ऐश, तैश और कैश
बात निकलेगी तो...
ऐश, तैश और कैश
कनक तिवारी
दंत कथाओं और परंपराओं में तीन का आंकड़ा सदियों से समाजव्याप्त है. धरती की
अस्तित्वकथा के नायक त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश लोकव्याप्त हैं. यह अवधारणा
इतनी मज़बूत है कि लगता है तीनों देवता वास्तव में कहीं आसपास ही हैं. गंगा, यमुना
और सरस्वती भारत की तीन पवित्र नदियां हैं. राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकली
बताई जाती सरस्वती को किसी ने देखा भी नहीं होगा. इनके संगम को तीर्थराज प्रयाग कहा
जाता है. प्राणिजगत का अस्तित्व धरती, पाताल और आकाश की अवधारणा से संचालित है.
वैज्ञानिक आकाश को लेकर यही कहते हैं कि ऊपर कहीं कुछ नहीं है. आकाश नज़रों का धोखा
है. भारत से पाताल भेदने की कोशिश में पाताल वाताल तो मिलेगा नहीं, अलबत्ता अमेरिका
निकल आएगा और नागराज के बदले ओबामा. लोहिया ने भारतीय राजनीति को नेता, नगरसेठ और
नौकरशाह की तिकड़ी कहा था. संविधान की बनावट में भी विधायिका, कार्यपालिका और
न्यायपालिका की तीन संस्थाएं नागरिकों की ज़िंदगी का फलसफा और वसीयत लिख देती हैं.
दशरथ की तीन रानियां नहीं होतीं तो लोकतंत्र के संस्थापक राम को इतिहास लिखने का
अवसर नहीं मिलता. गांधी, नेहरू और पटेल की तिकड़ी को स्वतंत्रता आंदोलन को अपने कंधों
पर उठाए रखने का श्रेय दिया जाता है.
मौज़ूदा लोकतंत्र में कई नए प्रयोग और आविष्कार हो रहे हैं. पुरानी मर्यादाएं देह की
सूखी त्वचा की तरह उतर गई हैं. लोकतंत्र का नया जिस्म इक्कीसवीं सदी में ताज़ातरीन
और गुलाबी देह का दिखाई देता है. पुरानी त्रैराशिक की सभी मान्यताएं पिछड़ी और
अनावश्यक मालूम पड़ती हैं. वक्त था जब गांधी वगैरह की अगुवाई में अपने शरीर को
अंगरेज़ों की जेलों में सड़ा देने को देशसेवा कहा जाता था. तब नेताओं के शरीरों से
किसानों और मज़दूरों की तरह पसीने की गमक निकलती थी.
अब आलम यह है कि कब्र में एक पैर लटकाए बूढ़े नेता भी विदेशी सेंट और इत्र फुलेल
चुपड़े ब्यूटी पार्लर के स्थायी ग्राहक होते हैं. पुरुष होकर भी होठों पर लिपस्टिक
की परतें चढ़ाए रहते हैं. महिला सांसदों को फिल्मी तारिकाओं जैसा दिखने का चस्का लग
गया है. दूरदर्शन के निजी खबरिया चैनलों के कारण हर शो में कपड़े और केश सज्जा सहित
देह यष्टि के भी नए नए करतब ढूंढ़ने पड़ते हैं. सांसदों और मंत्रियों वगैरह के निजी
सौंदर्य सलाहकार भी नियुक्त हो रहे हैं. सुदूर अंचलों से निर्वाचित और मनोनीत सांसद
पांच वर्षों में भारत की राजधानी में रहकर अपना कायाकल्प कर लेते हैं. वे लौटते हैं
तो मतदाताओं को लगता है कि उनके प्रतिनिधि ने अपनी पूरी देह की प्लास्टिक सर्जरी करा
ली हो.
आज़ादी की लड़ाई में जननेताओं का समाजचेता क्रोध अंगरेज़ी सल्तनत के खिलाफ था. ज़्यादा
ताकतवर राजनीतिक शत्रु के विरुद्ध आंखें तरेरने में मौत का खतरा होता था. चंद्रशेखर
आज़ाद गोली खाकर मरे. भगतसिंह और साथियों को फांसी दी गई. गांधी और नेहरू सहित देश
के लाखों स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों ने जेलों में अपनी जवानी सड़ा दी. अपने परिवारों
को तबाह कर दिया. उनकी जायदादें बिक गईं. कई ने भयानक बीमारियां पाल लीं. अंगरेज़ों
की लाठियों ने सैकड़ों हज़ारों को अपाहिज कर दिया.
उनके राजनीतिक वंशज जिम, हेल्थ क्लब और आरोग्य शालाओं के स्थायी निमंत्रित अतिथि
होते हैं. वे उन क्लबों की सदस्यता ज़रूर लेते हैं जहां मालिश, वर्जिश वगैरह का काम
विपरीत यौन के लोग करते हों. शारीरिक व्यायाम के ये तथाकथित अड्डे दैहिक, मानसिक
अय्याशगाह भी हैं. पांच बल्कि सात सितारा होटलों के स्विमिंग पूल में तैरते हुए नेता
और उद्योगपति दंपत्ति करोड़ों, अरबों की डील कर लेते हैं. ऐसा ही नौकरशाह भी आदतन
करते रहते हैं. ऐसी महफूज़ जगहों पर आम आदमी अपने उदास चेहरे, कमज़ोर शरीर और खाली
जेब लिए फटक भी नहीं पाते हैं.
गांधी ने प्रतीकात्मक तौर पर बकरी का दूध पिया था. गाय को संस्कृति में माता का
दर्जा दिया गया है. पशु पक्षियों के प्रति प्रेम को एक नैसर्गिक गुण की तरह समझा
गया है. इसमें कहीं भी यह विपरीत भावना नहीं रही है कि मनुष्यों को ही पशु पक्षी की
तरह समझा जाए.
मामूली सरकारी कार्यालयों से लेकर मंत्रियों और अफसरों के कक्षों तथा बंगलों में
पहुंचने वाली जनता भेड़ बकरी और गाय भैंस की तरह दिखाई पड़ती है. हमारे संसदीय और
सरकारी भारसाधक अधिकारी जनता से बदतमीजी की भाषा में बात करते हैं. वे अपनी जुबान,
आंखों और कलम से जनता के अस्तित्व, चरित्र और नीयत पर थूकते हैं. लोगों के पास
अपमान का घूंट पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. यदि वे ज़्यादा वरिष्ठ लोकसेवक के
पास फरियाद लेकर जाएंगे भी तो वहां ज़्यादा तेज़ असर डालने वाला ज़हर मिलने की पूरी
संभावना होगी. कहते हैं जहांगीर ने अपने दरबार का घंटा बजाने पर बैल को भी न्याय
दिया था. यही काम तो आज के शासक कर रहे हैं. वे जनता को बैल बनाकर ही तो उसे न्याय
पाने के आवेदकों की सूची में रखते हैं.
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सांसदों और विधायकों, कलेक्टरों और सचिवों, पुलिस अधिकारियों और इन्कम टैक्स
के कमिश्नरों वगैरह के खर्च पर पैनी नज़र रखने का लोकतंत्र में कोई इंतज़ाम नहीं है.
कल तक जो अपने शहर या मोहल्ले में साधारण नागरिकों की तरह घूमते दिखाई देते थे.
अचानक अट्टालिकाओं के स्वामी बन जाते हैं. सैकड़ों, हज़ारों एकड़ जमीनें कबाड़ लेते
हैं. बड़े बड़े पावर प्लांट स्थापित कर लेते हैं. विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा कर
लेते हैं. अपनी संतानों के विवाह में राज्यकोष का करोड़ों रुपया बेशर्मी बल्कि
बेरहमी से खर्च करते हैं. बीमार होने पर भारत में मरना भी पसंद नहीं करते. महंगे
इलाज के लिए विदेश जाना ही उन्हें मयस्सर होता है. उनके बिगड़ैल बच्चे बिना लाइसेंस
की मोटरों और बंदूकों से लोगों को मार भी डालते हैं.
नौकरशाह सेवानिवृत्त होकर चोर दरवाज़े से घुसकर जनप्रतिनिधि और मंत्री बन जाते हैं.
नगरसेठ अपनी मिल्कियत के दम पर बड़े बड़े क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित कर उनमें तरह तरह
की अय्याशियों के कथानक बुनते रहते हैं. कुल मिलाकर एक अनैतिक, अश्लील और चरित्रहीन
भद्रलोक भारतीय लोकतंत्र में जनता के गाढ़े परिश्रम की कमाई का यश, पुण्य और मुनाफा
मलाई की तरह चट कर रहा है.
महान लेखक अल्डुअस हक्सले ने कहा है कि जवाहरलाल नेहरू का स्पर्श पाकर राजनीति सभ्य
हो गई थी. हमारी आज़ादी की लड़ाई के पहरुए सांस्कृतिक तमीज़ के कालजयी हस्ताक्षर रहे
हैं. मौजू़दा राजनीतिज्ञों के दीवानेखास में फूहड़, अश्लील और असंयत भाषा का
इस्तेमाल होता है. वह भारतीय लोकतंत्र के पतन का बैरोमीटर है. संसदीय भाषा का
विधायिकाओं में बैठकर ककहरा पढ़ने वाले जनप्रतिनिधि अपने निजी सामाजिक जीवन में जिस
भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसे सुनकर तो सेंसर बोर्ड भी शरमा जाए.
तमाम राजनीतिक व्यूह रचना के बावज़ूद भाजपा के कुछ बड़े नेताओं की बदजुबानी के कारण
ही कांग्रेस समर्थित यूपीए को सरकार बनाने का मौका मिल गया था. उसके उलट सरकारी
प्रवक्ता निर्दोष अन्ना हज़ारे जैसे गांधीवादी बुजुर्ग के खिलाफ क्रूर, सामंती और
दहशतगर्दी की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं. सत्ता उनके ज़ेहन से उतरती हुई जुबान में
बैठ गई है. केन्द्र सरकार के कई प्रतिनिधि देश के जनआंदोलनकारियों को पुलिसिया
लाठियों, गोलियों और जेल की सीधी सीधी धमकी दे रहे हैं. ऐसे लोग आज भी जनता को
अंगरेज़ी हुकूमत के ज़माने की रियाया समझते हैं जो केवल इनके सामने कोर्निश बजाती
रहे.
गांधी फक्कड़ थे. कुछ नहीं करते तब भी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. मोतीलाल नेहरू
ने अपनी पूरी संपत्ति लुटा दी. सरदार पटेल और राजेन्द्र प्रसाद के पास तो बहुत कपड़े
भी नहीं थे. हमारे महान नेता यदि जनता के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते तो रायबहादुर,
खान बहादुर, दीवान बहादुर और सर वगैरह का खिताब ढोते नोबेल पुरस्कार वगैरह भी हड़प
सकते थे. उन्होंने जानबूझकर गुरबत ओढ़ी. वे आत्मा के अमीर लोग थे.
उनके राजनीतिक वंशज लेकिन दुनियावी अर्थों में मूर्ख नहीं हैं. वे मालेमुफ्त
दिलेबेरहम की कहावत का अर्थ समझते हैं. वे छोटे मोटे घपले करने को तुच्छ काम समझते
हैं. लाखों करोड़ों रुपयों को लील जाने के बाद भी उन्हें डकार तक नहीं आती. अपने
ऐशोआराम को कायम रखने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को विश्व बैंक में गिरवी रख सकते
हैं. यूरो मुद्रा में भारत को बेच सकते हैं. आदिवासियों, दलितों और गरीबों की
ज़मीनों को भारतीय इतिहास के खलनायकों के नए संस्करणों की तरह जबरिया कबाड़ सकते हैं.
ऐसी भूमियों पर उद्योगपतियों को लोहे, ऊर्जा, सीमेंट वगैरह के उद्योगों को लगाने के
लिए उसी तरह आमंत्रित करते हैं जैसे घरजवांई बनाए जाते हैं.
उच्च न्यायालय तक ऐसे हो गए हैं, जो सामान्य जनआंदोलनों को राजद्रोह समझते हैं.
वहां मिल मालिकों के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को पुलिसिया जुल्म सहने के
बावजूद झूठे मुकदमों तक में ज़मानत नहीं मिल पाती है.
ऐश, तैश और कैश की नई त्रिगुणात्मक कथा के निर्माता, निर्देशक और अभिनेता भी राजकुल
परिवारों के हैं. बाप यदि मुख्यमंत्री हो तो बेटे का यह संवैधानिक अधिकार बन जाता
है कि वह भी अपने पिता की गद्दी संभाले. शिक्षा व्यवस्था इस तरह की है कि अमूमन
आई.ए.एस. का बेटा ही आई.ए.एस. बनेगा. जानबूझकर शिक्षा को निजी उद्योग बनाया गया
जिससे पूंजीपतियों के निकम्मे कुलदीपक ऊंची उपाधियां प्राप्त कर शिक्षा के नए
उद्योग स्थापित करते चलें.
नौकरशाह, मंत्री और उद्योगपति यदि पकड़े भी जाएं तो खुद ही जांच करें और खुद को
निर्दोर्षिता का प्रमाणपत्र दे दें. इसके बाद भी स्कूली पाठ्यक्रम में बच्चों को
पढ़ाया जाए कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा और पुख्ता लोकतंत्र है. इसको समझने के
लिए अंगरेज़ महारानी की लठिया को भारत का गौरव समझते हुए सड़कों पर बच्चों को दौड़ाया
जाए. उन्हें बार बार दौड़ाया जाए. नारे लगवाए जाएं कि भारत महान है. जब दौड़ते दौड़ते
वे थककर रोजगार दफ्तर में अपने नामों का पंजीयन कराने के बाद बूढ़े होने लगेंगे तब
उन्हें समझ में आएगा कि लोकतंत्र के नए त्रिगुण का अर्थ क्या होता है!
26.06.2011, 09.28 (GMT+05:30) पर प्रकाशित