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गीली मिठास
कहानी
गीली मिठास
श्यामबिहारी श्यामल
लाल बाबू केवल पांच मिनट लेट थे किंतु दफ्तर में घुसे तो सारे सहकर्मी काम में लगे
हुए मिले. सामने फाइलें खुली हुईं और उनमें डूबे लोग. सबके मुंह पर ताले, मुद्रा
स्थिर. किसी ने उनके आने की आहट पर सिर उठाकर भी नहीं देखा. उन्हें बहुत धक्का लगा!
यह क्या! यहां तो कोई हाड़-मांस का पुतला लग ही नहीं रहा, जैसे सभी माटी की मूरतें
हों! यह बात तो समझ में आ ही रही थी कि यह नये साहब का असर है लेकिन एकबारगी ऐसा भी
क्या कि दफ्तर में कर्फ्यू लग जाये!
कल शहर में घुसते ही बस स्टैण्ड पर शिवशंकर बाबू ने रिक्शा रोककर करारा मजाक किया
था, “बहुत कड़ा एसपी आया है. ज्यादा भ्रमण-पर्यटन मत कीजिये नहीं तो सीधे फाइनल
तीर्थ यात्रा करा देगा!”
सुबह खटाल पर नजारत के बड़ा बाबू मिले. कहने लगे, “आपका नया साहब तो बहुत टेढ़ा आ
गया है.”
अभी कचहरी परिसर में घुसते ही पत्रकार गोकुल बसंत ने रोककर दस मिनट तक चर्चा की थी,
“बहुत ईमानदार और योग्य एसपी मिला है इस बार पलामू को!”
इन तमाम बातों से उन्हें कुल मिलाकर यही लगा था कि दफ्तर का माहौल कुछ चेंज मिल सकता
है, किंतु एकबारगी ऐसा भी नहीं लगा था कि सारे सहयोगी इस कदर रातों-रात कर्मठ हो गये
होंगे. यह शांति अप्रत्याशित लगी. अवांछित भी. संजीदगी अपरिचित, पूरा माहौल दमघोंटू.
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि कोई साथी लम्बी छुट्टी से लौटा हो और उसकी ओर कोई नजर तक
उठाकर न देखे. ऐसे मौके पर तो सभी उठकर पास आ जाते थे. खूब धमाल मचता. चाय-वाय होती
तभी काम शुरू होता. आज यह इसलिए भी अखरा कि वे करीब दो साल बाद हफ्ते भर की लम्बी
छुट्टी पर गये थे.
उन्होंने खांसते हुए बगल वाले अखिलेश सिन्हा का ध्यान खींचना चाहा. एक बार का खांसना
बेकार गया. दुबारा खंखरे. इस बार उसने बगैर सिर उठाये कहा, ‘‘ लाल बाबू, तुरंत काम
शुरू कर दीजिये. साहब कभी भी विजिट मारने आ सकते हैं. वे रोज इधर एक बार आ ही जा रहे
हैं. ’’
सिन्हा की बात से मन में दहशत हुई. तुरंत झोले को मोड़कर टेबुल के कोने पर रखते हुए
सोचा, इसे तुरंत नीचे कहीं छिपा देना होगा! कुर्सी पर बैठे. मन उड़ा हुआ था. एक पल
को लगा, जैसे स्कूली दिन लौट आये हों. बात-बात में छड़ी बरसाने वाले अम्बिका गुरुजी
की कक्षा! ओह, गजब हो रहा है! दफ्तर का माहौल भला ऐसा होना चाहिए! उन्होंने सबसे
पहले झोले को टेबुल के नीचे ड्रावर में डाला. ऊपर वाली फांक में. टेबुल पर ही कुछ
नयी फाइलें आकर रखी थीं. जल्दी से एक को खोला और सामने फैला लिया. चश्मा लगाया और
कलम हाथ में पकड़े काम करते दिखने लगे. सिर झुका हुआ किंतु चश्मे के ऊपर और भौंहों
के बीच से निकलकर नजर सामने सीधे साहब के पोर्टिको की ओर.
एकांउट के चपरासी ने आकर ध्यान तोड़ा, ‘‘ आपको बड़ा बाबू याद कर रहे हैं! ’’
फाइल पटक दी और उठ गये. लपककर बाहर निकले.
बड़ा बाबू ने दरवाजे में घुसते देखा तो संयमपूर्वक मुस्कुराये, ‘‘ आइये! आइये! कैसा
रही आपकी काशी-हरिद्वार की यात्रा? ’’
‘‘ काशी-हरिद्वार की तो ठीक-ठाक रही बड़ा बाबू, लेकिन यह मैं क्या देख रहा हूं!
आफिस में लग रहा है जैसे श्मशान उतर आया हो. सभी मूरत हो गये हैं! कोई किसी की ओर
ताक भी नहीं रहा है! हर टेबुल पर खुली-खुली फाइलें दिख रही हैं और उसमें डूब-उतरा
रहे साथी! ’’
‘‘ इसीलिए तो अभी बुलाया है. आपको यही बताना है कि यह साहब बहुत उल्टी खोपड़ी का आ
गया है. उसके दिमाग में घुसा हुआ है कि हमलोग बहुत भ्रष्ट और नाकारा हैं. पहले ही
दिन बोल चुका है कि जिले की क्राइम वगैरह से तो वह बाद में निपटेगा, पहले अपना
विभाग दुरुस्त करेगा. फरमान यह भी जारी कर चुका है कि साढ़े दस बजे से ड्यूटी शुरू
होती है तो इसका सीधा मतलब यही कि साढ़े दस बजे से काम शुरू हो जाना चाहिए. इसके
लिए कितने बजे दफ्तर में घुसना है, यह तय कर लीजिये. हमींलोग तो सबसे ज्यादा असहाय
हैं न! खुद तय किया गया कि दस से सवा दस बजे तक सभी लोग दफ्तर में घुस जायें. वह तो
नौ-साढ़े नौ बजे से ही आकर कुर्सी पकड़ लेता है. दो-तीन दिन तो ऐसा ही चला कि वह घड़ी
देखकर एकदम सटीक साढ़े दस बजे आकर यहां साक्षात खड़ा हो जाये. पहले दिन केवल मैं ही
साढ़े दस बजे यहां पहुंचा था. वह कुछ खास नहीं बोला लेकिन यह जरूर कह गया कि सिस्टम
को एक-दो दिन में ठीक कर लीजिये नहीं तो मैं कड़ा कदम उठा लूंगा. देश में बहुत
बेरोजगारी है, लापरवाह और बेईमान लोग चलें जायें तो कुछ नये लोगों को मौका मिल सकेगा.
’’
‘‘ अरे वाह! यह भी कोई बात हुई भला! साढ़े दस बजे तो दफ्तर में घुसने का समय है न.
इससे पहले क्यों आयेगा कोई. ’’
‘‘ लाल बाबू! यह समय रेर करने का नहीं है. जैसे भी हो अपनी नौकरी को बचाने का
प्रयास करना है, बस! आपको मैं क्या बताऊं! मेरी नौकरी का यह पैंतीसवां साल है, मेरे
साथ पहले ही दिन इस आदमी ने जैसा व्यवहार किया ऐसा कभी किसी अफसर ने किसी सहयोगी के
साथ नहीं किया होगा. ’’ बड़ा बाबू की आंखों में आंसू आ गये थे.
‘‘ क्या बड़ा बाबू? ’’ लाल बाबू सन्न थे. आवाज में भय के कण.
आगे पढ़ें ‘‘
चार्ज हो जाने के बाद पहला बुलावा मेरा ही आया. गया. चेम्बर में घुसते ही मैंने
हंसते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार किया और बधाई दी तो वह आगबबूला! चिल्लाने लगा. बोला-
‘आप मेरे कोई दोस्त-मित्र हैं क्या! इस तरह क्यों बधाई बरसाने आ गये! मैं यह सब
हरकत पसंद नहीं करता! इससे मैं आपको बहुत काबिल नहीं मान लूंगा. मुझे आपसे बधाई और
धन्यवाद वगैरह नहीं, सिर्फ और सिर्फ काम चाहिए! कायदे से काम करिये. आज से कोई भी
गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए!’
मैंने ठिसियाकर बैठते हुए फिर हाथ जोड़ा तो फिर बिगड़ गया-
‘उठिये, यहां बैठने के लिए आपको किसने कह दिया! यह आपके बैठने की नहीं बल्कि पब्लिक
की जगह है! जो संक्षेप कह रहा हूं इसे विस्तार में समझ लीजिये!’ मैं हड़बड़ाकर उठ
खड़ा हुआ... उसने उंगली दिखाकर पूछा- ‘यह आप माथे पर त्रिपुंड क्यों लगाये हुए हैं?
बहुत पापाचार करते हैं क्या? इतनी पूजा तो किसी कर्मठ व्यक्ति को न करने की फुर्सत
होती है न जरुरत! ’ मैं तो सन्न रह गया. कभी सोचा भी नहीं था कि कोई मुझे इस तरह
बोल देगा! वह आगे बोले जा रहा था- ‘ प्रेम और पूजा-पाठ तो नितांत व्यक्तिगत और
एकांत की क्रिया है. प्रेम क्या चौराहे पर किया जा सकता है. साधना तो जंगल-पहाड़ों
की वीरानी और गुफा-कंदराओं के गहन अंधेरे में ही होती भी रही है. चकाचौंध और
प्रदर्शन भाव से सर्वथा मुक्त! और, ऐसा त्रिपुंड या तो यजमानों को आस्था में अंधा
बनाने के लिए पूजा-पाठी पंडित लगाते हैं या समाज की आंख में धूल झोंकने के लिए पापी!
आप यहां नौकरी करने आये हैं या पूजा-पाठ करने-कराने? जिस दिन आपका मन ऐसा धार्मिक
होने लगे, उस दिन सीएल ले लिया करिये! यह सब नाटक-नौटंकी यहां नहीं चलेगी. इस तरह
दफ्तर आने की जरुरत नहीं. जाइये! ’ मैं तो जैसे बेजान हो चुका था. उसके चेम्बर से
निकलकर यहां आते हुए लगा कि मैं एक फुटबॉल हूं और जोरदार शॉट खाकर हवा में उधिया रहा
हूं! आकर यहां अपनी इस चेयर पर धब्ब से गिरा. देर तक माथा चाक की तरह घूमता रहा. लग
रहा था जैसे किसी ने भरी सभा में थप्पड़ मारा हो.’’
‘‘ अरे बाप रे बाप! तब तो यह आदमी एकदम खब्तुलहवास है! आपने धार्मिक भावना और आस्था
पर चोट करने की इस हरकत का विरोध नहीं किया? यह तो बहुत गलत बात है. ’’
‘‘ अरे कुछ मत कहिये! मैं तो ... ’’
बड़ा बाबू सामने आते साहब के चपरासी को देख चुप हो गये. पास आते ही वह लाल बाबू से
मुखातिब हो गया, ‘‘साहब आपको काफी देर से खोज रहे हैं! मैं दो बार आपकी सीट से लौट
चुका हूं. पहले तो बताया कि लाल बाबू आ गये हैं लेकिन बाथरूम गये हैं. दूसरी बार आप
नहीं मिले तो मेरे लौटते ही कुछ बताने से पहले साहब ने ही कहा कि देखो कहीं किसी के
कमरे में बैठा गप्प तो नहीं लड़ा रहा! चलिये, चलिये! तुरंत चलिये! ’’ वह अपनापन
दिखाते हुए अपनी विवशता का भी अहसास करा रहा था.
हड़बड़ाकर खड़े हो गये लाल बाबू. बड़ा बाबू ने चपरासी को सुनाकर कहा, ‘‘ आप साहब से
मिलकर आइये तो फिर आगे डिस्कसन करूंगा! तो सारा काम ऐसे ही बहुत मुस्तैदी और समय से
पूरा करना है....’’
लाल बाबू ने बड़ा बाबू का संकेत समझते हुए भी खुद को बहुत घने तनाव में उलझते पाया.
अपना ही सीना जैसे सीधे कान के पास चला आया हो, जोर-जोर धड़कता हुआ. धमनियों में
रक्त की बेचैन दौड़ जैसे साफ-साफ सुनाई पड़ने लगी हो! वे तेज कदमों से लपके. चपरासी
पीछे-पीछे. साहब के चेम्बर में घुसने से पहले कलेजा एक बार धक्क करके रह गया. घुसते
ही उन्होंने सामान्य रूप से नमस्ते की. कुछ करीब जाकर खड़े हो गये.
साहब ने पूछा, ‘‘ तुम्हीं सत्य प्रकाश लाल हो न! ’’
‘‘ जी सर! ’’
‘‘ तुम घर से ऐसे ही चल देते हो ? घर में बाथरूम वगैरह नहीं बनवाया है क्या! यहां
आते-आते शुरू हो जाते हो? ’’ आवाज में सख्ती थी.
‘‘ साहब, मैं बाथरूम में नहीं बड़ा बाबू के कक्ष में था. उन्होंने बुलवाया था...’’
‘‘ बड़ा बाबू ने आते ही तुमको बुलवा लिया! क्यों? ’’
‘‘ काम समझाने के लिए! ’’
‘‘ तो तुमको अभी भी समझाया जाता है तब काम समझते हो? ’’
‘‘ नहीं, साहब! मैं छुट्टी पर गया था न! ’’
‘‘ हां, हां! तभी तो मैं अब तक तुम्हें देख नहीं सका था. बैठ जाओ. ’’
लाल बाबू बैठने लगे तो यह समझ में नहीं आ रहा था कि यहां जब बड़ा बाबू को बैठे से
उठा दिया गया है तो फिर उन्हें भला क्यों बिठाया जा रहा है! एसपी ने आगे पूछा, ‘‘
सुना है तुम पत्र-पत्रिकाओं में कुछ लिखते रहते हो... ’’
‘‘ थोड़ा-बहुत! ’’ लाल बाबू चकराये, यह सब इसे किसने बता दिया! पता नहीं इसे किस
रूप में ग्रहण करे! एक बार पुलिस के बारे में लिखे एक व्यंग्य पर उस समय का एसपी
काफी कड़वा अनुभव दे चुका है, जिसके बाद वे अपनी ओर से कभी नहीं चाहते कि उनकी इन
गतिविधियों की जानकारी अफसरों को मिले.
‘‘ क्या लिखते हो? ’’
‘‘ कहानी और व्यंग्य! ’’
‘‘ यानी रूलाने और हंसाने वाली चीजें! ’’
‘‘ जी, हां! बीस साल से लिख-छप रहा हूं लेकिन कोई किताब अभी नहीं छप सकी है! ’’
उन्हें लगा कि तारीफ मिलने वाली है इसलिए प्रसन्न भाव से बोले.
‘‘ क्या वाहियात काम है! तुम तो खुद पुलिस विभाग में हो. जानते ही होगे कि रूलाने
के लिए बाकायदा आंसू गैस उपलब्ध है जबकि हंसने-हंसाने के लिए भी लाफिंग गैस मिल जाती
है. ऐसे में इसी काम के लिए कागज काला करने की क्या जरुरत! यह कभी मत भूलो कि कागज
बहुत कीमती चीज है. अपने बिक्री मूल्य से तो हजारों-लाखों गुणा ज्यादा. सोचो, धरती
का हरा-भरा सुहाग नोंचकर बनाया जाता है कागज! इसके एक-एक सफे का आक्सीजन की तरह
इस्तेमाल होना चाहिए! ...और तुमलोग हो कि हंसाने और रूलाने के लिए कागज बर्बाद करने
में जुटे हो! ’’
लगा जैसे किसी ने जोरदार चांटा रसीद कर दिया हो. गाल पर चोट भी महसूस हुई. लाल बाबू
ने खुजलाने के बहाने गाल को सहलाना शुरू किया. वह आगे बोले जा रहा था, ‘‘ऐसे बेकार
लेखन से क्या होगा! यों भी दुनिया की ज्यादातर बेस्ट सेलर किताबें वैचारिक हैं या
रिसर्च की हद तक जाकर मिहनत से लिखे गये उपन्यास. सटायर जैसी नॉनसीरियस चीजें तो
कत्तई नहीं!’’
आगे पढ़ें लाल बाबू
को लग गया था कि यह आदमी बहुत टेढ़ा है लगातार खरी-खोटी ही सुनायेगा. ऐसे अवसरों पर
उन्हें अपनी एक जबरदस्त कमजोरी का पूरा अहसास था. लेखकीय मामलों में किसी अलेखक की
प्रतिकूल टिप्पणियां वे देर तक बर्दाश्त नहीं कर पाते और स्वयं पर से नियंत्रण खो
देते हैं. ऐसे में कब मुंह से धाराप्रवाह गालियां फूट पड़ेंगी, वे नही जानते. यहां
अगर ऐसी कोई भूल हो गयी तो सीधे नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जायेगा. तब, घर कैसे चलेगा!
बच्चे क्या खायेंगे? यह बात ध्यान में आते ही वे उठने लगे. इसे देख एसपी आगे बोले,
‘‘ बैठो! मैं तुम से यों ही बात कर रहा हूं...’’
यह भी लगा कि यह जल्दी पिण्ड छोड़ने वाला नहीं! एक संदेह यह भी हुआ कि कहीं यह स्वयं
कवि टाइप का जीव तो नहीं. गोल-गोल बतियाता हुआ अचानक कहीं कुछ सुनाने न लग जाये!
उन्हें शुरू से कविता के नाम से ही चक्कर आने लगता है और माथा बथने लगता है. उसकी
बात जारी थी, ‘‘ विचारशून्य अनर्गल लेखन से तो अच्छा है कि एक-दो अनाथ गरीब बच्चों
को साथ रख लो और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाने में योगदान करो. साहित्य की कीमती
दुनिया में दो-चार फालतू किताबें बढ़ाने-लादने से कई गुणा ज्यादा बड़ा होगा यह
योगदान! एक बात बताओ...’’
लाल बाबू का दिमाग जैसे लाल मिर्चे के स्पर्श से भकभकाने लगा हो. भीतर-भीतर गुस्सा
ट्यूब में हवा की तरह सांय-सांय भर रहा था. उन्होंने सप्रयास खुद को सामान्य बनाये
रखते हुए पूछा, ‘‘ क्या सर! ’’
‘‘ तुम आफिस में काम ठीक से करते हो या यहां भी यही सब करने-धरने में समय बर्बाद
करते हो? ’’
एकदम जैसे किसी ने जले पर नमक रख दिया हो. एक तो यह व्यक्ति पूरे लेखन-कर्म को ही
नकार रहा है दूसरे अब यह संदेह भी कि मैं यही सब तो नहीं करता रह जाता हूं. बहुत
बुरा लगा. कुछ पल मुंह ताकते रहे फिर खुद को सहज करते हुए बोले ‘‘ आप मेरी वर्किंग
के बारे में मेरे इंचार्ज से रिपोर्ट ले लीजिये सर! मैं बहुत निष्ठा के साथ काम करता
हूं. ’’ अब और सहना मुश्किल हो रहा था. उठ खड़े हुए लाल बाबू. हाथ जोड़कर आगे बोले,
‘‘ सर, मैं कोई बहुत बड़ा लेखक तो हूं नहीं! वैसे भी मेरे पास समय कहां बचता है.
मुझे चलने दीजिये. ’’
बाहर आये तो मन आहत और भयभीत था. उन्हें लग गया था कि यह आदमी तो सचमुच हर मामले
में टांग फंसाने वाला है और खतरनाक भी. आकर अपनी सीट पर बैठे और सामने एक फाइल खोल
कर रख ली. हॉल में एकदम वैसा ही सन्नाटा. पीछे मुड़कर देखा तो भ्रमर चौधरी को देख
दंग रह गये. वह पैंट-शर्ट में आया था. जबसे वह चाईबासा से तबादला होकर यहां आया है,
आज तक कभी पैंट-शर्ट में नहीं देखा गया था.
पिछली कतार में विभाग के दोनों चैंपियन भाषणबाज हरिहर शर्मा और राजेंद्र आसपास
कुर्सियों में धंसे फाइलों से जूझ रहे थे. दोनों रोज आते-जाते दो-तीन बार बड़े
टेबुल पर उठंघते हुए धीरे-धीरे चढ़ बैठते और कम से कम एक-एक घंटा बकबक करते रह जाते
थे. हरिहर शर्मा यूनियन में थे और वाम विचारधारा की पैरवी करते जबकि राजेंद्र का
पॉलिटिकल स्टैण्ड बहते पानी की तरह था. राजेंद्र कभी भाजपा की पूरजोर खबर लेने लगते
तो कभी उसके बगैर उन्हें देश का भविष्य अंधकारमय लगने लगता. कभी समाजवादियों की
जरुरत महसूस करते तो कभी कांग्रेस पर ही भरोसा जमाने लगते. विचार तो उनके बेशक बदलते
ही रहते थे किंतु अंदाज हमेशा एक जैसा आक्रामक. खम ठोंककर बोलते और विरोध करने वाले
से भिड़ने को हमेशा जैसे कमर कसे रहते. हरिहर का दृष्टिकोण तो तय और साफ था किंतु
अंदाज उनका भी झगड़ने वाला ही होता. बात-बात में वर्ग-दृष्टि समझाने लगते. यह संभवतः
पहला मौका था, जब हमेशा बजते रहने वाले ऐसे मृदंग-पुरुष उधर कुर्सियों में गड़े हुए
थे.
लाल बाबू को लगा कि इस मामले में तो यह बदलाव अच्छा ही है कि ऐसे मनबढ़ुओं पर लगाम
लगना सम्भव हुआ! आखिर दफ्तर तो दफ्तर है. इसका न्यूनतम अनुशासन तो हर हाल में जिंदा
बचा ही रहना चाहिए. यह क्या कि एक-दो लोगों की बकबकाहट की बीमारी के कारण काम करना
चाह रहे दूसरे लोग सांसत में आ जायें और ऐसा ही लगातार महसूस करते रह जायें! ...
तभी सामने साहब की पोर्टिको की ओर ध्यान गया. साहब की गाड़ी स्टार्ट हो गयी थी.
फाइल को सामने कर उन्होंने वहीं से नजरें तिरछी कर ली. ध्यान पूरी तरह गाड़ी पर
केंद्रित. साहब तेज गति से निकले और गाड़ी का गेट खींचकर चढ़ गये. पीछे-पीछे आये
क्राइम रीडर साहब नीचे से साहब के करीब खिसक कर खड़े हो गये. साहब कुछ बोल रहे थे.
क्राइम रीडर के हाथ में कागज-कलम थी, जिसका वे बीच-बीच में इस्तेमाल करते चल रहे
थे. कुछ ही क्षणों बाद साहब की गाड़ी ने यू टर्न लेकर पीछे का रुख किया और बाहर
निकल गयी. लाल बाबू ने पीछे मुड़कर भ्रमर को आवाज लगायी, ‘‘ क्या हाल है, दादा! आज
आपको इस पोशाक में देखकर चुप नहीं रहा जा रहा है. आइये करीब आइये. जरा आपको पास से
देखूं. ’’
वे वहीं से चुप-चुप देखते रहे तो लाल बाबू ने कहा, ‘‘ साहब जा चुके हैं. गाड़ी बाहर
निकल गयी... ’’
एक साथ कई सहकर्मियों ने पूछा, ‘‘ निकल गये साहब? सचमुच? ’’
‘‘ हां, भई! मेरी सीट का यही तो कमाल है कि यहां से सीधे साहब की खबर ली जा सकती
है. ’’ लाल बाबू आम तौर पर ऐसा मजाक नहीं करते लेकिन आज शायद दिल को लगी जोरदार
ठोकर से बोल में ही व्यंग्य का सोता फूट पड़ा था! सबने ठहाका लगाया. इससे काफी देर
से जमा सन्नाटा धान की भूसी की तरह उड़ने लगा.
सबसे पीछे होने के बावजूद हरिहर शर्मा व राजेंद्र दरवाजे तक सबसे पहले आ गये.
राजेंद्र ने पूछा, ‘‘ यात्रा तो ठीक-ठाक रही न? यहां हमीं लोगों का जात्रा खराब चल
रहा है! ’’ लाल बाबू ने हां-हूं कर बात संक्षेप में समेट दी. वे दोनों बाहर निकल गये.
आगे पढ़ें भ्रमर
पास आया. लाल बाबू ने पूछा, ‘‘ क्या बात है दादा! यह क्या. कहां गयीं आपकी डिजायनर
कलरफुल लांग कमीज और अलीगढ़ी पायजामे वाली पाशाकें? ’’
‘‘ अरे दादा! क्या बोलेगा! अब वह सब बांधकर बक्सा में रखवा दिया है भविष्य में कभी
काम आयेंगे. नौकरी बच जाये तो ऐसी कलरफुल डिजायनर पोशाकें पहनने का जमाना फिर कभी
लौटेगा. मुझे तो नये साहब ने पहले ही दिन बुलाया और कपड़ा देख कर ही उखड़ गये. बोले-‘
ड्यूटी करने आये हो या नौटंकी करने ? मुगले आजम का नाटक पेश करोगे क्या? शहजादा
सलीम बने हो ?’ मैं कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा तो आगे पूछा- ‘‘ संगीतबाजी वगैरह करते
हो क्या? कुछ ठोंक-पीट करते हो? तबला या ढोलक जैसा कुछ? ’ मैंने जब बताया कि मैं
तबला आर्टिस्ट हूं तो बिगड़कर बोले- ‘ घर में तबला ठोंको या ढोलक पीटो, इससे हमें
मतलब नहीं. दफ्तर आओ तो आदमी की तरह! बहरुपिया बनकर यहां आने की जरुरत नहीं. ढंग का
कपड़ा तो शरीर पर होना ही चाहिए न! यह नहीं कि रास्ते में कोई देखे तो पूरे
डिपार्टमेंट का मजाक बनाये कि यह देखो पुलिस विभाग का नमूना जा रहा है! ’ इसके बाद
साहब ने अपनी गाड़ी से उसी समय मुझे घर भेजा. खोजवाकर पैंट-शर्ट निकलवायी. पोशाक
बदलकर ही आफिस लौटा. चार-पांच साल से कोई शर्ट-पैंट नहीं बनवायी थी. यह देखिये न
कितना टाइट है! क्या करें, कपड़ा उधार लेकर पैंट-शर्ट सिलने को दे दिया है! ’’ उसका
अंदाज मजाकिया लेकिन आवाज में कसक थी.
लाल बाबू बोले, ‘‘ मैं तो हफ्ते भर बाद आया हूं. नये साहब बहुत अलग ढंग के लग रहे
हैं.’’
‘‘ बहुत मस्त आदमी हैं. जहां भी कुछ गड़बड़ समझ रहे हैं वहां तुरंत ऑपरशन जमा दे रहे
हैं. आपको शायद नहीं पता कि उन्होंने तमाम लाइलाज समझे जाने वाले बिगड़ैल दारोगाओं
को नाकोदम कर रखा है. कल ही क्राइम मीटिंग है. देखियेगा, कल क्या-क्या होता है!
लेकिन दुःख की एक ही बात है कि संगीत से बहुत चिढ़े हुए हैं. इसी का मुझे बहुत
तकलीफ है. ’’ भ्रमर के स्वर में उमंगभरी थाप नहीं, ढरकता हुआ सुर था. पराजित और तरल.
उसी समय बड़ा बाबू आ गये. लाल बाबू ने मुस्कुराकर स्वागत-भाव प्रदर्शित किया. वह
बोले, ‘‘ आप से डिस्कसन अधूरा ही रह गया. फुर्सत हो तो आ जाइये, कुछ देर के लिए.’’
लाल बाबू उठकर साथ ही चल दिये. अपने कक्ष में घुसते ही बड़ा बाबू ने पीछे मुड़कर
आंखें फैला दी, ‘‘ हां, मैं आपको एक जरुरी बात बताना भूल गया. अब दोपहर में
चाय-नाश्ता के लिए उधर बिहारी की दुकान में जाना भी बंद हो गया है. साहब को संदेह
है कि यह सामूहिक नाश्ता अभियान रोज किसी न किसी को मुड़कर चलाया जा रहा था. जिस
दिन उन्होंने चार्ज लिया, उसके दूसरे ही दिन लंच के समय इधर आकर कमरों में झांकने
लगे. भई, यह तो वर्षों-वर्षों से चली आ रही परिपाटी है कि दोपहर में साहब के जाने
के बाद आधा घंटा के लिए उठकर हमलोग टहलते हुए दस कदम चलकर बिहारी के यहां चले जाते
रहे हैं. इससे दिमागी थकान भी उतरती है और कुछ चाय-पान भी हो जाता है. उस दिन साहब
इधर सारे कमरे में झांक आये ...सिवाय डीएसपी साहब के इधर पूरे सेक्शन में कोई नहीं
था. हमलोग चाय पीकर लौटे तो डीएसपी साहब धीरे-धीरे बोलते हुए पूरी बात बताने लगे.
उन्होंने बताया कि साहब ने उनके कक्ष में आकर खड़े-खड़े ही उन्हें खूब डांटा और कहा-
‘ आप यहां मूर्ति की तरह बैठे मत रहिये! अनुशासन और कार्य संस्कृति को बनाये रखने
के लिए पहल भी करते रहिए! यह क्या कि सभी स्टाफ उठकर इस तरह गोल बांधे ऑफिस छोड़कर
चल देते हैं! जिसे दोपहर में कुछ खाना-पीना हो वह घर से टिफिन लेकर आये. मुझे पता
चला है कि इस तरह रोज सभी उधर कहीं दूर जाकर होटलबाजी करते हैं. बहुत भारी वेतन
मिलने लगा है क्या! कहां से रोज होटलबाजी कर रहे हैं ये लोग! देखिये, कल से इस तरह
एक साथ सभी उठकर तफरी पर न निकला करें! कल से ऐसा नहीं होना चाहिए.’ डीएसपी साहब ने
ही कहा कि अब एकदम बाहर निकलना बंद हो जाना चाहिए. जिसे चाय-वाय पीना हो वह मौका
देखकर बीच में उठकर अकेले चला जाये और जल्दी आ जाये! ’’
लाल बाबू ने दुखड़ा रोया, ‘‘ बताइये साहब! हमलोग का चाय- नाश्ता भी रोक दिया इसने!
गजब पगलेटे लग रहा है!’’ उन्होंने सिर खुजलाते हुए आगे कहा, ‘‘ हमलोगों के पास कोई
पब्लिक डिलिंग तो है नहीं कि फाइलों पर पैसा बरसता हो. ले-देकर पुलिस विभाग के ही
लोगों का वेतन और भत्तों का काम है. इसमें भी चूंकि दारोगा-इंस्पेक्टर फील्ड में
छूटकर कमाते हैं, इसलिए यहां आने पर कभी सौ-पचास थमा देते हैं. यह कौन बहुत बड़ी
घूसखोरी हो गयी! ढेर कड़े हैं तो जरा मनबढ़ु दरोगाओं को छूकर तो देख लें! एक-एक
दरोगा एक-एक महीना में लाख-डेढ़ लाख तक बटोर लेता है! इनमें कोई रोज सीधे सीएम से
बतियाता है तो कोई किसी अन्य पावरफुल नेता-मंत्री से! ’’
बड़ा बाबू बोले, ‘‘ अरे, ई सब को डिस्टर्ब कर देगा! कल ही तो है क्राइम मीटिंग भी.
देखिये, क्या-क्या गुल खिलता है! ज्यादा देर हो गयी. अब अपनी सीट पर आप चलिये!”
दूसरे दिन माहौल काफी गरम था. क्राइम मीटिंग शुरू होने के कुछ ही देर बाद बड़ा बाबू
हॉल में आये. मुआयना करने वाले अंदाज में घूमने लगे. सहयोगियों के पास रुकते, फिर
आगे बढ़ जाते. कोई सिर उठाकर भी नहीं देख रहा था. वह राजेंद्र के पास जाकर रुक गये,
‘‘ अरे, एकदम ऐसा भी नहीं. आपस में जरूरी बातचीत संक्षेप में जारी रखिये भाई! नहीं
तो ऐसा न हो जाये कि कुछ दिन बाद हमलोग मुंह खोलना और बोलना ही भूल जायें. हमेशा के
लिए गूंगा हो जाना है क्या.’’
राजेंद्र ने सिर उठाया. मुस्कुराकर ही देखा, लेकिन कातरता छिपी न रह सकी. दोनों हाथ
उठाकर नचाते हुए लाचारगी व इस हालात पर चिंता व्यक्त की. दूसरे ही पल खुद ही फाइल
में गुम! बड़ा बाबू मुड़े और वापस लौटने लगे. बाहर निकलने से पहले लाल बाबू के पास
रुके, ‘‘अरे लाल बाबू , टीए बिल वाले मामले में क्या हुआ? ’’
आगे पढ़ें लाल बाबू
ने सिर झुकाये-झुकाये लिखते हुए अचकचाकर पूछा, ‘‘ किस टीए बिल के मामले में? ’’
बड़ा बाबू ने उनके टेबुल पर हाथ से धीरे-धीरे थपकी दी. लाल बाबू ने सिर उठाकर देखा.
उन्होंने आंख दबाकर उधर चलने का इशारा कर दिया. वे बात को समझ गये. उठते हुए बोले,
‘‘ हां, हां! उस मामले में आप से मुझे कुछ पूछना था...’’
बड़ा बाबू ने अपने कक्ष में घुसते ही कलेजा ठंडा कर देने वाले अंदाज में खुशखबरी
दी, ‘‘ क्राइम मीटिंग में हो गया है बवाल! यादव दरोगा को शहर से हटाकर मनातू कर दिये
हैं साहब. यादव चुपचाप उठा और बाहर आ गया. उसने तत्काल मोबाइल पर सीएम से बात कर
ली. सीएम ने तुरंत साहब को फोन किया व यह तबादला रोकने को कह दिया. इसके बाद का
डेवलपमेंट नहीं मिला है. मीटिंग जारी है. कोई निकले तो आगे की बात मालूम चले! ’’
लाल बाबू ने सच्चे हृदय से कामना प्रकट की, ‘‘ वाह भई वाह! ऐसे ही दरोगा उनको नकेल
पहनायें. पहनायेंगे भी! तभी तो बात बनेगी! हमलोगों को तो यह कस्साई एकदम खस्सी-बकरी
ही समझ रहा है! अच्छा, तो अब मैं चलता हूं. ’’
कुछ ही देर में तमाम थाना प्रभारी और अन्य अफसर भरभराकर बाहर निकलने लगे. सभी
इधर-उधर जाने लगे. यह क्राइम मीटिंग खत्म हो जाने का संकेत था! बाद में पता चला कि
साहब ने क्राइम मीटिंग के दौरान ही फोन पर सीएम को बहुत कड़ा जवाब दे दिया और यहां
तक कह डाला-“आप चाहें तो मेरा ही तबादला कर दें. मैं इसे रुकवाने के लिए नहीं कहूंगा!
आप भी मेरे किसी मातहत का तबादला रोकने या इसमें रद्दोबदल करने के लिए प्लीज मत कहें!
मैं आपकी बात नहीं रख सकूंगा.”
इसके बाद उन्होंने फोन रख दिया था और यादव को खड़ाकर सबके सामने काफी डांटा- “तुमको
अब मैं जल्दी ही खाली कर दूंगा. तुम पुलिस डिपार्टमेंट के तो कम, राजनीति
डिपार्टमेंट के ज्यादा करीब लग रहे हो. मीटिंग से निकलकर फोन पर बतिया आये. वेरी
फास्ट! गुड! भई, मान गये तुम्हें! तुम तो सचमुच नेता-मंत्रियों के बहुत करीबी हो!
चलो, वर्दी उतर जायेगी तो आराम से खादी पहन लेना और राजधानी में जाकर उन्हीं लोगों
के करीब बैठकर झूम-झूमकर झाल बजाना. फिलहाल तो मैं तुम्हें लाइन हाजिर करता हूं! नो
तबादला! जाओ बाहर जाकर मोबाइल पर अभी बता दो.” इसके अलावा उन्होंने सदर विधायक के
सगे रिश्तेदार दारोगा राजू शर्मा को भी लाइन हाजिर किया था. साथ ही साथ आधा दर्जन
ऐसे अन्य अफसरों को भी इधर से उधर करके फेंक-पटक दिया था, जो किसी न किसी
पैरवी-प्रभाव से एक ही स्थान पर एकाध दशक से जमे हुए थे.
लाल बाबू ने किसी से कुछ कहा नहीं किंतु दिमाग में यह बात जरूर आयी कि यह तो बहुत
साहसिक और प्रशंसनीय कदम उठाये गये हैं. पुलिस में नौकरी और नेताओं की भक्ति.
ऐसे-ऐसे जुगाड़ से पैसा बनाने वालों को तो सबक सिखाया ही जाना चाहिए. अभी तक तो
जितने भी एसपी आये, सब के सब कैरियरिस्ट निकले. सीएम का फोन आ जाना तो बहुत बड़ी
बात, केवल हनक-भनक पर ही नेताओं के करीबियों को लाभ देने को बेचैन हो उठते थे. यह
अपनी आंखों का देखा सच है कि इसी यादव दारोगा को उल्टे पिछला एसपी ही खुश करने का
अवसर खोजता रहता था. केवल इसलिए कि यह सीएम के पास भूलकर भी कभी कोई गलत छवि न पेश
कर दे. अब अगर उसी यादव दारोगा को हिलाया जा रहा है तो यह तो बहुत अच्छी बात है.
दारोगा को तो अपनी हद में ही रहना चाहिए! सीएम का रिश्तेदार होने का मतलब खुद सीएम
होना तो कदापि नहीं! ... इसका मतलब कि व्यवहार में यह साहब कुछ खब्त भले लग रहा हो
लेकिन है ईमानदार. आखिर दफ्तर की वैसी बातें जिन्हें लेकर वे वर्षों से भीतर ही
भीतर कुढ़ते रहे, उन पर भी अंकुश इसी ने लगाया. रही बात महीने भर में बिल वगैरह के
एवज में हजार-डेढ़ हजार की ऊपरी कमाई खत्म होने की तो इससे कुछ आर्थिक सांसत तो
बढ़ेगी लेकिन आत्मा का बोझ बेशक कितना कम हो जायेगा!
लाल बाबू ने हमेशा महसूस किया है कि ऊपर की कमाई भीतर से खंधारती चली जाती है...
लगातार कमजोर और अपनी ही नजर में चोर बनाती हुई. किसी भी चीज को गलत जानते-मानते
हुए भी ढोना मामूली यातना नहीं है. कम से कम उनके जैसे व्यक्ति के लिए, जो कलम से
इन चीजों का विरोध करता चलता है. उन्हें याद है, शुरू में जब वे नौकरी में अभी आये
ही थे यह सब देख मुखर होकर विरोध करते थे. वे न गलत एक पैसा छूते थे न किसी को ऐसा
करने देना चाहते थे. बाद में उन्हें साथियों ने यह डर दिखाकर धीरे-धीरे अपने रंग
में रंग लिया कि ऐसा नहीं करेंगे तो नौकरी भी हाथ से जा सकती है. उस समय लोगों ने
यही तर्क दिया था कि ऐसी कमाई करने वालों की पूरी श्रृंखला बनी हुई है. इसमें नीचे
से लेकर सबसे ऊपर तक के अधिकारी शामिल हैं. उनकी कड़ी यदि आपके चलते टूटने लगेगी तो
वे कभी सलामत नहीं छोड़ेगे.
उन्होंने महसूस किया कि यदि व्यक्गित रूप से कुछ क्षति भी हो रही हो तब भी भ्रष्ट
तत्वों के विरोध में उठे ऐसे कदमों को नैतिक समर्थन जरूर मिलना चाहिए! दूसरे ही पल
यह भी खयाल आया कि यहां किसी से ऐसा कुछ जाहिर करना ठीक नहीं होगा. खुद बड़ा बाबू
भी जले-भुने बैठे हैं, ऐसा सुनेंगे तो मुझी पर विश्वास करना छोड़ देंगे! वे फाइल पर
आंखें टिकाये बैठे ही बैठे बहुत दूर तक दौड़ लगा रहे थे. इसी दौरान पोर्टिको में
गाड़ी स्टार्ट हुई और साहब निकल गये.
साहब के बंगले का चपरासी राजन आकर सामने खड़ा हो गया. लाल बाबू उसे लेकर आफिस के
पीछे नयी गुमटी की ओर बढ़ गये. उन्होंने पूछा, ‘‘ साहब लंच में गये और तुम बंगला
छोड़कर इधर? साहब अकेले ही हैं न अभी? ’’
‘‘ अरे बाबू! यह साहब अलग ढंग के हैं! एक बार नहाने-धोने के बाद नौ बजे चार रोटी और
रात में फिर वही नौ बजे चार रोटी. दोपहर में कुछ नहीं खाते. हां, लाल चाय खूब पीते
हैं लेकिन ज्यादातर खुद ही बनाकर. एकदम दो मिनट में एक कप चाय उतार लेते हैं! अभी
गये हैं तो वहां खुद चाय बनाकर पियेंगे. ’’
आगे पढ़ें ‘‘ लाल
चाय! तुम होश में तो हो न ? ’’
‘‘ अरे बाबू!यह एकदम अलग दिमाग के हैं! गजब! हमींलोगों जैसे साधारण रहते-खाते हैं.
’’
‘‘ अच्छा! ऐसा! परिवार वगैरह कहीं होगा न? लायेंगे कि नहीं? ’’
‘‘ अब उनसे परिवार के बारे में कौन पूछे! वैसे तो अभी एकदम अकेले ही आये हैं. साथ
में एक-एक रेडीमेड बेड, प्लास्टिक की बाल्टी, मग और तीन कार्टूनों में भरकर किताबें
लाये हैं, बस! कोई तामझाम नहीं. साहेब वाला तो रोब-रुतबा ही नहीं. आये तो तीन दिन
तक बाहर से ही रोटियां मंगाते रहे. बीस रुपये देते और कहते कि मेरा नाम बताये बिना
सड़क किनारे के किसी भी होटल से ताजा बनी चार रोटियां ले लेना और कोई भी जेनरल सब्जी
हाफ प्लेट! बाकी पैसे में तुम कुछ खा लेना! बोलते हैं तो लगता है कि घर का कोई
बाप-भाई बोल रहा है! ...सड़क छाप होटलों से खाना लाने में बहुत डर लग रहा था.
दिक्कत थी कि किसी को बताना भी नहीं था कि यह खाना एसपी साहब के लिए जा रहा है और
लाना भी ऐसे ही होटल से था. आप तो जानते हैं होटल तो होटल ही है. चाहे छोटा हो या
बड़ा. कब बासी-तिरासी को गरमकर थमा दे, कौन जानता है! गड़बड़ खाने से कहीं तबीयत ही
कभी खराब हो जाये! इसलिए मैंने दो दिनों पहले हाथ जोड़कर साहेब से कहा कि होटल वाले
खाने में कभी कोई गड़बड़ी हो सकती है. इससे सेहत भी खराब होगी. खाना मैं बंगला पर
ही बना लूंगा. इस पर वे तुरंत बोले कि ऐसे ही तो वे वर्षों से मंगाकर खा रहे हैं,
अभी तक तो कोई गड़बड़ी नहीं हुई! मेरे बहुत कहने पर वे राजी हुए तो खाना अब बंगले
पर ही बन रहा है. उन्हें चावल पसंद नहीं लेकिन मुझे कह दिये हैं कि मैं जब चाहूं
अपने लिए पका लूं! कल रात में तो मेरे हिस्से के चावल से दो चमच मांगकर उन्होंने
लिया भी था. हां, बंगले पर सिपाही दारोगाओं को नहीं चढ़ने देते. हद से हद बंगले वाले
आफिस तक वे लोग आ सकते हैं, बस! ’’ उसने सावधानी से दायें-बायें देखा फिर मुंह करीब
लाकर धीरे से कहा, ‘‘ जानते हैं कि नहीं! एक और खास बात है...’’
‘‘ क्या ’’ लाल बाबू ने लम्बी सांस ली.
‘‘ साहब आफिस के लिए निकलने से पहले रोज अपना बेड, किताबों की कार्टूनें और
बाल्टी-मग सब एकदम पैक कर देते हैं. कहते हैं कि तबादला कभी भी हो सकता है, इसलिए
तैयारी ऐसी हो कि एक मिनट में उठूं और अगले पड़ाव के लिए कूच कर लूं. उसी तरह शाम
में जब लौटते हैं तो हंसकर रोज यही डायलोग बोलते हैं- चलो, आज की नौकरी तो यहां हो
गयी पूरी और अब यह रात यहीं बीतेगी...! अब कल का कल देखेंगे! ’’
लाल बाबू का मुंह खुला का खुला रह गया! मन नही मन सोचा- यह आदमी नौकरी कर रहा है या
जंग लड़ रहा है! सोचते हुए बोले, ‘‘ लेकिन आफिस में तो बहुत हड़का रहे हैं हमलोगों
को! यहां बहुत कड़ा बोलते हैं, यार! ‘‘
गुमटी के पास पहुंचते ही उन्होंने दुकानदार से कहा, ‘‘ दो चाय तुरंत दे दीजिये!
लौटना है जल्दी! ’’
उसने कांच के छोटे गिलासों में दो चाय पकड़ा दी. पहली चुस्की लेकर उन्होंने उससे कहा,
‘‘ क्या यार! तुमने तो इस बार हद कर दी! दशहरे में नहीं आये! देखो, तुम भले छोटी
नौकरी कर रहे हो लेकिन पढ़े-लिखे युवक हो. तुम्हें रिश्तों का मर्म हमेशा याद रखना
चाहिए. बच्चे तुम्हें बहुत बेसब्री से याद करते रहे. ’’
राजन ने तुरंत कहा, ‘‘ ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं आपके घर न पहुंचूं? एक आप ही तो
हैं जो इस गरीब और अनाथ आदमी को अपने सगे भाई की तरह अपनाये हुए हैं. ... दशहरे के
दिन भी आपके घर से बैरंग लौटा हूं और दीवाली के दिन भी. कहीं बाहर गये थे क्या
आपलोग? ’’
‘‘ हां , यार! काशी-हरिद्वार चला गया था. ’’ लाल बाबू बताने लगे, ‘‘...इस बार बहुत
सालों के बाद यह एक ऐसा मौका आया, जब दोनों ही पर्वों के दिन तुम साथ नहीं थे. दशहरे
के दिन तो बच्चे तुम्हें दिन भर खोजते रहे! दशहरे के दिन तुम कब आये थे? दीवाली में
तो हमलोग थे ही नहीं. ’’
‘‘ असल में उस दिन मैं दिन भर छुट्टी नहीं पा सका. आप तो पिछले साहब को जानते हैं,
उस दिन भी उनके ढेर सारे सम्बन्धी आ गये थे. तब भी रात में आठ बजे वहां से निकला.
आपके यहां ही चला आ रहा था कि नवकेतन सिनेमा हॉल के पास एक दारोगा जी मिल गये. वे
साथ लेकर हॉल में जा बैठे. फिल्म धार्मिक थी. मन ऐसा लगा कि बीच में उठने की इच्छा
ही नहीं हुई. शो टूटा तो दौड़कर आपके यहां पहुंचा लेकिन आपलोग सो चुके थे. दो-तीन
बार हांक भी लगायी फिर लौट गया. उसी तरह दिवाली के दिन भी शाम में गया था. घर में
ताला बंद मिला. चलिये, अब छठ में ही मैं दोनों मौके की कमी पूरी करूंगा. सुबह से ही
आकर सब काम सम्भाल लूंगा! ’’
उस दिन लाल बाबू सवा दस बजे ही आफिस पहुंच गये थे. हॉल में आधे लोग कुर्सी-टेबुल
सम्भाले मिले. लाल बाबू अभी बैठ ही रहे थे कि बड़ा बाबू बाहर साहब के चेम्बर की ओर
तेज कदमों से बढ़ते दिख गये. चलने के अंदाज से ही लग गया कि कोई मामला फंसा है.
उन्होंने फाइल खोलकर सामने रख तो ली, किंतु मन वहीं टंगा रहा. कहीं ऐसा तो नहीं कि
बड़ा बाबू की सुबह-सुबह ही क्लास लग रही हो! मन में तत्काल यह बात भी आयी कि साथ
में काम करने के कारण भले कुछ कहते नहीं बने किंतु यह बड़ा बाबू भी मामूली पाजी नहीं
हैं. तमाम दरोगाओं की दलाली करते हैं. आधा से ज्यादा माल खुद गड़प कर कर जाते हैं,
अफसर से भी अधिक. किस दिन यह आदमी दो-चार केस नहीं डिल करता. जिस तरह डालटनगंज में
उन्होंने बडा-सा मकान, दो-दो बसें, कार और दोनों बेटों का लाखों का बिजनेस खड़ा करा
दिया, ऐसे तो बड़े-बड़े अफसर भी नहीं कर पाते.
आगे पढ़ें
सहयोगियों को भी चटनी चटाकर मुंह बंद किये रहता है! कोई
जरा-सा जबान खोले तो उसकी कैसी दुर्गति करा देते हैं, इसका नमूना तो अभी पिछले ही
माह सुधीर केरकट्टा के मामले में देखा गया. उसने सही तो किया था उनका विरोध लेकिन
कैसे उसे सिंहभूम फेंकवा दिया. बेचारा आदिवासी लड़का खेल समझ नहीं सका, एक ही चाल
में हवा हो गया. इसलिए अगर इस नये साहब ने यहां कदम रखते ही इन्हें पहचान लिया तो
मानना पडे़गा कि इसकी आंखें कमाल की हैं. सटीक आदमी को खोज ले रही हैं. एकदम एक्स
रे करती हुई, पूरी आंत खंगाल ले रही हैं. कुछ ही देर बाद बड़ा बाबू उधर से इधर आते
दिखे. लाल बाबू ने फाइल समेटकर रख दी. बाहर आ गये.
अपने कक्ष में बड़ा बाबू घुसकर बैठ ही रहे थे कि पीछे से वे भी हाजिर. बैठकर मन ही
मन कुछ पल इंतजार किया कि शायद वे ताजा कुछ बताना चाहें. जब बड़ा बाबू नहीं खुले तो
उन्होंने बात शुरू की, ‘‘ बड़ा बाबू! आप तो जानते ही हैं मैं खुद भी छठ व्रत करता
हूं. इस साल अकेले ही करना है क्योंकि मिसेज स्वस्थ नहीं हैं. वैसे छठ तो एतवार को
पड़ रहा है और पारन के दिन मैं अब तक ड्यूटी पर आ ही जाता रहा हूं लेकिन उस दिन काम
करने के लायक शारीरिक स्थिति रहती नहीं. यह साहब जैसा है, आप समझ ही रहे हैं! कहीं
थका-मांदा देखकर कुछ उल्टा-सीधा न बोल दे! इसलिए सोचता हूं मैं सोमवार को छुट्टी ही
ले लूं. ’’
बड़ा बाबू ने बात गौर से सुनी. होंठ बिचकाकर असहाय भाव से बोले, ‘‘ यही तो बात हो
रही थी! साहब ने अभी बुलाया था. कहने लगे कि संडे को भी सभी स्टाफ को बुला लीजिये!
असल में सोमवार को डीजीपी आ रहे हैं न! साहब का कहना है कि सारे कागजात कम्पलीट होने
चाहिए. मैंने उन्हें बताया कि उस दिन छठ है, बहुत सारे लोगों के यहां यह पर्व
धूमधाम से मनाया जाता है. संडे होने के चलते सरकारी छुट्टी मारी गयी नहीं तो
झारखंड-बिहार का पूरा सरकारी महकमा उस दिन बंद रहता है. यह बहुत बड़ा पर्व है, ऐन
उसी दिन सहयोगियों को बुला लेना ठीक रहेगा नहीं! इस पर हमीं पर बिगड़ गये और बोले-
यह सब मैं कुछ नहीं जानता! जो जरूरी है वह हर हाल में होगा.’’
लाल बाबू सिर खुजलाने लगे, ‘‘ सर, मेरे लिये तो आना एकदम मुश्किल होगा, मैं तो
अखण्ड उपवास में रहूंगा न. और, दूसरे दिन छुट्टी ले लेना ही चाहता हूं.’’
बड़ा बाबू ने सुझाव दिया, ‘‘ आप अप्लीकेसनवा लेकर खुद साहब के पास चले जाइये न!
अच्छा रहेगा. बता दीजियेगा कि आप खुद उपवास पर रहेंगे. आपको तो छुट्टी वे दे ही
देंगे. ’’
लाल बाबू ने एक कागज मांगा. जल्दी-जल्दी दरख्वास्त लिखने लगे. बड़ा बाबू ने जल्दी
जाकर दे देने का संकेत दिया. वह तुरंत उठकर बाहर निकल गये. साहब के कक्ष की ओर लपके.
घुसते ही हाथ जोड़कर प्रणाम कहा. साहब ने पहले उन्हें, फिर हाथ के कागज को देखा.
हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले, ‘‘ आओ जी! क्या हाल है तुम्हारा? ’’
पहले तो लाल बाबू को साहब का यह नया अंदाज ही अविश्वसनीय लगा. उन्होंने बहुत सतर्कता
से देखते हुए यह विश्वास पक्का किया कि सचमुच वे मुस्कुरा रहे हैं और बाजाप्ता उन्हीं
को देखकर. इस पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि साहब या तो अभी अच्छे मूड में हैं या
उनके बारे में कोई पाजिटिव राय बना चुके हैं. उन्होंने मुदित भाव से उनके पास जाकर
दरख्वास्त आगे बढ़ायी, ‘‘ सर, संडे को छठ है और मैं खुद यह व्रत करता हूं! ’’ साहब
ने कागज पर से उठाकर नजर उनके चेहरे पर रखी और बहुत गौर से ताकने लगे. लाल बाबू ने
बात आगे बढ़ायी, ‘‘ चूंकि उपवास सोमवार को टूटेगा और उस दिन कमजोरी काफी रहती है
इसलिए मुझे मंडे को एक दिन की छुट्टी... ’’
उनका वाक्य पूरा होने के पहले ही अचानक साहब ने दरख्वास्त लेकर हवा में उछाल दिया.
जोर से चीख उठे, ‘‘ यह क्या है. तुमको पता नहीं है कि डीजीपी की विजिट है! मंडे तो
मंडे यहां संडे को भी आना है! जाकर बड़ा बाबू से मिलो. मैं दूसरी कोई बात नहीं
सुनूंगा. ’’
लाल बाबू को जैसे सांप सूंघ गया हो. एक कदम पीछे खिसक गये. मुंह बाये ताकते रहे.
आगबूबला साहब आंधी में मचलते पेड़ की तरह दिख रहे थे. आंखें भट्ठी की तरह धधकती हुई.
आवाज हथौड़े जैसी, ‘‘ तुम मर्द होकर यह औरतों वाला व्रत करते हो तो हम क्या करें.
खैर अपने घर में जो करना हो करो मुझे उससे मतलब नहीं. संडे को सबको आफिस आना है तो
तुमको भी आना होगा. अब जाओ! मुझे काम करने दो! ’’ तुरंत उन्होंने सामने टेबुल पर रखे
एक पन्ने पर नजर टिका दी. संभवतः किसी फरियादी की दरख्वास्त थी, वह इसे बहुत गंभीरता
से पढ़ने लगे.
लाल बाबू के दिमाग में जैसे ज्वालामुखी फट रहे हों! एक के बाद एक. पूरा शरीर सुन्न.
रोम-रोम से जैसे लपटें निकल रही हों. वे बाहर की ओर निकलने लगे तो लगा कि पांव
अस्तित्व में हैं ही नहीं. वे हवा में टंगे हैं अलगनी के कपड़े की तरह, या उधिया रहे
हैं चिरकुट जैसे. किसी तरह दरवाजे से निकले. चौखट पर खड़े होकर पीछे देखा. पर्दा
हिल रहा था. अचानक जैसे धैर्य की बुनियाद भी हिलने लगी! वे फट पड़े. उनकी आवाज फूटी
तो एकदम गैस कटर की फ्लेम जैसी, ‘‘ साले पर्दे में बैठ गये हैं तो लगता है कि बुद्धि
पर भी पर्दा पड़ गया है! कुर्सी के जोम में अन्धरा गये हैं, आदमी को आदमी नहीं समझ
रहे! जाओ, मैंने भी अब तय कर लिया, मुझे नहीं करनी है यह नौकरी! इसके बाद तुम मेरा
क्या कर लोगे! लेकिन अब सुनो, तुम्हारे जैसे किसी सनकी के दबाव में मेरा छठ व्रत
थोड़े ही विफल होगा. दस साल से करते आ रहे हैं और इस साल भी करेंगे. पता नहीं कहां
से आ गया है यह बुद्धु. उल्लू का पट्ठा कहीं का. जरा भी न बोलने की तमीज, न कोई
मामूली जानकारी. छठ पर्व को केवल महिलाओं का व्रत बता रहा है. गधा कहीं का. अगर यह
सचमुच महिलाओं का व्रत हो तब तो तुमको तो जरूर करना चाहिए. ‘क्षणे रुष्टा क्षणे
तुष्टा’ का इसका यह अंदाज भी तो औरताना ही है. कब किस बात पर मुस्कुराने लगे और कब
अचानक झगड़ने पर उतारु हो जाये, यह समझना ही मुश्किल है. यही तो है औरताना स्वभाव.
जाओ आज से इस डिपार्टमेंट को हमेशा के लिए सलाम. ’’
आगे पढ़ें वे आगे
बढ़े तो पीछे से किसी के दौड़कर आने की धमक मिली. मुड़कर देखा. सशस्त्र गार्ड था!
कहीं खिसका होगा, दौड़ता हुआ आकर अपनी जगह संभाल रहा था. खड़ा होकर अब वह मामला
समझने का प्रयास कर रहा था. लाल बाबू ने उसकी ओर नजर उठायी तो उसने नमस्कार कर धीरे
से पूछा, ‘‘ कौन है बड़ा बाबू? किसने आपको नाराज कर दिया? ’’
लाल बाबू मुड़कर आगे बढ़ गये. कुछ कदमों के बाद रुककर फिर पीछे मुड़े. आवाज तेज,
ताप प्रखर, ‘‘...यही एक आये हैं न बड़का भारी सत्य हरिश्चंद्र जी महाराज! जब मुंह
खोलते हैं, चिनगारिये फेंकते है. ढेर ईमानदार के नाती हैं, इसीलिए न पुलिस विभाग
में आये हैं. हमेशा आगे बरसाते चल रहे हैं. कब किस कमजोर कर्मचारी की इज्जत उतार
देंगे, कोई नहीं जानता. यही एक ईमानदार हैं परफेक्ट हैं, बाकी पूरी दुनिया भष्ट. यही
अकेले गांधीजी के अवतार हैं और मार्क्स-लेनिन के नये संस्करण, बाकी हम सारे लोग चोर
हैं, बेईमान हैं, बेवकूफ हैं, कीड़े-मकोड़े हैं... हम केवल पांव के नीचे रौंदे जाने
के लायक हैं. यही एक सच्चा आदमी हैं. ....‘‘
सामने आफिस के बरामदे पर निकलकर कुछ सहकर्मी इधर ही ताक रहे थे. लाल बाबू ने एसपी
के चेम्बर की ओर हाथ उठाकर आगे कहा, ‘‘...स्साले तोताराम की औलाद! रट्टा मार-मार कर
आईएएस-आईपीएस तो बन जाते हैं लेकिन जीवन भर जीवन का यह प्राथमिक पाठ भी नहीं सीख
पाते कि आदमी की भावनाएं रौंदने वाले से बड़ा विलेन कोई दूसरा नहीं होता! कोई बड़े
से बड़ा डाकू या क्रिमिनल भी नहीं. ’’ उनकी आवाज से जैसे पूरा परिसर झुलस रहा था.
छठ का दिन. शाम. घाट के लिए निकलने का समय हो गया लेकिन राजन का अब तक कहीं अता-पता
नहीं! सुबह से बच्चे बरामदे में जाते और कुछ देर तक इंतजार करने के बाद लौट आते.
लाल बाबू ने कह रखा था कि वह जरूर आयेगा. पत्नी ने आकर बताया, ‘‘ घाट जाने का समय
हो गया है. लोग निकलने लगे हैं. सामने वाले लोग दउरा लेकर निकल गये, अब तक घाट
पहुंच गये होंगे. राजन अगर नहीं आ सके तो कोई दूसरा इंतजाम तो रखना होगा न! ’’
लाल बाबू ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘ अरे, राजन ने तो कहा था कि छठ के दिन सुबह ही आ
जायेगा लेकिन वह बेचारा भी तो उसी कंस के पंजे में फंसा है! कहीं अगर समझ गया होगा
कि यह छठ पूजा में जाने वाला है तो किसी काम में उलझा दिया होगा. खैर अब दूसरा उपाय
करना ही होगा. आप बाहर जाकर किसी से पूछिये कोई अगर दउरा लेकर चलने को तैयार हो तो
ठीक, नहीं तो कुछ हल्का कर लेंगे और हमीं उठा लेंगे. छठी माई की कृपा से घाट तक ले
ही जायेंगे. वैसे कई साल से वही लगातार दउरा उठाकर आगे-आगे चलता रहा है इसलिए उसकी
कमी महसूस हो रही है. खैर तो आप बाहर जाकर अब किसी को देखिये. ’’
‘‘ अरे, यह सौभाग्य तो किस्मत वाले को ही मिलता है! कौन नहीं तैयार होगा! दउरा भारी
है, आप उपवास किये हैं इसलिए खुद नहीं ...’’ पत्नी कहती हुई बाहर चली गयीं. लाल बाबू
ने घड़ी देखी, पूरे पांच बज रहे थे. तभी वह उल्टे पांव पीछे लौट आयीं, ‘‘ ऐ जी! लगता
है कोई बड़का साहेब-सुबा आया है! लालबत्ती वाली गाड़ी आ कर दरवाजे पर रुकी और आपका
नाम लेकर कोई कुछ बोला तो मैं भागकर यहां आ... ’’
राजन की आवाज करीब आती सुनाई पड़ी, ‘‘ कहां हैं सर! अभी निकले नहीं न हैं घाट के
लिए? ’’
लाल बाबू ने दरवाजे की ओर नजर उठायी. वह बोलता हुआ भीतर आता दिखा, ‘‘ साहब भी आये
हैं! ’’
लाल बाबू अचकचा गये हैं. दिमाग जैसे चकरा गया हो! कुछ समझ पायें, इससे पहले सामने
से एसपी भी आते दिख गये. झुककर छोटे दरवाजे से निकल आंगन में निकलते हुए. परिचित-से
चेहरे पर सर्वथा अपरिचित मुस्कान. अब वे सामने आंगन में खड़े थे. सिर झुकाये, दोनों
हाथ आगे बांधे. चेहरे पर सपाट शांति! लाल बाबू को कुछ भी समझ में ही नहीं आ रहा,
क्या करें, क्या कहें! हक्का-बक्का ताकते रहे. एसपी ने मुंह खोला, ‘‘ देखिये भाई,
मैं अभी तो यहां हाजिर हुआ ही हूं, सुबह प्रसादी लेने घाट पर भी पहुंचूंगा! ’’
लाल बाबू की सांसें तेज हो गयीं. सामने रखे छठ के दउरे पर रखी सुपलियों से उठती
अगरबत्ती की सुगंधित लकीर कुछ कोमल आकार गढ़ रही थी. उन्हें लगा कि हल्के झोंके भी
गजब असरदार हैं, उनके स्पर्श से ही लोहा पिघलकर प्रवाहित हो रहा है ...लाल-लाल
सान्द्र लौह-जल!
एसपी और करीब आकर खड़े हो गये थे. उनकी आवाज एकदम तरल, लाल-लाल और सान्द्र, ‘‘...मैंने
सिद्धांतों के घने बियाबान जंगल देखे थे, आपने आंखों में उंगली डालकर भावनाओं की
हरी-भरी क्यारियां दिखा दीं! ... ’’ कुछ क्षणों के मुखर मौन के बाद उन्होंने आगे कहा,
‘‘...आप कल मंडे को आराम कर सकते हैं डीजीपी साहब का कार्यक्रम टल गया है! ’’ आवाज
में गीली मिठास थी! लग रहा था, यह आंखों से निकल रही थी.
23.06.2011, 10.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | shishir kumar singh [singh.shishir5@gmail.com] New Delhi - 2011-08-12 04:37:14 | | | |
कहानी साधारण होते हुए भी असाधारण है...आप का प्रयास परिपक्व है और पसंदीदा भी. | | | | | | | | Ssiddhant [ssiddhantmohan@gmail.com] Varanasi - 2011-07-27 01:17:28 | | | |
कई कहानियां जिन वजहों से मात खा जाती हैं, उनमें से एक सबसे बड़ी वजह विषय का सरल होते हुए भी भाषा का यूज़र फ्रेंडली ना होना है. साथ ही ये सबसे अच्छी बात है कि आपकी कहानी इस चीज़ से बहुत दूर है. कहानी में पढ़वा लेने का अद्भुत गुण है, जो हमें थकाता नहीं है. उम्दा कहानी के लिए आपको ख़ूब शुभकामनाएं. | | | | | | | | sk sharma [shivanu1975@gmail.com] balrampur , uttar pradesh - 2011-07-22 17:37:11 | | | |
उत्तम रचना!कथ्य व शिल्प दोनों दृष्टि से बहुत अच्छी कहानी. लेखक को साधुवाद. | | | | | | | | brahmaveer singh [brahmaeer@gmail.com] raipur - 2011-07-05 17:06:05 | | | |
इस वक्त चोटी की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों में जो कमी अखरती है उसे पूरा करती कहानी लिखी है श्याम बिहारी जी ने। वर्तमान की कहानियों में आम आदमी कम ही दिखता है। उसकी दिक्कतें भी कम नजर आती हैं। चोटी की पत्रिकाओं में भाषा शिल्प की बदौलत कहानी को ठेलने का अंदाज दिखता है। उन कमियों से अछूती कहानी लिखी है श्याम बिहारी जी ने। कहानी का कथ्य जितना उम्दा है उतना ही शिल्प का संयोजन है। कहानी की मांग के अनुरूप बहती भाषा है। पढ़ने से संतोष इसलिए भी मिला कि इसमें आधुनिक नायिकाओं और कुकर्मी नायकों की कारस्तानियां नहीं हैं। आम आदमी की भावनाओं को उकेरती बेहतरीन कहानी...। | | | | | | | | विनोद अनुपम [] - 2011-07-02 18:31:54 | | | |
गजब की पठनीयता,समय के नब्ज को टटोलती एक जरूरी कहानी | | | | | | | | rahul tiwari [] mumbai - 2011-06-30 05:47:24 | | | |
बहुत शानदार है भैया... आप की लेखनी बहुत जबरदस्त है... मज़ा आ गया पढ़ कर. | | | | | | | | uttam [] varanasi - 2011-06-29 20:14:13 | | | |
कहानी को पढ़ने से पहले मैं काफी थका सा महसूस कर रहा था आँखों में नीद भरी थी रात के 12:30 से ज्यादा बज चुके थे जम्हाई लेते हुए पढ़ना शुरु किया मैं पढ़ता गया और पढ़ते-पढ़ते मेरी नीद न जाने कहाँ चली गई जैसे सारा घटनाक्रम मेरी आँखों के सामने घट रहा था आपके पास शब्दो का अथाह सागर है और उनका इस खूबी से इस्तेमाल करते है की उनकी तारीफ के लिए कोई शब्द मेरे पास नहीं है एस.पी. साहब का किरदार एक आम आदमी के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद को व्यक्त करता है लेकिन इस द्वन्द में ज्यादातर लोग बड़े बाबु या यादव दरोगा बन जाते है और जो इस सांचे में नहीं ढल पते है उनकी राह काँटों से भरी होती है उनके पास भले बड़े बाबु की तरह कार और बैंक बलेंस न हो मगर एक आतंरिक शांति जरुर होती है और उसका आनंद एस.पी. साहब जैसे लोग ही महसूस कर सकते है जिसे शब्दो में बयां नहीं किया जा सकता है वैसे लोगो के लिए ही शायद कवि गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने यह गीत लिखा था ...जोड़ी तोर डाक सुने कु न आसे तोबे एकला चोलो रेरे...और आज ऐसे ही अकेले चलने वालो की जरुरत है जब ऐसे चलने वालो की संख्या बढेगी तो कारवां अपने आप ही बनता चला जायेगा. आज भारत में भ्रष्टाचार एक जलता प्रश्न है और यह कहानी उसका सही उत्तर बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा है और घडी भी 1:45 ए.एम. बता रही है आपके अगले कहानी का इन्तजार रहेगा... शुभ रात्रि. | | | | | | | | Kuldeep Srivastava [kuldeep2005@gmail.com] New Delhi - 2011-06-29 08:06:37 | | | |
वाह !! मजा आ गया !!
बहुत बड़ा लिखे है सर जी ... प्रभावशाली कहानी .... बहुत बहुत बधाई श्यामल जी आपको...!! | | | | | | | | Rajeev Mishra [rajivsmishra@yahoo.com] Kathmandu - 2011-06-29 07:43:50 | | | |
मजा आ गया.. क्या चित्रण किया है सरकारी महकमों की लगातार बिगडती बिगड़ती व्यवस्थाओं पर श्यामबिहारी जी ने.. अति सुन्दर.. लेकिन बिगड़ती व्यवस्थाओं से हमें निजात कब मिलेगी.. ये सोचने जी भी हमें जरुरत है. इस चित्रण के लिये बधाई. | | | | | | | | Shaleen [shaleen999@gmail.com] Budaun - 2011-06-29 06:44:32 | | | |
बढ़िया कहानी, धन्यवाद श्यामल जी. | | | | | | | | Amar Jyoti [amarjyoti55@gmail.com] Aligarh - 2011-06-29 05:23:09 | | | |
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की भूमि पर एक सुन्दर कथा के लिए बधाई. | | | | | | | | Abhay Singh [singh.abhay97@gmail.com] Lucknow - 2011-06-29 03:22:25 | | | |
बहुत ही अच्छी लगी.. | | | | | | | | virendra jain [j_virendra@yahoo.com] BHOPAL - 2011-06-27 06:20:16 | | | |
बदलाव के लिए उतावले किंतु अकेले लोग कभी कभी कुछ असामान्य से हो जाते हैं। पर जो अन्दर से मानवीय होते हैं वे इसी तरह लोगों को संघर्ष के लिए तैयार हो जाने पर उनका सम्मान भी करते हैं भले ही वह विद्रोह उन्हीं के खिलाफ क्यों न हो। | | | | | | | | kundan [] indore - 2011-06-27 04:57:18 | | | |
अच्छी कहानी लिखी है सर आपने.. पर क्या पता मुझे क्यों लगता है कि सिद्धांत और उसकी व्यवहारिकता कुछ ऐसी चीज है कि अगर एक को आदमी आत्म्सात करे तो दूसरे को भी भलीभंति निभा लेगा.. वैसे कहने की शैली बहुत ही बढ़िया.. तारीफ के काबिल.. | | | | | | | | विमलेश त्रिपाठी [bimleshm2001@yahoo.com] कोलकाता - 2011-06-27 03:42:09 | | | |
बहुत अच्छी कहानी है... धेर सारी बधाईयां... | | | | | | | | ashutosh kumar [ashuvandana@gmail.com] delhi - 2011-06-26 10:45:09 | | | |
कहानी में पढ़वा लेने का गुण है, यानी किस्सागोई. लेकिन भावुकता की दुहाई देता शुरू प्रेमचंदीय भावुक अंत निराश करता है. भावुकता है तो नाटकीयता आ ही जाती है. एक बेहतर कहानी का आटा अतिरिक्त मिठास के चक्कर में गीला हो गया लगता है. | | | | | | | | संजय सेन सागर [mr.sanjaysagar@gmail.com] सागर - 2011-06-26 05:02:35 | | | |
सरकारी महकमों की लगातार बिगडती बिगड़ती व्यवस्थाओं पर तीखा बार किया है,लेखन शैली जबरदस्त, शुरुआत से ही कहानी बांधे रखती है और पात्र और कहानी के महीम पात्र और कथानक काफी खूबसूरत है और चरित्र चित्रण सराहना के योग्य है. काफी खूबसूरत और सार्थक लेखन..बधाई हो. | | | | | | | | Manoj Srivastava [mks.rac.bhu@gmail.com] Varanasi - 2011-06-26 04:01:12 | | | |
Honesty Speaks. a story that can be read in one sitting. congrates. | | | | | | | | Ramanbhai Rathod [] Baroda - 2011-06-26 03:48:05 | | | |
मैं भी 34 साल क्लास वन ऑफिसर रह चुका हूँ.कहानी पढ़ते-पढ़ते मुझे थोडा सा एहसास हुया कि कहीं मैं तो वो लाल बाबु नहीं. हां,मैं थोडा स्ट्रिक्ट था पर उतना ही मानवीय था. किसी भी स्टाफ मेम्बर को कोई और तकलीफ हो तो मेरी मदद उसे मिल जाती थी. श्यामल जी ने बखूबी पूरी बात सही माहौल खड़ा करके रखी है.उनको धन्यवाद. | | | | | | | | Girish [] Mumbai - 2011-06-26 03:01:57 | | | |
Good one sir...we are becoming doling less and asking more system | | | | | | | | R N Tiwari [rntiwari1@gmail.com] Pune - 2011-06-26 02:47:37 | | | |
आज के युग में एस प्रकार के अभिव्यक्ति की नितांत आवश्यकता है. सराहनीय प्रयास . बहूत बहूत बधाई. व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के ह्रास पर प्रहार कराती कहानी,इमानदारी से चलने को सिखाती है. | | | | | | | | Niranjan Dev Singh [niranjan.devsingh@gmail.com] Varanasi - 2011-06-25 18:11:35 | | | |
nice story. Your stories are a new confidence for the new generation like us | | | | | | | | सुनील श्रीवास्तव [shrisunil@gmail.com] Indirapuram - 2011-06-25 14:40:26 | | | |
वर्त्तमान विसंगत समय की यथार्थवादी और प्रतिबिम्बात्मक तस्वीर. अच्छी कहानी के लिए बधाई. | | | | | | | | MALIK RAJKUMAR [malikrjkumar@sify.com] DELHI - 2011-06-25 09:11:20 | | | |
कहानी आज के माहौल को खोलने में पूरी तरह सक्षम है. प्रस्तुति अच्छी है. पठनीय औऱ संप्रेषण दोनों ही इस कहानी की खूबी है. | | | | | | | | गणेश जी "बागी" [ganesh3jee@gmail.com] ओपन बुक्स ऑनलाइन - 2011-06-25 07:48:02 | | | |
वाह वाह ! आदरणीय श्याम बिहारी श्यामल जी, बहुत ही खुबसूरत कहानी बन पड़ी है, लेखन शैली जबरदस्त, पहले पन्ने से चलने वाली यात्रा सीधे अंतिम पन्ने पर समाप्त हुई, बहुत ही मजबूत कथानक और चरित्र चित्रण सराहना के योग्य है |
एक कड़क अधिकारी के रूप में पुलिस अधीक्षक की छवि साथ में उनका इमानदराना रवैया, दिखावा और झूठा रौब से परहेज, मातहतों को जल्द भाप लेने की निपुणता साथ में सरकारी कर्तव्यों से इत्तर एक स्वजन और आस्था में यकीं रखने वाला व्यक्तित्व, राजनीति के दबाव में न आने का संकल्प साथ ही परिणाम स्वरूप स्थानान्तरण को सदैव तैयार, बहुत खूब, बहुत ही दबंग अधिकारी के रूप में प्रभाव जमाने में सफल रहे एस पी साहब | कार्यालय कर्मचारियों का रवैया बिलकुल जीवंत है ऐसा लग रहा है कि लेखक स्वयम लाल बाबू के किरदार को जीया हो | बहुत ही शानदार चरित्र चित्रण |
कुल मिलाकर अरसे बाद एक खुबसूरत और जीवंत कहानी पढ़ने को मिली , बहुत बहुत बधाई स्वीकार कीजिये |
| | | | | | | | bablu [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur c.g - 2011-06-25 07:35:01 | | | |
आपने अच्छी कहानी प्रकाशित की है. इस सुंदर कहानी के लिये लेखक को बधाई. आप लगातार लिखते रहें, यही कामना है. | | | | | | | | Dr. Dinesh Tripathi [] balrampur - 2011-06-25 04:57:19 | | | |
गजब की कहानी है श्यामल जी. सरकारी विभागों की कार्य-शैली को बड़ा तथ्यपरक उकेरा है आपने. सिद्धान्त और व्यवहार का का सुन्दर संयोग कहानी के अन्त में कहानी को पूरी गरिमा प्रदान करता है. बहुत बधाई आपको. | | | | | | | | Prof R K Dubey [] Patna - 2011-06-25 04:33:57 | | | |
लेखक की अभिव्यक्ति की शैली काबिले तारीफ है ..
\\\" कब किस कमजोर कर्मचारी की इज्जत उतार देंगे, कोई नहीं जानता. यही एक ईमानदार हैं परफेक्ट हैं, बाकी पूरी दुनिया भष्ट. यही अकेले गांधीजी के अवतार हैं और मार्क्स-लेनिन के नये संस्करण, बाकी हम सारे लोग चोर हैं, बेईमान हैं, बेवकूफ हैं, कीड़े-मकोड़े हैं... हम केवल पांव के नीचे रौंदे जाने के लायक हैं. यही एक सच्चा आदमी हैं. ....‘‘ | | | | | | | | anil pusadkar [anil.pusadkar@gmail.com] raipur - 2011-06-25 03:57:18 | | | |
सरकारी दफ्तरों का हाल और कभी-कभी कड़क अफसर के आने के बाद की परिस्थितयों का जीवंत चित्रण किया है आपने. हर चरित्र अपने आप में मज़बूत और पूरा खासकर एसपी साहेब का,सच में शुरुआत से अंत होते-होते गीली मिठास का सुखद एहसास करा गए आप. | | | | | | | | leena [leena3malhotra@gmail.com] delhi. - 2011-06-25 01:46:57 | | | |
कहानी के सभी पात्र वास्तविक लगते हैं. आपने दफ्तर के माहौल को भी एकदम सही-सही उकेर कर रख दिया है. मेरी बधाई. | | | | | | | | misir [misirkatya55@gmail.com] sitapur,uttar pradesh - 2011-06-24 09:40:53 | | | |
बुद्धि और भावना के समन्वय को स्थापित करती है ,श्यामल जी की यह कहानी ! अच्छी प्रभावशाली कहानी ! | | | | | | | | mahesh punetha [punetha .mahesh@gmail.com] pithoragarh - 2011-06-24 08:00:10 | | | |
कहानी रोचक है. शुरु से अंत तक पाठक को बांध कर रखती है. एसपी का चरित्र प्रभावशाली है. एख अच्छी कहानी के लिये बधाई. | | | | | | | | arunenesh [aruneshd3@gmail.com] raipur - 2011-06-24 04:38:21 | | | |
बहुत ही शानदार लिखते हैं आप मजा आ गया | | | | | | | | Kamal Dubey [kdbaba@yahoo.com] Bilaspur, Chhattisgarh. - 2011-06-24 03:51:48 | | | |
पहले ही पन्ने में आपने ये लिख कर कि \"देश में बहुत बेरोजगारी है, लापरवाह और बेईमान लोग चलें जायें तो कुछ नये लोगों को मौका मिल सकेगा. ’’ अपना फलसफा दे दिया, लयताल ऐसी कि जम कर रह गया. पूरे आठ पन्ने पढ़ता चला गया.बहुत से काम रुक गए, लाल बाबू के अधिकारी जैसा हमारा अधिकारी तो नहीं है, फिर भी काम नहीं करेंगे तो काम जाता रहेगा. जय हो छठ मैया की! | | | | | | | | Padm Singh [ppsingh8@gmail.com] Ghaziabad - 2011-06-24 03:23:42 | | | |
कहानी अपने मंतव्य और लक्ष्य तक पहुँचती है जब वह पाठक के अंतरतम की अनावृत परतों को उधेड़ कर उसके स्वत्व से साक्षात्कार करवाए... कोई भी व्यक्ति भले ही किसी कारणवश अनजाने ही किसी अनीति का हिस्सा तो बनता है किन्तु एक दर्पण कहीं न कहीं उसकी असल तस्वीर सहेज कर रखता है... चेतना की संदूक के अचानक खुलने पर कई बार स्वत्व की वही तस्वीर सामने आ खड़ी होती है.. कहानी ने ऐसी मनोदशा को बखूबी मुखर किया है..लेखक ने सरकारी महकमों की परम्परागत बिगड़ती व्यवस्थाओं में भी विचारशीलता की ज़िम्मेदारी और नैतिकता के एहसास को मरने नहीं दिया है
\\\"लाल बाबू ने हमेशा महसूस किया है कि ऊपर की कमाई भीतर से खंधारती चली जाती है... लगातार कमजोर और अपनी ही नजर में चोर बनाती हुई. किसी भी चीज को गलत जानते-मानते हुए भी ढोना मामूली यातना नहीं है. कम से कम उनके जैसे व्यक्ति के लिए, जो कलम से इन चीजों का विरोध करता चलता है.\\\"
किसी व्यवस्था की लगातार अनियंत्रित और बेलगाम पतन को देखते देखते हम धीरे धीरे न चाहते हुए भी उसके अभ्यस्त (कई बार निराश भी) हो जाते हैं...ऐसे में कोई सकारात्मक परिवर्तन अविश्वसनीय और अप्रत्याशित लगते है... विश्वास नहीं होता कि इस दौर में ऐसा भी संभव है !
“लाल बाबू का मुंह खुला का खुला रह गया! मन नही मन सोचा- यह आदमी नौकरी कर रहा है या जंग लड़ रहा है!”
कहानी ने सिद्धांतों और भावनाओं को अपनी अपनी जगह दृढ रखते हुए भी दोनों के बीच एक व्यवहारिक सम्मिश्रण का नया दृष्टिकोण दिया है...
“मैंने सिद्धांतों के घने बियाबान जंगल देखे थे, आपने आंखों में उंगली डालकर भावनाओं की हरी-भरी क्यारियां दिखा दीं!”
कहानी अंततः किसी व्यवस्था को मशीनी मुर्दापन से निकाल कर एक सैद्धांतिक व्यावहारिकता का विकल्प देती है. | | | | | | | | सत्येन्द्र [satyendra2020@gmail.com] दिल्ली - 2011-06-24 03:22:28 | | | |
आपने सरकारी दफ्तरों का कामकाज बहुत करीने से उकेरा है. हालाँकि ये तंत्र ऐसा ही है, कहना जरा मुश्किल है! ये तो कुछ ऐसा ही हुआ, जैसा सरकार कहलवाना चाहती है. और चाहती है कि सबकुछ निजी हाथों में आ जाए तो चमकदार हो जाएगी. मेरी राय थोड़ी अलग है. इस व्यवस्था में कोई आदमी इस अधिकारी की तरह काम करता है तो उसका हस्र छिपा नहीं है... ये आपने अपनी कथा में भी दिखाइ है.
जब ऊपर से ही सारा तंत्र घोटाले बाजी के पोषण में लगा हो तो नीचे वाले भी उससे प्रभावित होते ही हैं. निजी क्षेत्र में नौकरी में आदमी ४० साल के बाद बेकार हो जाता है, इसलिए सभी जवान और तेज तर्रार और चुस्त दुरुस्त दीखते हैं. देखिये ये व्यवस्था हमें कहाँ ले जाती है और कब हम इस व्यवस्था को समझकर कहानी लिखते है!
आखिर में आपने धर्म के प्रभाव को भी स्थापित कर दिया! | | | | | | | | B.K. Kumar [] New Delhi - 2011-06-24 02:54:25 | | | |
सिद्धांतों में जकड़े व्यक्ति की दुनिया ही अलग है. अपने सिद्धांत को पोषित करने की विवशता उन्हें व्यावहारिक पक्ष से अलग-थलग ही रखती है. और जब कभी तारुफ हो भी जाए तो अहम इतना बड़ा हो जाता है तत्काल स्वीकार्यता बहाल नहीं हो पाती है और यह कह कर गर्वान्वित होते है की टूट जायेंगे पर झुकेंगे नहीं.
श्यामल जी बधाई के पात्र है, इन्होंने एक आनंद्निया मोड़ पर लाकर कहानी को विराम दिया है. पर सिद्धांतों में फंसे और उससे पीड़ित दोनों तरह के लोगों के लिए तो यह शुरुआत ही कहिये. | | | | | | |
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