यहां दुख का जन्म होता है
मुद्दा
यहां दुख का जन्म होता है
सारदा
लहांगीर
भुवनेश्वर से
तेंदूपत्ता छटाई और बंधाई का काम करने वाली 35 वर्षीय सीता तांडी को पिछले साल
जुलाई के महीने में जब आठ महीने का मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसके साथ काम करने
वाले अन्य श्रमिकों को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उनके लिए यह एक रोजमर्रा
जैसी बात थी. सीता के परिवार वाले दुखी थे. एक तो मरा हुआ बेटा पैदा हुआ था, दूसरा
सीता की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसका बड़े अस्पताल में ऑपरेशन करना पड़ा था.
जिसके लिए उन्हें काफी पैसा खर्च करना पड़ा था. उसके पति श्रीधर को अब ये चिंता
खाये जा रही है कि उधार लिया हुआ दस हजार रुपया वो साहूकार को कैसे और कब
चुकायेंगे?
इस साल सीता तांडी फिर से तेंदूपत्ता छटाई और बंधाई के काम कर रही है. और गौर करने
वाली बात ये है कि अब भी वो पांच महीने के गर्भ से है.
सीता गहरी पीड़ा के साथ कहती हैं- '' क्या करे मैडम, काम न करने से खायेंगे क्या?
पिछले साल जंगल विभाग के अधिकारियों से एडवांस पैसा मिला था, वो तो घर में ही खर्च
हो गया था. ऊपर से ऑपरेशन में खर्च हुआ दस हजार रुपया साहूकार को चुकाना है. गांव
में तो काम-धंधा न के बराबर है. यहां काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? मुझे कष्ट
तो बहुत हो रहा है. इस हालत में घंटों नीचे बैठकर छटाई का काम करने से पेट में भी
दर्द होता है. पर क्या करूं, मजबूर हूं. पेट पालने के लिए हम जैसे गरीबों को इतना
कष्ट तो उठाना ही पड़ता है.''
सीता की ही तरह 22 वर्षीय अल्हादीनी भी तीन महीने के पेट से है. वो खईरामाल गांव के
तेंदूपत्ता बंधाई और छटाई केंद्र में काम करती है. आल्हादीनी का ये दूसरा बच्चा है.
''घंटों बैठकर काम करने में मुझे कभी-कभी पेट में दर्द हो जाता है. थकान भी बहुत हो
रही है. परसों ही यहां मेरी एक साथी महिला की तबीयत अचानक खराब हुई. उसे अस्पताल
में भर्ती कराया गया है. आज ही ऑपरेशन से उसका बच्चा हुआ. मां-बेटी दोनों की हालत
कुछ ठीक नहीं है, सुनने में आया है. ये सब देखकर बड़ा डर लगता है. पास में ढंग का
कोई डाक्टर भी नहीं है. तबियत खराब होने से यहां से दस किलोमीटर दूर पदमपुर ही जाना
पड़ता है. गाड़ी-वाड़ी कुछ उपलब्ध नहीं है यहां पर.'' ये बताते हुए मुझे आल्हादीनी
सहमी हुई दिखाई दी.
बरगड़ जिले के पदमपुर उपखंड के करीब 30 तेंदूपत्ता केंद्रों में मुझे करीब 18
गर्भवती महिलाएं मिली, जो घंटों नीचे बैठकर तेंदूपत्ता छटाई और बंधाई का काम कर रही
थी. शरीर की पीड़ा उनके चेहरे की शिकन से साफ झलक रही थी. अधिकतर महिलाएं कभी न कभी
इस काम की वजह से अपने बच्चे खोने के दर्द से गुजर चुकी थी. सब की अपनी एक अलग—अलग
कहानी थी पर बुनियादी मुद्दा एक ही था- गरीबी.
कलावती कहती हैं- ''हर साल हम 7 से 8 महीने इस केंद्र में इसी हालत में गुजारते
हैं, अपने परिवार के साथ. काम करते हुए मेरा दो बार गर्भपात हुआ था. अभी मेरे तीन
बच्चे हैं. मेरी बहू भी यहां काम करने आती है. वो भी अभी पेट से है. गांव में
काम-धंधा नहीं मिलने की वजह से हम इनसे कुछ एडवांस लेते हैं और यहां सभी आकर काम
करते हैं. अकेली मेरी बहू गांव में कैसे रहेगी, इसलिए यहां काम करने चली आई. हम लोग
ऐसे ही माहौल में रहने के आदी हो चुके हैं. गांव से बाहर एक तंबू के नीचे जहां न
साफ पीने का पानी है न और कोई सुविधा है. बारिश में बुखार, मलेरिया का खतरा भी बढ़
जाता है. जिसके पास पैसा है, वो तो अपना इलाज करवा लेते हैं पर जिसके पास पैसा नहीं
वो क्या करें? भगवान भरोसे ही रहते हैं.''
उड़ीसा में तेंदूपत्ता विभाग के अंतर्गत लगभग 7000 तेंदूपत्ता छटाई और बंधाई केंद्र
हैं. जिनमें लगभग 20000 छटाई और बंधाई के कुशल श्रमिक काम करते हैं. इनमें से 50
प्रतिशत यानी करीब 10000 महिला श्रमिक हैं.
तेंदूपत्ता तोड़कर सूखने के बाद मई महीने से छटाई और बंधाई का काम शुरू किया जाता
है. इसके लिए कुछ गांव में कुशल श्रमिक होते हैं, जो सालों से यही काम करते हैं. वन
विभाग के अधिकारी इन श्रमिकों को कुछ अग्रिम राशि देकर अपने अधिकार में रखते हैं.
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जब तेंदूपत्ता का मौसम शुरू होता है तो इन श्रमिकों को केंद्र में लाया जाता है. एक
महिला और एक पुरुष को लेकर एक 'खुंटी' बनाया जाता है, जहां महिला को छटाई और पुरुष
बंधाई का काम करते हैं. एक 'खुंटी' का एक गट्ठा-पत्ता बांधने पर 23.50 रुपये मिलता
है. 12 घंटे काम करके ज्यादा से ज्यादा एक महिला और पुरुष पांच से छह गट्ठा बांध
पाते हैं. अर्थात एक दिन की कमाई 144 रुपये ही होती है. यानी एक को 75 से 80 रुपये
के आसपास मिलता है, जो प्रतिदिन मजदूरी से भी कम होता है.
अगर बात मेडिकल खर्च की करें तो एक बैग पत्ता बंधाई के बदले एक रुपया मिलता है. एक
बैग यानी 'बोरी' में 12 गट्ठा होता है. एक खुंटी में एक महिला और एक पुरुष मिलकर
महीने में करीब 180 गट्ठा यानी 15 बोरी पत्ता ही बंधाई कर पाते हैं. मतलब ये कि
महीने में दो लोगों को मेडिकल खर्च के लिए सिर्फ 15 रुपए यानी एक को महीने भर के
अपने इलाज के लिए सिर्फ 7.50 रुपये मिलता है. जाहिर है, इससे इन श्रमिकों की
दयनीयता का अंदाजा लगाया जा सकता है.
रेंज आफिसर राजेंद्र गोधायन इस बात से इनकार नहीं करते कि यहां काम करने वाली
गर्भवती महिलाओं की हालत खराब है.
''मैं सालों से इन केंद्रों में काम करने वाले श्रमिकों के साथ जुड़ा हूं. ये बात
सच है कि हर साल मेरे इलाके के 11 केंद्रों में कम से कम 6-8 गर्भपात के मामले
सामने आते हैं. हालांकि इसका अभी तक हमारे पास कोई आंकड़ा नहीं है पर तेंदूपत्ता
केंद्रों में काम करने वाली महिलाओं के पति उनकी स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में
हमें बताते रहते हैं.'' वो कहते हैं.
तेंदूपत्ता कर्मचारी संघ के सचिव प्रदीप पुरोहित का कहना है- '' यहां महिलाओं की
समस्या बहुत ही ज्यादा है. हर साल गर्भपात, सिजेरीयन और समय से पहले बच्चा पैदा
होने की शिकायतें आती हैं. पर दुख की बात ये है कि बार-बार सरकार से शिकायत करने के
बावजूद इसका कोई समाधान नहीं निकल रहा है. सरकार को आंकड़ा चाहिये. पिछले पांच
सालों में मेरे पास इस तरह के लगभग 40-50 मामले आये हैं. कुछ महिलाओं की मौत भी हुई
है.''
प्रदीप पुरोहित के अनुसार ये लोग छटाई और बंधाई के काम में कुशल है. इनमें जो
महिलाएं हैं, वो छटाई का काम करने में माहिर हैं. छटाई का काम बहुत ही महत्वपूर्ण
होता है. छटाई यानी पत्तों को ग्रेड और क्वालिटी के अनुसार अलग-अलग करना होता है.
यह काम महिलायें जितने धैर्य और कुशलता से करती हैं, वह पुरुषों के लिये संभव नहीं
है.
बरगड़ जिले के वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ नारायन थानापती का मानना है कि घंटों
बैठकर काम करने वाली इन गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका कुप्रभाव तो पड़ ही
रहा है.
वो कहते हैं- '' मेरा घर इस जिले में है और मैं पिछले 15 सालों से इस इलाके में काम
कर रहा हूं. इस सीजन में हर साल करीब आठ से दस महिलाओं का केस आता रहा है. ये तो
सीधी सी बात है कि गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार के साथ उपयुक्त आराम की जरूरत
होती है. पर छटाई और बंधाई का काम करने वाली इन महिलाओं को न तो पौष्टिक आहार मिलता
है न आराम. ऊपर से दस से बारह घंटे नीचे बैठकर काम करने पर इनके पेट के निचले
हिस्से पर दबाव बढ़ता है, जिसकी वजह से पेट में बच्चा कभी-कभी ठीक से मूव नहीं सकता
और ऐसी हालत में गर्भपात, अपरिपक्व बच्चा पैदा होना तथा और भी कई खतरा बढ़ जाता
है.''
इस बारे में वन विभाग लगभग बेपरवाह है. तेंदूपत्ता विभाग के मुख्य वन सरंक्षक जुडे
सेखर कहते हैं- ''हमें इन छटाई और बंधाई करने वाली श्रमिकों की चिंता है. उनके
अच्छे स्वास्थ्य के लिए तेंदूपत्ता के मौसम में हम उनके लिए तेंदूपत्ता केंद्रों
में एक दिन के हेल्थ कैंप की व्यवस्था करते हैं. महिलाओं को इस हालत में काम करने
के लिए मजबूर नहीं किया जाता, पर जब भी वे अपने पति और बच्चों के साथ गांव छोड़कर
यहां आकर रहती हैं तो खुद काम करती हैं. इसके बाद भी अगर गर्भवती महिलाओं को
स्वास्थ्य समस्या होती है तो गांव के स्वास्थ्य केंद्र में जाकर वे अपना इलाज करवा
सकती है. हमें भी एक सरकारी दायरे में रहकर काम करना पड़ता है.''
जाहिर है, हम सब जानते हैं कि तेंदूपत्ता यानी बीड़ी पत्ता के व्यवसाय से सरकार हर
साल करोड़ों रुपया कमाती है लेकिन इस कमाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुशल
श्रमिक, मुख्यत: महिलाओं की समस्या को हमेशा से नजरअंदाज किया जाता रहा है. जिसका
परिणाम है- गर्भपात, असमय प्रसव, अपरिपक्व बच्चे का जन्म और हां, मृत्यु तो हमेशा
ऐसी स्त्रियों की प्रतीक्षा में ही रहता है.
*यह आलेख पेनोस साऊथ एशिया की
मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा है.
28.07.2011, 21.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित