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मंच का प्रपंच

बहस

 

मंच का प्रपंच

आशीष कुमार 'अंशु' नई दिल्ली से


किसी कविता के लिये पहली शर्त भले उसका कविता होना हो, लेकिन मंचीय-कविता के माध्यम से विकसित कविता के बाज़ार में भी यही शर्त लागू हो, ऐसा नहीं है. एक अनुमान के अनुसार देश भर में बारह सौ मंचीय कवियों की फ़ौज और डेढ़ सौ करोड़ की इस ‘कवि-सम्मेलन इंडस्ट्री’ में जमे रहने के लिए अब कविता की समझ, संवेदना और हुनर बिलकुल नहीं चाहिए. अगर कुछ चाहिए तो जोड़-तोड़, ख़ेमेबाज़ी और ओढ़े गए आत्मविश्वास के साथ बला की नौटंकी.

अशोक चक्रधर

इधर देश भर में एक बड़ा वर्ग है जिसके लिये कविता का अर्थ मंच की कविता ही है. इस वर्ग की नज़र में अशोक चक्रधर और सुरेंद्र शर्मा सरीखे रचनाकार सबसे बड़े कवि हैं. यह भोला वर्ग उन गजानन माधव मुक्तिबोध को नहीं जानता, जिनकी कविताओं पर अशोक चक्रधर ने डॉक्टरेट की उपाधि पाई है.

पिछले लगभग दो दशकों में मंच के कवि और लिखने वाले कवियों में ऐसी फांक हुई कि दोनों एक दूसरे को अछूत मानने लगे हैं. इससे पहले यह दृश्य हिंदी में कभी नहीं था. मगर अब लिखने वाले कवियों की राय में मंच पर फुहड़ता बढ़ गई और चुटकले को कविता बताया जा रहा है तो मंच के कवियों की शिकायत है कि लिखने वाले कवि, कविता और खुद को आम जनता से दूर कर चुके हैं.

लेकिन इस तरह की तमाम बहसों के बाद भी एक बड़े वर्ग के लिये मंच की कविता ही ‘सच्ची कविता’ है. और चुटकुलों व सतही व्यंग्यों से भरी यही ‘सच्ची कविता’ आम-आदमी के रुपयों से आयोजित मेलों-ठेलों के बड़े-बड़े कवि-सम्मेलनों से लेकर शासकीय और अर्ध-शासकीय संस्थाओं द्वारा ‘हिंदी पखवाड़े’ में आयोजित कवि-सम्मेलनों में बड़ी आत्ममुग्धता के साथ प्रस्तुत की जाती है.

मंच की कविता का अपना गुणा-भाग और भूगोल है. राजस्थान के कवि विनीत चौहान की बातों में थोड़ी तल्खी है लेकिन उनका बयान जो भी कहूंगा सच कहूंगा की स्टाईल में यही है कि “जरा से लापरवाह हुए नहीं कि मंच की दुनिया में आप हाशिए पर डाल दिए जाएंगे. ना आयोजकों के फोन आपके पास आएंगे, ना ही संयोजकों के.”

साल भर पुराना एक किस्सा मंचीय कवि आज तक चटखारे लेकर सुन-सुना रहे हैं कि लंदन में आयोजक को पटाने के क्रम में गाजियाबाद के एक कवि की किस प्रकार की दुर्गति हुई. क्योंकि उस कवि का ई-मेल आयोजक ने सार्वजनिक जो कर दिया था, जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि “मंच पर मुझसे अच्छा कवि कोई और नहीं है.”

जिन नामों के बिना मंच और मंच की कविता दोनों अधूरी लगती हैं, वह नाम सुरेन्द्र शर्मा और अशोक चक्रध्रर का है. अशोक चक्रधर मंच के प्रपंच पर कहते हैं, “ जो लोग राडिया और राजा के दौर में जी रहे हैं, उनसे इतने छोटे बाज़ार पर क्या कहा जाए.?”

बाज़ार भले ही छोटा है लेकिन इस मंच पर उतरने-चढ़ने वालों के पैंतरे बड़े हैं. वरना चंडीगढ़ के एक आयोजक को दिल्ली के एक कवि को पुलिस की सहायता से क्यों चंडीगढ़ उठाकर ले जाना पड़ता.? वाक्या कुछ यूं था कि दिल्ली के कविजी को चंडीगढ़ जाना था कविता पढ़ने और अंतिम दो दिनों में कहीं और से मिल गई मोटी पेमेन्ट तो वे चंडीगढ़ के आयोजन को भूल गए. भूल क्या गए, आयोजन वाले दिन आयोजक को बोल दिया कि बीमार हूं. अस्पताल में हूं. आयोजक भी पक्का चंडीगढ़ी, उसने कवि के पड़ोसियों से माजरा पता किया और जब पूरी दाल काली निकली तो, वह दिल्ली के अपने एक पुलिस अधिकारी मित्र को कवि को चंडीगढ़ तक भिजवाने की जिम्मेवारी देकर चैन से अपने कार्यक्रम की तैयारी में जुट गया. अर्थात् कविता में कविताई-संस्कारों से परे हर साम-दाम-दंड-भेद चलता है.

कविता के गंभीर श्रोताओं में अपने काव्य-कौशल से अधिक वाक्-कौशल के लिए चर्चित तथा पशु-मेलों के कवि-सम्मेलनों से लेकर आईआईटी के छात्रों तक स्वयं को लोकप्रिय मानने वाले कवि कुमार विश्वास कहते हैं कि - “आज कविता मंच पर जमे रहने की कोई शर्त नहीं है. खालिस चुटकुलेबाज़ी के दम पर कई तथाकथित कवि कई-कई सालों से मंचों पर हैं.” लेकिन कुमार विश्वास की मज़बूरी देखिये कि वे स्वयं, हिंदी व उर्दू छंद-शास्त्र की धज्जियां उड़ाते अपने मुक्तक ‘कोई दीवाना कहता है’ की चार लाइनें पढ़ते हुए बीस से ज़्यादा चुटकुले सुना जाते हैं.

हालांकि दिल्ली के मंचीय कवि राजेश चेतन मानते हैं कि- “ मंच पर आने वाले नए रंगरुटों के लिए कुछ बातें गुरु मंत्र की तरह हैं, जिसका पालन नए और जमे दोनों कवि करते हैं. पहला कवि मंच से जो सुनाने वाला है, उसकी विषय वस्तु आकर्षक हो. कवि की प्रस्तुति सम्मोहक हो. आज भी ओम प्रकाश आदित्य जैसे कवियों को लोग, उनके सुनाने के विशेष अंदाज की वजह से ही याद करते हैं. रचना में वैशिष्ट्य हो. जिससे कवि के कहे हुए वाक्य ही उसकी पहचान बने. जैसे ‘म्हारी घरारी’ से जैसे सुरेन्द्र शर्मा की पहचान हो जाती है. मानों इस शब्द पर उनका सर्वाधिकार सुरक्षित हो. मंच पर खड़े होने का सलीका और कवि का भाषायी ज्ञान भी प्रस्तुति के समय मंच पर बहुत काम आता है. और सबसे बड़ी मंचीय जरुरत है, कवि की तात्कालिकता और प्रत्युत्पन्नमति.’’
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

काजल कुमार [kajalkumar@comic.com] Delhi - 2012-06-08 00:32:15

 
  एक बात तो तय है कि मंचीय कवि‍यों को पैसा अच्‍छा मि‍लता इसीलि‍ए चल रहे हैं, अब चाहे वो कवि‍ता सुनाएं या चुटकुला या फि‍र मसखरी... सामने बैठे लोग हू हू हा हा तो कर ही लेते हैं न. जब कलम से पैसे कमाने की ठान ही ली तो ऐसे में नखरा कैसा. दूसरी तरफ, अमंचीय कवि‍यों से तो प्रकाशक कि‍ताबें छापने तक के पैसे माँग लेते हैं. 
   
 

SANDIP VASHISTHA [sandip1107@gmail.com] DELHI - 2011-07-03 16:10:00

 
  THATS GOOD ANSHU BHAI YOU HAVE TAKE THIS STEP TO IDENTIFY THE CULPRITS OF DESTROYING THE HINDI KAVI SAMMELANS GLORY AND THE PEOPLE WHO ARE INVOLVING TO DO THE SAME SHOULD NOT BE HONOUR BY ANY ORGANISATION AND THE LAUGHTERS LIKE SURENDRA SHARMA SHOULD NOT BE ELIGIBLE TO WRITE KAVI 
   
 

prem janmejai [premjanmejai@gmail.com] j - 2011-07-01 15:34:18

 
  आपकी काफी बातों से सहमत हूँ , पर यह विषय एक बड़ी बहस की मांग करता है. चलताऊ टिप्पणियाँ से काम नहीं चलेगा. 
   
 

सुधीर सिंह [sudhir.singh117@gmail.com] रीवा - 2011-07-01 05:58:26

 
  बहुत से श्रोता अभी भी इन चीजों से ऊपर हैं। कवि सम्मलेन लाफ्टर का रूप धारण कर रहा है। जो कविता पसन्द करता है उस वर्ग में ऐसे कवियों का स्थान नहीं है। 
   
 

Dinesh Raghuvanshi [kavidineshraghuvanshi@gmail.com] Faridabad - 2011-06-30 08:34:37

 
  मैं अपने आप को इस योग्य ही नहीं मानता की ऐसे बड़े विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकूं. मैं तो बहुत ही साधारण सा रचनाकार मानता हूँ अपने को. प्रपंच से दूर ही रहना चाहूँगा. 
   
 

ashok bhati [kaviashokbhati@gmail.com] ujjain - 2011-06-20 14:22:36

 
  अंशु जी,कवि सम्मेलन में पढ़ी जाने वाली कविताओं में चुटकलों से अलग हास्य कवितायेँ भी हैं. कुछ कवि लिखते भी हैं. किन्तु मंच के स्थापित कवि अपने चुटकलों के सामने हास्य कविताओं को नकारने क़ा शानदार उपक्रम करते हैं कि वह कवि निराश हो कर हल्केपन पर आ जाता है. खेमेबाजी से कोई भी अछूता नहीं है. जिनके कंधों पर कवि सम्मेलन की जिम्मेदारी है, उनके रवैय्ये की विवेचना सबसे ज्यादा जरूरी है. एक दूसरों को दोष देने के बजाय आत्म विश्लेषण करना प्रासंगिक होगा. जो वाकई बड़े और विशुद्ध कवि हैं, उनकी भूमिका इस समय कैसी है ? 
   
 

surendra bansal [taalab42421@gmail.com] chandigarh - 2011-06-18 06:49:00

 
  अंशु भाई , पिछले बीस वर्षों में मंचीय कविओं ने अपनी पत्नियों का मज़ाक उड़ा उड़ा कर, और अशोक चक्रधर जैसे मदारियों ने अजब गज़ब करतब करके और सुरेन्द्र शर्मा जैसे क्लारेक कवियों ने कुछ राज्यों के बड़े अधिकारिओं की खुशामद कर के मंचीय कविता की जो भद्द पीटी है, उससे कविता की सारी आंच और शिष्टाचार ख़तम हो गया है. 
   
 

राकेश खंडेलवाल [rakesh518@yahoo.com] संयुक्त राज्य अमेरिका - 2011-06-17 22:41:17

 
  आपका लेख जहाँ एक पक्ष को बताता है वहां इस बात का ज़िक्र नहीं करता कि एक वर्ग ऐसा भी है जिसे कविता की आड़ में चुटकुले परोसे जाना कतई पसन्द नहीं. अक्सर मंचीय कवि इस बात की दुहाई देते हैं कि यह श्रोताओं की पसन्द और माँग है लेकिन इधर के श्रोता कविता और अच्छी कविता के पारखी हैं. इसी वर्ग का कहना है कि आप को अपना स्तर गिराने के स्थान पर श्रोताओं का स्तर उठाना आवश्यक है. अंधेरे का अपराधी केवल अंधेरा ही नहीं, ज्योति की वह किरण भी है जो उस अंधेरे को प्रकाश में न बदल सके.आपके द्वारा उद्धअत किये हुए कई नामों से व्यक्तिगत परिचय भी है और कई नामों को मंच पर अपने ज्ञान का शून्य प्रदर्शन भी देखा है. जो वर्ग कविता पसन्द करता है उस वर्ग में ऐसे नौटंकी के कलाकारों का स्थान नहीं है और यह क्षेत्र बढ़ता जा रहा है.  
   
 

अरुण मित्तल अद्भुत [arunmittaladbhut@gmail.com] नॉएडा - 2011-06-17 17:20:08

 
  लेख काफी अच्छा है. मंच के कवियों में एक खास सम्मोहन क्षमता का होना अनिवार्य है. सभी का एक अलग अंदाज़ है. कई बार तो ये सब इमोशनल ब्लेकमेल करते हुए प्रतीत होते हैं. देश और समाज की दुहाई देने वाले मंच के कवियों को अभिनेताओं से भी बढ़कर समझा जा सकता है. जो बातें तो बहुत लंबी चौड़ी करते हैं और पेमेंट के नाम पर एक एक रुपये के लिए काटने मरने को तैयार हो जाते हैं.शायद साहित्य को मंच से जोड़ना ही गलत है. मंच तो बस मनोरंजन का साधन है, कभी कभी आश्चर्य होता है कि राजगोपाल जी जैसे शालीन लोगों का मंच पर दम नहीं घुट जाता होगा. वस्तुतः: ये लोग इन सब चीज़ों से ऊपर उठ चुके हैं. मंच के कवियों के कुछ विशेष गुण हैं- खुद की तारीफ़ करना, खुद को सर्वश्रेष्ठ कवि मानना, हर अच्छी टिपण्णी के लिए बोलना कि मेरी मौलिक टिपण्णी है...और बहुत कुछ.

सच कहूँ तो कविता से उसका व्याकरण और छंद लुप्त होता जा रहा है, वो दिन दूर नहीं है जब कवि सम्मलेन लाफ्टर का रूप धारण कर लेंगे. बहुत बड़ी बहस है लेकिन आपका लेख सामयिक और विचारपूर्ण है.
 
   
 

अंशुमाली रस्तोगी [anshum.mali@gmail.com] बरेली - 2011-06-17 08:22:25

 
  हकीकत तो यह है कि जो मंच के मोह में पड़ गया, समझो खल्लास हो गया... 
   
 

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी [sstripathi3371@gmail.com] लखनऊ - 2011-06-15 16:16:51

 
  मंचीय कवि सम्मेलनों में त्रिवेणी महोत्सव इलाहाबाद का नाम भी सुन रखा था लेकिन कैलाश गौतम के बाद इसकी चमक कम होती गयी। आजकल वहाँ इमरान प्रतापगढ़ी जैसे नये कवि अपनी फितरत का डंका पीट रहे हैं जो मंच का सलीका बड़ी तेजी से पकड़ रहे हैं। कुमार विश्वास की गोल का यह नया खिलाड़ी पच्चीस हजार से कम में कहीं नहीं जाता। वैसे रेट पचास के ऊपर का है। आपने अपनी समीक्षा में सुंदर कवयित्रियों का जिक्र नहीं किया जिन्हें बुलाना प्रत्येक आयोजक अपना जरूरी कर्तव्य मानता है। इन्हें लक्ष्य करके यह जरूर कहा जाता है कि कुछ लोग कविता सुनने आते हैं और कुछ लोग देखने. 
   
 

akhilesh akhil [] kanpur - 2011-06-15 14:52:09

 
  शहमत तो हूं पर बहुत से श्रोता और बहुत से कवि अभी भी इन चीजों से ऊपर हैं और कविता औऱ मंच इनके कारण ही जिंदा है. दुर्गा पूजा के चंदे की चरह बहुत से आयोजक साल में एक बार कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन कर उसे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक रुप में साल भर भुनाते हैं. लेकिन ऐसी बातें कवि सम्मेलन के मौलिक स्वरुप को नहीं खत्म कर सकती हैं. 
   
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