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छत्तीसगढ़ में एसपीओ और सुप्रीम कोर्ट

बहस

 

छत्तीसगढ़ में एसपीओ और सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी


जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त होते बी. सुदर्शन रेड्डी और सुरेन्दर सिंह निज्जर की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए छत्तीसगढ़ शासन के उन आदेशों को निरस्त कर दिया है, जिनके अनुसार बस्तर में नक्सलियों से निपटने के लिए विशेष पुलिस कर्मी (एसपीओ) को भरती कर मजबूर, गरीब और लगभग अशिक्षित आदिवासी युवकों के हाथों में कथित आत्मसुरक्षा के नाम पर बंदूकें थमा दी गई थीं. प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा और भारत शासन के पूर्व सचिव ई. ए. एस. शर्मा वगैरह द्वारा दायर याचिका पर आदेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत, वैचारिक और भविष्यमूलक टिप्पणियां की हैं. कोर्ट ने छत्तीसगढ़ और केन्द्र शासन के शपथ पत्रों की जमकर खिंचाई की है और उन्हें बार बार अविश्वसनीय, गलत और गैरज़िम्मेदार ठहराया है.

इस निर्णय के लगभग तिहाई भाग में उन ऐतिहासिक, सामाजिक और दार्शनिक कारणों का अनुशीलन और विवेचन किया गया है जिनके कारण भारत में नक्सलवाद तेजी से पनप रहा है. न्यायाधीशों की गहरी समझ समर्थन मांगती है. वे अपने विषद ज्ञान और तार्किकता को ताज़ा जानकारियों, सूचनाओं और अध्ययन से सम्पृक्त करते हैं. यदि फैसले पर पुनर्विचार नहीं हुआ अथवा संसद ने कोई विधायन नहीं किया तो यह फैसला केन्द्र और राज्य के उन हुक्मरानों के गले की हड्डी बनेगा, जो नक्सली हिंसा के मुकाबले राज्य की प्रतिहिंसा के पक्षधर बने हुए हैं.

80 कंडिकाओं के फैसले में संविधान, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानव अधिकार आदि की दृष्टि से मामले को वैचारिक गंभीरता से समझने की कोशिश की गई है. उसका अभाव नक्सलवाद से निपट रही सरकारी फाइलों में शायद दर्ज नहीं होगा. विशेषज्ञ टिप्पणियों के बाद छत्तीसगढ़ की बस्तरिहा नक्सली स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार कर भयानक अमानवीय स्थितियों को उकेरा है.

चार वर्षों से सुप्रीम कोर्ट बस्तर-याचिकाओं के सहारे राज्य और केन्द्र से जानकारियां, दस्तावेज, शपथ पत्र मांगता रहा है. उसने समय समय पर राज्य को निर्देश दिए और सवाल भी पूछे हैं. उपरोक्त फैसला यकबयक नहीं हुआ है. बार बार शपथ पत्र पेश करने वाली सरकारों को इस निर्णय का पूर्वाभास भी रहा होगा. लेकिन तब तक पानी सिर पर से गुजर चुका था.

सुप्रीम कोर्ट ने बस्तर में मानवाधिकारों के हनन की शिकायत पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को भी जांच दल बनाकर संस्तुतियों के साथ रपट देने कहा था. 25. 08. 2008 को रपट दे भी दी गई. उस पर अदालत ने राज्य सरकार को अमल करने को भी कहा. सरकार को यह भी निर्देश था कि वह मानव वध के प्रत्येक प्रकरण में पुलिसिया प्राथमिकी दर्ज कर मजिस्ट्रेट से जांच जरूर कराए और प्रतिवेदन पेश करे. 18 फरवरी 2010 को ही सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 3000 एसपीओ की भर्ती की जानकारी मिलने पर राज्य सरकार से ऐतराज जताया था. सुप्रीम कोर्ट ने तीन चुभते हुए सवाल पूछे थेः

1. स्कूलों और छात्रावासों में सुरक्षा बलों के ठहरने के कारण और प्रभाव क्या हैं?
2. एसपीओ अर्थात कोया कमांडो की भर्ती, ट्रेनिंग और उन्हें हथियारों से लैस करने की क्या स्थितियां हैं?
3. स्वामी अग्निवेश द्वारा मोरपल्ली, ताड़मेटला और तिम्मापुरम गांव में लगभग 300 घरों को जलाने, महिलाओं के साथ बलात्कार करने और 3 व्यक्तियों की मार्च 2011 में हत्या को लेकर सरकार को क्या कहना है? साथ ही स्वामी अग्निवेश और उनके साथियों पर सलवा जुडूम के सदस्यों द्वारा कथित हमलों के आरोप को लेकर सरकार का क्या रुख है?

शुरुआत में ही सरकार द्वारा स्कूलों और छात्रावासों में सुरक्षा बलों के नहीं ठहरने संबंधी शपथपूर्ण बयान को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी छानबीन में गलत पाया. अदालत ने हिदायतें देना जारी रखा. उसे अब भी भरोसा नहीं है कि उसके आदेशों का पालन हो गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी भी की ‘‘जिस तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने इस मुकदमे के सिलसिले में अपना आचरण किया है उस पर हमें गहरा एतराज़ है.‘‘ सरकार ने इसलिए नया शपथ पत्र पेश करके सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए अतिरिक्त समय भी मांगा.

उसमें सरकार ने जानकारी पेश की कि 2004 से 2008 के दरम्यान नक्सलियों ने 2298 छोटे बड़े हमले किए. इनमें 538 पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों के जवान, 169 एसपीओ, 32 अन्य शासकीय कर्मचारी और 1064 ग्रामीण मारे गए. इनमें एक साथ 76 सुरक्षा बल के सदस्यों के मारे जाने की घटना शामिल है. सरकार ने स्वामी अग्निवेश के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सलवा जुडूम कार्यरत नहीं है.

सरकार ने यह भी सूचित किया कि 28. 03. 2011 की स्थिति में 6500 एसपीओ कार्यरत हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कटाक्ष किया कि एक वर्ष पहले सरकार के शपथ पत्र में केवल 3000 एसपीओ के कार्यरत रहने का उल्लेख था. अर्थात पिछले एक वर्ष में संख्या दो गुने से ज़्यादा हो गई. अदालत ने एसपीओ की भर्ती को लेकर पांच सवाल किएः-

1. शैक्षणिक एवं अन्य योग्यताएं क्या होंगी?
2. ट्रेनिंग के क्या आयाम हैं, और विशेष कर हथियार देने को लेकर?
3. एसपीओ के कार्यों और गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण कितना और कैसा होगा?
4. कार्यरत रहते हुए एसपीओ के मरने अथवा गंभीर रूप से जख्मी होने को लेकर उनके तथा परिवारों की देखभाल को लेकर क्या सोच है?
5. नौकरी छोड़ देने पर एसपीओ से हथियार वापस लेने और उनकी सुरक्षा को लेकर क्या प्रबंध हो सकते हैं?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

keshav sharma [kaish.142@rediffmail.com] raipur - 2011-07-18 11:16:12

 
  आदरणीय कनक जी का ये लेख संभावनाओं से भरा हुआ है. जानकारियां बहुत अच्छी हैं.आखिर सरकारें झूठ क्यों बोलती हैं. केंद्र से लेकर राज्य तक यही हाल है.क्या ये लोकतंत्र के लिये गंभीर बात नहीं है. समस्यायों को निपटाने का यह तरीका खतरनाक है. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - 2011-07-16 04:10:12

 
  यह पहला आलेख मेरी नज़र में आया है, जिसमें इतने विस्तार के साथ पूरे फैसले की विवेचना की गई है. आपने जिस तरह से परत दर परत इस फैसले का उल्लेख किया है, उससे पूरे सलवा जूड़ूम, एसपीओ और सरकार की भूमिका सामने आ जाती है. मैं आपके प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं. 
   
 

Amita Sengupta [] Asansol - 2011-07-16 04:08:19

 
  सरकार ने अपनी लड़ाई के लिये गरीबों को मोहरा बनाया और उनकी जान जोखिम में डाल दी. इस सरकार को तो लोकतंत्र में रहने का ही अधिकार नहीं है. 
   
 

Sanajay Tamrakar [sanjay_tamrakar@gmail.com] Kanpur - 2011-07-16 04:06:46

 
  छत्तीसगढ़ की सरकार अपराध कर रही थी और आपने सही लिखा है कि -यदि फैसले पर पुनर्विचार नहीं हुआ अथवा संसद ने कोई विधायन नहीं किया तो यह फैसला केन्द्र और राज्य के उन हुक्मरानों के गले की हड्डी बनेगा, जो नक्सली हिंसा के मुकाबले राज्य की प्रतिहिंसा के पक्षधर बने हुए हैं.... लेकिन कनक तिवारी जी, इस फैसले पर पुनर्विचार क्या होगा ? 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi - 2011-07-12 06:45:08

 
  अक्सर इन अधपके नेता और इन अलाल अफ़सरो के पीछे चलाने वाले ऐसे ही किसी मुश्किल का शिकार होते है जहाँ इनकी जिंदगी अत्यंत दुखद और विडंबना पूर्ण हो जाती है ,अभी जिन्होने सलवा-जुड़ूम के कलमे पढे थे, उन्हें बताना चाहीए कि अब ये एसपीओ और सलवा-जुड़ूम कार्यकर्ता कहा जांए? कौन गाँधी इन्हे बचाएगा ? रमन सिंह को सिर्फ़ वोट चाहिए, इसके लिए वो आदिवासी को ही आदिवासियो से लड़ा दें. मोटी तनख़्वाह पाने वाले अफ़सर खुद तो बस्तर तबादला तक नहीं लेना चाहते मगर इन भोले-भाले लोगो को ३००० रु के एवज में मौत के मुंह में धकेल रहे हैं !
बड़े मज़े की बात है अब रमन सिंह क़ानूनी सलाह लेने दिल्ली गये हैं. अगर इन सब उटपटांग प्रयोगों के पहले ये सलाह ली होती तो इतनी जान यों दोराहे पर नही खड़ी होती और इनकी स्तुति लिखने वाली मीडिया को अभी भी सुप्रीम कोर्ट ग़लत दिखता है मगर रमन सिंह साधु नज़र आते हैं?
हमेशा विनायक सेन पर चिल-पों करने वाली मीडिया अब चुप क्यों है ? देश का आधा बेड़ा गर्ग तो इन दलाल किस्म के पत्रकारो ने कर रखा है. जिस पुलिस से खुद के थाने नहीं सम्हालते, क्या वो इन एस पी ओ को नक्सलियों से बचा पाएँगे ? क्या सरकारी चाटुकारिता में पालने वाली मीडिया अभी इन एसपीओ की इन आपात स्थिति का विश्लेषण करेगी और सरकार की ज़िम्मेदारी तय करेगी ? वैसे ये चुनाव के विश्लेषण खूब करते हैं क्योकि इनकी औकात यही है.
 
   
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