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के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

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राज्य का कन्या ‘दान’

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मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

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माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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घाघ बाघ की मेमना-कथा

बहस

 

घाघ बाघ की मेमना-कथा

कनक तिवारी


प्रिय पाठकों,

manmohan-singh

इस बार का लेख आपसे संवाद करने के लिए है. यदि आपको कोई बताए कि अमुक जगह नरेन्द्र मोदी का धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में व्याख्यान होने वाला है. या मुकेश अंबानी अपरिग्रह के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं. अथवा बाबा रामदेव किसी ब्लेड कंपनी का ब्रांड अम्बेसडर बनने पर सहमत हो गए हैं. अथवा विजय माल्या को अखिल भारतीय मद्य निषेध अमल समिति का अध्यक्ष बना दिया गया है. तब आपको कैसा लगेगा? ठीक वैसा ही आपको तब क्यों नहीं लगता जब कुदरती मासूम चेहरे की आड़ में सबको राजनीतिक दांव में चित करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहते हैं कि जन लोकपाल बिल तो संसद के अधिकार में है. देश में किसी को हक नहीं है कि वह संसद के मुकाबले अपनी राय को तरजीह दे.

संसद आखिर है क्या? देश के कोई 542 लोकसभा सदस्यों को संविधान की मंशा के अनुसार हर पांच साल में गठित किया जाने का प्रावधान है. ऐसा संविधान के प्रक्रिया वाले हिस्से में लिखा है. संविधान के प्रारंभ में ही लेकिन यह लिखा है कि हम भारत के लोग अपना यह संविधान खुद को आत्मार्पित करते हैं.

विश्व में भारत का संविधान इस अर्थ में अद्भुत है कि उसे आज़ादी मिलने के पहले से ही भारतीय देशभक्तों ने मिलकर बनाना शुरू कर दिया था. उसे आज़ादी मिलने के बाद 26 नवम्बर 1949 को पूरा किया गया. फिर उसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया. संविधान यह कहीं नहीं कहता कि जनता एक बार जनप्रतिनिधि को चुनकर संसद में पहुंचा दे तो फिर उसे पांच वर्ष तक मुंह पर पट्टी बांधकर रखना होगा.

कांग्रेस के एक बड़बोले प्रवक्ता मनीष तिवारी देश की जनता को गैर निर्वाचित तानाशाह कहते हैं जिसे सांसदों को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है. कांग्रेस के मशहूर वकील प्रवक्ता अभिषेकमनु सिंघवी भी कहते हैं कि विधायन की प्रक्रिया से नागर समाज का कोई लेना देना नहीं है. वह संसद की सार्वभौमिकता का सवाल है. उनसे भी ज़्यादा मशहूर वकील और काबीना के सबसे तेज़ तर्रार मंत्री कपिल सिब्बल का चेहरा फलसफाई अंदाज़ में मुस्कराहट और व्यंग्य का कॉकटेल पीते हुए ताना कसता है कि जनता के कहे पर संसद को ही हुक्मनामा चस्पा करने का अधिकार है.

जन आंदोलनों के प्रहार से बचने के लिए मौजूदा केन्द्र सरकार ने कानून मंत्री बदलकर एक और बेहतर वकील सलाम खुर्शीद को मंत्रालय का भार सौंप दिया है. उनके अतिरिक्त अपने ज़माने के बड़े वकील पी. चिदंबरम गृह मंत्रालय की नाजुक जिम्मेदारी संभाल ही रहे हैं. कुछ और वकीलों को सांसदों में गिन लिया जाए तो डॉ. मनमोहन सिंह का नया कुनबा सरकार बनाम जनता के युद्ध में कानून दां वकील सेनापतियों के भरोसे है.

यदि कोई कहे कि फिल्मों में अश्लीलता का सवाल फिल्म निर्माताओं के संघ को सौंप दिया जाना चाहिए. खिलाड़ियों में नशीली दवा लेने का मामला अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया को सलाह के लिए सौंप देना चाहिए. आदिवासियों और किसानों की जबरिया जमीनें उद्योगपतियों द्वारा छीने जाने का विवाद उद्योगपतियों के संगठन फिक्की के हवाले कर देना चाहिए. जिला कलेक्टर के आदेश पर गोली चलाने के आदेश की वैधता की जांच ए. डी. एम. या एस. डी. एम. से करानी चाहिए. या देश की कोयला नीति को बनाने का अधिकार कोयला माफिया को ही सौंप देना चाहिए. तो आपको कैसा लगेगा?

यदि देश की जनता की आकांक्षा का जन लोकपाल बिल संसद के हवाले कर देने का मासूम तर्क जनता नहीं समझेगी तो संसद की भूमिका को लेकर महात्मा गांधी ने जो टिप्पणियां की हैं, वे इतिहास के आले से मिटा दी जाएंगी. संसद का अर्थ उसकी सर्वसम्मति से यदि हो तो प्रधानमंत्री के तर्क से सभवतः पूरी असहमति नहीं हो सकती. तब भी जनता को संसद के विवेकाधिकार पर सवाल पूछने का हक तो होगा. ऐसा अधिकार देश के संविधान न्यायालयों को तो है ही. लेकिन यदि संसद का अर्थ सांसदों के बहुमत से है तो संसद की सार्वभौमिकता, प्रामाणिकता और वैधता की तुरही बजाते रहने से क्या होगा?

सरकारी कुनबा यह जानता है कि चाहे कुछ हो जाए वह अपने बहुमत के बल पर संसद में जैसा चाहे वैसा अधिनियम पास करा लेगा. इसका ही तो विरोध अन्ना हजारे के नेतृत्व में पूरा देश कर रहा है. घरों में शादियां बहुमत के आधार पर तय नहीं होतीं. किस कब्रिस्तान में मरहूम को सुपुर्देखाक किया जाए इसके लिए जम्हूरियत में बहुमत के कानून लागू नहीं होते. बच्चे का नामकरण संस्कार बहुमत के आधार पर नहीं होता. कौन सा मंदिर किस इलाके में बनवाया जाए इसका फैसला भी बहुमत नहीं करता. कौरवों ने द्रौपदी का चीर हरण या पांडवों ने द्वूत क्रीड़ा में पराजय का कृत्य बहुमत के आधार पर नहीं किया था. समाज में एक तरह की सर्वानुमति होती है. वह संसद में दिखाई दे तो जनता उसे स्वीकार कर सकती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vipin bihari shandilya [vicharmimansa@gmail.com] balaghat-madhyapradesh 2011-8-3 - 2011-08-05 15:15:35

 
  मनमोहन सिंह को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा. इंदिरा जी के बाद कोई साहसी पैदा ही नहीं हुआ. गांधी ने जो वैश्या वाली संज्ञा दी थी, वह सही मायने में आज सच्ची साबित हो रही है. 
   
 

kashish [] bilaspur - 2011-08-04 06:02:29

 
  बहुत शानदार आलेख. चाहे वकील सेनापति हो, सरकार ये जनता को समझा नहीं पायेगी. भ्रष्टाचार से बचने का काम हो रहा है या भ्रष्टाचारियों को बचाने का..इस मामले में सरकार+ विपक्ष एकमत भी हो सकते है...जनता को तय करना है कि अन्ना का साथ दे या जस का तस इसे चलने देना है. 
   
 

arun [arunbhardwaj@gmail.com] delhi - 2011-08-02 12:25:02

 
  यकीन मानिए, बहुत सालों बाद इतना बढिया लेख पढा है ।  
   
 

prashant [] Raipur,C.G. - 2011-08-02 06:58:07

 
  Very crystal clear,bold and true analysis of ill and dangerous motives of pleaders turned politicians.  
   
 

sunil chipde [] bilaspur , cg , india. - 2011-08-01 07:17:05

 
  लोकपाल बिल पर कुछ मंत्री-राजनेता लगातार जनता को ऐसी बात समझा रहे हैं जिससे मूल भावना से जनता दूर हो जाये. जब तब मीडिया के सामने वे बात बदल कर बात कर रहे हैं, ऐसे में यह लेख उन सभी को पढ़नी चाहिए, जो लोकपाल के लिए भ्रमित हैं या कुछ तय नहीं कर पा रहे हैं. 
   
 

ganesh agrawal [agrawalganesh73@gmail.com] raigarh chhatishgarh - 2011-08-01 06:00:50

 
  एक्सीलेंट कनक तिवारी जी, एक्सीलेंट....लेकिन गांधी का नाम तो केवल सत्ता पाने का जरिया है. एक बार सत्ता मिल जाने के बाद तो इन नेताओं की पूरी ऊर्जा गांधी की तस्वीरों वाले नोट एकत्र करने में ही लगती है.  
   
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