वाह, यह भी हो रहा है
बहस
वाह, यह भी हो रहा है
कनक तिवारी
पहले अन्ना हजारे और बाद में बाबा रामदेव, तीन-चार दशक से अन्ना हजारे और एक-डेढ़
दशक से बाबा रामदेव जनजीवन में नैतिक हस्तक्षेप की सरगनिसेनी पर चढ़ रहे हैं. इस
नैतिक कथा का क्लाइमेक्स अप्रेल और जून में ‘जंतर मंतर‘ और ‘रामलीला‘ शब्दों को
वास्तविक भावार्थ दे गया. दोनों का मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ अवाम की जंग छेड़ना
निश्चित तौर पर रहा है. अन्ना पहले भी नेताओं और अधिकारियों की महाराष्ट्र में बलि
चढ़ा चुके हैं. वे एक अंतराल के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ बैटिंग क्रीज़ पर उतरे.
रामदेव ने पर्याप्त नेट प्रेक्टिस कर ली. फिर वे चुनौती देने मैदान में उतर आए.
दोनों के अनशन आंदोलन सफलता के अर्थ में धूमिल प्रतीत हो रहे हैं. सफलता कभी भी
किसी नैतिक तो क्या राजनीतिक आंदोलन का निकष नहीं है. गांधी भी दोनों तरह के
आंदोलनों में असफल ही तो रहे. पता नहीं ऐसा क्यों बुजुर्ग पीढ़ी ने कनफुसिया में
हमें सिखाया है कि अंगरेज़ चाहे जितना कुटिल रहा हो, लोकतांत्रिक मूल्यों और संघर्ष
के कुछ संवेदनशील मानकों को उसने ठीक से समझा था. भारतीय राजनीतिक परिदृश्य झूठ से
इतना लबालब भर गया है कि आर्थिक भ्रष्टाचार के बदले जनता को पहले सत्ता प्रतिष्ठान
के झूठ और फरेब से दो-दो हाथ करना होगा.
यह कैसी तोहमत है कि बाबा के आंदोलन में यदि संघ परिवार जुड़ता है तो अनुष्ठान ही
अनैतिक हो जाता है. भाजपा देश की दूसरी सबसे बड़ी पंजीबद्ध राजनीतिक पार्टी है. वह
देश की सत्ता संभाल चुकी है. कई राज्यों में उसकी सरकारें आज भी हैं. बाबा रामदेव
यह फरेब क्यों करते हैं कि उन्हें संघ परिवार से वैचारिक अनुकूलता को लेकर भी कुछ
लेना देना नहीं है. देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां सपा, बसपा, अन्ना द्रमुक, बीजू
जनता दल, अकाली दल और कम्युनिस्ट पार्टियां वगैरह बाबा से शाब्दिक सहानुभूति तो
दिखाती हैं, लेकिन साथ नहीं आतीं. ऐसे में कौन नहीं कहेगा कि बाबा और संघ परिवार
दूध और पानी की तरह घुल-मिल गए हैं.
येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा की घिग्गी देश की नजरों
में बंधी हुई है. उसके मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल, झारखंड वगैरह
में बिगड़े नवाबों की तरह खनिज और वनोत्पाद बेचे पड़े हैं. किसानों और आदिवासियों को
लगभग बेशर्मी के साथ निजी उद्योगपतियों के लिए भूमि से बेदखल कर रहे हैं. कांग्रेस
और भाजपा दोनों मिलकर भट्टा पारसौल में उत्तरप्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखकर
मायावती की भूअधिग्रहण नीतियों की भर्त्सना करते हैं. बसपा की मुख्यमंत्री भी इस
मामले में दूध की धुली हुई नहीं हैं. इस देश की समस्याओं में किसानों, दलितों और
आदिवासियों की भूमियों पर सरकारी डाका डालना सबसे बड़ा अपराध है. ममता बनर्जी ने ज़रा
सा हाथ लगाया और मार्क्सवाद का महल भरभरा कर गिर गया. यक्ष प्रश्न है कि अन्ना और
बाबा ने इस सबसे बड़े जनवादी सवाल की अनदेखी क्यों की है.
यह ठीक है कि बाबा के आंदोलन प्रसंग में पुलिसिया बदतमीज़ी नहीं होनी चाहिए थी.
लेकिन लगातार गांधी का उच्चारण करने वाले रामदेव शालीनता के साथ गिरफ्तार क्यों
नहीं हुए. सेंट मेरिट्जबर्ग के स्टेशन पर गांधी ने पहला उदाहरण प्रस्तुत तो किया
था. बाबा मंच पर उछलकूद करते हुए महिलाओं के सुरक्षा घेरे में आकर धवल स्त्री पोशाक
को भगवा सन्यासी वसन पर तरजीह देते हैं. गिरफ्तारी का आंखों देखा हाल बताते रोने
क्यों लगते हैं. इससे उनका एक असहिष्णु चेहरा उभरा है, जो उनके भविष्य व्यक्तित्व
में दीमक की तरह चिपक गया है.
लालकृष्ण आडवाणी को तो उनकी पार्टी ने आत्ममुग्ध छाया प्रधानमंत्री बनने और जिन्ना
वगैरह को लेकर दक्षिणपंथी वैचारिक विश्वविद्यालय में विभ्रम पैदा करने के कारण हटा
ही तो दिया है. कहां प्राध्यापक दीखते आडवाणी और कहां बेलगाम भाषा उद्घोषक नितिन
गडकरी. कोई तटस्थ आकलन करता आडवाणी के सुर में सुर कैसे मिलाएगा कि उन्हें आपातकाल
की याद आ रही है. गडकरी का भी जलियांवाला बाग की घटना को ठीक से समझना ज़रूरी होगा.
ये लोग जयप्रकाश नारायण और भारतीय क्रांति नायकों का अपमान कैसे कर सकते हैं. जिस
राजघाट पर भाजपा ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिया, उस गांधी से भी उन्होंने
‘सत्याग्रह‘ और ‘सत्ता-आग्रह‘ के बारीक फर्क को समझने की इतिहास में कितनी
अवमाननाएं की हैं.
वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर ने यह अद्भुत लिखा था कि कांग्रेस कभी
सत्ताच्युत नहीं होती क्योंकि जो भी पार्टी सत्ता में बैठती है, वह अपने आप
कांग्रेस हो जाती है. भाजपा का कांग्रेसी और कांग्रेस का भाजपाई चरित्र समझने में
तो राजनीतिक विश्लेषकों को भी पसीना आ रहा है. कांग्रेस में अधिकारिक प्रवक्ता कुछ
कहता है और महाबली महासचिव सत्ता केन्द्र के मुंह लगे होने के नाते लगातार
अतिशयोक्ति अलंकार का पाठ देश को पढ़ाते रहते हैं.
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चार मंत्री हवाई अड्डे पर, फिर तीन मंत्री सितारा होटल में बाबा के लिए ऐसा सामंती
तिलिस्म रचते हैं कि वे एक तरह का प्रॉमिसरी नोट शीर्ष वकील मंत्री को लिखकर दे
देते हैं. गुलाम भारत में वकालत छोड़कर ही वकीलों ने अंगरेज़ की नाक में दम किया था.
आज़ाद भारत में इंदिरा गांधी के वक्त से अब तक दोनों बड़ी पार्टियों के वकील-सलाहकार
मातृ संस्थाओं की नाक के कटने का कारण बने हुए हैं. खतरा नाक को होता है. नाक के
बाल अंदर सुरक्षित रहते हैं और बीच बीच में झांकते रहते हैं.
सरकार के लेखे रामदेव सियासी तौर पर फिलहाल तो पिट गए दीखते हैं तथा अन्ना की सिविल
सोसायटी की आधी कचूमर सरकार ने तो निकाल ही दी है. लेकिन ये जन सेवकों के पराजय के
क्षण या लक्षण नहीं हैं. सरकारों से संघर्ष करने में अन्ना के तीन तीन वकील
सलाहकारों ने सरकार को तीन महीने का भी समय नहीं दिया. रामदेव तो तीन दिन तक भी
नहीं रुकना चाहते थे.
आंसू, खून और पसीना जैसे मानवीय देह के द्रवों को सुखाते रहने के समीकरण को नागरिक
संघर्ष कहते हैं. पंद्रह साल गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में तलुए घिसे. पच्चीस तीस
वर्ष उन्होंने भारत में अपनी देह को सुखा सुखाकर आखिर उसे ठठरी ही तो बना दिया.
अन्ना और बाबा गुरुदेव टैगोर का ‘एकला चलो‘ और गांधी का मूल मंत्र ‘स्वैच्छिक
गरीबी, स्वैच्छिक धीमी गति और स्वैच्छिक सादगी‘ का पाठ पढ़कर यदि देश का नेतृत्व
नहीं करते हैं तो बार बार यह नकारात्मक घटित बताकर नैतिक अहंमन्यता का तिलिस्म
क्यों रचते हैं कि वे तो गांधी के पैरों की धूल तक नहीं हैं.
इसमें भी कोई शक नहीं कि देश के एक एक साधु, धर्मप्रवाचक, बाबा और खैराती संगठनों
की संपत्तियों की सार्वजनिक जांच होनी चाहिए. पुट्टपार्थी के साईं बाबा से ज़्यादा
दौलत किसी भारतीय समानांतर को नसीब नहीं हुई. कोई कथा प्रवाचक अंबानी बंधुओं में
सुलह कराता है. किसी के आश्रम में अबोध शिशुओं का कत्लेआम होता है. कोई थाली, लोटा,
कंबल बांटते हुए अपने सात्विक इजलास में अंकिंचनों को मरने देता है. कोई अपने
मुस्टंडे अनुयायियों को सरकारी भूमियां औने पौने में दिलवाकर शिक्षा माफिया का
संरक्षक बनता है और विधायक मंत्री तक बनवाता है. सिविल कोर्ट की डिक्री मिलने वाले
जगत गुरु कहलाते हैं. कोई चार्टर्ड हवाई जहाज में बैठकर सात सितारा सुविधाओं का
उपभोग करता है. विदेशों में भूमियां प्राप्त करता है. फिर भी कहता है कि उसके पास
एक इंच ज़मीन नहीं है. न ही एक रुपया जेब में है क्योंकि जेब ही नहीं है.
राजनीति ऐसा हम्माम है, जिसमें साधु संत भी कपड़े पहनकर नहाना नहीं चाहते. इन्हीं
धार्मिकों ने तो गंगा, यमुना और नर्मदा को प्रदूषित कर दिया है. इनके पैरोकार भी
अरबपति हैं. तस्करों, भू माफियाओं, यूनियन कार्बाइड, लॉटरी धारकों, खनिज दोहकों
वगैरह के कानूनी, राजनीतिक और प्रशासनिक पैरोकार ही तो सत्ता में हैं. इनमें से
कितनों ने आम जन के लिए संघर्ष किया है. साधु संतों की मंडली भी इसी में जुड़कर
चौकड़ी बनती है. लुट पिट तो देश का आम आदमी रहा है. उसे यदि किसी साधु की चरण रज,
सिर पर आशीष का हाथ, हथेली पर चमत्कारिक भभूत, जीवन की सांझ में कोई धार्मिक प्रवचन
और रहने खाने की कुछ दिनों के लिए निःशुल्क सुविधा मिल जाए तो बेसहारा विधवाओं,
परित्यक्ताओं, अनाथों, अपाहिजों, मानसिक रोगियों, कुंठित वृद्धों वगैरह के बहुमत से
ऐसा संसार रच जाता है जिसे धर्म का आभामंडल कहा जाता है.
तर्क यह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध
आंदोलन करने के हकदार या योग्य पुरोधा नहीं हैं. उनमें साहस, नीयत और गंभीरता का
अभाव नहीं होगा. दुनिया की सभी बड़ी राज्य क्रांतियां लेकिन अप्रबुद्ध जनसेवकों की
अगुवाई में नहीं की गई हैं. लेनिन, माओ त्से तुंग, गांधी, हो-ची-मिन्ह, फीदेल
कास्त्रो, नेल्सन मंडेला, सू-की और यहां तक कि भगत सिंह अपने अपने समय, देश और
चुनौतियों की लय को समझते थे. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उतने प्रबुद्ध तो नहीं ही
हैं. एक के सलाहकार घोषित हैं. दूसरे के परदे के पीछे हैं और उनमें आपस में
सुसंगतता और वैचारिक भविष्यमूलकता नहीं है.
देश के अवाम को भ्रष्टाचार मुक्त जीवन चाहिए. वह राजनीतिज्ञों से ऊब चुका है.
नौकरशाह ऑक्टोपस की तरह उसे कसे हुए हैं. हुए होंगे कभी कोई भामाशाह या डूबते गिरते
बजाज और बिड़ला, जो गांधी वगैरह की नैतिक शुचिता के साथ अपने व्यापारिक समीकरणों को
समरस कर पाए होंगे. यह वक्त अंबानी बंधुओं, रतन टाटा, अनिल अग्रवाल, जिन्दल,
पोस्को, नीरा राडिया, ए. राजा, हसन अली, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी वगैरह नए अवतारों का
है. इन सबके रहते अवाम के संघर्ष को अर्थवान बनाना कई तरह के अनर्थों से जूझना भी
होगा.
बाबा को कुछ हासिल भले न हुआ हो. अन्ना को भले निराशा हासिल हुई हो. राजनीतिक
पार्टियों को निश्चित ही एक ही एजेंडा के विपरीत ध्रुव हासिल हुए हों. लेकिन इससे
क्या होगा. देश पतन के रास्ते पर है. जनता का चरित्र अब भी अपने पूर्वज संस्कारों
से बिंधा हुआ है. पूर्वज संस्कारों का अर्थ इतिहास की आदतों की समझ से है. एक गहरा
अवसाद पिछले तीन माहों में एक मौनी प्रधानमंत्री बाबा की अगुआई में सरकारी
कुकृत्यों की वजह से पैदा हुआ है. यहां सरकार से आशय प्रादेशिक सरकारों से भी है.
13.06.2011, 11.24 (GMT+05:30) पर प्रकाशित