पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >बिहार Print | Share This  

सिविल सोसायटी की राह में फारबिसगंज

बहस

 

सिविल सोसायटी की राह में फारबिसगंज

समर


फारबिसगंज! विकास की अंधी दौड़ में सरपट भाग रहे इंडिया से पीछे छूट गए हिन्दुस्तान का एक क़स्बा. इस फारबिसगंज की नियति भी हिन्दुस्तान के तमाम और गाँवों, कस्बों के जैसी ही है, न होने जैसे होने के साथ जीने की नियति. फारबिसगंज भी राही मासूम रज़ा के गंगौली जैसा एक गाँव है जिससे होकर जिन्दगी के काफिले नहीं गुजरते.

forbesganj-firing

इन तमाम जगहों की नियति में कभी भी अच्छे कारणों से चर्चा में न आने का अभिशाप भी जुड़ा होता है. मुफस्सिल हिन्दुस्तान की मिर्चपुर, झज्झर, चकवाड़ा, दुलीना जैसी सारी जगहें चर्चा में बस तब आती हैं जब इनके साथ होने वाली रोज की क्रूरता भी सारी हदें पार कर जाए. जैसे की 3 जून 2011 की उस दोपहर फारबिसगंज में हुआ, जब अपने हक़ के लिए, अपने गाँव तक पंहुचने के अपने रास्ते को एक निजी कंपनी से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे इस कस्बे के 4 बाशिंदे पुलिसिया गोलियों से मारे गए.

फारबिसगंज में चली गोलियों की आवाजें दिल्ली तक तब पंहुचीं थीं, जब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के मुताबिक़ सारा देश बाबा रामदेव के अनशन और आन्दोलन के बीच के किसी आयोजन पर हुए 'बर्बर' पुलिसिया दमन से बेहद आहत और स्तब्ध था. अब पता नहीं इस 'देश' में मणिपुर, कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे 'अशांत' क्षेत्रों में लगभग रोज पुलिसिया दमन की शिकार होने वाली जनता शामिल थी कि नही, पता नहीं पुलिसिया मुठभेड़ों के मामले में शीर्ष पर विराजमान आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की जनता को दिल्ली पुलिस के इस 'कारनामे' में कुछ नया दिखा था या नहीं, पर कुछ लोग सचमुच बहुत दुखी थे. उन्हें आपातकाल याद आ रहा था, नितिन गडकरी जैसे कुछ महान 'लोकतंत्रवादियों' ने तो जून के महीने में भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर लगे उस कांग्रेसी कलंक से जून के महीने में ही हुए इस हमले की तुकबंदी भी शुरू कर दी थी.

पर गुजरात से लेकर उड़ीसा तक अपनी महान लोकतांत्रिक परंपरा के झंडे गाड़ आये गडकरियों और आडवाणियों से अलग सिविल सोसायटी उर्फ़ 'सभ्य समाज' के कुछ रहनुमा भी 'हमले' पर क्रोध और विक्षोभ में दुहरे हुए जा रहे थे. इस सभ्य समाज के एक प्रतिनिधि प्रशांत भूषण को बाबा रामदेव पर हुआ हमला 'लोकतंत्र की हत्या' से कुछ कम नजर नहीं आ रहा था, जबकि इस सिविल सोसायटी के आज के दौर के सबसे बड़े नेता अन्ना हजारे को इसमें 'गोलियों वाले हिस्से को छोड़कर जलियांवाला बाग़ हत्याकांड' याद आ रहा था.

उनका दुःख, गुस्सा और विक्षोभ सब कुछ जायज था. एक मैदान में रात के तीसरे पहर शांतिपूर्ण ढंग से सो रहे पचास हज़ार से ज्यादा लोगों पर इस तरीके का बर्बर हमला न केवल निंदनीय वरन किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए असहनीय भी है. पर फिर भी एक दिक्कत तो थी, यह कि फारबिसगंज से बिलकुल अलग बाबा रामदेव के आन्दोलन पर टूटे इस सरकारी कहर में भी पुलिस ने इतना संयम बरता था कि इस हमले में न किसी की जान गयी और न एक महिला के अलावा कोई भी गंभीर रूप से घायल हुआ. (बावजूद इसके की इससे पुलिसिया बर्बरता की न तो तीव्रता कम होती है न उसकी मंशा, पुलिसिया बर्बरता पर लगातार लिखता भी रहा हूँ पर यहाँ सवाल 'असभ्य और औपनिवेशिक चरित्र वाली पुलिस' का नहीं बल्कि लोकतंत्र के नए पहरुओं यानी कि 'सिविल सोसायटी' और इसके नेताओं का है).

मतलब यह कि फारबिसगंज की तुलना में देखें तो यह हमला 'गांधीवादी अहिंसा के पुलिसिया पाठ' जैसा कुछ लगेगा उससे ज्यादा कुछ नहीं. और फिर भी 'सिविल सोसायटी' के इन रहनुमाओं को फारबिसगंज पर कुछ भी बोलना गवारा नहीं हुआ. वह भी तब, जब फारबिसगंज हत्याकांड बाबा पर हुए 'हमले' के 24 घंटे से भी ज्यादा पहले घटित हो चुका था.

कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो भट्टा पारसौल में हुए प्रशासनिक तांडव पर भी सिविल सोसायटी के इन नेताओं की खामोशी इतनी ही गहरी थी. पर इस खामोशी के कुछ तो कारण होंगे! फारबिसगंज पर तो फिर भी नीतीश कुमार को (नरेन्द्र मोदी के साथ) 'सुशासन' का प्रमाणपत्र दे चुके अन्ना हजारे का चुप रहना समझ आ सकता है पर फिर भट्टा पारसौल को कैसे समझा जाए? (यह समझना थोडा आसान हो सकता है अगर हम याद करें कि इस 'सिविल सोसायटी' के कई रहनुमाओं को बिलकुल ठीक, पारदर्शी और ईमानदार प्रक्रिया के तहत मिले फ़ार्म हाउस उत्तर प्रदेश की सीमा में आते हैं, और वह फ़ार्म हाउस भी तो किसानों की ही जमीन लेकर बने होंगे!) पर तमाम आसानी के बावजूद यह छोटा सा तथ्य खामोशी की तफसील तक नहीं ले जाता.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in