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अखिल गोगोई के खिलाफ क्यों है सरकार

मुद्दा

 

अखिल के खिलाफ क्यों है सरकार

रविशंकर रवि गुवाहाटी से


लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने वाले मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से यह उम्मीद की रही थी कि इस बार वे एक कुशल प्रशासक की तरह पेश आएंगे, लेकिन तरुण गोगोई का उतावलापन और मुद्दों से पीछा छुड़ाने की कोशिश, हमेशा की तरह एक बार फिर असम को मुश्किलों में डालने वाला साबित हो सकता है.

अखिल गोगोई

मामला किसान नेता अखिल गोगोई का है, जिनकी बढ़ती लोकप्रियता से घबराये असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनके कई प्रभावशाली मंत्री, अखिल गोगोई को नक्सली और उल्फा के साथ जोड़कर अगली कार्रवाई की जमीन तैयार कर रहे हैं, ताकि उन्हें कानून के दांव-पेंच में उलझा कर जेल के अंदर डाल कर रखा जा सके.

सरकार अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल इस बात के लिये कर रही है कि किसी भी तरह अखिल गोगोई को दिसपुर कांड का जिम्मेवार बता दिया जाये, जिसमें जमीन से उजाड़े गए लोगों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से तीन लोग मारे गए थे. हालांकि सरकार यह जानती है कि अखिल के खिलाफ रचे जा रहे चक्रव्यूह से राज्य में अशांति फैलेगी. अखिल के खिलाफ बदले की कार्रवाई जितनी अधिक होगी, उसका प्रतिवाद उतना ही घना होगा.

यह बात तो बहुत साफ है कि अखिल अकेले नहीं हैं. उनके समर्थक पूरे राज्य में बिखरे हुए हैं. जब गुवाहाटी में वन विभाग की खाली पड़ी जमीन पर एक दशक से अधिक समय से बसे लोगों को उजाड़ने की कार्रवाई चल रही थी, तब उन कमजोर लोगों के पक्ष में कोई सामने नहीं आया. न सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष. वे तमाम लोग भी सामने नहीं आए, जो कुछ माह पहले हुए विधानसभा चुनाव के दौरान उनके लिए हर तरह का आश्वासन लेकर आए थे. नेतृत्वविहीन उस तबके को अखिल ने नेतृत्व दिया. अखिल न केवल सामने आए, बल्कि उनके संघर्ष की अगुवाई की.

हिंसा-अहिंसा और बातचीत
मुख्यमंत्री कहते हैं कि अखिल गोगोई के साथ उल्फा का परेश बरुवा गुट है. लेकिन यदि दोनों के कार्य और आचरण को करीब से देखा जाए तो काफी बड़ा फर्क नजर आएगा. अखिल गोगोई और परेश बरुवा में सबसे बड़ा फर्क तो यह है कि अखिल के साथ जनता है, जनमत है और जनाधार है. क्योंकि उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे राज्य में खुलेआम प्रतिवाद हो रहा है. उनके समर्थन में आर्थिक रूप से कमजोर लोग खुल कर सामने आ रहे हैं.

हजारों की संख्या में लोगों का खुलकर सामना आना बिना जनाधार और समर्थन के संभव नहीं था. जबकि परेश बरुवा के साथ न तो राज्य की जनता है, न जनमत है और न ही जनाधार. यही वजह है कि अखिल राज्य की जनता के बीच रहकर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि परेश विदेश (म्यांमार या और कहीं) छिपकर तथाकथित विप्लव की दुंदभी बजाने का दावा कर रहे हैं.

परेश बरुवा लगातार सशस्त्र संघर्ष की बात कर रहे हैं, जबकि अखिल गोगोई ने कभी सार्वजनिक रूप से हथियार उठाने की बात नहीं की है. बल्कि वे तो शांतिपूर्ण संघर्ष के पक्ष में खड़े हैं. उनका चेहरा एक लोकतांत्रिक और अहिंसक चेहरा माना जाता है. यही कारण है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद अखिल को असम का अन्ना हजारे कहा जाने लगा.

हालांकि मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का ध्यान तथ्यों से कहीं अधिक उनके सहयोगियों द्वारा गढ़े जा रहे झूठ पर है और वे भी इस झूठ में लगातार इजाफा कर रहे हैं. अखिल के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से परेशान राज्य सत्ता उन्हें दबाना और कुचलना चाहती है. लेकिन अखिल के खिलाफ सरकार का रवैय्या उन लोगों को उकसाने वाला साबित हो सकता है, जो अब तक अहिंसक तरीके से सरकार का विरोध कर रहे हैं. ऐसे में तरुण गोगोई का यह पासा उनके लिये भारी मुसीबत खड़ी करने वाला साबित हो सकता है.

यह चकित करने वाली बात है कि उल्फा के नेताओं समेत दूसरे तमाम उग्रवादी संगठनों के आगे घुटने टेक कर बात करने वाले राज्य के मुख्यमंत्री दंभ के साथ गैरलोकतांत्रिक तरीके से कह रहे हैं कि वे अखिल से इसलिये बात नहीं करेंगे क्योंकि वे हिंसा को बढ़ावा देते हैं. अव्वल तो अखिल के खिलाफ हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के कोई प्रमाण नहीं हैं और अगर सरकार ऐसा मानती है तो भी कम से कम राज्य में शांति वार्ता के लिये माहौल बनाने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री को इस बातचीत से इंकार नहीं करना चाहिये.

दिसपुर का सच
दिसपुर में जो कुछ हुआ, वह अपने आप में भयावह है. लेकिन दुखद यह है कि प्रशासन हकीकत से ठीक उल्टी कहानी कह रहा है. प्रशासन ने अपनी व्यथा और मुसीबतों की गीत सुनाने आए मेहनतकमां को हिंसा पर उतारू होने के लिए उकसाया और भड़काया. जो आए थे, वे असंगठित थे, किसी धारा से जुड़े हुए लोग नहीं थे, जो प्रशासन की रणनीति और कूटिल नीति को समझ पाएं या उसके अनुकूल जवाबी रणनीति तय कर सकें. भले ही अखिल ने उन्हें नेतृत्व देकर उनके और उनके मुद्दे को संगठित कर एक दिशा देने का प्रयास किया.

जो लोग प्रदर्शन करने आए थे, जो बेघर होने के खतरे से परेशां है. जो किसी गांव से दो जून की रोटी कमाने की उम्मीद में गुवाहाटी आकर बसे थे. पहाड़ों पर एक टुकड़ा माटी लेकर रात गुजारने के लिए एक झोपड़ी बना ली थी. यह अलग बात है कि वहां की जिंदगी भी कठिन होती है. न पानी, न सड़क. सर पर बोरी उठाकर घर तक आते हैं और औरतें पानी की बाल्टी उठाकर चलती हैं. वैसे लोग सिर्फ बेघर होने की कल्पना और हाथियों व बुलडोजर से अपनी झोपड़ी को रौंदे जाने के आतंक से असहज होकर जुटे थे. वे तो बस उन "राजाओं' तक अपनी फरियाद करने आए थे. वे स्मारपत्र देने आए थे और चाहते थे कि जिला उपायुक्त खुद आकर उनकी फरियाद सुने. यदि राज्य प्रशासन आम आदमी के प्रति संवेदनशील होती तो स्मारपत्र ग्रहण करने से परहेज नहीं करता. लेकिन जिला उपायुक्त नहीं आए. दोनों तरफ
जिद थी. वहीं से मामले ने गलत राह पकड़ ली. उसके बाद जो हुआ सभी जानते हैं. यानी प्रशासन ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले के धैर्य के टूटने का इंतजार किया और फिर गोलीबारी में तीन लोगों को मार डाला गया.

परेश, अखिल और बेघर लोग
यह बात हर कोई जानता है कि अखिल के प्रति परेश बरुवा के समर्थन कर देने से अखिल अल्फा नेता नहीं हो सकते. समर्थन करना परेश बरुवा की मजबूरी है और उनकी रणनीति का एक हिस्सा भी. वे अपना वजूद बनाये रखने के लिये जनता की सहानुभूति और समर्थन चाह रहे हैं. इसीलिए वे ऐसे सभी मुद्दों का समर्थन कर रहे हैं, जिन मुद्दों पर जनता उत्तेजित है. इसके पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है, जब अल्फा ने जन आंदोलन का समर्थन करके सहानुभूति बटोरने की कोशश की है.

सरकार में बैठे लोग भी यह बात बेहतर जानते हैं लेकिन अखिल पर कार्रवाई के बहाने सरकार बेघर लोगों के मुद्दे से लोगों का ध्यान भी हटाना चाहती है. जिन लोगों के घर अवैध बता कर तोड़े जा रहे हैं, उनको लेकर सरकार की कोई नीति सामने नज़र नहीं आती. पहले पुनर्वास की योजना बनती तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती. पूरे राज्य में एक तरह का अभियान चलाना चाहिए था. राज्य के वनमंत्री सुरक्षित वनक्षेत्र में बसे लोगों को हटाने के लिए कभी परेशान नहीं दिखते हैं. लेकिन गुवाहाटी में जिन्हें उजाड़ा जा रहा है, वे वोट बैंक नहीं है. सत्ता में बैठे लोगों की ऐसी नीयत अशांति ही पैदा करेगी.

मुद्दों से जनता का ध्यान भटका कर अखिल गोगोई जैसे नेताओं को निशाना बनाना साबित करता है कि सरकार की चिंता फिलहाल विरोधियों को निपटाने की है और इसके लिये वह साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल करने से नहीं चूकेगी. लेकिन अखिल के पक्ष में पूरे राज्य में जिस तरह का माहौल बन रहा है, उससे सरकार की मुश्किल कम होने के बजाये और बढ़ेगी, यह बात तय है.

*लेखक गुवाहाटी से प्रकाशित 'दैनिक पूर्वोदय' के कार्यकारी संपादक और पूर्वोत्तर मामले के जानकार हैं.

04.07.2011, 22.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sanjeeb Kalita [kalita_sanjeeb@yahoo.co.in] Guwahati - 2011-08-17 16:12:18

 
  Myself being associated with print media for the last 16 years have not seen activist like Akhil Gogoi\'s stature in Assam, who has carved a niche for himself in the field of RTI activism and leading the poor farmers agitation. I personaly know the writer of this article who deserve kudos for reflecting Assam and its present Govt. in his article in a simple and lucid language. 
   
 

Abhijit Deb [] Kolkata - 2011-07-05 06:30:14

 
  Whatever is the reality...it\'s true that a sense of arrogance has set in Congress government in Assam after coming back to power for the third consecutive time.Akhil Gogoi is only a case in point there will be many like him Gogoi led congress government has to face if it continues in the same way.In this case line is blurring between democracy and dictatorship.  
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Delhi - 2011-07-05 03:49:06

 
  अखिल केवल इसलिये निशाने पर हैं, क्योंकि सरकारें चाहती हैं कि आम जनता में प्रतिरोध के स्वर खत्म हो जायें. लेकिन सरकार की इस तरह की कार्रवाई आखिर में ऐसे लोगों को ही जगह दिलाने का काम करेगी, जो हिंसा में विश्वास करते हैं. जब अहिंसक आंदोलन का इस तरह से दमन होगा तो हिंसक लोगों की आस्था और मजबूत होगी. सरकार को चाहिये कि अखिल को जितनी जल्दी हो सके, रिहा करे. 
   
 

Sumant Mishra [] Bhopal - 2011-07-05 03:46:40

 
  Krishak Mukti Sangram Samiti has a history of non-violent agitations and exposing the corruption of the district officials and some of the key Ministers of Mr. Tarun Gogoi’s Cabinet. KMSS has been a victim of state terror in past as well and many of their cadres has been arrested on various charges for opposing anti-people development, mega dams in the North East and unearthing massive corruption in the PDS in Golaghat district. If in all these years KMSS has never indulged in violence or damaging government property then how can they do this ?

It is completely ironical that Akhil was addressing a press conference on the same issue and explaining that how some unruly elements in the crowd and members of Youth Congress were responsible for the burning of the vehicles. Given the complicity of the state and KMSS occupying the key oppositional democratic space in the State, it is very likely that violence was instigated to bring bad name to the movement.
 
   
 

Rajdeep S [] Delhi - 2011-07-05 03:45:29

 
  Akhil Gogoi has rattled the Tarun Gogoi in Assam with his anti-corruption crusade for two years now. thats why he is on Target.  
   
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