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बीड़ी पत्ते में धुआं-धुआं ज़िंदगी

मुद्दा
 

बीड़ी पत्ते में धुआं-धुआं ज़िंदगी

सारदा लहांगीर भुवनेश्वर से

 

“छो...छोको भूंजी लोक पतर तुड़ले लागसी भोक....” ( हम लोग गरीब भुंजिया आदिवासी, पत्ता तोड़ते हुए भूख लगती है ) नुआपाडा जिले के सीनापाली गांव में रहने वाली 55 वर्षीय पहनी मांझी को जंगल में तेदूपत्ता तोड़ते हुए जब भूख लगती है तो वो अपना ध्यान बंटाने के लिए यहीं उड़ीया लोकगीत गुनगुनाती हैं.

तेंदूपत्ता

अप्रैल और मई महीने की चिलचिलाती धूप में जब हम अपने वातानुकुलित कमरे में बैठे आराम फरमा रहे होते हैं, उस समय इस इलाके की महिलाएं और बच्चे जंगल-जंगल भटक कर तेंदूपत्ता तोड़ रहे होते हैं. यह पत्ता ही है, जिसे बेचने के बाद उनके घरों में चुल्हा जल पाता है.

‘‘मेरे दोनों बेटे और बहुएं काम की तलाश में आंध्रप्रदेश चले गये हैं. यहां मैं और मेरे अंधे पति गांव में रहते हैं. पेट पालने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा. इन दिनों तेंदूपत्ता तोड़कर हम अपना गुजारा करते हैं. तेंदूपत्ता तोड़ना इतना आसान काम नहीं है. जंगल-जंगल भटककर भूखे-प्यासे रहकर धूप में पत्ता तोड़कर लाना पड़ता है. पर परिश्रम के मुकाबले पैसा बहुत ही कम मिलता है.’’ दुखी होकर पहनी हमें समझाती हैं.

वैज्ञानिक तौर पर डायोसपायरस मेलेनोक्ज़ायलोन के नाम से पहचाने जाने वाले तेंदूपत्ता या केंदूपत्ता को बीड़ी पत्ता के नाम से भी जाना जाता है, जिसका इस्तेमाल बीड़ी बनाने के लिये किया जाता है. इस पत्ते को ओड़ीसा में 'हरा सोना' कहा जाता है लेकिन यह हरा सोना केवल बीड़ी पत्ता के व्यापारियों और अपने लिये अधिक से अधिक सुविधायें इकट्ठी करने वाली सरकारी महकमे के लोगों की जिंदगी ही खुशहाल कर रही है. इस पत्ते को इकट्ठा करने वालों की जिंदगी तो सूखे हुये बीड़ी पत्ते की ही तरह है- बेजान. गरमी के दिनों में जब खेती के काम लगभग नहीं के बराबर रह जाते हैं तब ओड़ीसा के अनेक गांवों के लाखों गरीब लोग तेंदूपत्ता तोड़कर अपनी रोज-रोटी का जुगाड़ करते हैं.

गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और बदहाल जिंदगी से परेशान कोरापुट, बोलांगीर और कालाहांडी इलाके के लाखों लोग इन दिनों तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए निकलते हैं. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद इन्हें एक दिन की मजदूरी से भी कम पैसा मिलता है.

मजबूरी
यह गौरतलब है कि हमेशा से अपनी गरीबी और भूखमरी के लिये चर्चित इन इलाकों में सर्वाधिक उच्च श्रेणी का तेंदूपत्ता मिलता है. इस इलाके के गांवों में ज्यादातर गरीब, भूमिहीन,खेत मजदूर या फिर छोटे किसान रहते हैं. सरकार की सिंचाई योजना यहां सिर्फ 20 प्रतिशत ही पहुंची हैं. इसलिए यहां के गरीब किसान और उनकी खेती बारिश देवता की कृपा पर निर्भर करती है.

यहीं वजह है कि हर दूसरे साल यहां सूखा पड़ता है. सरकारी काम यहां न के बराबर है. भूख और गरीबी की मार झेल रहे, ये गरीब मजदूर और किसान, काम की तलाश में हर साल लाखों की तादात में प्रवासी मजदूर के रूप में दूसरे राज्यों को चले जाते हैं.

खप्राखोल गांव के एक बुजुर्ग हेमंत माझी बताते हैं ‘‘यहां सरकारी काम नहीं मिलता, किसानों के पास भी अधिक जमीन नहीं है. जो कुछ थोड़ा-बहुत है, उसमें खेती के समय परिवार के लोग ही काम कर लेते हैं. मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती. इसलिए यहां के लोग बनजात द्रव्य जैसे कि महुआ, टोल और तेंदूपत्ता का सहारा लेते हैं. फरवरी और मार्च में हम महुआ इकटृठा करके बेचते हैं और अप्रैल और मई में तेंदूपत्ता तोड़कर सरकार को बेचते हैं.’’

इस इलाके के समाजसेवी रवींद्र जोशी सरकारी व्यवस्था से खफा है. उनका कहना है ‘‘यहां के अधिकांश लोगों के पास जॉबकार्ड तो हैं पर सिर्फ दस प्रतिशत लोगों को 100 दिन का काम मिल पाया है.’’

अगर हम नुआपाडा जिले के महगा गांव की बात करें तो यहां करीब 300 परिवार रहते हैं, जिनमें से नब्बे प्रतिशत भूमिहीन, कृषि मजदूर और छोटे किसान है. इनमें से पचास प्रतिशत लोगों को अभी तक जॉबकार्ड नहीं मिला है और जिनके पास कार्ड है उन्हें दो साल से कोई काम ही नहीं मिला. ऐसी हालत में ये सभी लोग इस महीने में तेंदूपत्ता न तोड़े तो क्या करें ?

नुआपाडा के बोडेन ब्लाक के 55 वर्षीय राधानाथ राउत एक किसान हैं, जिनके पास एक एकड़ जमीन है. सिंचाई की सुविधा न होने के कारण और बारिश की कमी की वजह से पिछले दो सालों से इनकी फसल अच्छी नहीं हो रही है. जो कुछ जमीन से मिलता है उसमें इनके दस सदस्यों का परिवार मुश्किल से गुजारा करता है. फरवरी और मार्च में जंगल से महुआ इकटृठा करके दो हजार और अप्रैल और मई में तेंदूपत्ता तोड़कर 1500 से 2000 रुपए तक कमा लेते हैं. वे कहते हैं ‘‘मेरे दो बेटों ने पिछले साल मनरेगा में काम किया था पर आठ महीने हो गये, अभी तक पैसा नहीं मिला.’’

लड़कियां, औरतें और बच्चे
ओड़ीसा में तेंदूपत्ता एक लाभदायक व्यवसाय है. भारत में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बाद सर्वाधिक तेंदूपत्ता उत्पादन ओड़ीसा में ही होता है. तेंदूपत्ता का संग्रहण इसमें सरकार का निवेश न के बराबर है. ओड़ीसा के बोलांगीर, संबलपुर, कालाहांडी, कोरापुट, अनुगुल, ढेंकानाल, सुंदरगढ़, क्योंझर और कंधमाल जिले में तेंदूपत्ता मिलता है. तेंदूपत्ता का व्यापार लाखों श्रम दिवस पैदा करता है. इस तेंदूपत्ते के व्यापार में सबसे ज्यादा गांव की महिला और बच्चों की भागीदारी रहती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pravin Patel [tribalwelfare@gmail.com] Bilaspur, Chhattisgarh - 2011-07-24 11:00:40

 
  Though the rate of 36 Paisa for a bundle of twenty Kendu leaves, Munshis are forcing the plucker to give them bundles containing twenty five leaves.  
   
 

Aloka [aloka.ranchi@gmail.com] Ranchi - 2011-06-22 07:41:51

 
  अच्छी रिपोर्ट है. मैं भी बीड़ी मज़दूरों पर ही लिख रही हूं. ओडिशा का हाल जान कर दुख हुआ. 
   
 

SANjay VARMA [svsunjay581@gmal. com] RAIPUR - 2011-06-21 07:08:17

 
  SAME SITUATION IS FACED BY JAMUNWALI JAMUNABAI IN BASTAR .SHE COLLECT JAMUN BUT BAIDYANATH AND OTHERS GOT SO MANY WELTH. FOREST HAS WEALTH, THE INHABITANTS ARE POOR . 
   
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