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गीली मिठास

कहानी

 

गीली मिठास

श्यामबिहारी श्यामल


लाल बाबू केवल पांच मिनट लेट थे किंतु दफ्तर में घुसे तो सारे सहकर्मी काम में लगे हुए मिले. सामने फाइलें खुली हुईं और उनमें डूबे लोग. सबके मुंह पर ताले, मुद्रा स्थिर. किसी ने उनके आने की आहट पर सिर उठाकर भी नहीं देखा. उन्हें बहुत धक्का लगा! यह क्या! यहां तो कोई हाड़-मांस का पुतला लग ही नहीं रहा, जैसे सभी माटी की मूरतें हों! यह बात तो समझ में आ ही रही थी कि यह नये साहब का असर है लेकिन एकबारगी ऐसा भी क्या कि दफ्तर में कर्फ्यू लग जाये!

indian-police

कल शहर में घुसते ही बस स्टैण्ड पर शिवशंकर बाबू ने रिक्शा रोककर करारा मजाक किया था, “बहुत कड़ा एसपी आया है. ज्यादा भ्रमण-पर्यटन मत कीजिये नहीं तो सीधे फाइनल तीर्थ यात्रा करा देगा!”

सुबह खटाल पर नजारत के बड़ा बाबू मिले. कहने लगे, “आपका नया साहब तो बहुत टेढ़ा आ गया है.”

अभी कचहरी परिसर में घुसते ही पत्रकार गोकुल बसंत ने रोककर दस मिनट तक चर्चा की थी, “बहुत ईमानदार और योग्य एसपी मिला है इस बार पलामू को!”

इन तमाम बातों से उन्हें कुल मिलाकर यही लगा था कि दफ्तर का माहौल कुछ चेंज मिल सकता है, किंतु एकबारगी ऐसा भी नहीं लगा था कि सारे सहयोगी इस कदर रातों-रात कर्मठ हो गये होंगे. यह शांति अप्रत्याशित लगी. अवांछित भी. संजीदगी अपरिचित, पूरा माहौल दमघोंटू.

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि कोई साथी लम्बी छुट्टी से लौटा हो और उसकी ओर कोई नजर तक उठाकर न देखे. ऐसे मौके पर तो सभी उठकर पास आ जाते थे. खूब धमाल मचता. चाय-वाय होती तभी काम शुरू होता. आज यह इसलिए भी अखरा कि वे करीब दो साल बाद हफ्ते भर की लम्बी छुट्टी पर गये थे.

उन्होंने खांसते हुए बगल वाले अखिलेश सिन्हा का ध्यान खींचना चाहा. एक बार का खांसना बेकार गया. दुबारा खंखरे. इस बार उसने बगैर सिर उठाये कहा, ‘‘ लाल बाबू, तुरंत काम शुरू कर दीजिये. साहब कभी भी विजिट मारने आ सकते हैं. वे रोज इधर एक बार आ ही जा रहे हैं. ’’

सिन्हा की बात से मन में दहशत हुई. तुरंत झोले को मोड़कर टेबुल के कोने पर रखते हुए सोचा, इसे तुरंत नीचे कहीं छिपा देना होगा! कुर्सी पर बैठे. मन उड़ा हुआ था. एक पल को लगा, जैसे स्कूली दिन लौट आये हों. बात-बात में छड़ी बरसाने वाले अम्बिका गुरुजी की कक्षा! ओह, गजब हो रहा है! दफ्तर का माहौल भला ऐसा होना चाहिए! उन्होंने सबसे पहले झोले को टेबुल के नीचे ड्रावर में डाला. ऊपर वाली फांक में. टेबुल पर ही कुछ नयी फाइलें आकर रखी थीं. जल्दी से एक को खोला और सामने फैला लिया. चश्मा लगाया और कलम हाथ में पकड़े काम करते दिखने लगे. सिर झुका हुआ किंतु चश्मे के ऊपर और भौंहों के बीच से निकलकर नजर सामने सीधे साहब के पोर्टिको की ओर.

एकांउट के चपरासी ने आकर ध्यान तोड़ा, ‘‘ आपको बड़ा बाबू याद कर रहे हैं! ’’

फाइल पटक दी और उठ गये. लपककर बाहर निकले.

बड़ा बाबू ने दरवाजे में घुसते देखा तो संयमपूर्वक मुस्कुराये, ‘‘ आइये! आइये! कैसा रही आपकी काशी-हरिद्वार की यात्रा? ’’

‘‘ काशी-हरिद्वार की तो ठीक-ठाक रही बड़ा बाबू, लेकिन यह मैं क्या देख रहा हूं! आफिस में लग रहा है जैसे श्मशान उतर आया हो. सभी मूरत हो गये हैं! कोई किसी की ओर ताक भी नहीं रहा है! हर टेबुल पर खुली-खुली फाइलें दिख रही हैं और उसमें डूब-उतरा रहे साथी! ’’

‘‘ इसीलिए तो अभी बुलाया है. आपको यही बताना है कि यह साहब बहुत उल्टी खोपड़ी का आ गया है. उसके दिमाग में घुसा हुआ है कि हमलोग बहुत भ्रष्ट और नाकारा हैं. पहले ही दिन बोल चुका है कि जिले की क्राइम वगैरह से तो वह बाद में निपटेगा, पहले अपना विभाग दुरुस्त करेगा. फरमान यह भी जारी कर चुका है कि साढ़े दस बजे से ड्यूटी शुरू होती है तो इसका सीधा मतलब यही कि साढ़े दस बजे से काम शुरू हो जाना चाहिए. इसके लिए कितने बजे दफ्तर में घुसना है, यह तय कर लीजिये. हमींलोग तो सबसे ज्यादा असहाय हैं न! खुद तय किया गया कि दस से सवा दस बजे तक सभी लोग दफ्तर में घुस जायें. वह तो नौ-साढ़े नौ बजे से ही आकर कुर्सी पकड़ लेता है. दो-तीन दिन तो ऐसा ही चला कि वह घड़ी देखकर एकदम सटीक साढ़े दस बजे आकर यहां साक्षात खड़ा हो जाये. पहले दिन केवल मैं ही साढ़े दस बजे यहां पहुंचा था. वह कुछ खास नहीं बोला लेकिन यह जरूर कह गया कि सिस्टम को एक-दो दिन में ठीक कर लीजिये नहीं तो मैं कड़ा कदम उठा लूंगा. देश में बहुत बेरोजगारी है, लापरवाह और बेईमान लोग चलें जायें तो कुछ नये लोगों को मौका मिल सकेगा. ’’

‘‘ अरे वाह! यह भी कोई बात हुई भला! साढ़े दस बजे तो दफ्तर में घुसने का समय है न. इससे पहले क्यों आयेगा कोई. ’’

‘‘ लाल बाबू! यह समय रेर करने का नहीं है. जैसे भी हो अपनी नौकरी को बचाने का प्रयास करना है, बस! आपको मैं क्या बताऊं! मेरी नौकरी का यह पैंतीसवां साल है, मेरे साथ पहले ही दिन इस आदमी ने जैसा व्यवहार किया ऐसा कभी किसी अफसर ने किसी सहयोगी के साथ नहीं किया होगा. ’’ बड़ा बाबू की आंखों में आंसू आ गये थे.

‘‘ क्या बड़ा बाबू? ’’ लाल बाबू सन्न थे. आवाज में भय के कण.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shishir kumar singh [singh.shishir5@gmail.com] New Delhi - 2011-08-12 04:37:14

 
  कहानी साधारण होते हुए भी असाधारण है...आप का प्रयास परिपक्व है और पसंदीदा भी. 
   
 

Ssiddhant [ssiddhantmohan@gmail.com] Varanasi - 2011-07-27 01:17:28

 
  कई कहानियां जिन वजहों से मात खा जाती हैं, उनमें से एक सबसे बड़ी वजह विषय का सरल होते हुए भी भाषा का यूज़र फ्रेंडली ना होना है. साथ ही ये सबसे अच्छी बात है कि आपकी कहानी इस चीज़ से बहुत दूर है. कहानी में पढ़वा लेने का अद्भुत गुण है, जो हमें थकाता नहीं है. उम्दा कहानी के लिए आपको ख़ूब शुभकामनाएं. 
   
 

sk sharma [shivanu1975@gmail.com] balrampur , uttar pradesh - 2011-07-22 17:37:11

 
  उत्तम रचना!कथ्य व शिल्प दोनों दृष्टि से बहुत अच्छी कहानी. लेखक को साधुवाद. 
   
 

brahmaveer singh [brahmaeer@gmail.com] raipur - 2011-07-05 17:06:05

 
  इस वक्त चोटी की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों में जो कमी अखरती है उसे पूरा करती कहानी लिखी है श्याम बिहारी जी ने। वर्तमान की कहानियों में आम आदमी कम ही दिखता है। उसकी दिक्कतें भी कम नजर आती हैं। चोटी की पत्रिकाओं में भाषा शिल्प की बदौलत कहानी को ठेलने का अंदाज दिखता है। उन कमियों से अछूती कहानी लिखी है श्याम बिहारी जी ने। कहानी का कथ्य जितना उम्दा है उतना ही शिल्प का संयोजन है। कहानी की मांग के अनुरूप बहती भाषा है। पढ़ने से संतोष इसलिए भी मिला कि इसमें आधुनिक नायिकाओं और कुकर्मी नायकों की कारस्तानियां नहीं हैं। आम आदमी की भावनाओं को उकेरती बेहतरीन कहानी...।  
   
 

विनोद अनुपम [] - 2011-07-02 18:31:54

 
  गजब की पठनीयता,समय के नब्ज को टटोलती एक जरूरी कहानी 
   
 

rahul tiwari [] mumbai - 2011-06-30 05:47:24

 
  बहुत शानदार है भैया... आप की लेखनी बहुत जबरदस्त है... मज़ा आ गया पढ़ कर. 
   
 

uttam [] varanasi - 2011-06-29 20:14:13

 
  कहानी को पढ़ने से पहले मैं काफी थका सा महसूस कर रहा था आँखों में नीद भरी थी रात के 12:30 से ज्यादा बज चुके थे जम्हाई लेते हुए पढ़ना शुरु किया मैं पढ़ता गया और पढ़ते-पढ़ते मेरी नीद न जाने कहाँ चली गई जैसे सारा घटनाक्रम मेरी आँखों के सामने घट रहा था आपके पास शब्दो का अथाह सागर है और उनका इस खूबी से इस्तेमाल करते है की उनकी तारीफ के लिए कोई शब्द मेरे पास नहीं है एस.पी. साहब का किरदार एक आम आदमी के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद को व्यक्त करता है लेकिन इस द्वन्द में ज्यादातर लोग बड़े बाबु या यादव दरोगा बन जाते है और जो इस सांचे में नहीं ढल पते है उनकी राह काँटों से भरी होती है उनके पास भले बड़े बाबु की तरह कार और बैंक बलेंस न हो मगर एक आतंरिक शांति जरुर होती है और उसका आनंद एस.पी. साहब जैसे लोग ही महसूस कर सकते है जिसे शब्दो में बयां नहीं किया जा सकता है वैसे लोगो के लिए ही शायद कवि गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने यह गीत लिखा था ...जोड़ी तोर डाक सुने कु न आसे तोबे एकला चोलो रेरे...और आज ऐसे ही अकेले चलने वालो की जरुरत है जब ऐसे चलने वालो की संख्या बढेगी तो कारवां अपने आप ही बनता चला जायेगा. आज भारत में भ्रष्टाचार एक जलता प्रश्न है और यह कहानी उसका सही उत्तर बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा है और घडी भी 1:45 ए.एम. बता रही है आपके अगले कहानी का इन्तजार रहेगा... शुभ रात्रि. 
   
 

Kuldeep Srivastava [kuldeep2005@gmail.com] New Delhi - 2011-06-29 08:06:37

 
  वाह !! मजा आ गया !!
बहुत बड़ा लिखे है सर जी ... प्रभावशाली कहानी .... बहुत बहुत बधाई श्यामल जी आपको...!!
 
   
 

Rajeev Mishra [rajivsmishra@yahoo.com] Kathmandu - 2011-06-29 07:43:50

 
  मजा आ गया.. क्या चित्रण किया है सरकारी महकमों की लगातार बिगडती बिगड़ती व्यवस्थाओं पर श्यामबिहारी जी ने.. अति सुन्दर.. लेकिन बिगड़ती व्यवस्थाओं से हमें निजात कब मिलेगी.. ये सोचने जी भी हमें जरुरत है. इस चित्रण के लिये बधाई. 
   
 

Shaleen [shaleen999@gmail.com] Budaun - 2011-06-29 06:44:32

 
  बढ़िया कहानी, धन्यवाद श्यामल जी.  
   
 

Amar Jyoti [amarjyoti55@gmail.com] Aligarh - 2011-06-29 05:23:09

 
  आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की भूमि पर एक सुन्दर कथा के लिए बधाई. 
   
 

Abhay Singh [singh.abhay97@gmail.com] Lucknow - 2011-06-29 03:22:25

 
  बहुत ही अच्छी लगी.. 
   
 

virendra jain [j_virendra@yahoo.com] BHOPAL - 2011-06-27 06:20:16

 
  बदलाव के लिए उतावले किंतु अकेले लोग कभी कभी कुछ असामान्य से हो जाते हैं। पर जो अन्दर से मानवीय होते हैं वे इसी तरह लोगों को संघर्ष के लिए तैयार हो जाने पर उनका सम्मान भी करते हैं भले ही वह विद्रोह उन्हीं के खिलाफ क्यों न हो।  
   
 

kundan [] indore - 2011-06-27 04:57:18

 
  अच्छी कहानी लिखी है सर आपने.. पर क्या पता मुझे क्यों लगता है कि सिद्धांत और उसकी व्यवहारिकता कुछ ऐसी चीज है कि अगर एक को आदमी आत्म्सात करे तो दूसरे को भी भलीभंति निभा लेगा.. वैसे कहने की शैली बहुत ही बढ़िया.. तारीफ के काबिल.. 
   
 

विमलेश त्रिपाठी [bimleshm2001@yahoo.com] कोलकाता - 2011-06-27 03:42:09

 
  बहुत अच्छी कहानी है... धेर सारी बधाईयां... 
   
 

ashutosh kumar [ashuvandana@gmail.com] delhi - 2011-06-26 10:45:09

 
  कहानी में पढ़वा लेने का गुण है, यानी किस्सागोई. लेकिन भावुकता की दुहाई देता शुरू प्रेमचंदीय भावुक अंत निराश करता है. भावुकता है तो नाटकीयता आ ही जाती है. एक बेहतर कहानी का आटा अतिरिक्त मिठास के चक्कर में गीला हो गया लगता है.  
   
 

संजय सेन सागर [mr.sanjaysagar@gmail.com] सागर - 2011-06-26 05:02:35

 
  सरकारी महकमों की लगातार बिगडती बिगड़ती व्यवस्थाओं पर तीखा बार किया है,लेखन शैली जबरदस्त, शुरुआत से ही कहानी बांधे रखती है और पात्र और कहानी के महीम पात्र और कथानक काफी खूबसूरत है और चरित्र चित्रण सराहना के योग्य है. काफी खूबसूरत और सार्थक लेखन..बधाई हो. 
   
 

Manoj Srivastava [mks.rac.bhu@gmail.com] Varanasi - 2011-06-26 04:01:12

 
  Honesty Speaks. a story that can be read in one sitting. congrates. 
   
 

Ramanbhai Rathod [] Baroda - 2011-06-26 03:48:05

 
  मैं भी 34 साल क्लास वन ऑफिसर रह चुका हूँ.कहानी पढ़ते-पढ़ते मुझे थोडा सा एहसास हुया कि कहीं मैं तो वो लाल बाबु नहीं. हां,मैं थोडा स्ट्रिक्ट था पर उतना ही मानवीय था. किसी भी स्टाफ मेम्बर को कोई और तकलीफ हो तो मेरी मदद उसे मिल जाती थी. श्यामल जी ने बखूबी पूरी बात सही माहौल खड़ा करके रखी है.उनको धन्यवाद. 
   
 

Girish [] Mumbai - 2011-06-26 03:01:57

 
  Good one sir...we are becoming doling less and asking more system  
   
 

R N Tiwari [rntiwari1@gmail.com] Pune - 2011-06-26 02:47:37

 
  आज के युग में एस प्रकार के अभिव्यक्ति की नितांत आवश्यकता है. सराहनीय प्रयास . बहूत बहूत बधाई. व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के ह्रास पर प्रहार कराती कहानी,इमानदारी से चलने को सिखाती है. 
   
 

Niranjan Dev Singh [niranjan.devsingh@gmail.com] Varanasi - 2011-06-25 18:11:35

 
  nice story. Your stories are a new confidence for the new generation like us 
   
 

सुनील श्रीवास्तव [shrisunil@gmail.com] Indirapuram - 2011-06-25 14:40:26

 
  वर्त्तमान विसंगत समय की यथार्थवादी और प्रतिबिम्बात्मक तस्वीर. अच्छी कहानी के लिए बधाई. 
   
 

MALIK RAJKUMAR [malikrjkumar@sify.com] DELHI - 2011-06-25 09:11:20

 
  कहानी आज के माहौल को खोलने में पूरी तरह सक्षम है. प्रस्तुति अच्छी है. पठनीय औऱ संप्रेषण दोनों ही इस कहानी की खूबी है. 
   
 

गणेश जी "बागी" [ganesh3jee@gmail.com] ओपन बुक्स ऑनलाइन - 2011-06-25 07:48:02

 
  वाह वाह ! आदरणीय श्याम बिहारी श्यामल जी, बहुत ही खुबसूरत कहानी बन पड़ी है, लेखन शैली जबरदस्त, पहले पन्ने से चलने वाली यात्रा सीधे अंतिम पन्ने पर समाप्त हुई, बहुत ही मजबूत कथानक और चरित्र चित्रण सराहना के योग्य है |
एक कड़क अधिकारी के रूप में पुलिस अधीक्षक की छवि साथ में उनका इमानदराना रवैया, दिखावा और झूठा रौब से परहेज, मातहतों को जल्द भाप लेने की निपुणता साथ में सरकारी कर्तव्यों से इत्तर एक स्वजन और आस्था में यकीं रखने वाला व्यक्तित्व, राजनीति के दबाव में न आने का संकल्प साथ ही परिणाम स्वरूप स्थानान्तरण को सदैव तैयार, बहुत खूब, बहुत ही दबंग अधिकारी के रूप में प्रभाव जमाने में सफल रहे एस पी साहब | कार्यालय कर्मचारियों का रवैया बिलकुल जीवंत है ऐसा लग रहा है कि लेखक स्वयम लाल बाबू के किरदार को जीया हो | बहुत ही शानदार चरित्र चित्रण |
कुल मिलाकर अरसे बाद एक खुबसूरत और जीवंत कहानी पढ़ने को मिली , बहुत बहुत बधाई स्वीकार कीजिये |
 
   
 

bablu [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur c.g - 2011-06-25 07:35:01

 
  आपने अच्छी कहानी प्रकाशित की है. इस सुंदर कहानी के लिये लेखक को बधाई. आप लगातार लिखते रहें, यही कामना है. 
   
 

Dr. Dinesh Tripathi [] balrampur - 2011-06-25 04:57:19

 
  गजब की कहानी है श्यामल जी. सरकारी विभागों की कार्य-शैली को बड़ा तथ्यपरक उकेरा है आपने. सिद्धान्त और व्यवहार का का सुन्दर संयोग कहानी के अन्त में कहानी को पूरी गरिमा प्रदान करता है. बहुत बधाई आपको. 
   
 

Prof R K Dubey [] Patna - 2011-06-25 04:33:57

 
  लेखक की अभिव्यक्ति की शैली काबिले तारीफ है ..
\\\" कब किस कमजोर कर्मचारी की इज्जत उतार देंगे, कोई नहीं जानता. यही एक ईमानदार हैं परफेक्ट हैं, बाकी पूरी दुनिया भष्ट. यही अकेले गांधीजी के अवतार हैं और मार्क्स-लेनिन के नये संस्करण, बाकी हम सारे लोग चोर हैं, बेईमान हैं, बेवकूफ हैं, कीड़े-मकोड़े हैं... हम केवल पांव के नीचे रौंदे जाने के लायक हैं. यही एक सच्चा आदमी हैं. ....‘‘
 
   
 

anil pusadkar [anil.pusadkar@gmail.com] raipur - 2011-06-25 03:57:18

 
  सरकारी दफ्तरों का हाल और कभी-कभी कड़क अफसर के आने के बाद की परिस्थितयों का जीवंत चित्रण किया है आपने. हर चरित्र अपने आप में मज़बूत और पूरा खासकर एसपी साहेब का,सच में शुरुआत से अंत होते-होते गीली मिठास का सुखद एहसास करा गए आप. 
   
 

leena [leena3malhotra@gmail.com] delhi. - 2011-06-25 01:46:57

 
  कहानी के सभी पात्र वास्तविक लगते हैं. आपने दफ्तर के माहौल को भी एकदम सही-सही उकेर कर रख दिया है. मेरी बधाई. 
   
 

misir [misirkatya55@gmail.com] sitapur,uttar pradesh - 2011-06-24 09:40:53

 
  बुद्धि और भावना के समन्वय को स्थापित करती है ,श्यामल जी की यह कहानी ! अच्छी प्रभावशाली कहानी ! 
   
 

mahesh punetha [punetha .mahesh@gmail.com] pithoragarh - 2011-06-24 08:00:10

 
  कहानी रोचक है. शुरु से अंत तक पाठक को बांध कर रखती है. एसपी का चरित्र प्रभावशाली है. एख अच्छी कहानी के लिये बधाई. 
   
 

arunenesh [aruneshd3@gmail.com] raipur - 2011-06-24 04:38:21

 
  बहुत ही शानदार लिखते हैं आप मजा आ गया  
   
 

Kamal Dubey [kdbaba@yahoo.com] Bilaspur, Chhattisgarh. - 2011-06-24 03:51:48

 
  पहले ही पन्ने में आपने ये लिख कर कि \"देश में बहुत बेरोजगारी है, लापरवाह और बेईमान लोग चलें जायें तो कुछ नये लोगों को मौका मिल सकेगा. ’’ अपना फलसफा दे दिया, लयताल ऐसी कि जम कर रह गया. पूरे आठ पन्ने पढ़ता चला गया.बहुत से काम रुक गए, लाल बाबू के अधिकारी जैसा हमारा अधिकारी तो नहीं है, फिर भी काम नहीं करेंगे तो काम जाता रहेगा. जय हो छठ मैया की! 
   
 

Padm Singh [ppsingh8@gmail.com] Ghaziabad - 2011-06-24 03:23:42

 
  कहानी अपने मंतव्य और लक्ष्य तक पहुँचती है जब वह पाठक के अंतरतम की अनावृत परतों को उधेड़ कर उसके स्वत्व से साक्षात्कार करवाए... कोई भी व्यक्ति भले ही किसी कारणवश अनजाने ही किसी अनीति का हिस्सा तो बनता है किन्तु एक दर्पण कहीं न कहीं उसकी असल तस्वीर सहेज कर रखता है... चेतना की संदूक के अचानक खुलने पर कई बार स्वत्व की वही तस्वीर सामने आ खड़ी होती है.. कहानी ने ऐसी मनोदशा को बखूबी मुखर किया है..लेखक ने सरकारी महकमों की परम्परागत बिगड़ती व्यवस्थाओं में भी विचारशीलता की ज़िम्मेदारी और नैतिकता के एहसास को मरने नहीं दिया है
\\\"लाल बाबू ने हमेशा महसूस किया है कि ऊपर की कमाई भीतर से खंधारती चली जाती है... लगातार कमजोर और अपनी ही नजर में चोर बनाती हुई. किसी भी चीज को गलत जानते-मानते हुए भी ढोना मामूली यातना नहीं है. कम से कम उनके जैसे व्यक्ति के लिए, जो कलम से इन चीजों का विरोध करता चलता है.\\\"

किसी व्यवस्था की लगातार अनियंत्रित और बेलगाम पतन को देखते देखते हम धीरे धीरे न चाहते हुए भी उसके अभ्यस्त (कई बार निराश भी) हो जाते हैं...ऐसे में कोई सकारात्मक परिवर्तन अविश्वसनीय और अप्रत्याशित लगते है... विश्वास नहीं होता कि इस दौर में ऐसा भी संभव है !
“लाल बाबू का मुंह खुला का खुला रह गया! मन नही मन सोचा- यह आदमी नौकरी कर रहा है या जंग लड़ रहा है!”

कहानी ने सिद्धांतों और भावनाओं को अपनी अपनी जगह दृढ रखते हुए भी दोनों के बीच एक व्यवहारिक सम्मिश्रण का नया दृष्टिकोण दिया है...
“मैंने सिद्धांतों के घने बियाबान जंगल देखे थे, आपने आंखों में उंगली डालकर भावनाओं की हरी-भरी क्यारियां दिखा दीं!”
कहानी अंततः किसी व्यवस्था को मशीनी मुर्दापन से निकाल कर एक सैद्धांतिक व्यावहारिकता का विकल्प देती है.
 
   
 

सत्येन्द्र [satyendra2020@gmail.com] दिल्ली - 2011-06-24 03:22:28

 
  आपने सरकारी दफ्तरों का कामकाज बहुत करीने से उकेरा है. हालाँकि ये तंत्र ऐसा ही है, कहना जरा मुश्किल है! ये तो कुछ ऐसा ही हुआ, जैसा सरकार कहलवाना चाहती है. और चाहती है कि सबकुछ निजी हाथों में आ जाए तो चमकदार हो जाएगी. मेरी राय थोड़ी अलग है. इस व्यवस्था में कोई आदमी इस अधिकारी की तरह काम करता है तो उसका हस्र छिपा नहीं है... ये आपने अपनी कथा में भी दिखाइ है.
जब ऊपर से ही सारा तंत्र घोटाले बाजी के पोषण में लगा हो तो नीचे वाले भी उससे प्रभावित होते ही हैं. निजी क्षेत्र में नौकरी में आदमी ४० साल के बाद बेकार हो जाता है, इसलिए सभी जवान और तेज तर्रार और चुस्त दुरुस्त दीखते हैं. देखिये ये व्यवस्था हमें कहाँ ले जाती है और कब हम इस व्यवस्था को समझकर कहानी लिखते है!
आखिर में आपने धर्म के प्रभाव को भी स्थापित कर दिया!
 
   
 

B.K. Kumar [] New Delhi - 2011-06-24 02:54:25

 
  सिद्धांतों में जकड़े व्यक्ति की दुनिया ही अलग है. अपने सिद्धांत को पोषित करने की विवशता उन्हें व्यावहारिक पक्ष से अलग-थलग ही रखती है. और जब कभी तारुफ हो भी जाए तो अहम इतना बड़ा हो जाता है तत्काल स्वीकार्यता बहाल नहीं हो पाती है और यह कह कर गर्वान्वित होते है की टूट जायेंगे पर झुकेंगे नहीं.

श्यामल जी बधाई के पात्र है, इन्होंने एक आनंद्निया मोड़ पर लाकर कहानी को विराम दिया है. पर सिद्धांतों में फंसे और उससे पीड़ित दोनों तरह के लोगों के लिए तो यह शुरुआत ही कहिये.
 
   
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