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लेकिन असली नायक कहां हैं?

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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चंद रोज़ और मेरी जान

बात बोलेगी...

 

चंद रोज़ और मेरी जान...

कृष्ण राघव


कहते हैं, अच्छे काम का कोई समय नहीं होता. उसी तरह मेरा मानना है कि किसी के बारे में लिखने के लिए उसके जन्म अथवा अवसान का दिन मुकर्रर नहीं होना चाहिए. अरे, याद का क्या है. जब आ गई तब आ गई! बस कुछ ऐसा ही हुआ, बैठे बिठाए फ़ैज़ साहब याद आ गए. आप मुल्क़ बांट सकते हैं, सोच को कैसे बांटेंगे ! वह तो वहां की भी है और यहां की भी. सो आज और अभी अगर मन फ़ैज़ साहब को याद करना ही चाहता है तो मैं क्या करूं ?

फ़ैज़ अहमद फैज

वैसे फ़ैज़ साहब के बारे में कुछ कहने से ज़्यादा मैं आप लोगों को कुछ बांटना ज़्यादा चाहूंगा. हो सकता है, आप ही बता पाएं कि फ़ैज़ को मैंने सही समझा कि गलत! और अगर भूल-चूक का मामला ही हाथ लगे, तो और कुछ नहीं तो रविवार के माध्यम से एक साफ—सुथरे संवाद की शुरुआत ही हो जाए.

हां तो शुरुआत मैं यहां से करना चाहूंगा कि क्या कारण है कि फ़ैज़ साहब पूरी तरह समझ में नहीं आते! लगता है जैसे ‘’मंज़िलें सहल हो गईं ’’ लेकिन तभी वह अभेद हो जाते हैं. इसी सिलसिले में कल रात जब मैंने उन्हें महसूसने की कोशिश की तो उन्हीं की एक नज़्म ने मुझे सहारा दिया-
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ
यूँ गुमाँ होता है गर्चे है अभी सुबह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात


ये नज़्म उन्होंने जेल में लिखी थी. जो नहीं समझ पाया सो यह कि उस रोज़ उनके दिल के रुख़्सार पर किसकी याद ने अपना हाथ रक्खा होगा! महबूगा, दोस्त की वतन!! यह और ऐसे ही न जाने कितने नादान सवाल दिल में घुमड़ते हैं...

मैं हैरान होता हूं कि एक इतना मीठा, रोमानी शायर जिसने कभी अलस्सुबह प्यार भरी गुहार लगाई थी कि-
तिरा जमाल निगाहों में ले के उठ्ठा हूं
निखर गई है फ़िज़ां तेरे पैरहन की सी
नसीम तेरे शबिस्तां से होके आई है
मिरी सहर में महक है तेरे बदन की सी...


वह शायर जिसे न जाने बुलबुलों के कितने तराने याद रहते थे बल्कि जो ख़ुद एक बुलबुल था, उसे ज़माने ने कितना सताया होगा (क्यों!)- कितना निराश किया होगा कि उसे मजबूरन अपने ज़ाती सोच को बरतरफ़ करके कहना पड़ा-
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा...
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे...
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग


देखते ही देखते फ़ैज़ की दिली आवाज़ समाज का आइना बन गई, साथ ही एक मशाल भी बन गई, जिसकी रौशनी ने दूसरों को राह दिखाई.

हालांकि फ़ैज़ रोमानियत और हुस्नों-इश्क को शायर का मज़हब मानते हैं, फिर भी अपने अलग मज़मूनों के बारे में रहस्योद्घाटन करते हुए बड़ी ही ईमानदारी से शायर के मिज़ाज की मजबूरी भी बता देते हैं-
ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है

ये हर इक सिम्त पुर-असरार कड़ी दीवारे
जल बुझे जिनमें हज़ारों की जवानी के चिराग़
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों के मक़तलगाहें
जिनके परतौ से चिरागाँ हैं हज़ारों के दिमाग़


ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंठ
हाय उस जिस्म के कमबख्त दिलआवेज़ ख़ुतूत
आप ही कहिये कहीं ऐसे भी अफ्सूँ होंगे

अपना मौज़ू-ए-सुख़न इनके सिवा और नहीं
तब-ए-शायर का वतन इनके सिवा और नहीं


सो रोमान्टिक नज़रिया तो उनका है, भरपूर है, यहां तक कि अपने रकीबों तक से मिलने के भी वह हमेशा तमन्नाई रहे क्योंकि रकीबों ने उन पर काफ़ी एहसानात किए. इसीलिए फ़ैज़ साहब ने अपने रकीबों का शुक्रिया भी अदा किया, उन्हें अपने आपसे मिलने की दावत भी दी-
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परीखाना बना रक्खा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रक्खा था

हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ


उसी रकीब की वजह से उन्होंने-
आजिज़ी सीखी, ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के, दुख-दर्द के मानी सीखे

(आशा-निराशा)

वजह यह है कि रकीब ने उन्हें हुस्न से दूर रहने पर मजबूर कर दिया. बल्कि बाद में तो यों भी हुआ कि-
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

तो साहब यों हुआ! रकीब की मिहरबानियों ने शायर की सोच बदलने के सामान जुटा दिए. इस बात को लेकर मुझे थोड़ा अंदेशा सा था कि फ़ैज़ साहब ही फिर काम आए-
हम लोग इस दौर (रोमानी) की एक झलक ठीक से देख भी न पाए थे कि सोहबते याद आखिर शुद!...देस पर आलसी कसाब बाज़ारी के साए ढलने शुरू हुए. कालेज के बड़े-बड़े तीसमार खां, तलाशे मआश में, गलियों की ख़ाक फांकने लगे. ये वो दिन थे, जब यकायक बच्चों की हंसी बुझ गई. उजड़े हुए किसान खेत-खलिहान छोड़कर शहरों में मज़दूरी करने लगे और अच्छी-ख़ासी शरीफ बहू-बेटियां बाज़ार में आ बैठीं. घर के बाहर यह हाल था और घर के अंदर मर्ग़े-सोज़े-मुहब्बत का कुहराम मचा था. यकायक यूं महसूस होने लगा कि दिलो-दिमाग पर सभी रास्ते बंद हो गए हैं और अब यहां कोई नहीं आएगा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shikha gupta [shikha.puneet@gmail.com] dehli - 2011-08-23 06:39:06

 
  बहुत खूब...... अच्छे लेख के लिये बधाई. 
   
 

नरेंद्र तोमर [nakutom@yahoo.com] गाजियाबाद उ;प्र; - 2011-07-31 10:43:40

 
  मुख्‍तलिफ दौर में लिखी गई उनकी अपनी रचनाओं को लेकर एक अच्‍छी तस्‍वीर तैयार की गई। फिर भी मुझे लगता हैं कि अगर उनकी इन लाइनों को और शामिल कर लिया जाता तो उनकी शख्‍सियत ज्‍यादा पूरी तरह सामने आ सकती:
मुकाम फैज कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कूये यार से निकले तो सूयेदार चले।
 
   
 

रंगनाथ [] नई दिल्ली - 2011-07-11 11:16:40

 
  बहुत पसंद आया, फैज़ को यूँ याद करना. 
   
 

अजय कुमार जैन [] आगरा कैंट, उत्तर प्रदेश - 2011-07-07 03:30:59

 
  फ़ैज़ हमेशा समकालीन हैं, यही बात उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगी. पाकिस्तानी कथाकार इंतेजार हुसैन से शब्द उधार लें तो- फ़ैज़ की शायरी आधुनिक प्रबोधन की उदारता की उपमा है. आज पाकिस्तान में वह पहले से ज़्यादा लोकप्रिय हैं और अब उनके आलोचक भी उनके फ़न का लोहा मान चुके हैं. 
   
 

Anamika [anamika61@gmail.com] New Delhi - 2011-07-07 03:27:35

 
  फै़ज़ को सही तरीके से समझा ही नहीं गया. आपका यह लेख हमारी समझ को बढ़ाने वाला है. 
   
 

Sanyukta ghosh [] Toranto - 2011-07-05 15:50:07

 
  आपने गागर में सागर भर दिया. फ़ैज़ को समझने के लिये इतना कहना सही है कि वे आवाम के शाइर थे. आवाम के दिल-ओ-दिमाग में जो कुछ चलता है, वह सब कुछ उनकी रचनाओं में था. आपने कही कहा है कि-चांद-तारे, धरती-आसमान, नदी, पहाड़, समन्दर, सब उन्हें पसंद है लेकिन वहां वे सिर्फ़ नज़रिया बदल लेते हैं... बहुत खूब. आपको एक अच्छे लेख के लिये बधाई. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Delhi - 2011-07-05 15:42:25

 
  राघव जी, आपने बहुत डूब के यह आलेख लिखा है. मजा आ गया. लेकिन इसे मेरी गुस्ताखी न मानें तो कहना चाहूंगा कि फ़ैज़ की इस रचना का उल्लेख भी आपके लेख में होना था-
आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर
गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर
फिर सबा सायः-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर
जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर
एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर
 
   
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