पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > गोरखालैंडPrint | Send to Friend 

गोरखालैंड में ‘स्वशासन’

गोरखालैंड में 'स्वशासन'

 

रविवार संवाददाता

दार्जिलिंग से

 

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा 'स्वशासन' शुरू करने की घोषणा के साथ ही दार्जिलिंग की शांत पहाड़ियों में उबाल आ गया है. पिछले कुछ महीनों से चल रहे अलग गोरखालैंड की मांग ने इस सप्ताह जिस तरह करवट बदली है, उससे माहौल के और गरमाने की आशंका व्यक्त की जा रही है.

विमल गुरुंग ने 'स्वशासन' की घोषणा की है.

 

शुक्रवार को एक आंदोलन के दौरान गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की एक महिला सदस्य की मौत, किसी जमाने में पहाड़ के भगवान कहे जाने वाले गोरामुमो सुप्रीमो सुभाष घीषिंग को दार्जिलिंग से लगभग खदेड़े जाने और अब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा 'स्वशासन' की घोषणा ने पश्चिम बंगाल सरकार की भी नींद उड़ा दी है.

स्वशासन का मतलब क्या है ? इसका जवाब देते हुए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंग कहते हैं- “ स्वशासन मतलब हमारा शासन. अब दार्जिलिंग के सभी सरकारी मामले हम देखेंगे. इसमें किसी और का दखल नहीं होगा.”

आंदोलन
1980 के आसपास गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट बनाकर भारतीय राजनीति में धमाका करने वाले सुभाष घीसिंग ने दार्जिलिंग और उसके आसपास के पहाड़ी इलाकों में एक ऐसी आग भर दी थी, जिसके बाद लगता ही नहीं था कि यह आग अलग गोरखालैंड के बिना बंद होगी.

कोई एक हजार से अधिक लोग गोरखालैंड की इस आग की भेंट चढ़ गए. इस हिंसक जनांदोलन के नेता सुभाष घीसिंग और उनके साथ के विशाल जन सैलाब ने अलग राज्य की मांग करने वाले देश के दूसरे नेताओं को भी आंदोलन की एक नई धारा दिखाई.

लेकिन 1988 में घीसिंग को मना लिया गया और फिर दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल बना कर उन्हें उसकी कमान सौंप दी गई. हालांकि घीसिंग के समर्थकों का एक बड़ा धड़ा मानता था कि काउंसिल के सहारे पृथक गोरखालैंड की मांग को खत्म करने की कोशिश की गई है. यही कारण है कि विमल गुरुंग जैसे समर्थक घीसिंग के खिलाफ उठ खड़े हुए. लेकिन यह विरोध असफल साबित हुआ.

विमल गुरुंग
दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल का राजपाट 20 साल तक चला और तब तक पृथक गोरखालैंड का मुद्दा राजनीतिक और जन संगठनों की ओर से लगभग हाशिए पर धकेल दिया गया.

2005 में इस इलाके को छठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने पर अपनी मुहर लगाकर घीसिंग विवादों में घिर गए थे. दूसरी ओर विमल गुरुंग उनके खिलाफ बगावती झंडा लहराते पहाड़ में घुम ही रहे थे. कोई नौ महीने पहले गुरुंग ने गोजमुमो बनाकर तो जैसे गोरखालैंड आंदोलन में भूचाल ला दिया.

 

आज हालत ये है कि पहाड़ के इलाकों में विमल गुरुंग की तूती बोलती है. पहाड़ के इलाके में पिछले नौ महीनों से जिस आक्रमक तरीके से आंदोलन चल रहा है, उसमें विमल गुरुंग सर्वमान्य नेता बन कर उभरे हैं.

दूसरी ओर कभी पहाड़ के भगवान कहे जाने वाले गोरामुमो सुप्रीमो सुभाष घीसिंग अब अपनी रक्षा के लिए इन दिनों सिलीगुड़ी में रह रहे हैं.

पहाड़ से भागे ‘भगवान’

पिछले शुक्रवार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की एक महिला की कथित हत्या के बाद विमल गुरुंग की पार्टी के सदस्यों ने सुभाष घीसिंग और उनके समर्थकों के घर पर हमला बोल कर उन्हें दार्जिलिंग छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया. विमल गुरुंग ने सुभाष घीसिंग को चेतावनी दी थी कि वे 15 दिनों भीतर दार्जिलिंग छोड़ दें अन्यथा उनके खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई की जा सकती है.

मिरिक के पास लाप्चे भिल्ला स्थिति सुभाष घीसिंग के विशालकाय मकान पर भी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने रविवार को कब्जा कर लिया और उस घर को अपना कार्यालय घोषित कर दिया है.


चेतावनी का असर हुआ और घीसिंग दूसरे ही दिन सिलीगुड़ी आ गए. खबर है कि मिरिक के पास लाप्चे भिल्ला स्थिति सुभाष घीसिंग के विशालकाय मकान पर भी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने रविवार को कब्जा कर लिया और उस घर को अपना कार्यालय घोषित कर दिया है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की आक्रमकता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इन धमकियों के बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट पार्टी के एकमात्र विधायक तथा अन्य नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.

सिलीगुड़ी के एक होटल के कमरे में शरण लेने वाले सुभाष घीसिंग कहते हैं- “ मैंने पहाड़ की जनता का सम्मान किया है. हमारे समर्थकों पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उसके लिए मैं सीधे तौर पर बंगाल सरकार को जिम्मेवार मानता हूं. बंगाल सरकार ने अगर पहले ही छठी अनुसूची लागू कर दी होती तो आज ये नौबत नहीं आती.”


लेकिन राज्य के शहरी मामलों के मंत्री अशोक भट्टाचार्य इस तरह के आरोपों से सहमत नहीं हैं. भट्टाचार्य का मानना है कि इस मुद्दे पर केन्द्र, राज्य सरकार एवं गोजमुमो के बीच वार्ता चल ही रही है. लेकिन गोजमुमो ने जिस तरह से 'स्वशासन' शुरू करने की घोषणा की है, यह दर्शाता है कि उनकी दिलचस्पी बातचीत में नहीं है.

वे कहते हैं- “ हम किसी को क़ानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं देंगे. हम ऐसे लोगों से सख्ती से निपटेंगे.”

क्या पृथक गोरखालैंड को लेकर वे सहमत हैं ? भट्टाचार्य कहते हैं- “ देश में जो भी छोटे राज्य बने, उनमें सब जगह अशांति है. अभी गोरखालैंड के अलावा कई दूसरे राज्यों की भी मांग हो रही है. अगर ये सारी मांगें मान ली जाएं तो देश का बंटाधार हो जाएगा.”

अशोक भट्टाचार्य की बातों से समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार पहाड़ की इस गरमी से निपटने के पक्ष में है, कथित बंटाधार के पक्ष में नहीं. ये और बात है कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा किसी भी कीमत पर गोरखालैंड चाहता है, उससे कम कुछ भी नहीं.

29.07.2008, 10.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in