न इधर न उधर
बहस
न इधर न उधर
राजकिशोर
क्या विडंबना है आदमी की फितरत की ! हम बीच में नहीं रह सकते. या तो इधर रहेंगे या
उधर. जरूरी नहीं कि सत्य ठीक वहीं हो जहाँ हम उसे देखते हैं. लेकिन मन दिमाग पर
भारी पड़ जाता है. पूर्वग्रह इसी से पैदा होते हैं. जब एक बार पूर्वग्रह पैदा हो
गया, तब सत्य को देखना और मुश्किल हो जाता है. पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और
बाबा रामदेव, ये दो व्यक्तित्व उभर कर आए हैं. इनके समर्थकों का एक समूह है तो
विरोधियों का भी एक समूह है. दोनों ही समूह एक-दूसरे की बात पर विचार करने से
कतराते हैं. इससे संकट की स्थिति बन रही है.
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव, दोनों ही अ-राजनीतिक व्यक्ति रहे हैं. अन्ना ने समाज
सुधार का कुछ काम किया है. वे न कभी किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए न शामिल होना
चाहते हैं. दूसरी ओर, रामदेव योग शिक्षक के रूप में मशहूर रहे हैं. बाद में वे काय
चिकित्सक भी बन गए और तमाम तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा करने लगे. जब उनकी
महत्वाकांक्षा और बढ़ी, तो उन्होंने सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के बारे में
भी बोलना शुरू कर दिया.
कांग्रेस ही नहीं, कुछ और लोगों का भी कहना है कि राजनीति करना राजनीतिक दलों का
काम है. ये हजारे और रामदेव इस क्षेत्र में क्यों कूद पड़े हैं? मैं नहीं समझता कि
इससे बेहूदा कोई और प्रश्न हो सकता है. सभी व्यवस्थाएँ राजनीतिक होती हैं. इन
व्यवस्थाओं के सदस्य भी राजनीतिक होते हैं. जब कोई आदमी वोट देने के लिए घर से बाहर
निकलता है, तो वह राजनीति करने के लिए ही निकलता है. इस मायने में नागरिकता अपने
आपमें एक राजनीतिक घटना है. इसीलिए विदेशी नागरिक भारत में राजनीति नहीं कर सकते,
यह प्रतिबंधित है.
ऐसी स्थिति में हजारे या रामदेव अगर कोई राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं, तो इसकी वैधता
को ललकारा नहीं जा सकता. युद्ध के बारे में कहा गया है कि यह इतना गंभीर मामला है
कि इसे सिर्फ सेनापतियों के हाथ में छोड़ा नहीं जा सकता. यही बात अब राजनीति के बारे
में कही जा सकती है. राजनीति इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ राजनीतिज्ञों के
भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता. जब राजनेता कहते हैं कि हम राजनीति में हैं, इसलिए
राजनीति करना हमारे ही अधिकार क्षेत्र में आता है, तो वे अपनी ही हँसी उड़ाते हैं.
इनसे कहना चाहिए कि आप जैसे लोग राजनीति की शोभा बढ़ाते रहे हैं, इसीलिए तो देश का
यह हाल हो गया है.
देश की वर्तमान दुर्गत के लिए कौन जिम्मेदार है, इस विषय पर जनमत सर्वेक्षण कराया
जाए, तो पहले नंबर पर राजनेताओं का ही नाम आएगा. जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आज इतना
असंतोष दिखाई दे रहा है, उसके शिरोमणि भी यही नेता लोग हैं. जब ये लोग सरकार चलाते
हैं, तो सरकार भी भ्रष्ट हो जाती है.
कायदे से इस राजनीतिक पतन का उपचार यही है कि राजनीति की वर्तमान शैली के विरुद्ध
एक या दो नए राजनीतिक दल उभरते और राष्ट्रीय विनाश को रोकते. 1980 के दशक में कुछ
क्षेत्रीय दलों के उभरने के बाद कोई नया राजनीतिक दल नहीं बना है. वे क्षेत्रीय दल
भी अब राष्ट्रीय दलों की तरह भ्रष्ट और जन विरोधी हो चुके हैं. इसलिए किसी नई या
वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है. लेकिन प्रकृति शून्य को
बर्दाश्त नहीं करती. राजनीतिक प्रक्रिया के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने के परिणामस्वरूप ही
माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ है. लेकिन वह संसदीय पार्टी नहीं है. इस तरह,
हम पाते हैं कि देश में राजनीतिक शून्यता है.
इस शून्यता को भरने के लिए ही अ-राजनीतिक लोगों को वे काम करने पड़ रहे हैं जो काम
वस्तुतः राजनीतिक संगठनों का है. आज भारतीय जनता पार्टी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव
के साथ है- हजारे के साथ कम और रामदेव के साथ ज्यादा, क्योंकि हजारे के काम में
हिंदूवाद की संभावना नहीं है, जब कि रामदेव की मुहिम में इसकी संभावना कोई भी देख
सकता है, लेकिन भाजपा की प्रसिद्धि इस बात के लिए कभी नहीं रही है कि यह पार्टी
भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करती है. यही वजह है कि अपने चरित्र को दूसरों से
ऊँचा साबित करने के लिए उसे एक योग शिक्षक का सहारा लेना पड़ रहा है.
पिछले तीस-चालीस वर्षों में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जो राजनीतिक फैसलों को चुनौती
देते हैं. इनमें मेधा पाटकर का पर्यावरण आंदोलन, अरुणा राय का सूचना का अधिकार
आंदोलन और भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध स्थानीय समुदायों का आंदोलन- ये साफ तौर पर
दिखाई देते हैं. मानव अधिकारों का आंदोलन भी जोर पकड़ रहा है और इसका नेतृत्व भी कोई
ऐसा व्यक्ति नहीं कर रहा है जिसके बारे में कहा जा सके कि वह राजनीति में है. अन्ना
हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए.
जाहिर है, ये दोनों ही व्यक्ति कोई पूर्ण पुरुष नहीं हैं. इनमें कमियाँ और
कमजोरियाँ हैं. हमें इन कमियाँ और कमजोरियों की चर्चा जरूर करनी चाहिए, लेकिन
उन्हें पूरी तरह से खारिज करते हुए नहीं. इसी तरह, जो लोग हजारे और रामदेव के भक्त
हैं और इन्हें युगपुरुष बता रहे हैं, उन्हें भी यह सोचने की जरूरत है कि कहीं वे
अतिभक्ति का शिकार तो नहीं हो रहे हैं. कमियाँ होने से कोई व्यक्ति घृणास्पद नहीं
हो जाता, न पूर्ण पुरुष न होने से कोई व्यक्ति श्रद्धा का पात्र नहीं रह जाता. इसी
तरह, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थन भाजपा कर रही है, तो यह मुहिम भाजपाई नहीं
हो जाती. शैतान को भी बाइबल के अंश उद्धृत करने की आजादी होनी चाहिए. तभी तो उससे
यह माँग की जा सकती है कि वह बाइबल के अनुसार चल कर दिखाए.
13.06.2011, 09.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित