पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >साहित्य >कविता Print | Share This  

सुदीप ठाकुर की कविता

साहित्य

 

सुदीप ठाकुर की कविता

 

जगहें-1

जगहें


हम कभी लौटकर नहीं जा पाते
उन जगहों पर
जहां हम जाना चाहते हैं बार-बार
वे जगहें हमारी स्मृतियों में
हमारी चेतना में होती हैं
जस की तस

हम स्मृतियों के साथ
वहां जाना चाहते हैं
अपनी पूरी चेतना के साथ बार-बार

हम वहां जाकर भी वहां नहीं पहुंच पाते।

जगहें- 2

जिन जगहों पर हम
बार-बार जाना चाहते हैं
वे जगहें वैसी नहीं होतीं
जैसी हम उन्हें छोड़ आते हैं
उनका कुछ हिस्सा
हमारे साथ चला आता है

हम वहां बचे होते हैं
वहां से विदा होने के बाद भी।

जगहें-3

कुछ जगहों पर
हम कभी पहुंच नहीं पाते

अंतहीन होती है वहां की यात्रा
दुर्गम होते हैं रास्ते
वहां की यात्रा कभी खत्म नहीं होती।

03.08.2011, 01.09 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

NK Thakur [shiv.nkthakur@gmail.com] RAJNANDGAON C.G. - 2011-10-04 15:40:03

 
  बहुत अच्छा लगा .../ गम्भीर चिंतन है .. / बधाई ... /  
   
 

shashankmisrabharti [] shahjahanpuru.p. - 2011-10-02 16:24:42

 
  सुंदर लिखा है आपने. बधाई. ऐसा लिख कर देश को जगाते रहें. 
   
 

Ramesh sharma [rameshbaba.2010@gmail.com] Raigarh c.g. - 2011-09-29 13:47:32

 
  कविता अच्छी लगी. बहुत दिनों के बाद सुदीप जी को पढ़ने का अवसर मिला. 
   
 

samir [sameer.diwan@mp.bhaskarnet.com] Raipur - 2011-09-21 07:37:53

 
  बहुत सुंदर. बहुत दिनों बाद तुमसे मिलने जैसा है. 
   
 

शहरोज़ Shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] Ranchi - 2011-08-09 08:48:50

 
  दिनों बाद सुदीप जी को पढ़ा तो बस्तर की यात्रा याद हो आई. यही कहना है:

हम स्मृतियों के साथ
वहां जाना चाहते हैं
अपनी पूरी चेतना के साथ बार-बार

हम वहां जाकर भी वहां नहीं पहुंच पाते।
 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in