करुणा की निधि
बाईलाइन
करुणा की निधि
एम जे अकबर
अगर इन आत्महंता गर्मियों में अंतिम विनाश डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार का होने जा रहा
है, तो कुछ निडर, कांग्रेसी मामलों के भविष्य के इतिहासकार दिल्ली हाईकोर्ट की ओर
उंगली उठाने के लिए फुसलाए जा सकते हैं.
कोर्ट ने डीएमके के वयोवृद्ध मुखिया करुणानिधि को अपनी बेटी कनिमोड़ी के स्नेही
पिता और डॉ. सिंह के वफादार गठबंधन साथी में से किसी एक को चुनने के लिए कहा है.
बाइबल में वर्णित, नवाचारी न्याय के लिए प्रसिद्ध किंग सोलोमन के उलट, कोर्ट ने
पेचीदा समस्याओं के लिए समाधान नहीं सुझाया है. इसने बस टिप्पणी व स्थगन आदेश दिया
है.
सीधी सी बात है: यदि करुणानिधि, कनिमोड़ी को जमानत पर बाहर लाना चाहते हैं (यह
इच्छा रखने का उन्हें हर तरह से अधिकार है), तो उन्हें लोकसभा में विपक्ष की बेंचों
की ओर कदम बढ़ाने होंगे. हर तरह से लगता है कि इसके फलस्वरूप, एक प्रक्रिया शुरू
होगी, जो जल्द ही मध्यावधि चुनाव ला सकती है.
8 जून को एक और जमानत याचिका को खारिज करने के लिए माननीय न्यायालय द्वारा दिए
कारणों पर सरसरी नजर डालने से ही यह साफ हो जाता है, “उनके (याचिकाकर्ताओं के)
मजबूत राजनीतिक जुड़ाव हैं. याचिकाकर्ता कनिमोड़ी करुणानिधि उसी राजनीतिक दल से
जुड़ी हैं, जिससे अभियुक्त ए. राजा का जुड़ाव है और यह पार्टी केंद्र की सत्ता में
साझेदार है.” तो बात यही है. अगर आप केंद्र सरकार में सत्ता-शक्ति के साझेदार हैं,
तो आप दिल्ली में जेल भी साझा करते हैं.
जेल में दिन गुजारने के लिए आपका दोषसिद्ध अपराधी होना जरूरी नहीं है. जब तक आप देश
के शासकों में शामिल हैं, आपका आरोपित होना ही पर्याप्त है. तर्क कोई विकल्प नहीं
है. करुणानिधि बेहतर तर्क दे सकते थे कि अगर वे न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने
के लिए प्रवृत्त होते, तो कनिमोड़ी शायद ही जेल में होतीं.
वे तर्क के आधार पर यह कह सकते थे कि कनिमोड़ी और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा
अपनी कैद से पहले बरसों तक जेल से बाहर रहे और सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को
प्रभावित करने की कोशिश नहीं की, तो अब वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?
वाकई, यदि सत्ता से निकटता ही लॉकअप में जीवन बिताने के लिए काफी है, तो फिर सुरेश
कलमाड़ी या कांग्रेस में किसी के भी पास तिहाड़ जेल से छूटने का कोई मौका नहीं है-
भले ही उसका अपराध सिद्ध होता है या नहीं.
यदि वे चिड़िचिड़े होते हैं, करुणानिधि इस बात पर भी हैरान हो सकते हैं कि अदालतें
उन कुछ शक्तिशाली कांग्रेसियों से कैसा बर्ताव करेंगी, जिनकी इस कतार में अगली बारी
हो सकती है, क्योंकि उन्होंने जी2 मामले में राजा द्वारा लिए गए तमाम फैसलों पर
मुहर लगाई थी. परंतु यह सब अकादमिक श्रेणी में ओझल हो जाता है.
कोर्ट की सोच श्रेणीबद्ध है. ऑफिस में? बिना बेल जाओ जेल. संभवत: यह गर्भपात का
ख्याल है, जो कुछ कांग्रेसी नेताओं को उन्मादी बना रहा है. उनमें से कुछ अशिष्ट हो
रहे हैं, और गैरजरूरीपन को एक गुण का रूप देकर इस दोष को ज्यादा निकृष्ट बना रहे
हैं.
मंत्री पद की ऊंची महत्वाकांक्षाओं के साथ जो अन्य हैं, उन्होंने व्यक्तिगत की बजाय
राजनीतिक उग्रता को चुना है. वे असहमति को राजद्रोह की तरह मान रहे हैं. उनमें से
एक ने ऐलान किया कि यह राज्य के खिलाफ आभासी युद्ध की तरह है और उसने विपक्षी
गतिविधियों के लिए खुद के द्वारा छोड़ी गई गुंजाइश का कठोर खाका भी खींच डाला.
जो कोई भी इस रेखा से बाहर आता है, वह अगर अंधेरी खोह जैसी कालकोठरी का नहीं, तो
जोरदार धौल खाने का अधिकारी तो है ही. आडंबरपूर्ण वाक्पटुता का घेरा, देशभक्ति के
विभिन्न पहलुओं में छुपे स्वहित से ज्यादा नैतिक नहीं है. हम उनके नाम नहीं लेंगे,
लेकिन अखबारों पर एक सरसरी निगाह ही यह जानने के लिए काफी है कि वे कौन हैं.
दावे और दोषारोपण में संगति नहीं है. इस तथ्य पर बहस की गुंजाइश है कि सरकार के
उड़नछू होने के बहुत पहले ही प्रशासन ओझल हो चुका था. संघीय सरकार हास्यचित्र में
जड़ चुकी है और उसके कुछ मंत्री अपने महल से निकलकर जनता के क्षेत्र की तरफ कूच कर
रहे हैं. गलतियां संक्रामक हो सकती हैं और 2011 की गर्मियां तो प्लेग सरीखी हो गई
हैं. अगर अभी भी देश में समझदारी दिखती है, तो इसलिए, क्योंकि राज्य सरकारें प्लेग
से संक्रमित नहीं हुई हैं. कांग्रेस ने अपने साझेदार डीएमके को संभालने में विलक्षण अक्षमता दिखाई है, जिसके
पास गुमनामी के अलावा और कोई राह नहीं है. इस रिश्ते पर लगे घावों से रिसने वाली
तेजाबी बूंदें यूपीए गठबंधन के स्थायित्व को खा रही हैं.
जो ताकतें इस गठबंधन को अस्थिर करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रही
हैं, उनके मुकाबले यह सर्वथा अयोग्य साबित हो चुकी है. अगर कोई केंद्र सरकार बाबा
रामदेव सरीखे छुट्टा विचारों वाले शख्स को पैमाने पर नहीं कसती और मामले को शांत
करने का सही उपाय ऐसे व्यक्ति में खोजती है, जो हमेशा थोथा चना बाजे घना की तर्ज पर
बंदर घुड़की देता है, तो फिर उसे देश पर राज करने का कोई अधिकार नहीं है. सरकार
तत्काल जितना गिन सकती है, उसने रामदेव को उससे कहीं ज्यादा वोटरों के लिए असंभाव्य
नायक के रूप में बदल दिया है.
मनमोहन सिंह की सरकार ने भले ही बहुमत न खोया हो, लेकिन उसने अपना आत्मविश्वास और
उद्देश्य खो दिया है और उसके लिए अपने जोश को फिर से पाना मुश्किल ही है. ऐसा लगता
है कि सरकार को खुद जमानत पर बाहर आने की जबरदस्त जरूरत है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
12.06.2011, 00.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित