्र हो रहा है ! 
   
 

owais alam [] New Delhi - 2011-06-13 07:40:44

 
  ये खबर तो दिल दहला देने वाली है. ऐसा नहीं होना चाहिये. न जाने कितने गरीब लोग मारे जाते होंगे. इसका तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है. शुक्रिया मनीष जी आपका. 
   
 

jayant piriyadarsh [jayant_priyadarshi@yahoo.co.in] Ranchi - 2011-06-13 05:34:04

 
  keep it up guru. 
   
 

संध्या नवोदिता [navodiita@gmail.com] इलाहाबाद - 2011-06-12 18:57:57

 
  बहुत ही दुखद घटना.मन आक्रोश से भर गया.यह कैसा लोकतंत्र है ?जब लोग कहते हैं कि लोकतंत्र की हत्या हुई तो अब यह सही नहीं लगता. आखिर लोकतंत्र की कितनी हत्यायें होंगी और उसके बाद भी लोकतंत्र जीवित रहेगा !! कहना चाहिए कि लोकतंत्र अब देश में है ही नहीं.यह तो सामंतशाही है.आप सरकार की आलोचना नहीं कर सकते.. विरोध दर्ज नहीं करा सकते.. अनशन ,धरना,सत्याग्रह नहीं कर सकते.. कोर्ट के फैसलों की आलोचना नही कर सकते यह अवमानना हो जाती है,नौकरशाह भी सामंत बने बैठे हैं उनके खिलाफ तो खैर सारे रास्ते बंद हैं ही ...यही लोकतंत्र के तीन मज़बूत अंग हैं .जब इन सबमें इतनी सडांध है तो लोकतंत्र कैसे है ?? क्यों नहीं इसे थोड़ा लिबरल सामंती तंत्र कहा जाना चाहिए ?? 
   
 

arshad ajmal [arshadajmal@yahoo.co.in] patna - 2011-06-11 05:32:47

 
  ताज़ा सूचना है कि बिहार सरकार ने 7 महीने के बच्चे के मरने पर उसके परिजनों के लिए 3 लाख रूपए का मुआवजा देने की घोषणा की है. मतलब यह कि यह 7 महीने का बच्चा दंगाई नहीं है. उसके इलावा वो छब्बीस साल की गर्भवती महिला जो कि अपने पति को खाना खिलने गई थी. नोट करना चाहिए कि उसका पति उसी निर्माणाधीन फैक्ट्री में काम करता है, जिस से गाँव वालों की लड़ाई सड़क को लेकर चल रही है. और वो पान की दुकान चलाने वाला लड़का तो दंगाई है, जिस का तजकिरा आप के लेख में विडियो का ज़िक्र कर के है. वो जो बेसुध पड़ा है और उसके ऊपर पुलिसे वाले कूद रहे हैं. उनको तो ज़रूर दंगाई माना जाना चाहिए, जो उस सड़क के लिए आन्दोलन कर रहे हैं जो 60 साल पुराना है. जिस का पक्कीकरण सरकार द्वारा कराया गया है. कंपनी सिर्फ इतना चाहती है कि वो सड़क जो उसको आवंटित नहीं की गयी है, वह उसको बंद कर दे. मुआवजा नहीं मिलेगा, जाँच होगी इस से दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा. दंगाइयों को बख्शा नहीं जायेगा, फैक्ट्री के विरोध में बोलने वाले दंगाई हैं. 
   
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