जयराम रमेश की मजबूरी
बात पते की
जयराम रमेश की मजबूरी
संदीप पांडेय
जयराम रमेश ने अपने फैसलों से कई बार देश को चौंकाया है. पहले तो उन्होने देश का
ध्यानाकर्षण पर्यावरण मंत्रालय की तरफ कराया. यह एक ऐसा मंत्रालय है, जिसे अभी तक
कोई गम्भीरता से नहीं लेता था. परियोजनाओं को जो पर्यावरणीय स्वीकृतियां चाहिए होती
थीं, वे या तो आसानी से मिल जाती थीं या फिर यह मान कर कि देर-सवेर यह स्वीकृति तो
मिल ही जाएगी. कई बार बिना पर्यावरणीय स्वीकृति के भी परियोजनाओं का काम शुरू हो
जाता था.
ठीक उसी प्रकार से जैसे कभी टी.एन. शेषन ने लोगों को चुनाव आयोग की ताकत का एहसास
कराया था, वैसे ही जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्रालय के महत्व का ज्ञान कराया.
परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति प्राप्त करना एक औपचारिकता मात्र
समझी जाती थी या ज्यादा से ज्यादा एक ऐसी बाधा, जिसे दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं
माना जाता था.
लेकिन जयराम रमेश ने यह धारणा बदलनी शुरू कर दी थी. एक के बाद एक, उन्होंने कई ऐसे
फैसले लिए, जिससे उन्होने वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति बढ़ती चिन्ता का एहसास
भी कराया. खासकर कार्बन उत्सर्जन व धरती का बढ़ता तापमान अब वैश्विक चिन्ता के विषय
हैं और हम अपने आप को इससे अलग नहीं रख सकते.
सबसे पहले जयराम रमेश ने ध्यान तब खींचा, जब उन्होंने नदी जोड़ो परियोजना पर सवाल
खड़े किए. जिस परियोजना की वकालत वैज्ञानिक-राष्ट्रपति अब्दुल कलाम व सर्वोच्च
न्यायालय कर चुके हों, उस पर सवाल खड़े करना वाकई में बहादुरी का काम था. जयराम रमेश
के बोलने के बाद राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को पर्यावरण की दृष्टि से अनुचित
बताया.
जयराम रमेश ने जो सबसे बेहतरीन काम किया था, वह था देश भर में घूम-घूम कर लोगों से
बी.टी. बैंगन के बारे में राय लेना. आम तौर पर जिस देश में ग्राम पंचायतों से लेकर
केन्द्रीय कैबिनेट के निर्णय बंद कमरों में लिए जाते हों और जहां सूचना का अधिकार
कानून लागू होने के बाद भी अधिकारी-कर्मचारी सूचना देने के बजाए छुपाने की कोशिश
करते हों, वहां किसी मुद्दे पर जनता की राय लेकर अपना फैसला लेना एक ताजी बयार जैसा
था. असल में लोकतंत्र में तो फैसले इसी प्रकार से लिये जाने चाहिए. इस मायने में
जयराम रमेश ने एक आदर्श प्रस्तुत किया.
जयराम रमेश ने भारत में बी.टी. बैंगन के प्रवेश पर रोक के साथ-साथ उड़ीसा में
वेदांता कम्पनी द्वारा बॉक्साइट खनन, पॉस्को कम्पनी द्वारा स्टील का कारखाना
स्थापित करने, दमरा बंदरगाह, महाराष्ट्र के जैतापुर में नाभकीय बिजली घर स्थापित
करने, लवासा की लेक सिटी परियोजना, मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी पर महेश्वर बांध
परियोजना, इन्दिरा सागर व ओंकारेश्वर बांधों की नहर परियोजनाओं, छत्तीसगढ़ में जिंदल
का स्टील का कारखाना, हिमाचल प्रदेश में रेणुका बांध परियोजना, उत्तराखण्ड की लोहऱी
नागपाल बांध परियोजना, सिक्किम में दो बांध परियोजनाओं आदि पर रोक लगाने का सराहनीय
काम किया क्योंकि ये परियोजनाएं पर्यावरणीय नियमों का पालन नहीं कर रही थीं. मुम्बई
में पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना निर्मित आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी की 31 मंजिला इमारत
को ढहाने का आदेश भी जयराम रमेश दे चुके हैं.
जबकि ऐसा लग रहा था कि भारत को एक अच्छा पर्यावरण एवं वन मंत्री मिल गया है जो नियम
कानून का ठीक से पालन करेगा तभी जयराम रमेश ने ही अपने लिये निर्णयों को वापस लेना
भी शुरू कर दिया.
उन्होने पॉस्को स्टील कारखाने, जैतापुर के नाभकीय बिजली संयत्र, इन्दिरा सागर व
ओंकारेश्वर बांधों की नहरों, जिंदल के स्टील कारखाने और अब महेश्वर बांध पर लगाई
रोक हटा ली है. ऐसा लग रहा है कि इन परियोजनाओं से जिनका हित सधना है, वे ताकतें
जयराम रमेश पर भारी पड़ रही हैं. यह भारत की राजनीतिक हकीकत भी बयान करती है. जयराम
रमेश खुद कहते हैं कि अवैध काम को मंजूरी देना भारतीयों का लक्षण हो गया है.
मजेदार बात यह है कि जयराम रमेश कहते हैं कि उन्हें अवैध काम को वैधता प्रदान करना
पसंद नहीं है किन्तु कबूल करते हैं कि उन्हें कई बार मजबूरी में गलत निर्णय लेने
पड़ते हैं. किस किस्म के दबाव में निर्णय लेने पड़ते हैं, यह भी जयराम रमेश ने
महेश्वर बांध के उदाहरण से साफ कर दिया है.
पिछले वर्ष अप्रैल में पर्यावरण मंत्रालय ने बांध के काम पर रोक लगा दी थी क्योंकि
2001 में दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों का बांध निर्माता श्री महेश्वर हाईडल
पावर कार्पोरेशन लिमिटेड, जो एस. कुमार्स की एक कम्पनी है, पालन नहीं कर रहा था.
पूरी न होने वाली शर्तों में एक पुनर्वास से सम्बन्धित थी. जो गांव बांध की वजह से
डूबने वाले थे, उनका पुनर्वास बांध निर्माण के साथ-साथ होना था. किन्तु जब बांध 80
प्रतिशत बन चुका था तो पुनर्वास पर काम कात्र 5 प्रतिशत हुआ था. अभी भी पूरे डूबने
वाले नौ गांवों में से सिर्फ एक का ही पुनर्वास हुआ है, जबकि मध्य प्रदेश सरकार का
दावा है कि पुनर्वास 70 प्रतिशत हो चुका है.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय
सिंह ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर बांध निर्माण पर लगी रोक को हटाने की मांग की
है. शिवराज सिंह चौहान ने तो अनशन भी किया. काश, शिवराज सिंह चौहान और दिग्वजय सिंह
को इतनी ही चिन्ता विस्थापितों की होती तो शायद अब तक पुनर्वास का काम पूरा हो गया
होता. लेकिन इस उदाहरण से साफ है कि सत्ता में बैठे लोग पूंजीपतियों के हितों का ही
प्रतिनिधित्व करते हैं और इस स्तर पर राजनीतिक दलों के बीच का फर्क भी खत्म हो जाता
है.
जयराम रमेश ने बांध के बाकी बचे पांच गेटों के निर्माण पर लगी रोक को हटाते हुए कहा
कि ये गेट तभी बंद किये जा सकेगें या 154 मीटर की ऊंचाई तक बांध का जलाशय तभी भरा
जा सकेगा, जब पुनर्वास का काम पूरा हो जाएगा. किन्तु जयराम रमेश की लाचारी इस बात
से झलकती है जब वे कहते हैं कि उनके पास कोई चारा नहीं बचा था, सिवाय इसके कि वे
बांध के काम पर लगी रोक हटा लें.
जयराम रमेश की मजबूरी में एक बार फिर पूंजीपति वर्ग ने आम जनता की कीमत पर अपनी बात
इस देश के शासक वर्ग से मनवा ली है. और शासक वर्ग का दलाल चरित्र फिर सामने आया है.
01.07.2011, 22.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित