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आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2
आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-2
रामचंद्र गुहा
अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव
आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र-1
1960 के दशक तक आते-आते भारत सरकार द्वारा प्रायोजित की गई रिपोर्टें खुद इस बात की
गवाही देने लगी थीं कि कैसे राज्य अपने आदिवासी नागरिकों को आत्मसम्मान से जीने की
स्थितियां मुहैया कराने में नाकाम रहा है. यह कोई सामान्य किस्म की आलोचना नहीं थी,
बल्कि आदिवासियों की विशिष्ट समस्याओं को पहचाना भी गया था. मसलन, सुस्त और भ्रष्ट
अधिकारी, जमीन छीने जाना, ऋणग्रस्तता, वन के इस्तेमाल पर लगाया गया प्रतिबंध और बड़े
पैमाने पर विस्थापन. इसमें तथा अन्य रिपोर्टों में जो साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे,
उनकी प्रतिक्रिया में ऐसी नीतियां बनाए और लागू किए जाने की जरूरत थी जो यह
सुनिश्चित कर पाती कि भारत का औद्योगिक और आर्थिक विकास इसके आदिवासी नागरिकों की
कीमत पर होने नहीं जा रहा है.
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आदिवासियों के बीच ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जो राज्य और भाषा की
सीमाओं से परे लोगों के लिए प्रेम, एकजुटता और प्रेरणा का
स्रोत रहा हो. मसलन, बिरसा मुंडा को झारखंड में सम्मान दिया
जाता है, लेकिन आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों
में उनकी पहचान शायद ही है. |
इन रिपोर्टों और इनमें की गई सिफारिशों पर बहरा कर देने वाली चुप्पी साध ली गई. ऐसा
नहीं है कि इसका अंदाजा पहले से नहीं था. जैसा कि एल्विन समिति ने दर्ज किया,
आदिवासी समस्या पर अतीत की रिपोर्टों को भी 'व्यवहार में उपेक्षित' किया गया है.
उसने टिप्पणी की कि 'यह तो अद्भुत है...कैसे इसी तरह अक्सर एक सिफारिश सरकारी फाइल
के निर्मम आगोश में दम तोड़ देती है और फिर कभी भी उसकी आवाज कानों में नहीं पड़ती.'
कम से कम 20-30 साल तक तो ऐसा होता ही है.
1980 के दशक में यह बात साबित होती है जब
सरकारी रिपोर्टों की एक अन्य श्रृंखला में आदिवासी की जारी बदहाली पर कठोर
टिप्पणियां की गई थीं. इन्हें लिखा था अनुसूचित जाति और जनजाति के तत्कालीन आयुक्त
बी. डी. शर्मा ने, एक ऐसे नौकरशाह जिन्हें आदिवासियों के साथ और समानान्तर काम करने
का व्यापक अनुभव था.
जैसा कि शर्मा ने लिखा, आदिवासियों की प्रमुख समस्या अब भी
भूमि अलगाव, जंगलों का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध, बांधों और अन्य बड़ी परियोजनाओं
के चलते होने वाला विस्थापन ही हैं. उन्होंने कहा कि, 'आदिवासी लोग अपने इतिहास के
निर्णायक बिंदु पर हैं...', वे 'संसाधनों पर अपना नियंत्रण बहुत तेजी से खो रहे
हैं, लेकिन साथ ही वे एक ऐसे सामाजिक विघटन का सामना कर रहे हैं जो इतिहास में
अभूतपूर्व है.' और इसके बावजूद 'आदिवासी इलाकों की बदहाली की कहानियां बाहर शायद ही
सुनी जाती हों. और जब वे यहां आते हैं, तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता.' इससे
भी बुरा यह है कि 'राज्य खुद ही विभाजक भूमिका में कभी-कभार आ जाता है और ऐसी
कार्रवाइयों में उतर जाता है जिन्हें आसानी से हम कानूनी नहीं कह सकते क्योंकि
मामला एक छोटे से समुदाय का है जिसके पास अपनी आवाज नहीं.'
इस बार विनम्र शब्दों में और बेहतर तरीके से लिखी गई इन रिपोर्टों पर सरकार की
प्रतिकिय्रा फिर यही रही कि उसे संसद में प्रस्तुत करने से इनकार कर दिया गया.
3.
उपर्युक्त कुछ तथ्य स्वतंत्र भारत में आदिवासियों की उपेक्षा और शोषण से जुड़े हैं.
अब मैं विद्रोहों और असंतोष के इतिहास की ओर रुख करना चाहूंगा. औपनिवेशिक युग में
आदिवासी इलाकों में बड़े विद्रोह हुए, जैसे 19वीं शताब्दी के आरंभ में कोल और भुम्ज
का विद्रोह, 1855 का संताल हूल, 1890 के दशक में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में
उलगुलान, 1911 में बस्तर में आदिवासियों का उभार, 1920 के दशक में गुडेन-रम्पा का
विद्रोह और 1945-46 में वर्ली का विद्रोह. इनमें से अधिकतर विद्रोह आम तौर पर जमीन
छीने जाने या मुनाफे के लिए जंगलों के बेजा इस्तेमाल से जुड़े हैं. इन विद्रोहों का
दमन सिर्फ बर्बर बल प्रयोग द्वारा ही संभव किया जा सका था.
आजादी के बाद के शुरुआती दो दशक अपेक्षाकृत आदिवासी इलाकों के लिए शांतिपूर्ण थे.
संभव है कि जयपाल सिंह की ही तरह अधिकतर आदिवासियों ने सरकार के शब्दों पर भरोसा कर
लिया था- स्वतंत्रता के बाद एक नए अध्याय की शुरुआत होगी, जहां 'अवसरों की समानता
होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी.' हालांकि, जैसे-जैसे इसका सबूत इकट्ठा
होता गया कि विकास के फलों का वितरण असमान रूप से होगा और इसकी कीमत आदिवासी
समुदायों को सबसे ज्यादा चुकानी पड़ेगी, असंतोष फिर से फलने लगा.
इसी का नतीजा रहा कि 1966 में बस्तर में आदिवासियों का एक बड़ा उभार वहां के हाल ही
में अपदस्थ किए गए राजा प्रवीर चंद्र भंज देव के नेतृत्व में देखने में आया. इसके
बाद 1970 के दशक में इस असंतोष ने बिहार के आदिवासी इलाकों में सशस्त्र रूप धारण कर
लिया जिसकी मांग थी कि सूदखोरों और वन विभाग द्वारा शोषण की समाप्ति हो और एक
स्वतंत्र राज्य का गठन किया जाए जिसका नाम झारखंड हो. इसी दशक में महाराष्ट्र में
भूमि सेना और काश्तकारी संगठन जैसे समूहों द्वारा आदिवासियों को उनकी जमीनों और वन
अधिकारों के समर्थन में संगठित किया गया. इसके बाद 1970 के दशक में बिहार में
कोयल-कारो परियोजनाओं के खिलाफ विरोध देखने में आया.
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1980 के दशक से लेकर अब तक
विकास परियोजनाओं और खासकर बड़े बांधों द्वारा विस्थापित किए गए आदिवासियों की
बदहाली को नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा प्रकाशित किया जाता रहा है. हाल ही में उड़ीसा
में खनन परियोजनाओं का खतरा झेल रहे आदिवासियों ने अपनी उन जमीनों पर दोबारा
दावेदारी जताने के लिए सिलसिलेवार प्रदर्शन और आंदोलनों को अंजाम दिया है जिन्हें
राज्य सरकार द्वारा खनन कंपनियों के सुपुर्द कर दिया गया है.
इन विभिन्न आंदोलनों और प्रदर्शनों के अलावा और इन सबसे ऊपर माओवादी क्रांतिकारी
आदिवासी इलाकों में सक्रिय हुए हैं. वह गांव नक्सलबाड़ी, जहां से नक्सलियों को नाम
की पहचान मिली, खुद पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल इलाके में स्थित है. 1960 के दशक
के आखिर में नक्सली गतिविधियों का एक अन्य प्रमुख केंद्र आंध्र प्रदेश के आदिवासी
इलाके रहे हैं. 1970 के दशक में माओवादियों ने दो प्रमुख इलाकों में अपना आधार
विकसित किया - मध्य बिहार के जातिग्रस्त इलाकों में और दक्षिण भारत के आदिवासी
इलाकों में. हाल के दशकों में जिस तरह माओवादी असंतोष फैला है, इसने महाराष्ट्र,
उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिलों में अपनी पैठ सबसे ज्यादा बनाई है.
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किसी आदिवासी को कभी भी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश
नहीं नियुक्त किया गया. जहां तक मेरी जानकारी है, आज तक किसी भी
आदिवासी को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भी नहीं बनाया गया. |
पिछले चार दशकों के दौरान मध्य भारत के आदिवासियों ने राज्य के कार्यक्रमों और
नीतियों के खिलाफ अक्सर अपना विरोध सार्वजनिक और सामूहिक रूप से प्रदर्शित किया है.
उनका विरोध कई बार पारम्परिक साधनों और नेतृत्व का सहारा ले लेता है, जैसा कि 1966
में बस्तर और 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में झारखंड में देखने में आया था. इसके
अलावा कई बार ऐसा हुआ कि आदिवासियों को संगठित करने में शहरी मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि
से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भूमिका निभाई है, जैसा कि हम 1970 के दशक में
महाराष्ट्र में और नर्मदा बचाओं आंदोलन में देखते हैं. लेकिन इन सबकी तुलना में
आदिवासी असंतोष को सबसे ज्यादा स्वर सशस्त्र माओवादी क्रांतिकारियों के नेतृत्व में
मिला है.
4.
खंड 1 में हमने संक्षेप में दलितों और आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति की
तुलना की थी. जब इस तुलना को हम राजनीतिक दायरे में खींच कर ले जाते हैं, तो पाते
हैं कि आदिवासी और ज्यादा अवसरविहीन हैं. आदिवासियों की कमज़ोर और अरक्षित स्थिति तब
और ज्यादा सतह पर उभर कर सामने आ जाती है जब हम इस तुलना को हाशिए पर पड़े एक तीसरे
समुदाय तक विस्तारित कर देते हैं, यानी मुस्लिमों तक.
मसलन, 1947 से लेकर 2007 तक के केंद्रीय मंत्रिमंडलों की बनावट को ही हम देखें. इस
दौरान कई मुस्लिम और दलित ऐसे रहे हैं जिन्होंने महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया
है. दलित और /या मुस्लिम कभी-कभार लंबी अवधि तक गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, कृषि
मंत्री और विदेश मंत्री के पदों पर भी रहे हैं. दूसरी ओर हम देखते हैं कि केंद्रीय
मंत्रिमंडल में आदिवासी नेता को कभी भी कोई प्रमुख पद नहीं दिया गया.
ठीक इसी तरह दलितों और मुस्लिमों दोनों ने ही ऊंचे संवैधानिक पदों पर भी राज किया
है. अब तक भारत के सबसे बड़े पद राष्ट्रपति के तौर पर एक दलित और तीन मुस्लिम रह
चुके हैं. एक दलित और तीन मुस्लिम भारत के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं. किसी
आदिवासी को कभी भी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश नहीं नियुक्त किया
गया. जहां तक मेरी जानकारी है, आज तक किसी भी आदिवासी को उच्चतम न्यायालय का
न्यायाधीश भी नहीं बनाया गया. जहां तक राज्यों के राज्यपालों का सवाल
है, तो
आदिवासियों की तुलना में दलितों और मुस्लिमों की संख्या काफी ज्यादा रही है.
ये सारे तथ्य राजनीतिक प्रक्रिया में आदिवासियों की व्यापक गुमशुदगी का प्रतिबिंब
भर हैं. मुस्लिम और दलित राष्ट्र के राजनीतिक मंच पर खुद को एक हित समूह के तौर पर
दर्ज करवा पाने में सक्षम रहे हैं- उन्हें लोकप्रिय विमर्शों में ऐसे समुदायों के
तौर पर बरता जाता है जो अखिल भारतीय हैं. वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के अखिल भारतीय
होने के दावे सिर्फ उन्हीं जिलों और राज्यों तक महदूद रह जाते हैं जहां उनकी रिहाइश
है. दलितों और मुस्लिमों के ठीक उलट आदिवासी अब भी बिखरे हुए पाए जाते हैं.
खासकर, दलितों ने अपनी शिकायतों को संवैधानिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए बहुत
प्रभावी रास्ता मुहैया कराया है. उन्होंने ऐसी राजनीतिक पार्टियां बनाईं जो कामयाब
रहीं जैसे बहुजन समाज पार्टी, जो उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ है और जिसका विस्तार व
प्रभाव तेजी से अन्य राज्यों में भी फैल रहा है. दलितों के राजनेता भी राष्ट्रीय
स्तर के हैं, जैसे बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री
मायावती जिन्हें भारत की संभावित अगली प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है.
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दूसरी ओर आदिवासियों के पास न तो कोई कामयाब राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई
राष्ट्रीय स्तर का नेता. चालीस के दशक में जयपाल सिंह के नेतृत्व में झारखंड पार्टी
का गठन हुआ था. 1952 में हुए पहले आम चुनावों में उसने बढ़िया प्रदर्शन किया, उसके
बावजूद वह क्षेत्रीयपार्टी ही बनी रही. साठ वर्षों तक इस पार्टी ने एक अलग राज्य की
मांग को लेकर संघर्ष किया, लेकिन सिलसिलेवार विघटन के चलते इसका प्रभाव क्रमश: कम
होता गया. खैर, जब 1998 में झारखंड राज्य का गठन हुआ तो वह जयपाल सिंह की उम्मीदों
के मुताबिक नहीं था. उनकी इच्छा थी कि झारखंड राज्य में बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश,
आंध्र प्रदेश और साथ ही बिहार के तमाम आदिवासी इलाकों को सम्मिलित किया जाए, लेकिन
झारखंड में सिर्फ बिहार के आदिवासी इलाकों को ही रखा गया. अपनी आखिरी संरचना में
झारखंड का स्वरूप कुछ ऐसा रहा कि यहां गैर-आदिवासियों की भारी तादाद आबादी का
बहुसंख्य है.
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एक उदाहरण के तौर पर देखें तो एक आम चुनाव में जहां आदिवासी मत सिर्फ
50 से 60 चुनाव क्षेत्रों में ही अर्थ रखते
हैं, वहीं दलित मत करीब 300 क्षेत्रों के
चुनावी समीकरण पर असर डाल सकते हैं. |
यदि दलित और आदिवासी भारतीय समाज के दो सबसे ज्यादा असरविहीन तबके हैं, जैसा कि ठीक
ही माना जाता है, तो ऐसा क्यों है कि दलित इस राजनीतिक तंत्र में अपनी मांगों को
प्रभावी तरीके से रख पाने में सफल रहे हैं? मुझे लगता है कि यह अंतर्विरोध बहुत कुछ
भौगोलिक और जनांकिकीय पहलुओं से जाकर जुड़ता है. मध्य भारत के आदिवासी आम तौर पर
आदिवासी गांवों में रहते हैं जो पहाड़ों, घाटियों जैसे दुर्गम स्थानों पर स्थित हैं
और जहां उनकी संख्या गैर-आदिवासियों की तुलना में कहीं ज्यादा है. हालांकि, भारतीय
प्रायद्वीप के किसी भी राज्य में वे बहुसंख्य नहीं हैं. मसलन, आंध्र प्रदेश में
पूरी आबादी का सिर्फ 6 फीसदी ही आदिवासी हैं, महाराष्ट्र में 9 फीसदी और राजस्थान
में 12 फीसदी. यहां तक कि जिन राज्यों को घोषित तौर पर आदिवासी हितों के संरक्षण के
लिए गठित किया गया, जैसे कि झारखंड या छत्तीसगढ़, वहां भी मोटे तौर पर दो-तिहाई
आबादी गैर-आदिवासियों की ही है.
दलित भी प्रत्येक राज्य में अल्पमत में ही हैं, लेकिन उनकी रिहाइश आदिवासियों से
भिन्न है. वे मिश्रित गांवों में अन्य समुदायों व जातियों के साथ ही निवास करते
हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि चुनाव के वक्त वे उन इलाकों में भी निर्णायक असर छोड़ सकते
हैं जो उनके लिए आरक्षित नहीं हैं. भारत के अधिकतर राज्यों में और राज्यों के
अधिकतर जिलों में करीब 10 से 20 फीसदी मतों पर दलितों का ही वर्चस्व है. यही वजह है
कि राजनीतिक पार्टियों को लोक सभा और विधान सभा चुनावों में दलित हितों को संबोधित
करने पर मजबूर होना पड़ता है. इसके उलट आदिवासी उन्हीं इलाकों में चुनावों पर असर
डाल सकते हैं जहां उनकी बहुतायत है. एक उदाहरण के तौर पर देखें तो एक आम चुनाव में
जहां आदिवासी मत सिर्फ 50 से 60 चुनाव क्षेत्रों में ही अर्थ रखते हैं, वहीं दलित
मत करीब 300 क्षेत्रों के चुनावी समीकरण पर असर डाल सकते हैं.
प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का संगठनीकरण उनके द्वारा झेले जा रहे दमन
में ढांचागत समानताओं के चलते भी सक्षम हुआ है. ऐसा इसलिए कि समूचे भारत में जाति
व्यवस्था कमोबेश एक ही तरीके से काम करती है. तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के गांवों
में दलितों को एक समान अपमानजनक कृत्यों के लिए मजबूर किया जाता है, उच्च जाति की
बसावटों से दूर रहने को बाध्य किया जाता है, अस्वच्छ जल स्रोतों का पानी पीने को
बाध्य किया जाता है और मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित है. इसी वजह से उनके लिए
संभव है कि वे गांवों, जिलों और राज्यों में अपने संपर्क तंत्र विकसित करते हुए
एकजुटता बना लेते हैं. दूसरी ओर, दलित जिस किस्म का दमन झेलते हैं उसके स्वरूप में
काफी अंतर होता है. किसी एक स्थान पर उनके मुख्य शोषक वन अधिकारी होते हैं तो कहीं
और सूदखोर; कहीं राज्य के संरक्षण में बन रही विकास परियोजनाएं होती हैं तो कहीं
निजी कंपनी द्वारा चलाई जा रही खनन परियोजना. ऐसी परिस्थितियों में एक बैनर के तले
समान लक्ष्य के लिए लड़ने वाले आदिवासियों का व्यापक एका बना पाना कहीं ज्यादा कठिन
होता है.
दलितों को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मौजूदगी से भी काफी मदद मिली थी. वह इनके लिए
उदाहरण और प्रेरणा दोनों के ही स्रोत रहे हैं, एक ऐसी महान शख्सियत जिसने उच्च जाति
के किले को कामयाबी से ढहा दिया और अपने जाने के लंबे समय बाद भी दूसरों को ऐसा
करने की प्रेरणा दे रहे हैं. वास्तव में अंबेडकर का व्यक्तित्व देशभर के दलितों के
लिए एक प्रस्थान बिंदु बन कर स्थापित हो चुका है.
दूसरी ओर आदिवासियों के बीच ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जो राज्य और भाषा की सीमाओं से
परे लोगों के लिए प्रेम, एकजुटता और प्रेरणा का स्रोत रहा हो. मसलन, बिरसा मुंडा को
झारखंड में सम्मान दिया जाता है, लेकिन आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के आदिवासी
इलाकों में उनकी पहचान शायद ही है.
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अन्य आदिवासी नायकों की तुलना में अंबेडकर के
साथ एक फायदा यह रहा कि वह आधुनिक संस्थाओं के निर्माता होने के साथ-साथ एक सामाजिक
आंदोलनकारी भी थे. उन्होंने मनुस्मृति की प्रतियां जलाईं और श्रमिक संगठनों को गठन
किया, उन्होंने न सिर्फ स्कूल और राजनीतिक दल बनाए बल्कि इन सबसे ऊपर भारतीय
संविधान के लेखन में निर्देशन का काम किया. अंबेडकर सिर्फ इसलिए एक अखिल भारतीय
व्यक्तित्व बन सके क्योंकि उनके अनुयायी मोटे तौर पर न सिर्फ एक ही किस्म के दमन और
उत्पीड़न का अनुभव करते हैं, बल्कि वे अन्याय का प्रतिकार करने और एक बेहतर कल के
निर्माण दोनों ही कार्यों के लिए अंबेडकर के पीछे चलने को तैयार हो सकते हैं.
यह बात कही जा सकती है कि आदिवासियों में इस किस्म के नेतृत्व का अभाव इसलिए रहा
क्योंकि उनके यहां साक्षरता दर कम है. उनका जो भी प्रतिनिधि होता है वह आधुनिक
लोकतांत्रिक राजनीति की भाषा और उसके विमर्शों के साथ संवाद करने के लिए बहुत खुला
नहीं होता. वहीं दूसरी ओर दलितों के मामले में अतीत में अंबेडकर और वर्तमान में
मायावती के साथ कार्यकर्ताओं की एक दूसरी कतार पहले से खड़ी है जो राजनीतिक तंत्र
बनाना, पक्ष समर्थन जुटाना और पार्टियों के बीच सम्पर्क विकसित करने में माहिर है.
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वास्तविक जीवन में आदिवासी उतने ही ज्यादा
हाशिए पर उत्पीड़ित हैं लेकिन शायद ही कभी
उनसे जुड़ी चिंताओं को टीवी कार्यक्रमों, सम्पादकीय, रिपोर्टों या
आलेखों में प्रकाशित किया जाता हो. |
जैसा कि ऊपर बताया गया, राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम ऐसा दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय है
जिसका राजनीतिक प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण रहा है. कश्मीर घाटी के बाहर कहीं भी देखें
तो मुस्लिम बिल्कुल दलितों की तरह भारतीय गांवों और शहरों में अन्य भारतीयों की
तुलना में छोटे-छोटे टुकड़ों में सघन रूप से निवास करते हैं. उनकी बदहाल आर्थिक
स्थिति इस बात का सबूत है कि राज्य ने खासकर उनके भौतिक हितों का ख्याल नहीं रखा
है, हालांकि राजनेताओं को इस ओर ध्यान इसलिए देना पड़ा क्योंकि उन्हें वोट चाहिए.
बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में तो एक नेता ने यह वादा तक कर डाला कि यदि उनकी
पार्टी जीतती है तो वह मुख्यमंत्री किसी मुस्लिम को ही बनाएंगे. ऐसा कोई भी वादा तक
आदिवासियों के साथ नहीं किया गया, चाहे वह मध्यप्रदेश जैसा राज्य ही रहा हो जहां
इनकी संख्या कुल आबादी का 20 फीसदी तक है.
इस पूरे विमर्श में एक और प्रासंगिक तत्व भारतीय राष्ट्रवाद का इतिहास रहा है,
खासकर कांग्रेस का इतिहास. गांधी के नेतृत्व में आने से बहुत पहले कांग्रेस को इन
आरोपों का सामना करना पड़ा था कि वह अनिवार्य तौर पर उच्च वर्ण वाले हिंदुओं की
पार्टी है. इस आलोचना से लड़ने के लिए पार्टी को मुस्लिमों और निम्न जातियों तक जाना
पड़ा. गांधी के दौर में यह बात और ज्यादा उभर कर सामने आई जब गांधी के इस दावे को
मोहम्मद अली जिन्ना और डॉ. अम्बेडकर ने कड़ी चुनौती दी कि कांग्रेस समूचे भारत का
प्रतिनिधित्व करती है. मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिमों की ओर से बोल रहे थे और
अम्बेडकर सबसे निचली जातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. कांग्रेस के राष्ट्रवाद का
मुहावरा आजादी के पहले और आजादी के बाद हमेशा से अपने भीतर मुस्लिमों और दलितों के
विशेष हितों के लिए एक स्थान बनाकर रखता था(ध्यान दें कि यह मुहावरे तक ही सीमित
था, वास्तव में क्या हुआ यह अलग बात है). दूसरी ओर, कांग्रेस ने कभी भी आदिवासियों
के वजूद की मौलिक स्थिति को नहीं समझा. दशकों बीत गए और आदिवासियों से जुड़े मसलों
को शायद ही कभी अखिला भारतीय कांग्रेस समिति या कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में
महत्व दिया गया.
एक और दलितों और मुस्लिमों की दृश्यता और उसकी तुलना में इसके ठीक उलट आदिवासियों
के अदृश्य रहने के बीच अंतरविरोध को मुख्यधारा के मीडिया के संदर्भ से भी समझा जा
सकता है. अखबार और टेलिविजन दलितों और मुस्लिमों के निरंतर जारी उत्पीड़न को
पर्याप्त कवरेज देते हैं. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि मीडिया में दलितों और
मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों का कवरेज उतना नहीं किया जाता जितना होना चाहिए. यह
आलोचना निराधार नहीं है, हालांकि यदि हम इसी बात को आदिवासियों पर लागू करें तो यह
कह सकते हैं कि मीडिया दलितों और मुस्लिमों की पर्याप्त सेवा करता है. वास्तविक
जीवन में आदिवासी उतने ही ज्यादा हाशिए पर उत्पीड़ित हैं लेकिन शायद ही कभी उनसे
जुड़ी चिंताओं को टीवी कार्यक्रमों, सम्पादकीय, रिपोर्टों या आलेखों में प्रकाशित
किया जाता हो.
5.
आदिवासी वर्चस्व वाले इलाकों में नक्सलियों की बढ़ती मौजूदगी के भौगोलिक कारण है,
मसलन मध्य भारत के पहाड़ और जंगल गुरिल्ला संघर्ष के लिए सबसे उपयुक्त स्थान मुहैया
कराते हैं. लेकिन इसका एक ऐतिहासिक कारण भी है- राजनीतिक स्वतंत्रता के 60 वर्षों
के दौरान सबसे कम पाने वालों और सबसे ज्यादा खोने वालों में आदिवासी ही रहे हैं.
दरअसल, ये दोनों ही कारण आपस में जुड़े हुए हैं. आदिवासियों की राज्य द्वारा की गई
उपेक्षा कई मायनों में उन इलाकों की भी देन हैं जहां उनका निवास हैं. इन दूरस्थ
ऊबड़-खाबड़ इलाकों में सरकारी अधिकारी और कर्मचारी काम ही नहीं करना चाहते. डॉक्टर
अपने क्लीनिकों में नहीं जाते, अध्यापक स्कूलों से दूर रहते हैं और मजिस्ट्रेट इस
जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किसी तरह उनका स्थानान्तरण मैदानी इलाकों में कर दिया
जाए.
शेष अगले अंक में
04.08.2008,
02.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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