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रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति की तीन कवितायें

साहित्य

 

रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति की तीन कवितायें


एक
जीवन का जहाज

प्यार


तेरे प्यार में मेरे जीवन का जहाज डूब रहा है
दुनिया की चीज़े बह रही हैं
पैसा बह रहा है सुविधायें जा रही है

तेरे प्यार की विशालता में सबकुछ हिल रहा है
कितना बड़ा है इसका घेरा में तो समझ ही नहीं पाया
मैं छोटा हो गया तेरे प्यार का पानी चढ़ गया

दुनिया के शहर में आया तो रंगीन हो गया
तालाब का पानी बन कर शाम की तरह चमक उठा
सुबह तेरे घर जाने वाली सड़क बना
दुनिया में जो अच्छा हो रहा है तेरा ही प्यार है ..

हवा के साथ ठंडक की तरह मेरी सांसो में आता है
मेरे शहर से मिल कर बना है ...तेरा प्यार
मेरे शरीर में रोज पानी की तरह उतरता है
मेरी आँखों में रोज धूप की तरह भरता है

तेरा ही प्यार फैला है हर गली हर सड़क पर
तू भी नहीं बच सकी और मैं भी नहीं बच सका
कैसा है तेरा प्यार कैसा है हमारा उसमे गुम जाना

दो
तुझे खोजने जंगल नहीं जाऊंगा

मैं तेरे लिए सुबह बन के वापस आऊंगा
मैं बनता रहूँगा तेरे लिए धरती के मौसम

मैं बनूँगा तेरे लिए दोपहर और शाम
मैं खोजता रहूँगा तुझे धूप की किरणों में
मैं जानता हूँ तू यही कहीं है इसी धरती में
तू मेरे शहर की हवा में घुली हुई
मेरे शहर की चहल पहल में मिली हुई

मैं सब में तुझे तलाश करूंगा
तेरा न मिलना मेरे दुःख का कारण नहीं
तेरा न मिलना जीवन का सफ़र है

मैं जानता हूँ तू यही कही मिल जाएगी
शहर में मेरे काम के दौरान आते जाते

मैं तुझे खोजने जंगल नहीं जाऊंगा
मंदिरों और ध्यान केन्द्रों पर भी नहीं
हिल स्टेशनों और बीच पर नहीं जाऊंगा

मैं तुझे खोजते खोजते सब बन जाऊंगा
और आखिर में खुद में ही खोजूंगा तुझे

कितना सुंदर होगा उन दिनों का मौसम
जब सब मुझ में होगा और तू सब में होगी

तीन
अपने फ्रेंड्स के लिए कविता
Collapse comments

मैं उसको प्यार करता हूं.... आय लव हर
वो अनफिनिस्ड बुक की तरह लगती है
बट आई डोंट टच द ग्रेट बुक्स लेकिन महसूस करता हूं
और मेरे दोस्त मैं अपने प्यार के लिए बहुत कुछ कहूंगा
जैसे कुछ भी बुक की तरह नहीं और न लवर की तरह
इस तरह उसे पढ़ा नहीं जा सकता है
जिसे मैं गाता हूं और प्यार करता हूं

मुश्किल है किताबों को पेड़ों और फूलों की तरह देखना
रामायण को कोयल की तरह गाना मेरे दोस्त
कुरान और बाइबिल को गिटार पर बजाना और हार्ड
बट आई थिंक इसे हमारी कल्चर होना जरूरी है

मैं उस लड़की से प्यार करता हूं
धूप में पेड़ के खड़े रहने जैसा
क्या तुमने ऐसा प्यार किया है
जो फूलों की तरह लहराता और मिट्टी जैसा ठोस

तुम मुझ से बातें करो
यह कालीदास की बड़ी कल्पनाओं का प्यार है
ये वही काले बादल विदिशा पर उड़ रहे हैं

मेरे दोस्त प्यार दुनिया को देखने का एंगल है
जहां हार और जीत नहीं होती
यह कविता तुम्हारे लिए है तुम जो प्यार करते हो
ओनली फॉर यू

26.06.2011, 07.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bobby [coolbobby.ratan@ibibo.com] patna - 2011-09-03 10:51:36

 
  love is a miracle; it is a touch of heaven. 
   
 

सत्यपाल [] चंडीगढ... - 2011-08-23 13:56:34

 
  ताजगी भरी कवितायें.......पसंद... 
   
 

braj shrivastav [braj.vidisha@yahoo.in] vidisha - 2011-08-23 13:56:04

 
  still ravindra is on his earlier style.it looks attractive but not so impressive.nevertheless these poems reveals some good aspects of fall in love. 
   
 

हिमांशु [patrakarhimanshu@gmail.com] नोएडा - 2011-07-16 04:19:50

 
  रवींद्र की कवितायें नये तरीके से खुलती हैं. इन कविताओं में प्रेम का एक ऐसा उद्धात स्वरुप सामने आता है, जो कविता में बहुत कम संभव हो पाता है. 
   
 

ved patel [vpatel.patel41@gmail.com] kanker - 2011-07-15 10:30:34

 
  प्यार तो बेवकूफों की एक प्रकार से टाईमपास है. लड़कियों से जितना दूर रहो, उतना ही खुश रहोगे. प्यार एक खतरनाक बीमारी है. 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-06-27 16:55:35

 
  something can be said about love but love can not be said even though your something is worthwhile and so sweet . 
   
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