|
|
|
चंद रोज़ और मेरी जान
बात बोलेगी...
चंद रोज़ और मेरी जान...
कृष्ण राघव
कहते हैं, अच्छे काम का कोई समय नहीं होता. उसी तरह मेरा मानना है कि किसी के बारे
में लिखने के लिए उसके जन्म अथवा अवसान का दिन मुकर्रर नहीं होना चाहिए. अरे, याद
का क्या है. जब आ गई तब आ गई! बस कुछ ऐसा ही हुआ, बैठे बिठाए फ़ैज़ साहब याद आ गए.
आप मुल्क़ बांट सकते हैं, सोच को कैसे बांटेंगे ! वह तो वहां की भी है और यहां की
भी. सो आज और अभी अगर मन फ़ैज़ साहब को याद करना ही चाहता है तो मैं क्या करूं ?
वैसे फ़ैज़ साहब के बारे में कुछ कहने से ज़्यादा मैं आप लोगों को कुछ बांटना
ज़्यादा चाहूंगा. हो सकता है, आप ही बता पाएं कि फ़ैज़ को मैंने सही समझा कि गलत!
और अगर भूल-चूक का मामला ही हाथ लगे, तो और कुछ नहीं तो रविवार के माध्यम से एक
साफ—सुथरे संवाद की शुरुआत ही हो जाए.
हां तो शुरुआत मैं यहां से करना चाहूंगा कि क्या कारण है कि फ़ैज़ साहब पूरी तरह
समझ में नहीं आते! लगता है जैसे ‘’मंज़िलें सहल हो गईं ’’ लेकिन तभी वह अभेद हो
जाते हैं. इसी सिलसिले में कल रात जब मैंने उन्हें महसूसने की कोशिश की तो उन्हीं
की एक नज़्म ने मुझे सहारा दिया-
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ
यूँ गुमाँ होता है गर्चे है अभी सुबह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
ये नज़्म उन्होंने जेल में लिखी थी. जो नहीं समझ पाया सो यह कि उस रोज़ उनके दिल के
रुख़्सार पर किसकी याद ने अपना हाथ रक्खा होगा! महबूगा, दोस्त की वतन!! यह और ऐसे
ही न जाने कितने नादान सवाल दिल में घुमड़ते हैं...
मैं हैरान होता हूं कि एक इतना मीठा, रोमानी शायर जिसने कभी अलस्सुबह प्यार भरी
गुहार लगाई थी कि-
तिरा जमाल निगाहों में ले के उठ्ठा हूं
निखर गई है फ़िज़ां तेरे पैरहन की सी
नसीम तेरे शबिस्तां से होके आई है
मिरी सहर में महक है तेरे बदन की सी...
वह शायर जिसे न जाने बुलबुलों के कितने तराने याद रहते थे बल्कि जो ख़ुद एक बुलबुल
था, उसे ज़माने ने कितना सताया होगा (क्यों!)- कितना निराश किया होगा कि उसे मजबूरन
अपने ज़ाती सोच को बरतरफ़ करके कहना पड़ा-
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा...
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे...
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
देखते ही देखते फ़ैज़ की दिली आवाज़ समाज का आइना बन गई, साथ ही एक मशाल भी बन गई,
जिसकी रौशनी ने दूसरों को राह दिखाई.
हालांकि फ़ैज़ रोमानियत और हुस्नों-इश्क को शायर का मज़हब मानते हैं, फिर भी अपने
अलग मज़मूनों के बारे में रहस्योद्घाटन करते हुए बड़ी ही ईमानदारी से शायर के
मिज़ाज की मजबूरी भी बता देते हैं-
ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है
ये हर इक सिम्त पुर-असरार कड़ी दीवारे
जल बुझे जिनमें हज़ारों की जवानी के चिराग़
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों के मक़तलगाहें
जिनके परतौ से चिरागाँ हैं हज़ारों के दिमाग़
ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंठ
हाय उस जिस्म के कमबख्त दिलआवेज़ ख़ुतूत
आप ही कहिये कहीं ऐसे भी अफ्सूँ होंगे
अपना मौज़ू-ए-सुख़न इनके सिवा और नहीं
तब-ए-शायर का वतन इनके सिवा और नहीं
सो रोमान्टिक नज़रिया तो उनका है, भरपूर है, यहां तक कि अपने रकीबों तक से मिलने के
भी वह हमेशा तमन्नाई रहे क्योंकि रकीबों ने उन पर काफ़ी एहसानात किए. इसीलिए फ़ैज़
साहब ने अपने रकीबों का शुक्रिया भी अदा किया, उन्हें अपने आपसे मिलने की दावत भी
दी-
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परीखाना बना रक्खा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रक्खा था
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ
उसी रकीब की वजह से उन्होंने-
आजिज़ी सीखी, ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के, दुख-दर्द के मानी सीखे
(आशा-निराशा)
वजह यह है कि रकीब ने उन्हें हुस्न से दूर रहने पर मजबूर कर दिया. बल्कि बाद में तो
यों भी हुआ कि-
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.
तो साहब यों हुआ! रकीब की मिहरबानियों ने शायर की सोच बदलने के सामान जुटा दिए. इस
बात को लेकर मुझे थोड़ा अंदेशा सा था कि फ़ैज़ साहब ही फिर काम आए-
हम लोग इस दौर (रोमानी) की एक झलक ठीक से देख भी न पाए थे कि सोहबते याद आखिर
शुद!...देस पर आलसी कसाब बाज़ारी के साए ढलने शुरू हुए. कालेज के बड़े-बड़े तीसमार
खां, तलाशे मआश में, गलियों की ख़ाक फांकने लगे. ये वो दिन थे, जब यकायक बच्चों की
हंसी बुझ गई. उजड़े हुए किसान खेत-खलिहान छोड़कर शहरों में मज़दूरी करने लगे और
अच्छी-ख़ासी शरीफ बहू-बेटियां बाज़ार में आ बैठीं. घर के बाहर यह हाल था और घर के
अंदर मर्ग़े-सोज़े-मुहब्बत का कुहराम मचा था. यकायक यूं महसूस होने लगा कि
दिलो-दिमाग पर सभी रास्ते बंद हो गए हैं और अब यहां कोई नहीं आएगा.
आगे पढ़ें
यही जज़्बात शायद
बाद में नज़्म बन गए होंगे-
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार, नहीं कोई नहीं
 |
|
बेटी सलीमा के साथः
1944 की एक तस्वीर |
राहरव होगा, कहीं और चला जाएगा
... अपने बेख़्वाब किवाडों को मुकफ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आएगा...
इसी समय वह छात्र से अमृतसर के एम.ए.ओ.कॉलेज में प्रोफेसर हो गए और लिखते हैं कि
वहीं पर—
तरक़्क़ीपसंद तहरीक़ की दाग़बेल पड़ी...मज़दूर तहरीक़ों का सिलसिला शुरू हुआ और यूं
लगा जैसे गुलशन में एक नहीं कई दबिस्तां खुल गए है. उस दबिस्तां में पहला सबक़ जो
हमने सीखा, यह था कि अपने ज़ात को बाकी दुनिया से अलग करके सोचना अव्वल तो मुमकिन
ही नहीं...और अगर ऐसा मुमकिन भी हो तो इंतिहाई ग़ैर सूदमंद फ़ैल है...कि एक इंसान
फ़र्द की ज़ात अपनी सब मुहब्बतों, क़ुदूरतों, मसर्रतों और रंजिशों के बावजूद बहुत
ही छोटी-सी, बहुत ही महदूद और हक़ीर शै है. उसकी वुसअत और पिन्हाई का पैमाना तो
बाकी आलमें-मौजूदात से उसके ज़हनी और जज़्बाती रिश्ते हैं; ख़ास तौर से इन्सानी
बिरादरी के मुश्तरका दुख—दर्द के रिश्ते. चुनाचे ग़मे जाना और ग़मे दौरां एक ही
तस्वीर के दो पहलू है.
ज़ाहिर है, इसीलिए फ़ैज़ की शायरी में फूल और अंगारे दोनों साथ-साथ है. वह अपनी सोच
जब बदलते भी हैं तो प्यार के साथ. वह अपनी पुरानी रिवायतें भी नहीं बदलते. ग़ालिब
के लिखे को भूलकर सामाजिक-सांस्कृतिक या अदबी इदारे में एकदम नया कुछ करने का दावा
भी वह नहीं करते. चांद-तारे, धरती-आसमान, नदी, पहाड़, समन्दर, सब उन्हें पसंद है
लेकिन सिर्फ़ नज़रिया बदल लेते हैं. पुराने इस्तियारों को नए मानी पिन्हा देते हैं.
मुझे लगा, जैसे यही है उनके नए सोच का राज़-
तू गर मेरी हो भी जाए, दुनियां के ग़म यूं ही रहेंगे
इसीलिए-
क्यों न जहां का ग़म अपना लें
बाद में सब तदबीरें सोचें
बाद में सुख के सपने देखें
सपनों की ताबीरें सोचें
साथ ही महबूब को दिलासा भी देते जाते हैं कि-
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर हैं हम
इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
...अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बेनाम गराँ-बार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
...और फ़ैज़ साहब आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े. आज़ादी ख़ाली मुल्क़ की नहीं, रूह
की भी! क्योंकि आज़ादी आई काली चादर पहनकर...सुबह हुई पर सियाह सी...हमसे हमारा
फ़ैज़ ही नहीं जाने कितने और छिन गए. इधर से बहुत सारे जिस्म उधर चले गए. उनकी
ख़ुशबुएं यहां रह गईं. संस्कृति के आंगनों के बीचों बीच दीवार खिंच गई. सियासत के
बाज़ार सज गए. फ़ैज़ साहब यकायक पाकिस्तानी हो गए...हमारी पीढ़ी को बुजुर्गों ने
समझाया कि अब हमारा उस ग़ैर मुल्क़ से कुछ लेना-देना नहीं लेकिन महके तो उधर से भी
आ रही थी...भला कोई उससे महरूम रह सकता था !
उनका यह तराना तो गूंगे-बहरे भी सुन सकते थे-
ऐ ख़ाक-नशीनों उठ बैठो, वह वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख़्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे
कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो के अब डेरे, मंजिल ही पे डाले जाएंगे
मैं अपने पाठकों को माजरत के साथ यह बताता चलूं कि मैं उर्दू के मामले में एकदम
पैदल हूं, उर्दू अदबे का मिज़ाज, ज़बान का लहज़ा, रस्मों—रिवायत इससे ज़्यादा
बिल्कुल नहीं जानता कि उर्दू का सब कुछ बहुत अच्छा लगता है और इसीलिए मुझे शिकायत
है अदब, तहज़ीब और तमद्दुन के जानकारों से जब उर्दू अदब के ये सुतून हमसे छीने जा
रहे थे तब ऐन ऐसा क्यों न हो सका कि बंट जाएं अगर घर बंटते हों, आंगन तो सांझे के
रहे.
आज जब फ़ैज़ की ग़ज़ल सुनने का मन होता है तो उसे समझकर गाने वाली आवो उस पार होती
है. ‘अनकही’, ‘धूप किनारे’ और ‘तन्हाई’ जैसे टीवी सीरियल बनाने का मन होता है तो उस
ज़बान की चाशनी वाले फ़नकार उधर होते हैं. जन-न की अमीर ख़ुसरों की हिन्दवी,
ग़ालिब, मीर और दाग़ की उर्दू तक्सीम की शिकार होकर आज अपने ही घर में लावारिस
घूमती है. वजह ? वो चाहे संस्कृत हो कि उर्दू जो ज़बान सरकारी महकमों की जीनत नहीं
रहती, वह भले महफिलों में सराही जाये, भले ही उसमें ईश-प्रार्थना के श्लोक ही क्यों
न हो, आम आदमी से दूर होती जाती है क्योंकि उसमें से रोज़ी-रोटी दिलाने की तासीर
जुदा कर दी जाती है.
ख़ैर, फ़ैज़ साहब पाकिस्तान क्यों गए ? क्योंकि वह वहीं के थे. वह वहां फ़ौजी कर्नल
से लेकर कालेज के अध्यापक तक रहे. अदबी एडिटर तो ख़ैर रहे ही मगर अपनी ज़बान से कभी
रौब नहीं झाड़ा. कर्नल की तरह कमांड, टीचर की तरह डांट, एडिटर की तरह हुक्म कभी
दिया ही नहीं. मुहब्बत में शराबोर फ़ैज़ ने तानों की ज़बान भी तभी इस्तेमाल की जब
उनके वतन, उनके प्यारे वतन ने उनको अपने अदब-कायदों से दो चार कराया-
निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले
फिर भी इतना बोलना सियासत को अखर गया. अपने ख़िलाफ़ झूठी साज़िश के शिकार हुए. जेल
में धकेल दिए गए लेकिन बोलती बंद न हुई-
तेरे गद्दार ग़ैरत से मुंह मोड़कर
तेरी इज़्ज़त का भाव लगाने चले
+ + +
हममें दम है तो ये करने देंगे न हम
चाल उनकी कोई चलने देंगे न हम
आगे पढ़ें
चुटकियां लेने में माहिर थे. हुक्मरानो की अक्ल का रोना रोने से भी बाज़ न आए-
वो बात सारे फसाने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बड़ी नागवान गुज़री है
अपने ख़ैरख़्वाह भी ऐसे वक्त पर कैसे याद न आते-
कर रहा था ग़मे जहां का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए.
फ़ैज़ के लिये कोई भी पहरा पहरा न था. उन्हें पता था कि गुफ़्तगू इशारों में कैसे
की जाती है-
है वही बात यूं भी और यूं भी
तुम सितम या करम की बात करो
जान जायेंगे जानने वाले
फ़ैज़ फ़रहादो-जम की बात करो
(जमशेद, ईरान का बादशाह )
जेल से आज़ाद हुए...फिर जेल गए...अजीब तमाशा था.वजह यह कि हुक्मरान कहीं के भी
क्यों न हों उनके उसूल इंसानियत के परवानों से मेल नहीं खाते....और भी हुक्मरान ही
क्यों, दोस्त—एहबाब...महबूबा सभी समझाना पड़ता है.. कहीं-कहीं तो ख़ुद को भी समझाते
हैं-
जिस धज से कोई मक्तल में गया
वो शाम सलामत रहती है
ये जान तो आनी—जानी है, इस ज़ां की तो कोई बात नहीं.
+ + +
बेदादगारों की बस्ती है, यां दाद कहां फरियाद कहां
सर फोड़ती फिरती है नादां, फ़रियाद जो दर-दर जाती है
+ + +
क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
...मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
यहां आकर फ़ैज़ में मुझे कबीर नज़र आने लगे. कबीर वाला अंदाज उन्होंने पाया भी और
बख़ूबी निबाहा भी-
फ़ैज़ थी राह सरबसर मंजिल
हम जहां पहुंचे कामयाब आए
इसीलिए जेलख़ाने की ज़िंदगी उनके लिए आसान भी हो जाती है-
जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक-महक उठी
जब तेरा ग़म जगा लिया, रात मचल-मचल गई
इसीलिए शायद हुक्मरानो को माफ़ करते हुए उन्होंने यह भी कह डाला-
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब -ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले
+ + +
लाओ तो क़त्लनामा मेरा, मैं भी देख लूं
किस-किस की मुहर है, सर-ए-महजर (आदेशपत्र) लगी हुई
फिर न जाने किसको नसीहत देते हैं...ख़ुद को कि अहबाबों को, मज़लूमों को कि इंसानियत
के पैरोकारों को-
तुम नाहक टुकड़े चुन-चुनकर, दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं, क्यों आस लगाए बैठे हो
कभी—कभी उन्हें रिहाई का आभास भी होता है. ख़ुद ही ख़ुद को तसल्ली दे डालते हैं-
सबा ने फिर दरे-ज़िंदां पे आके दी दस्तक
सहर करीब है दिल से कहो न घबराए
और जब जेल से निकलने का वक्त आया तो शायद यही तेवर रहे होंगे-
दोनो जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
+ + +
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आके टल गई
दिल था के फिर बहल गया, जाँ थी के फिर सम्भल गई
बच्चों की तरह शफ़्फ़ाक दिल, माफ़ करने का हैरतअंगेज़ हौसला, हर नई सुबह को नई नज़र
से देखने का वलवला-
जाग उठीं सरसों की किरने, वापस लौट आई बहार
ग़म के तपते सहराओं में, धुंधली-सी राहत की चमक
कि वापस लौट आई बहार
मुसीबतें फ़ैज़ को पछाड़ नहीं पाईं. जितनी ज़ोर से हालात ने उन्हें दबाया, उतनी ही
ज़बरदस्त स्प्रिंग के साथ उन्होंने ऊपर आकर अपना पैग़ाम सुनाया. इसके बाद तो वह
हिंद-पाकिस्तान ही क्या, सारे जहान के हो गए. जहां-जहां इंसान को दबाया गया, फ़ैज़
को वहां पाया गया. मसलन अफ्रीका से कहने लगे—
आ जाओ अफ्रीका/ धरती धड़क रही है है मेरे साथ अफ्रीका/ दरिया थिरक रहा/ है तो बन दे रहा है ताल/ मैं अफ्रीका हूं, धार लिया मैंने तेरा रूप/ आ जाओ अफ्रीका, आओ,चलो बबर की चाल
कहीं किसी फ़लिस्तीनी बच्चे को पुचकारने लगे-
मत रो बच्चे
रो रो के अभी/ तेरी अम्मी की आँख लगी है/ मत रो बच्चे/ कुछ ही पहले/ तेरे अब्बा ने/ अपने ग़म से रूख़सत ली है/ मत रो बच्चे/ तेरा भाई/ अपने ख़्वाब की तितली के पीछे/ दूर कहीं परदेस गया है/ मत रो बच्चे/ तेरी बाजी का/ डोला पराए देस गया है/ मत रो बच्चे/ तेरे आँगन में/ मुर्दा सूरज नहला के गए हैं/ चन्द्रमा दफ़्ना के गए हैं/ मत रो बच्चे/ अम्मी, अब्बा, बाजी, भाई/ चाँद और सूरज/ रोएगा तो और भी तुझ को रूलवाएँगे/ तू मुस्काएगा तो शायद/ सारे इक दिन भेस बदल कर/ तुझसे खेलने लौट आएँगे
ज़ाती सोच जब ज़माने की फ़िक्र में बदल जाता है तो मसीहा बनने के साथ ही साथ साथी,
हमराह और हमराज बनकर फ़ैज़ नमूदार होता है. फ़ैज़ को ज़िन्दा रखना है तो इन्सानियत
को ज़िन्दा रखना होगा. आम इंसान के अरमानों की क़द्र करनी होगी, फ़िक्र करनी
होगी... बात फ़ैज़ की है लेकिन साहिर का सहारा लेकर खत्म करता हूं-
माना कि अभी तेरे-मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी...
04.07.2011, 18.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | shikha gupta [shikha.puneet@gmail.com] dehli - 2011-08-23 06:39:06 | | | |
बहुत खूब...... अच्छे लेख के लिये बधाई. | | | | | | | | नरेंद्र तोमर [nakutom@yahoo.com] गाजियाबाद उ;प्र; - 2011-07-31 10:43:40 | | | |
मुख्तलिफ दौर में लिखी गई उनकी अपनी रचनाओं को लेकर एक अच्छी तस्वीर तैयार की गई। फिर भी मुझे लगता हैं कि अगर उनकी इन लाइनों को और शामिल कर लिया जाता तो उनकी शख्सियत ज्यादा पूरी तरह सामने आ सकती:
मुकाम फैज कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कूये यार से निकले तो सूयेदार चले। | | | | | | | | रंगनाथ [] नई दिल्ली - 2011-07-11 11:16:40 | | | |
बहुत पसंद आया, फैज़ को यूँ याद करना. | | | | | | | | अजय कुमार जैन [] आगरा कैंट, उत्तर प्रदेश - 2011-07-07 03:30:59 | | | |
फ़ैज़ हमेशा समकालीन हैं, यही बात उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगी. पाकिस्तानी कथाकार इंतेजार हुसैन से शब्द उधार लें तो- फ़ैज़ की शायरी आधुनिक प्रबोधन की उदारता की उपमा है. आज पाकिस्तान में वह पहले से ज़्यादा लोकप्रिय हैं और अब उनके आलोचक भी उनके फ़न का लोहा मान चुके हैं. | | | | | | | | Anamika [anamika61@gmail.com] New Delhi - 2011-07-07 03:27:35 | | | |
फै़ज़ को सही तरीके से समझा ही नहीं गया. आपका यह लेख हमारी समझ को बढ़ाने वाला है. | | | | | | | | Sanyukta ghosh [] Toranto - 2011-07-05 15:50:07 | | | |
आपने गागर में सागर भर दिया. फ़ैज़ को समझने के लिये इतना कहना सही है कि वे आवाम के शाइर थे. आवाम के दिल-ओ-दिमाग में जो कुछ चलता है, वह सब कुछ उनकी रचनाओं में था. आपने कही कहा है कि-चांद-तारे, धरती-आसमान, नदी, पहाड़, समन्दर, सब उन्हें पसंद है लेकिन वहां वे सिर्फ़ नज़रिया बदल लेते हैं... बहुत खूब. आपको एक अच्छे लेख के लिये बधाई. | | | | | | | | Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Delhi - 2011-07-05 15:42:25 | | | |
राघव जी, आपने बहुत डूब के यह आलेख लिखा है. मजा आ गया. लेकिन इसे मेरी गुस्ताखी न मानें तो कहना चाहूंगा कि फ़ैज़ की इस रचना का उल्लेख भी आपके लेख में होना था-
आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर
गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर
फिर सबा सायः-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर
जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर
एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर | | | | | | |
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें |
|
|