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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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वाह, यह भी हो रहा है

बहस

 

वाह, यह भी हो रहा है

कनक तिवारी


पहले अन्ना हजारे और बाद में बाबा रामदेव, तीन-चार दशक से अन्ना हजारे और एक-डेढ़ दशक से बाबा रामदेव जनजीवन में नैतिक हस्तक्षेप की सरगनिसेनी पर चढ़ रहे हैं. इस नैतिक कथा का क्लाइमेक्स अप्रेल और जून में ‘जंतर मंतर‘ और ‘रामलीला‘ शब्दों को वास्तविक भावार्थ दे गया. दोनों का मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ अवाम की जंग छेड़ना निश्चित तौर पर रहा है. अन्ना पहले भी नेताओं और अधिकारियों की महाराष्ट्र में बलि चढ़ा चुके हैं. वे एक अंतराल के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ बैटिंग क्रीज़ पर उतरे. रामदेव ने पर्याप्त नेट प्रेक्टिस कर ली. फिर वे चुनौती देने मैदान में उतर आए.

दोनों के अनशन आंदोलन सफलता के अर्थ में धूमिल प्रतीत हो रहे हैं. सफलता कभी भी किसी नैतिक तो क्या राजनीतिक आंदोलन का निकष नहीं है. गांधी भी दोनों तरह के आंदोलनों में असफल ही तो रहे. पता नहीं ऐसा क्यों बुजुर्ग पीढ़ी ने कनफुसिया में हमें सिखाया है कि अंगरेज़ चाहे जितना कुटिल रहा हो, लोकतांत्रिक मूल्यों और संघर्ष के कुछ संवेदनशील मानकों को उसने ठीक से समझा था. भारतीय राजनीतिक परिदृश्य झूठ से इतना लबालब भर गया है कि आर्थिक भ्रष्टाचार के बदले जनता को पहले सत्ता प्रतिष्ठान के झूठ और फरेब से दो-दो हाथ करना होगा.

यह कैसी तोहमत है कि बाबा के आंदोलन में यदि संघ परिवार जुड़ता है तो अनुष्ठान ही अनैतिक हो जाता है. भाजपा देश की दूसरी सबसे बड़ी पंजीबद्ध राजनीतिक पार्टी है. वह देश की सत्ता संभाल चुकी है. कई राज्यों में उसकी सरकारें आज भी हैं. बाबा रामदेव यह फरेब क्यों करते हैं कि उन्हें संघ परिवार से वैचारिक अनुकूलता को लेकर भी कुछ लेना देना नहीं है. देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां सपा, बसपा, अन्ना द्रमुक, बीजू जनता दल, अकाली दल और कम्युनिस्ट पार्टियां वगैरह बाबा से शाब्दिक सहानुभूति तो दिखाती हैं, लेकिन साथ नहीं आतीं. ऐसे में कौन नहीं कहेगा कि बाबा और संघ परिवार दूध और पानी की तरह घुल-मिल गए हैं.

येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा की घिग्गी देश की नजरों में बंधी हुई है. उसके मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल, झारखंड वगैरह में बिगड़े नवाबों की तरह खनिज और वनोत्पाद बेचे पड़े हैं. किसानों और आदिवासियों को लगभग बेशर्मी के साथ निजी उद्योगपतियों के लिए भूमि से बेदखल कर रहे हैं. कांग्रेस और भाजपा दोनों मिलकर भट्टा पारसौल में उत्तरप्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखकर मायावती की भूअधिग्रहण नीतियों की भर्त्सना करते हैं. बसपा की मुख्यमंत्री भी इस मामले में दूध की धुली हुई नहीं हैं. इस देश की समस्याओं में किसानों, दलितों और आदिवासियों की भूमियों पर सरकारी डाका डालना सबसे बड़ा अपराध है. ममता बनर्जी ने ज़रा सा हाथ लगाया और मार्क्सवाद का महल भरभरा कर गिर गया. यक्ष प्रश्न है कि अन्ना और बाबा ने इस सबसे बड़े जनवादी सवाल की अनदेखी क्यों की है.

यह ठीक है कि बाबा के आंदोलन प्रसंग में पुलिसिया बदतमीज़ी नहीं होनी चाहिए थी. लेकिन लगातार गांधी का उच्चारण करने वाले रामदेव शालीनता के साथ गिरफ्तार क्यों नहीं हुए. सेंट मेरिट्जबर्ग के स्टेशन पर गांधी ने पहला उदाहरण प्रस्तुत तो किया था. बाबा मंच पर उछलकूद करते हुए महिलाओं के सुरक्षा घेरे में आकर धवल स्त्री पोशाक को भगवा सन्यासी वसन पर तरजीह देते हैं. गिरफ्तारी का आंखों देखा हाल बताते रोने क्यों लगते हैं. इससे उनका एक असहिष्णु चेहरा उभरा है, जो उनके भविष्य व्यक्तित्व में दीमक की तरह चिपक गया है.

लालकृष्ण आडवाणी को तो उनकी पार्टी ने आत्ममुग्ध छाया प्रधानमंत्री बनने और जिन्ना वगैरह को लेकर दक्षिणपंथी वैचारिक विश्वविद्यालय में विभ्रम पैदा करने के कारण हटा ही तो दिया है. कहां प्राध्यापक दीखते आडवाणी और कहां बेलगाम भाषा उद्घोषक नितिन गडकरी. कोई तटस्थ आकलन करता आडवाणी के सुर में सुर कैसे मिलाएगा कि उन्हें आपातकाल की याद आ रही है. गडकरी का भी जलियांवाला बाग की घटना को ठीक से समझना ज़रूरी होगा. ये लोग जयप्रकाश नारायण और भारतीय क्रांति नायकों का अपमान कैसे कर सकते हैं. जिस राजघाट पर भाजपा ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिया, उस गांधी से भी उन्होंने ‘सत्याग्रह‘ और ‘सत्ता-आग्रह‘ के बारीक फर्क को समझने की इतिहास में कितनी अवमाननाएं की हैं.

वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर ने यह अद्भुत लिखा था कि कांग्रेस कभी सत्ताच्युत नहीं होती क्योंकि जो भी पार्टी सत्ता में बैठती है, वह अपने आप कांग्रेस हो जाती है. भाजपा का कांग्रेसी और कांग्रेस का भाजपाई चरित्र समझने में तो राजनीतिक विश्लेषकों को भी पसीना आ रहा है. कांग्रेस में अधिकारिक प्रवक्ता कुछ कहता है और महाबली महासचिव सत्ता केन्द्र के मुंह लगे होने के नाते लगातार अतिशयोक्ति अलंकार का पाठ देश को पढ़ाते रहते हैं.
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