शराब से पुलिस का कल्याण
बहस
शराब से पुलिस का कल्याण
रघु ठाकुर
4 जुलाई के अखबारों में एक चौंकाने वाली खबर पर नज़र टिक गई. इस खबर में बताया गया
था कि अब केन्द्रीय पुलिय की कैन्टीन में भी सेना जैसी व्यवस्था होगी और पुलिस के
आला अधिकारियों को याने सी.आर.पी.एफ., बी.एस.एफ., सी.आई.एस.एफ., आई.टी.बी.पी. और
एस.एस.बी. के प्रमुख और महानिदेशक को केन्द्रीय पुलिस की कैन्टीन से जितनी चाहे उतनी
निःशुल्क शराब उपलब्ध होगी. यह निर्णय पुलिस बलों के वेलफेयर एण्ड रिहेबिलेशन बोर्ड
की बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रमन
श्रीवास्तव ने की थी. इस नई कोटा प्रणाली के तहत इन बलों के अन्य अधिकारियों और
जूनियर श्रेणी के अधिकारियों के लिये रम, वोदका, बियर आदि पूरे देश में पुलिस
कैन्टीन के माध्यम से उपलब्ध कराई जायेगी. नए निर्णय के तहत शहीदों के परिजन और सेवा
निवृत्त कर्मचारी भी तीन बोतल शराब ले सकते है.
नई प्रणाली के तहत शहीदों के परिजन और
सेवानिवृत्त कर्मचारी भी तीन माह में तीन बोतल ले सकते हैं। इन बलों के कल्याण एवं
पुनर्वास बोर्ड के आदेशानुसार, ‘‘ केन्द्रीय पुलिस कैंटीन में सेवा में और
सेवानिवृत्त कर्मियों को भी शराब दिए जाने पर मंजूरी दी गई है. केंद्रीय सशस्त्र
पुलिस बलों की शराब की तिमाही माँग के संकेतों के मद्देनजर यह निर्णय लिया गया है
ताकि केन्द्रीय पुलिस कैंटीन पर्याप्त मात्रा और प्रकार में शराब मुहैया कराने में
सक्षम हो.’’
वेलफेयर एण्ड रिहेबिलेशन बोर्ड का गठन सुरक्षा बलों के कल्याण तथा पुर्नवास के लिये
किया गया था परन्तु यह कितना आश्चर्यजनक है कि पुलिस के उच्च अधिकारियों ने कल्याण
का मतलब मुफ्त शराब माना है. आखिर इसका क्या औचित्य है? शराब के प्रभाव सेना और
पुलिस पर कितने बुरे पड़ रहे हैं, इसकी कल्पना भी इन उच्च अधिकारियों को नही है. सेना
के अधिकारी और जवान जब छुट्टी में अपने घर को जाते हैं, तब कैन्टीन से मुफ्त शराब
ले जाते हैं. रास्ते में शराब पीकर, रेल यात्रियों से झगड़ा करते हैं, अभद्रता करते
हैं और अक्सर महिलाओं से अभद्रता करने के लिये तैयार रहते है. महिला यात्रियों के
लिये सेना, पुलिस के जवान सहयात्री के बजाय भय और आतंक का पर्याय बन गये हैं. आये
दिन अखबारों में इस प्रकार की घटनाओं के समाचार आते रहते हैं.
पुलिस बल भी शराब के चलन में कितनी बिगड़ चुका है और शराब उनके परिवारों को कैसे
बरबाद कर रही है, अब यह चिन्ता का विषय है. अभी हाल में झॉंसी के पास एक स्टेशन से
पुलिस के जवान अपने ही विभाग की अधिकारी की दो बच्चियों को रेल्वे स्टेशन से पकड़ कर
ले गये और पुलिस थाने में ही बच्चियों के साथ बलात्कार किया. शराब पीकर हुड़दंग
मचाते पुलिसवालों को हर शहर में, हर रोज देखा जा सकता है.
सेना में पहले ही शराब की खपत का हाल ये है कि सस्ती शराब के चक्कर में बड़ी सख्या
में सैनिक एल्कोहॉल के आदी हो गये हैं. जिन सैनिकों पर देश की रक्षा का भार है, उनमें
से बड़ी संख्या में ऐसे युवा सैनिक अस्पतालों में भर्ती कराये जा रहे हैं, जो
एल्कोहॉल के कारण मनोविकार के शिकार हो चुके हैं. अखबारों में आने वाली खबरों पर
यकीन किया जाये तो ऐसे जवानों की संख्या बहुत बड़ी है, जिन्होंने सेना में भर्ती
होने के बाद ही पहली बार शराब पीना शुरु किया.
जोधपुर की एक खबर बताती है कि वहां कि मिलिट्री अस्पताल के मनोविकार वार्ड के सभी
बेड हमेशा भरे रहते हैं और मरीजों की संख्या बढ़ने पर अतिरिक्त बेड लगाना पड़ता है.
इनमें से 50 से 60 फीसदी मरीज ऐसे हैं, जो एल्कोहॉलिक डिपेंडेंट सिंड्रोम नामक
बीमारी से ग्रस्त होते हैं.
यह तो सरकार भी बेहतर जानती है कि शराब के कारण समाज का क्या हाल है. एक तरफ तो
सरकारें अंधाधुंध शराब की बिक्री करती हैं, दूसरी ओर उससे बचाव के लिये करोड़ों
रुपये का अभियान चलाती है. शराब के कारण होने वाली बीमारियों पर तो देश में अरबों
रुपये खर्च हो जाते हैं. ऐसे में शराब को कल्याणकारी योजना में शामिल कर उसे बढ़ावा
देना, देश को एक और बड़े नरक में ढ़केलने की तरह है. शराब का कल्याण और पुर्नवास से
क्या संबंध है? ऐसे निर्णय पर अगर अमल करना है तो पुलिस को पहले ’’वेलफेयर एण्ड
रिहेबिलेशन बोर्ड’’ को समाप्त करना चाहिये.
शराब अपने आप में एक बड़ी सामाजिक बुराई है जो न केवल व्यक्ति को उत्तेजित और अपराध
की ओर प्रवृत्त करती है बल्कि परिवार और समाज में कलह, असामाजिकता और अपराधीकरण की
प्रवृत्ति को विकसित करती है. जो अधिकारी यह निर्णय कर रहे हैं, वे अपने ही समाज के
कल के भविष्य को नही देख रहे. इससे सेना में शामिल जवानों के बच्चे शराब के अभ्यस्त
बनेंगे और फिर शराब के लिये अपराध करेंगे.
जो सिपाही सीमा की रक्षा में या आतंकवादियों से लड़ते हुये शहीद हो गये, उनके परिजनों
को भी मुफ्त और सस्ती शराब की व्यवस्था का उद्देश्य क्या है? उनके परिजनों का
तात्पर्य क्या है? उनके परिजन में वृद्ध माता पिता हो सकते है. जिनकी आवश्यकता शराब
नही बल्कि दवा हो सकती है. उनके परिजनों में बीबी, बच्चे हो सकते हैं जिनकी आवश्यकता
शिक्षा और चिकित्सा हो सकती है, शराब तो बिल्कुल नहीं.
कुल मिलाकर यह निर्णय पुलिस और समाज को घोर पतन की ओर ले जाने वाला है. शराबी
अधिकारियों द्वारा लिया गया यह निर्णय आपराधिक निर्णय है, जिसे तत्काल रद्ध किया
जाना चाहिए.
08.07.2011, 09.48 (GMT+05:30) पर प्रकाशित