अरब में स्त्रियों के लिये बसंत
बाईलाइन
अरब में स्त्रियों के लिये बसंत
एम जे अकबर
अरब के श्रेष्ठतम इतिहासकार इब्न खल्दून ने अपनी शानदार किताब ‘मुकद्दिमाह’ में अरब
भावना के महा-पुनर्जागरण को ‘असाबिया’ कहा है. इसका अर्थ मोटे तौर पर ‘सामूहिक एकता
या संघभाव’ से लगाया जा सकता है- एक चेतना, जो कबीलाई पहचान जैसी परंपरागत
वफादारियों से ऊपर होती है और इसी ने वह प्रेरणास्पद ऊर्जा प्रवाहित की, जिसने
नखलिस्तान के वासियों और खानाबदोशों को विश्वविजेता बना दिया.
सातवीं सदी के इस बुनियादी पुनरुत्थान के साथ किसी और चीज की तुलना नहीं की जा
सकती, लेकिन सीमाओं से परे अरब उभार में ‘असाबिया’ का स्पर्श है, जिसने एक अलसाई
हुई अरबी सडक़ को क्रांतिकारी ताकत में बदल दिया है, जो उन सड़ाने-गलाने वाले
मकडज़ालों को साफ कर रही है, जिन्होंने महान जनता को स्थानीय निरंकुशता और अन्याय के
पीडि़त में बदलकर रख दिया है.
किसी क्रांति की रफ्तार और रास्ते का कभी भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता, न ही यह
सुनिश्चित किया जा सकता है कि इसका पुनर्निर्माण एक स्थिर व्यवस्था के रूप में हो.
लेकिन लीबिया के गद्दाफी और सीरिया के असद अपने दीवालिया विचारों व बहानों के साथ
ऐसी दुनिया से चिपके हुए हैं, जो खत्म हो चुकी है. यह सब उस विनाशकारी हुकूमत के
लिए पाखंडी छद्म आवरण की तरह है, जिसने राष्ट्रीय संपदा (इसमें तेल शामिल है) को
निजी संपत्ति बना दिया और आजादी व लोकतंत्र के नागरिक अधिकारों का गला ही घोंट
दिया.
इन सैन्य-पुलिस राज्यों ने एक छोटे-से मध्यमवर्ग को नई वंशानुगत, नागरिक सल्तनतों
के प्रति वफादारी के बदले में समृद्धि का पुरस्कार दिया और इस वर्ग के जरिए
अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पाने की कोशिश की. क्या गद्दाफी कुनबे की तुलना में
मध्ययुग में निरंकुशता का कोई दृष्टांत हो सकता है, जिसकी अराजक आलीशानता को बाकी
दुनिया लंबे समय तक सहन करती रही?
गद्दाफी के बेटे जब स्विट्जरलैंड में अपने निजी स्टाफ के साथ नृशंसता नहीं कर रहे
थे, तब सार्वजनिक कोषों से चुराए धन से इटली में फुटबॉल क्लब व इंग्लैंड में लंदन
स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स के डॉक्टरेट खरीदने में व्यस्त थे. विदेशियों की चापलूसी से
बेदम हुए निरंकुश शासक घर के माहौल से ही बेखबर और बेपरवाह हो गए.
जब तक ये प्रजापीडक़ पश्चिमी ताकतों की क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करते
हैं, तब तक वे ताकतें अपने ही द्वारा घोषित नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीन रहती हैं
: अगर हुस्नी मुबारक आज्ञाकारी रहते हैं, तो कोई मिस्री, अमेरिकियों जितना लोकतंत्र
पाने का अधिकार नहीं रखता. बहरहाल, अब तहरीर चौक ने परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संबंधों
को उलट-पुलट डालने का फैसला कर लिया है. अमरीका और यूरोप ट्यूनीशिया या मिस्र में
अपने आसामियों को बचाने में नाकाम रहे. सोवियत संघ बहुत पहले दफन हो चुका है और रूस
तथा चीन मौखिक भरोसा दिलाने से ज्यादा की पेशकश करने में ढुलमुल हैं, सो, लीबिया और
सीरिया में गद्दी के कब्जेधारी अपने ही लोगों के खिलाफ लगातार बढ़ती क्रूरता के साथ
अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं.
उनके पास खोने के लिए खजाना है : उनकी लूट. वे अपने घृणित जुल्मो-सितम को बनाए रखने
के लिए जमकर लड़ेंगे और बदलाव की प्रक्रिया न तो आसान होगी, न पूर्वानुमान लगाए
जाने लायक. परिवर्तन में विलंब हो सकता है, लेकिन इसे झुकाया या नकारा नहीं जा
सकता.
अरब में सडक़ों पर उभार महज इसीलिए पश्चिम का शत्रु नहीं होने जा रहा कि वॉशिंगटन ने
अधिकारवादी अरब सत्ताओं को सहारा दिया था. असल में, सबसे बड़ा उत्प्रेरक तो
आधुनिकता के लिए अंत:प्रेरणा है. आप लोकतंत्र और लैंगिक समानता के बगैर आधुनिक समाज
या राष्ट्र नहीं हो सकते और ये पश्चिमी राष्ट्रों की सर्वोपरि खासियतें हैं.
लोकतंत्र में सरकारें बनती हैं, जो न निरंकुश होंगी, न चापलूस.
विडंबनापूर्ण है कि अगर पश्चिम समर्थक अरब राजवंशों ने असहमति के प्रबंधन में बेहतर
लचीलापन दिखाया, तो इसका कारण यह है कि वे लोकतांत्रिक तानाशाहों की तुलना में अपनी
जनता के ज्यादा करीब रहे हैं. लेकिन, लंबे समय में, या मध्यम समय में भी, यह
अपर्याप्त है. पुरुष संबंधियों पर निर्भर रहने की बजाय, कार चलाने के बराबर अधिकार
और ड्राइविंग लाइसेंस के लिए सऊदी महिलाओं की ताजा मांग के सुधारवादी निहितार्थों
को कम करके आंकना भूल होगी.
यह अभियान दमदार सवाल पूछता है : यदि पैगंबर मोहम्मद की पत्नी आइशा युद्ध में अपनी
सेना का नेतृत्व करते हुए ऊंट चालन कर सकती हैं, अगर महिलाएं मस्जिद जा सकती हैं और
मक्का व मदीना में इस्लाम के आगमन के बाद से ही मंत्रणाओं में हिस्सा ले सकती हैं,
तो फिर वे दो पवित्र मस्जिदों के अभिरक्षक द्वारा शासित देश में कार क्यों नहीं चला
सकतीं?
सऊदी बहस दिमागों को खोल रही है. खुले दिमाग खुले समाज की मांग करते हैं. अगर अरब
राजशाहियों ने अपने महलों को बकिंघम पैलेस में नहीं बदला और एकछत्र अधिकार के बदले
रस्मी भूमिका स्वीकार नहीं की, तो ‘असाबिया’ की भावना उनके दरवाजों को खडख़ड़ाने
लगेगी.
हाफिज असद खुद को नए सीरियाई राजवंश का संस्थापक मानता है. वह ऐसा शासक है, जिसे
बगावत को दबाने के लिए 10 हजार नागरिकों की हत्या पर कोई खेद नहीं है. उसने हर
सार्वजनिक भवन और नगर-द्वार पर यह नारा लगवाया है : ‘राष्ट्रपति हाफिज असद सदा के
लिए हमारे लीडर हैं’. उसका बेटा बशर ‘सदा के लिए’ के उसके विश्वास में उसके साथ है.
समय और ‘असाबिया’ की लहर किसी व्यक्ति का इंतजार नहीं करती.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
03.07.2011, 00.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित