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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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योगेंद्र कृष्णा की दो कवितायें

साहित्य

 

योगेंद्र कृष्णा की दो कवितायें


इस कठिन दौर में

सुनीता वर्मा



किसी शोक सभा में अब
जाना होगा तुम्हें
पूरी तरह बेफ़िक्र और तैयार
एक और शोक के लिए…

कह देना होगा तुम्हें
मासूम अपनी पत्नी
और असमय प्रौढ हो रहे
अपने बच्चों से…
समझदार हो
बहुत देर तक न लौटूं
तो समझ लेना…

इतना ही नहीं
कि तुम किसी क्षण
मारे जा सकते हो…

श्मशान या कब्रिस्तान
तक पहुंचने के पहले
रास्ते में खो सकती है
तुम्हारी लाश…

और खो सकते हैं
तुम्हारे शोक
तुम्हारे आंसू…

और तब तुम्हें
न कोई शोक हिला सकेगा
और न ही कोई सुख

तुम्हारे इस कठिन दौर में
नहीं होगा कोई
तुम्हारे संग
फिर भी तुम
निस्संग नहीं होगे

नहीं होगा अब
तुम्हारे सामने शोक
या सुख का कोई विकल्प
लेकिन तुम
निर्विकल्प भी नहीं होगे…


अवशिष्ट

रेत पर बिखरे पड़े अवशिष्ट
अनाम सैलानियों के ही नहीं
समुद्र और कई कई और भी
अनाम चीज़ों और रिश्तों
के ठौर बताते हैं

माचिस की अधजली तीलियां
बताती हैं कि अधजले
सिगरेट के टुकड़े भी ज़रूर
यहीं कहीं पास है
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rati Saxena [] Kerala - 2011-08-05 03:15:37

 
  अच्छी कविताएँ हैं, कृपया kritya के लिए भी कुछ कविताएँ भेंजे.  
   
 

श्रीश राकेश जैन [shreeshrakeshjain94@gmail.com] लहार (म.प्र.) - 2011-07-29 16:50:38

 
  योगेन्द्र जी की कहन अनूठी है। उनकी रचना की हर पंक्ति अपने अंदर अनगिन अर्थछटाएँ समेटे रहती है। प्रस्तुत रचना भी अपने अंदर कितने संदर्भ और अर्थ गांभीर्य समेटे हुये है। हर वाचन में एक नया अर्थ खुलता है। 
   
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