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उद्योगों के लिये पूरा जिला खाली
मुद्दा
उद्योगों के लिये पूरा जिला खाली
सुनील शर्मा
जशपुर से लौटकर
अगर किसी ज़िले की पूरी आबादी को विस्थापित कर दिया जाये तो ? आपके पास इसका जो भी जवाब
हो, कम से कम छत्तीसगढ़ में तो इस सवाल पर भी कोई बात नहीं करना चाहता. सिवाय उन
आदिवासियों के, जो डरे हुये हैं और आक्रोशित भी.
अगर सब कुछ सरकार और औद्योगिक घरानों के मुताबिक ठीक-ठाक रहा तो आने वाले दिनों में
छत्तीसगढ़ की साढ़े आठ लाख की आबादी वाला जशपुर जिला पूरी तरह से खाली करवा दिया
जायेगा. इन साढ़े आठ लाख लोगों में शामिल 64 फीसदी उन आदिवासियों को भी खदेड़ने की
तैयारी चल रही है, जो हज़ारों साल से जशपुर के इलाके में रहते आये हैं. जशपुर के
लाखों आदिवासी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं, उनसे जवाब चाहते हैं लेकिन राजधानी
रायपुर से लेकर दिल्ली तक उनकी गुहार अनसुनी रह जा रही है.
गरीबी, लाचारी और अभावों की दिशा में नया इतिहास गढ़ने वाले इस जिले ने देश को कई
आईएएस, आईपीएस के साथ कई उच्चाधिकारी दिये हैं लेकिन इनकी ताकत भी जशपुर में कमजोर
पड़ रही है. जशपुर के भूगर्भ में खनिज संपदाओं का विपुल भंडार तो है ही यहां की
नदियों में प्राकृतिक स्वर्णकण भी पाये जाते हैं. लेकिन प्रकृति की यह विरासत ही इन
आदिवासियों के लिये मुश्किल का सबब बन गई है.
पिछले कुछ सालों से इस जिले में औद्योगिक घरानों ने अंधाधुंध तरीके से अपने विस्तार
की तैयारी शुरु की है. यहां आने वाले 122 बड़े उद्योगों ने सरकार से उद्योगों की
स्थापना के लिए 6023 वर्ग किलोमीटर जमीन की मांग की है. और जानते हैं, जिले का पूरा
क्षेत्रफल कितना है ? कुल 6205 वर्ग किलोमीटर. यानी केवल 182 वर्ग किलोमीटर का
क्षेत्र ऐसा है, जिसे औद्योगिक घराने बचे रहने देना चाह रहे हैं.
जाहिर है, जिले की लगभग साढ़े आठ लाख की आबादी के पास, ऐसी स्थिति में कई सवाल हैं.
आखिर सब कुछ खाली हो जायेगा तो लोगों का क्या होगा ? लोग कहां जाएंगे ? खेती की
जमीन छीन जायेगी तो खेती किसमें करेंगे और खायेंगे क्या ?
हाल देश का
एक बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर विकास की सारी विपदा आदिवासियों के हिस्से ही क्यों
हैं ? देश में साढे आठ करोड़ सूचीबद्ध आदिवासी हैं जबकि ढाई करोड़ गैर सूचीबद्ध
(डिनोटीफाइड)हैं यानी कुल लगभग 11 करोड़ आदिवासी हैं. पर इन आंकड़ों में सबसे
महत्वपूर्ण है आदिवासियों का विस्थापन. जानकारों की मानें तो प्रत्येक दस में से एक
आदिवासी आज वहां नहीं है, जहां वह पैदा हुआ था, जहां उसकी संस्कृति फल-फूल रही थी.
न उसके पास अब जमीन है और न जंगल. पिछले एक दशक की ही बात लें तो औद्योगिक
परियोजनाओं की स्थापना के कारण देश के महज चार राज्यों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ,
झारखंड और उडीसा में 14 लाख लोग विस्थापित हुये. इनमें 79 प्रतिशत लोग आदिवासी थे.
तथ्य बताते हैं कि इस लोकतांत्रिक राष्ट्र में जनता के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाने
वाली सरकार ने 66 प्रतिशत विस्थापितों का पुनर्वास तक नहीं किया और उन्हें उनके हाल
पर जानवरों की तरह मरने-जीने के लिये छोड़ दिया.
डा.एम.एम.स्वामीनाथन द्वारा तैयार 'ड्राफ्ट पेपर' में चौंकाने वाले तथ्य हैं. यह
रिपोर्ट बताती है कि देश में औद्योगीकरण और विकास से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं के
कारण वर्ष 1990 तक की अवधि में जो आदिवासी विस्थापित हुए उनका पूरी तरह पुनर्वास
नहीं हुआ. विस्थापित आदिवासियों की कुल संख्या 85.39 लाख रही, जो कुल विस्थापितों
का 55.16 प्रतिशत थी. विस्थापित आदिवासियों में 64.23 प्रतिशत अब भी पुनर्वास से
वंचित है और अपनी जमीन एवं जड़ से उखडे हैं.
ऐसे में भला छत्तीसगढ़ अलग कैसे होता ! छत्तीसगढ़ में भी सरकार उसी परंपरा के पालन
की कोशिश कर रही है, जिसमें आदिवासियों की छाती पर उद्योग लगा कर कथित विकास की
इबारत दर्ज की जाती है.
जीवन का अधिग्रहण
जशपुर में औद्योगिक घरानों के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू से ही संघर्षरत
सेवती पन्ना को जैसे सब कुछ मुंहजुबानी याद है. वह बताती हैं- "2008 में जमीन
अधिग्रहण के लिए बगीचा ब्लाक के तेरह पंचायतों को नोटिस भेजा गया. इसमें गुल्लू भी
शामिल था, जहां हाईड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट बनाने की तैयारी की जा रही है. नोटिस
पंचायतों के सरपंच-सचिव के हाथ में दिया गया. तब तक उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि
जमीन अधिग्रहण क्या होता है ? नोटिस में साफ शब्दों में लिखा था कि यदि वे जमीन
अधिग्रहण के संबंध में 7 अगस्त 2008 तक न्यायालय के समक्ष पंचायत का अभिमत पेश नहीं
करेंगे तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. लोग घबरा गए. उन्होंने पहले
तो सभी तेरह पंचायतों की एक बैठक बुलाई फिर एक निजी कंपनी में बतौर असिस्टेंट
मैनेजर काम कर चुके एक बुजुर्ग से इस बाबत सलाह ली. बुजुर्ग ने कंपनियों के जमीन
अधिग्रहण की मंशा को स्पष्ट किया. बाद में खनिज संसाधनों का उत्खनन रोकने ग्रामीणों
ने खुद से ही तहसील में जाकर उस नोटिस का जवाब दिया.’’
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सेवती पन्ना के अनुसार किसी को इस बात का अनुमान नहीं था कि नोटिस की यह शुरुवात
असल में नोटिस के एक अंतहीन सिलसिले में तब्दिल हो जाएगी. अलग-अलग पंचायतों को जब
नोटिस मिलना शुरु हुआ तो लोगों को समझ में आने लगा कि कोई गहरी साजिश रची जा रही
है. आदिवासियों ने गांव-गांव में बैठकें की. लोग एकजुट होने लगे. 10 अगस्त को तहसील
परिसर के सामने हजारों की संख्या में एकत्र हुये ग्रामीणों ने चक्का जाम कर दिया.
बुजुर्गों को याद नहीं कि आजादी के बाद इससे पहले कभी कोई इस तरह का आंदोलन हुआ हो.
सरकारी अफसर थोड़े घबराये. अगले दिन आदिवासियों का विरोध देखते हुये अपर कलेक्टर
विपिन मांझी ने तहसीलदार की अब तक की कार्रवाई को खारिज किया और इस दौरान 105 वर्ग
किमी क्षेत्र में सर्वेक्षण पर विराम लग गया.
लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री का जशपुर में ज़मीन अधिग्रहण को लेकर दिया गया भाषण
दिलचस्प है. मुख्यमंत्री रमन सिंह के जशपुर दौरे (4 अगस्त 2010 ) के दौरान दिया गया
भाषण गौरतलब है- "कौन कहता हैं कि आदिवासियों की जमीन उद्योग के लिए ली जायेगी? न
तो उद्योगों को जमीन आबंटित की जा रही है और न ही इसकी प्रक्रिया शुरू हुई है, यह
महज अफवाह है.’’ पूछने का मन होता है कि अगर यह सब कुछ अफवाह था तो फिर अपर कलेक्टर
ने तहसीलदार के 105 वर्ग किलोमीटर के किस सर्वेक्षण को खारिज किया था?
तपकरा इलाके के युवक संदीप एक्का बताते हैं "मुख्यमंत्री के बयान पर जशपुर के किसी
भी व्यक्ति को शायद ही भरोसा हो. उनके इस कथन को किसी ने भी गंभीरता से नहीं
लिया.’’
जन संघर्ष समिति जशपुर के अध्यक्ष श्याम सुंदर पैकरा के पास मुख्यमंत्री के बयान का
अलग ही जवाब है. "यदि मुख्यमंत्री सच बोल रहे हैं तो फिर उद्योग वहां क्या कर रहे
हैं ? औद्योगिक घरानों ने जशपुर में अपने दफ्तर क्यों खोले हैं ? इसके पीछे उनकी
मंशा क्या है ? यदि प्रदेश सरकार जशपुर में उद्योग स्थापित करने की योजना नहीं बना
रही है तो निजी कंपनी से खनिज की उपलब्धता का सर्वेक्षण क्यों करा रही है ?"
ज़ाहिर है, इस फैसले ने जमीन अधिग्रहण के विरोध में खड़े हुए लोगों में खासा असर
डाला और लोगों में अपने अधिकारों के प्रति पहली बार जागरूकता भी आई.
यह है जशपुर
जशपुर छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्व भाग में स्थित एक ऐसा जिला है जो अपनी प्राकृतिक
सुषमा के कारण अलग पहचान रखता है. कुल आबादी का लगभग 65 फीसदी आदिवासियों का है.
यहां विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा के अलावा, उरांव, बिरहोर भी बड़ी संख्या में
निवास करते हैं. यह ज़िला ओडिशा और झारखंड की सीमाओं तो छूता है. वर्तमान में जिले की कुल जनसंख्या
8,52043 है. इसमें पुरुष 4,25085 व 4,26958 महिलाएं हैं.
कुल साक्षर जनसंख्या 5,02105 है, इसमें से 2,84985 पुरुष व 2,17120 महिलाएं है. प्रतिशत में
जिले की साक्षरता 68.60 प्रतिशत है, जिसमें 78.24 प्रतिशत पुरुष व 59.05 प्रतिशत
महिलाएं साक्षर हैं.
जन संघर्ष समिति जशपुर के अध्यक्ष श्री पैकरा बताते हैं कि "सूचना के अधिकार के
अंतर्गत मिली जानकारी के मुताबिक जिला प्रशासन के पास 112 कंपनियों के आवेदन मिले.
कंपनियों की मंशा जानकर जनसंघर्ष समिति का गठन किया गया. इसका विस्तार जिले के साथ
ही ब्लाक स्तर पर हुआ. पहली बार हम लोग संगठित हुये.’’
डॉ. आस्कर केंद्र और राज्य शासन पर जशपुर जिले को उद्योग घरानों के हाथों बेच देने
का आरोप लगाते हैं. उनका आरोप है कि बिना जनसुनवाई और ग्रामसभा की सहमति के सरकार
ने जिले में 112 उद्योग लगाने की सहमति दे दी. इसके लिए सरकार 29 लाख करोड़ रूपए
औद्योगिक घरानों से ले चुकी है.
इस बात में कोई शक नहीं है कि छत्तीसगढ़ उद्योगपतियों का चारागाह बन चुका है.
छत्तीसगढ़ में विकास के जो कारपोरेट मॉडल तैयार हुये हैं, उसमें औद्योगिक घराने
सरकार की गोद में बैठ कर आदिवासियों, मजदूरों और किसानों को नाकों चने चबवा रहे
हैं. जशपुर जिला इसका एक छोटा उदाहरण है.
मुख्यमंत्री के बयान को गलत ठहराते हुये सामाजिक कार्यकर्ता ममता कुजूर कहती हैं
"सरकार झूठ बोल रही है क्योंकि यदि यहां के आदिवासियों ने संघर्ष नहीं किया होता तो
अब तक कईयों की जमीन अधिग्रहित हो चुकी होती और उद्योग भी लग चुके होते, कड़े विरोध
के फलस्वरूप उद्योगपति जशपुर में अपनी जड़े नहीं जमा पा रहे हैं.’’
पिछले पांच सालों में कई बार आदिवासियों के प्रतिनिधि मंडल ने कलेक्टर के माध्यम से
राज्यपाल, मुख्यमंत्री और अन्य म़ंत्रियों को ज्ञापन सौंपा है. इन ज्ञापनों में
जशपुर की जमीन के सर्वेक्षण के लिए निजी उद्योग कंपनियों को दिए गए लाईसेंस को
निरस्त करने, ग्राम सभा की सहमति के बिना उद्योग स्थापना की अनुमति न दिए जाने,
जाति प्रमाण पत्र की प्रक्रिया सरल करने, बांध और उद्योग के लिए स्थानीय लोगों को
विस्थापित न करने और वन अधिकार अधिनियम 2006 लागू करने की मांग की गई है लेकिन यह
बेनतीजा ही रहा है.
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अब जरा औद्योगिक घरानों की सुन लें. जशपुर में उद्योग की स्थापना को जिन्दल स्टील
एवं पावर लिमिटेड के महाप्रबन्धक संजीव चौहान सिरे से खारिज कर देते हैं. हालांकि
तथ्य यह है कि सबसे पहले बगीचा, मनोरा और कुनकुरी के इलाके में जमीन अधिग्रहण के
लिए इस कंपनी के लिये ही नोटिस भेजा गया था.
संजीव चौहान का दावा है कि जशपुर जिले में उद्योग स्थापित करने की कोई योजना नहीं
है. बगीचा, मनोरा और कुनकुरी तहसील क्षेत्र के 3800 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में
हीरा, सोना और अन्य बहुमूल्य पत्थर ब्रैस मैटल खनिज का सर्वे का कार्य चल रहा है.
इसके लिए किसी की भी जमीन अधिग्रहित करने की जरूरत नहीं है. बहुमूल्य खनिज का
सर्वेक्षण के लिये हवाई सर्वे तथा बोर खनन से रेत पत्थर आदि के नमूने एकत्रित किये
जा रहे है.
सामाजिक कार्यकर्ता संजीव चौहान के दावे पर कई सवाल उठाती हैं. मालती तिर्की कहती
हैं कि यदि ऐसा है तो फिर उद्योगपतियों ने जमीन अधिग्रहण के लिये किसानों को नोटिस
क्यों भिजवाया और वह हर हाल में उनकी जमीन लेने पर क्यों आमादा है ? यदि उनकी नीयत
में खोट नहीं है तो नोटिस आखिर क्यों, किसलिए ? गांवों में कंपनियों के एजेंट क्यों
चक्कर लगा रहे हैं और आदिवासियों को भड़का रहे हैं. उन्हें लालच क्यों दिया जा रहा
है ? वे कहती है कि जिंदल कंपनी की यह चाल है वह अंदर ही अंदर जमीन अधिग्रहण कर
जशपुर को दूसरा रायगढ़ बनाना चाहती है.
पड़ोसी जिले रायगढ़ में आज की तारीख में जिंदल की सत्ता चलती है. जल, जंगल और ज़मीन
पर कब्जा करने वाले सैकड़ों की संख्या में लगे हुये उद्योगों ने रायगढ़ को नरक बना
दिया है.
रायगढ़, जशपुर के आदिवासियों के विभिन्न मुददों पर पिछले कई वर्षों से कलम चलाने
वाले पत्रकार रमेश शर्मा कहते हैं ‘’ आदिवासियों का कसूर इतना ही है कि उन्होंने उस
जमीन पर बसने की गलती की, जिस जमीन के नीचे अमूल्य खनिज की अपार संपत्ति है! जबरन
केस में फंसवाना पुरानी और कारगार नीति है जिसमें यहां के औद्योगिक घरानों को महारत
हासिल है. इस नेक काम में सरकार का भरपूर सहयोग उन्हें मिलता है. रहा सवाल ग्राम
सभा के प्रस्ताव का, तो शासन उन्हीं प्रस्तावों पर ध्यान देती है जिन्हें औद्योगिक
घरानों ने प्रस्तुत किये हों.’’
खेती का विकास करे सरकार
एक ओर सरकार जहां पूरे छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास चाहती है, वहीं जशपुर के
आदिवासी और गैर आदिवासी उ़द्योगों की स्थापना को षड़यंत्र बता रहे हैं. वे उद्योगों
की जगह खेती का विकास चाहते हैं. उद्योगों की स्थापना और इससे होने वाले विकास के
मसले पर फरसाबहार के इलाके में संघर्ष कर रहे बिलासियस कुजूर कहते हैं कि सरकार आंख
मूंदकर कंपनियों को प्रश्रय दे रही है. प्रशासन के दम पर कंपनी के एजेंट गांव-गांव
पहुंच रहे हैं और ग्रामीणों को उनकी जमीन देने के लिए मान-मनौव्वल कर रहे हैं.
ग्रामीणों को कारखानों में नौकरी, नगद रुपया, शराब सहित अन्य कई तरह के लालच दिया
जा रहा है. पर वे लगातार पांच सालों से ग्रामीणों की मीटिंग लेकर उन्हें
उद्योगपतियों और सरकार के द्वारा बुने गये जाल में न फंसने की बात समझा रहे हैं.
बिलासियस कुजूर के साथी ए. कुजूर लगातार ग्रामीणों से संपर्क करते हैं और उन्हें
सरकार और उद्योगों की नीयत और नीतियों से आगाह करते हैं. वे कहते हैं "कारखाना
खुलने से हमारी खेती-बाड़ी उजड़ जायेगी और वहां काम करने वाले श्रमिक भी बाहरी
होंगे. हम खेती का विकास चाहते हैं उद्योगों की स्थापना नहीं. सरकार खेती का विकास
क्यों नहीं करती. हम चाहते हैं कि सरकार खेती का विकास करें, नहर बनवायें, सिंचाई
की व्यवस्था करें.”
बिलासियस इस बात से खुश हैं कि अब आदिवासी जाग चुके हैं. वे कहते हैं- “अब तो वे
स्वयं ही इतने सक्रिय है कि सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी पीछे छोड़ चुके
हैं. जशपुर में सरकार और उद्योग के खिलाफ बयार तेज हो चुकी है.’’
लेकिन बिलासियस शायद इस बात से अनजान हैं कि सत्ता और उद्योगों का गठबंधन जब
साजिशें रचने पर आमदा हो जाये तो ऐसी बयारों के लिये लंबे समय तक टिक पाना मुश्किल
हो जाता है. जिंदल के अधिकारियों के बयान और मुख्यमंत्री के भाषण को एक बार फिर से
पढ़ लेने से इस बात को समझना आसान हो जाता है.
*यह आलेख नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया की
मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन का हिस्सा है.
01.08.2011, 21.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | durwesh [vichar2000@gmail.com] bhopal - 2011-08-16 12:52:52 | | | |
जंगल राज्य का एक और उदाहरण..अगर आपके पास ताकत है तो जंगल आपका, नदी आपकी...सरकार आपके चरणों मे. पाचों उगलिया घी मे...और सिर..उस पर तो ताज है...अब एसे मे माओवादी को पनपने की जमीन मिल रही है तो क्या आश्चर्य है. | | | | | | | | ashutosh [ashutosh6jan@gmail.com] varanasi - 2011-08-12 12:48:51 | | | |
Very standard reporting.where is mr. punia.he should fight here against capitalism & corrupt system. Tribal problem is more important than -Aarakshan- issue. | | | | | | | | yasin ansari [Yaseen.ansari@mp.bhaskarnet.com] bilaspur - 2011-08-10 20:30:12 | | | |
सुनील जी, आपने जिस मुद्दे को उठाया है, उसक लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं। यह प्रदेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण् और ज्वलंत विषय है और लोगों के लिए चिंतनीय भी। एक समय जिस प्रदेश को कृषि के लिए जाना जाता था, इसमें अपार संभावनाएं थीं, आज वो खत्म हो रही है। बडे साजिश के तहत राजनीतिक दलाल प्रदेश की खेतिहर और वनभूमि को उद्योगों के हवाले कर रहे हैं। यहां तक कि आवासीय भूमि से भी यहां के मूल निवासियों को बेदखल कर रहे हैं। पर्यावरणीय सुनवाई में जो विरोध कर रहा है उनकी भूमि प्रशासनिक दादागीरी से अधिग्रहित कर ली जा रही है। ऐसे में आपका यह प्रयास घोर अंधेरे में उम्मीद की एक रोशनी की तरह है। उम्मीद है सफलता जरूर मिलेगी, और एक दिन लोग उठ खडे होंगे स्वार्थी और राजनीतिक दलालों के खिलाफ। आपके प्रयास के लिए पुन: धन्यवाद। | | | | | | | | prashant sharma [prashant781020@gmail.com] raipur,cg - 2011-08-08 10:12:33 | | | |
सुनील जी सबसे पहले आपको बधाई की आपने सरकार की एक बड़ी चाल उजाकर की है। निश्चित रूप से सरकार प्रदेश को सबसे विकसित राज्य बनाना चाहती है। लेकिन ये कैसा विकास जिसमें स्थानीय लोग अपनी जल, जंगल और जमीन से महरूम हो जाएं। विकास तो सभी चाहते हैं लेकिन इसकी कीमत क्या लोगों को विस्थापित होकर उठाना पड़ेगा। अब तो सरकार के खिलाफ एक बड़े और उग्र आंदोलन की जरूरत है। अगर आप जैसे पत्रकार सरकार की खामियों को उजाकर करते रहेंगे तो निश्चित रूप से धनकुबेर यहां की धरती को नहीं लुट सकेंगे। | | | | | | | | raghwendrta sahu [raghwendrasahu@gmail.com] durg/bilaspur/ korba - 2011-08-07 12:50:32 | | | |
सुनील जी बधाई हो.....आज वाकई में रमन सरकार उद्योगपतियों की सरकार बन कर रह गई है..........आम आदिवासी को उसके जल जंगल और जमीन से बेदखल करने की ये साजिश माफ़ करने योग्य नहीं है लेकिन यहाँ की मीडिया भी रमन के सामने सिर्फ विज्ञापन पाने की चाहत में आम छत्तीसगढ़िया के साथ केवल छल कर रही हैं..........उद्योगों के कारण खेती का रकबा दिनोदिन कम होता जा रहा है लेकिन अन्य प्रदेशों का चावल यहाँ खपाकर पुरुष्कार लेते हुए आम आदमी की आँखों में धूल झोंका जा रहा है.......विकास के नाम पर विनाश की और यहाँ के लोगों को धकेला जा रहा है और अपनी जेबें गर्म करने में ये राजनेता व्यस्त हैं........... | | | | | | | | YOGESH [SHAMA,YOGI@GMAIL] BILASPUR - 2011-08-06 19:55:41 | | | |
आपने तो बिलासपुर के सांसद दिलीप सिंह जूदेव के दावे की पोल खोल दी. देखना है कि आगे क्या खेल होता है. | | | | | | | | PAWAN SHARMA [pawansharma.rsgroup@gmail.com] RAIGARH - 2011-08-06 19:03:38 | | | |
छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले ही रायगढ़, कोरबा, जांजगीर-चांपा, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव को औद्योगिक क्षेत्र घोषित कर रखा है. मेरे विचार से ऐसी हालत में कम से कम जशपुर, बस्तर, सरगुजा, कोरिया और महासमुंद के आदिवासी बहुल इलाकों को औद्योगिक क्षेत्र से अलग रखना चाहिये. इससे छत्तीसगढ़ का पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा. | | | | | | | | Pravin Patel [tribalwelfare@gmail.com] Bilaspur, Chhattisgarh - 2011-08-06 12:49:07 | | | |
I congratulate Sri Sunil Sharma ji for his excellent research that exposes beyond any doubt, the bundle of lies that Raman Government of Chhattisgarh is trying to sell.
Entire Jashpur is a fifth schedule area where according to Panchayat Extension of Schedule Areas Act, 1996, resolve of the villagers taken at the Gram Sabha is supreme but what is seen is a classic case of unholy nexus of corrupt, spineless and greedy political leaders + Bureaucrats + Corporates having laid their eagle eyes on the soil of poor tribals of Jashpur District. | | | | | | | | Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - 2011-08-06 05:26:32 | | | |
गणेश अग्रवाल जी, आप इस बात को क्यों भूल रहे हैं कि जशपुर के जूदेव साहब की अब राजनीति में चलती नहीं है. वे रमन सिंह के खिलाफ चूं-चां भी नहीं कर सकते. मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे जूदेव जी को राजनीति ने किनारे लगा दिया है. रही बात उनके सुपुत्र युद्धवीर की, तो वे तो जशपुर छोड़ कर ही चले गये हैं. उन्होंने अपनी राजनीति के लिये सुरक्षित जगह तलाश ली. ऐसे में जशपुर का केवल भगवान ही मालिक है. | | | | | | | | sanjeev pandey [reporter.sanjeev@gmail.com] bilaspur - 2011-08-05 17:39:13 | | | |
सुनील जी, आप किस्मत वाले हैं जो आपको अपनी आंखों देखी लिखने की आज़ादी है. हमारे राज्य के हरेक ज़िले का हाल कुछ ऐसा ही है. रमन सरकार को एक पंचवर्षीय कार्यकाल और मिल जाये तो आपके-हमारे जैसे लोगों को भी पलायन करना पड़ेगा. आपको बधाई और रविवार.कॉम के साहस को सलाम. | | | | | | | | ganesh agrawal [agrawalganesh73@gmail.com] raigarh chhatishgarh - 2011-08-05 07:41:25 | | | |
जशपुर में उद्योगपतियों के लिए उद्योग लगाना उतना ही मुश्किल है,जितना कांग्रेस के लिए इलेक्शन जीतना. कम से कम जूदेव परिवार के रहते उद्योगों का खुलना मुश्किल ही है. विगत दो दशक से पड़ोसी जिले रायगढ़ में नए-नए उद्योगों की भरमार हो गई मगर जशपुर उद्योगों से अछुता ही रहा. जूदेव परिवार की मंशा के अनुरूप ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि जब नेशनल पार्टी कांग्रेस चाह कर भी यहाँ अपना इलेक्शन नहीं जीत पाती तो उद्योगपतियों की मंशा किस तरह से पूरी हो सकेगी? जशपुर जिले में कोई भी उद्योग स्वीकार नहीं होगा, ये बयां कई बार आ चुके हैं. साथ ही जूदेव परिवार ने रायगढ़ में औद्योगिक विकास को करीब से देखा है कि किस तरह से यहाँ खुलेआम लुट-खसोट जारी है. जिला प्रसासन उद्योगपतियों का दरबारी बना हुआ है नेताओं की आवाज खामोश है या कुचल दी जाती है. जशपुर को छत्तीसगढ़ का पर्यटन जिला बनाने की कोशिशें जोरों से जारी हैं. हाल ही में इसे ग्रीन बेल्ट दर्जा दिलवाने की कोशिश की गई थी, मुख्यमंत्री रमन सिंह जी ने बाकायदा ग्रीन बेल्ट की मांग को स्वीकार करते हुए इस दिशा में जल्द ही काम शुरु करने की बात कही है. चंद्रपुर के एमएलए और जूदेव परिवार के कुंवर युद्धवीर सिंह ने हॉल में प्रेस से कहा भी था कि जशपुर जिले में औद्योगिक विकास की गंगा नहीं बल्कि सुख चैन की हवा बहेगी. हम भूस्वामियों को उद्योगपतियों का नौकर नहीं बनाना चाहते. उद्योगपति अपनी नज़रें जशपुर की भू सम्पदा से हटा लें. ये सम्पति यहाँ के मूल निवासियों की है, इसे कोई नहीं छीन सकता. | | | | | | | | SUNIL CHIPDE [studio.and.sunil@gmail.com] bilaspur , cg , india. - 2011-08-04 14:04:07 | | | |
विकास के नाम पर राजनेताओं की कमाई का पिछला दरवाज़ा है ये तरीका. सरकार और बड़े उद्योग घराने एक हो जायें तो जनता की आवाज़ दब जाती है. काश चुनाव के समय हम भी सरकार बनाने का दावा करने वालो से कोई करार या एमओयू कर पाते. | | | | | | | | manoj singh [manojbaghel71@gmail.com] raipur - 2011-08-04 13:56:21 | | | |
बहुत ही सार्थक प्रयास है आपका. नये राज्य में आने वाले खतरों के प्रति आपने अच्छी
investigative स्टोरी लिखी है. मेरी बधाई स्वीकार करें. | | | | | | | | sangya tandon [sangya_tandon@yahoo.in] Bilaspur - 2011-08-03 15:56:34 | | | |
नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया की मीडिया फेलोशीप के तहत किये जा रहे अध्ययन के इस छोटे से हिस्से को पढकर ही समझ में आ रहा है कि जशपुर के आदिवासियों के साथ कितना गलत हो रहा है. छत्तीसगढ़ का आम आदमी इन सब बातों से बिल्कुल अनजान-सा है और फायदा लेने वाले लोग शायद कोई मौका नहीं छोड रहे हैं. हम आशा करते हैं कि आपकी इस रिपोर्ट का असर दूर दूर तक हो...उपर तक हो...और न्याय हो इन मासूम आदिवासियों के साथ. | | | | | | | | raksha [] katni - 2011-08-03 07:41:51 | | | |
congrats for raising this burning issue. keep it up. | | | | | | | | देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2011-08-02 21:02:04 | | | |
साधा हुआ आलेख .. सोचने वाली बात तो यह है कि अगर सारे जगह उद्योग लगा दिए जायेंगे और खेती ही नहीं होगी तो हम अनाज कहा से लायेंगे और क्या खायेंगे .. सरकार अपने आप को आदिवासियों का हितैषी बता रही है, वहीं उन्हें उनके जमीन से काटकर सरकार कैसा विश्वसनीय छत्तीसगढ़ हमें दिखाना चाहती है. हाँ थोड़े दिनों बाद छत्तीसगढ़ के नक़्शे से आदिवासी भूभाग गायब हो जाएँगे, ऐसा ही विश्वास विश्वसनीय छत्तीसगढ़ का है. इस इलाके के कुंअर बनकर सत्ता का सुख भोग रहे राजा जो कभी इस इलाके में मिशनरियों का विरोध करते नज़र आते थे, आज मशीनरी का विरोध करने सामने क्यों नहीं आ रहे हैं ...? | | | | | | | | yashwant dhote [yeshwantdhote@gmail.com] raipur - 2011-08-02 16:06:07 | | | |
very good report- Yashwant Dhote, reporter, Outlook | | | | | | | | nand kumar [nand.kashyap@yahoo.com] bilaspur - 2011-08-02 13:24:36 | | | |
जशपुर एक खुबसूरत जगह थी जहाँ आदिवासियों ने आधुनिक कृषि को अपनाकर और शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़कर पुरे देश में अपनी पहचान बनाई थी. जशपुर कहते के साथ ही शिक्षित, खेलों में आगे, स्वास्थ्य,प्रशासनिक सेवाओं,सेना अदि में कार्यरत मुस्कुराता हुआ भोला-भला आदिवासी चेहरा आँखों के सामने उभर आता है. उस पूरे जिले की नैसर्गिकता को नष्ट दो कारणों से किया जा रहा है- एक तो यह कि यहाँ के अदिवासितों ने आधुनिकता को अपनाया और फ़िलहाल हिन्दुत्ववादी ताकतों को यह असहनीय था. मौका मिलते उन्होंने पूरे जिले के विकास का बीड़ा उठा लिया. दूसरा अंग्रेजी शासनकाल से ही आदिवासियों से भू अधिकार छीन लिए गए थे. जो प्रतिरोध हुआ, उसे सांप्रदायिक रंग देकर ईसाई मिशनरियों की साजिश बता कुचल दिया जा रहा है. हरे-हरे नाशपातियाँ उगने की जगह अब धूल और धुआं उड़ेगा. | | | | | | | | ABDUL ASLAM [aslam.media4u@gmail.com] KORBA - 2011-08-02 09:51:59 | | | |
सुनील जी,छत्तीसगढ़ में काफी उद्योगों के लिए सरकार के पास जमीं खाली है. उस जमीन में रहने वाले की कोई फिक्र करने वाला नहीं है. अफ़सोस, औद्योगीकरण के नाम पर आदिवासियो के साथ केवल धोखा,धोखा,धोखा... उस के सिवाए कुछ भी नहीं हो रहा. ज्वलंत मुद्दे पर रिपोर्ट लिखने पर बधाई. | | | | | | | | sunil gupta [good.do37@gmail.com] chirmiri,korea(CG) - 2011-08-02 06:58:34 | | | |
बहुत गहन और बढ़िया सर्वेक्षण किया है आपने.दरअसल शासन के पास आज तक न तो कोई उचित विस्थापन नीति ही बन पाई है और न ही खनिजो के उचित दोहन का कोई कार्यक्रम, जिसमें प्रकृति और औद्योगिक विकास के बीच कोई संतुलन हो. सिर्फ औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन का ढ़िंढ़ोरा पिटा जा रहा है. ऐसे में एक चीज और नहीं समझ आती, जिन राजा-महाराजा को आज भी वहां की आदिवासी जनता सर पर बैठायी हुयी है, वे आदिवासियों के लिए क्या कर रहे? | | | | | | |
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