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आरक्षण पर मीरा कुमार के नाम एक पत्र

बात निकलेगी तो...

 

आरक्षण पर मीरा कुमार के नाम एक पत्र

अनिल चमड़िया


प्रति,
अध्यक्ष
लोकसभा, संसद भवन
नई दिल्ली

मीरा कुमार


विषय- लोकसभा टीवी में सामाजिक न्याय के तहत आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था के लागू नहीं होने के संबंध में.

मैं आपको स्मरण कराना चाहता हूं कि दिल्ली के हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में देश में दलितों की बुरी अवस्था को लेकर प्रकाशित मेरे एक लेख के बाद आपके दफ्तर से आपके निजी सचिव ने मुझे फोन किया था. उन्होंने बताया कि आप मुझ से मिलना चाहती है. आप उस समय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थी.

दलितों के सवालों से जुझते हिन्दी का एक लेख छपने के बाद भारत सरकार के मंत्री का फोन वैसे भी मुझे आश्चर्यचकित कर रहा था. लेकिन इससे मैंने आपकी संवेदनशीलता को समझने की कोशिश की. आपने उस लेख के अलावा दलितों की आम स्थिति को लेकर बातचीत की थी. उस समय के बाद अब तक मेरी आपसे दोबारा बातचीत नहीं हुई.

यह स्मरण कराने का उद्देश्य लोकसभा द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मेरे पास आए जवाब की तरफ आपका ध्यान ले जाना है. लोकसभा का अपना टीवी चैनल है और मैंने उसमें कार्यरत लोगों के बाबत कुछ सूचनाएं मांगी थी. सूचनाओं (नंबर 1(299)/IC/11) में कंसलटेंट के रूप में कार्यरत 107 लोगों की सूची भी शामिल है.

मैंने ये सूचना भी मांगी थी कि क्या लोकसभा टीवी में दलितों, आदिवासियों एवं पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को लागू किया गया है? और वास्तव में इसी सूचना ने मुझे भी आपको पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया.

लोकसभा से मिले जवाब के मुताबिक कंसलटेंट के रूप में काम लेने की स्थिति में आरक्षण लागू नहीं होता है. दूसरी तरफ स्थिति यह है कि सरकारी कर्मचारियों की सेवा के अलावा लोकसभा टीवी में कंसलटेंट ही रखे जाते हैं. एक तरह से लोकसभा टीवी को कंसलटेंट ही चलाते हैं. कम से कम संपादकीय विभाग के बारे में तो यह बात पूरी तरह से लागू होती है.

मैंने देखा कि राज्य सभा अपना टीवी चैनल शुरू करने जा रहा है. लेकिन जब राज्य सभा की ओर से विभिन्न पदों के लिए टेलीविजन क्षेत्र के लोगों को आवेदन करने के लिए कहा गया तो उसमें भी आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी. तब मुझे आश्चर्य हुआ था और मैंने संबंधित अधिकारी का इसकी तरफ ध्यान खींचा था. लेकिन मुझे तब आश्चर्य हुआ था कि आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं करने के बावजूद राज्यसभा के अधिकारी निश्चिंत थे.

अब मुझे यह लगता है कि राज्यसभा टीवी में आरक्षण नहीं लागू करने की ताकत के रूप में लोकसभा टीवी में जारी व्यवस्था सक्रिय रही है. कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है और कंसलटेंट एंगेज किए जाते हैं. यह समय शब्दों के खेल में भारतीय जनमानस के सचमुच उलझ जाने का रहा है.

सवाल यह है कि संविधान में आरक्षण की व्यवस्था है और संसद ने इसकी बहाली का फैसला भी किया है. लेकिन दूसरी तरफ संसद में लोकसभा टीवी भी है और वह कंसलटेंट के सहारे चल रहा है और वहां आरक्षण भी लागू नहीं है क्योंकि कंसलटेंसी तो नौकरी होती नहीं है. मैं ये समझने और जानने की कोशिश कर रहा था कि लोकसभा द्वारा 107 कंसलटेंट में क्या दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के सदस्यों की कुछ संख्या शामिल है. संविधान में उन्हें नौकरी में अवसर देने की व्यवस्था की है. कंसलटेंसी के लायक उन्हें माना जा रहा है? लेकिन मेरी जानकारी में शायद दलित और आदिवासी नहीं हैं. कंसलटेंसी की व्यवस्था के लायक वे नहीं हुए हैं.

इस बारे में कुछ और बातें आपके सामने रखूं, उससे पहले मैं आपका ध्यान उस दिन की तरफ ले जाना चाहता हूं, जिस दिन आपका लोकसभा अध्यक्ष बनना तय हुआ था. उस दिन के समाचार पत्रों की तरफ भी आपका ध्यान गया होगा.

एक बड़े मीडिया ग्रुप के एक अंग्रेजी दैनिक ने 2 जून 2009 को लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चयन किए जाने के बाद अपने संपादकीय में लिखा- Lok Sabha needs an effective speaker. इस शीर्षक के बाद उसमें लिखा है कि- The office of the Speaker of the Lok Sabha is not a decorative one . The Speaker decides the agenda of the house and conducts its business, including disciplining unruly members. It requires considerable executive ability, an adroit tongue and a cool head. In recent years it also required considerable lung power and stamina. Those who have seen Ms Kumar at work are bound to ask whether she has it in her power to deliver what her party expects of her. संपादकीय का यह अंतिम पैरा लिखने से पहले एक पंक्ति ये भी है- But it ( the Congress party) has one major weakness- it is a destroyer of institutions. यह कोई एकलौता समाचार पत्र नहीं था, जिसने इस स्वर में अपने पूर्वाग्रहों को सार्वजनिक किया था बल्कि ज्यादातर पत्रों का इसी तरह का रूख और स्वर था.

मैंने इसका उल्लेख यह बताने के लिए किया है कि जिस समाज व्यवस्था में इस तरह के पूर्वाग्रह सक्रिय हों, वहां मानवीय और सामाजिक न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती है? हमसे आप ज्यादा जानती हैं कि देश में इस तरह के पूर्वाग्रहों का इतिहास कितना लंबा है. ऐसी स्थिति में यदि कोई यह कल्पना करे कि बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था के इस देश में सामाजिक वर्गों को न्याय मिल सकता है तो यह बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है. यहीं मैं आपका ध्यान लोकसभा टी वी में कंसलटेंट की व्यवस्था और उसकी पूरी प्रक्रिया की तरफ ले जाना चाहता हूं. आखिर इस तरह की व्यवस्था में क्यों नहीं, अपवाद की स्थिति को छोड़कर, दलित और आदिवासी सहजता से आ पाते हैं?

मैंने अपने दो मित्रों के साथ मिलकर 2006 में राष्ट्रीय मीडिया की सामाजिक पृष्ठभूमि का एक सर्वेक्षण किया था. सैतीस संस्थान इस सर्वेक्षण में शामिल थे. इसमें यह भी जानने की योजना थी कि मीडिया के संपादकीय विभागो में उपर से नीचे दस तक के पदों पर बैठने वालों की सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है. सामाजिक पृष्ठभूमि में जाति, धर्म और लिंग शामिल था.

हमें यह जानकारी मिली कि इन पदों पर एक भी दलित और आदिवासी नहीं हैं. सवाल है कि इन वर्गों के लिए निजी संस्थानों और सरकार की कंसलटेंसी वाली व्यवस्था में क्या फर्क है ? आखिर निजी संस्थानों में दलित आदिवासी चुनकर क्यों नहीं आते हैं ? मैं आपको, आपके लोकसभा अध्यक्ष के चयन के समय लिखे गए संपादकीय के उपरोक्त अंशों की तरफ एक बार फिर ले जाना चाहता हूं. वहां अध्यक्ष के बारे में एक निश्चित राय यह बनी हुई है कि उसे कितने भारी आवाज और मोटे गले का मनुष्य चाहिए. सदस्यों को नियंत्रित करने के लिए कितना बलशाली होना चाहिए.

योग्यता एक पैकेजिंग है और उस पैकेजिंग में दलित, आदिवासी का छंटना स्वभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है.

मैं यह उम्मीद करता था कि कम से कम सरकारी संस्थानों में खासतौर से सार्वजनिक क्षेत्र के मीडिया में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण के संवैधानिक व्यवस्था का लाभ मिलेगा. लेकिन मैंने सार्वजनिक क्षेत्र के जिस मीडिया संस्थान से सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी हासिल की, मुझे हैरानी हुई है. सार्वजनिक क्षेत्रों में भी ‘योग्यता’ का नया रास्ता निकाल लिया गया है. लोकसभा टीवी भी उसी रास्ते पर है.

अनिल चमड़िया

06.08.2011, 10.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दुर्वेश [vichar2000@gmail.com] भोपाल - 2011-09-09 11:38:53

 
  धन्यवाद चित्रांश जी, आपने बहस को जारी रखा. अगर आरक्षण आपकी बदली सोचा का नतीजा है तो क्या अब इस पर आपको अफसोस हो रहा है. सच तो यह है की कुछ लोगों ने समझा की जब तक बहुसंख्यंक दबे कुचले समाज को आगे बढने का मोका नहीं दिया जायेगा तब तक सही मायनों में इस देश की तरक्की नही हो सकती और आरक्षण उसका नतीजा था.
यह सच है की आज आरक्षणका फायदा वो ही उठा पा रहे है जिनके पास पढाने लिखाने के लिये साधन है. हम कहां कह रहे है की हम आप की तरह मेधावी है. शायद इसलिये अभी भी हमारे MLA या MP के बच्चे जो किसी इंग्लिश स्कूल में पढ़े हैं किसी तरह आरक्षंण के द्वारा नोकरी पा रहे है. जिन्हे देखकर उस जाति के बाकी लोगों की भी हिम्म्त बन रही है. यह कमजोरी शायद इसलिये है की आज भी हम अपने को मन से कमजोर मान रहे है. अब क्या करे जेसे ही हमारी जाति का पता हमारे साथी दोस्तों को चलता है उनकी नजर हमे अदंर तक आहत कर देती है. प्रोफेसर का बस चले तो हमे क्लास से बाहर निकाल फेंक दे. हमने बोला ना कुछ तो समय दिजिये हमे अपनी मानसिक गुलामी से बाहर निकलने के लिये. या फिर जाति बताना या पूछना कानूनी जुर्म बना दि जिये...एसा कुछ कर दीजिये की किसी की जाति का ही पता ना चले...
रही बात हर हाथ को रोजगार देने की. तो इसके लिये इस देश में वो लोग जिम्मेदार है जिन्होने इस देश का लाखों करोडो लूटा और देश की विकास योजनाओं की वाट लगा दी. सोचो अगर यह पैसा देश की तरक्की में लगता तो हर हाथ को रोजगार मिलता. इसलिये अगर होनहार को रोजगार नहीं मिल रहा तो इसके लिये आरक्षण को दोष नहीं दीजिये ..इसके सही दोषीयों को पहचानीये. अन्ना ने जो पहल की है उसे आगे बढाईये. कुछ ऐसा कीजिये की इस देश में रोजगार के अवसर बढे. तब शायद आरक्षण भी अपने आप अप्रसांगिक हो जायेगा.
वेसे देखा जाये तो राजनीति के बेठे कुछ लोग चाहते है की हम और आप इसी बहस में उलझे रहे और मोका मिलते ही एक दूसरे का सिर फोड दे... और वो रस मलाई खाते रहे. सोचिये चित्रांश जी चपरासी की नोकरी के लिये भी अगर पीएचडी धारक लाइन में लगा है तो लानत है एसी व्यवस्था पर जिस में लोग इस बात पर लडे की किस पीएचडी धारक को यह नोकरी मिले.... वो जो आरक्षण वाला है या वो जो आरक्षण वाला नहीं है. वही दूसरी तरफ कांग्रेस क्या और भाजापा क्या दोनों रेड्डी बंधुओं के दरबार मे सजदा करते नजर आते थे. भला हो की कीसी ने तो इस सच्चाई को उजागर किया. पता नहीं इस देश में एसे कितने रेड्डी है...अभी तक हम सब समझते थे की यह देश गरीब है उसके पास साधन नहीं है.. क्या इतना सब होने के बाद भी हम यही माने...चित्रांश जी अगर चोट करनी है तो सही जगह कीजिये.
 
   
 

Jatin [] Bangalore - 2011-08-24 20:52:29

 
  Dear Prabhat,
I am trying to make only point here, if any one who got the reservation at initial stage, no matter what is his/her financial condition now or his/her family really needs this reservation now/not but get benefitted because they know the policy pros/cons. But one who really needs, can/cant be get benefit. It is like some one became MP/MLA then their son/daughter is eligible for same profession by default without considering their weakness or strength.
When reservation introduced in our system, we need that because our leaders and generation had feeling for uplifting the society. But now its introducing harness and biasness among the generation as young generation is feeling that somebody is not qualified but still eligible for taking that place. It is widening emotional attachment.
60 years we have completed after independence, still we have feeling like that our policy didn’t uplift the society then definitely we need to look our policy.
 
   
 

चित्रांश [chitranshmishra24@gmail.com] meerut - 2011-08-23 14:19:24

 
  @दुर्वेश जी,वो तो पुराने बातें आप उठाते रहे तो ये बात तो और भी उलझती चली जायेगी लेकिन आप फिलहाल की सोचिये और आप जो ये कह रहे हैं कि हमारी सोच नहीं बदली तो मैं आप को बता दूं कि ये जो आरक्षण की नीति है, ये हमारी ही बदली सोच का नतीजा है ना कि आपकी. लेकिन मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि जो भी हुआ, उसका खामियाजा हमारी युवा पीढ़ी क्यों सहे...
आप जानते है गरीबी क्या होती है...आज सिर्फ एक आरक्षण की वजह से एक बड़े आरक्षित जाति के MLA या MP के बच्चे भी इसका फायदा उठा रहे हैं. मैं आपको ऐसे पचासों उदाहरण बता सकता हूँ और जबकि वो भी किसी इंग्लिश स्कूल में ही पढ़े हैं और अलग से tution भी ली है...उनके पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें आरक्षण का फायदा क्यों....जबकि ऐसा नहीं है कि हर जगह सामान्य जाति पूर्ण रूप से सक्षम है पैसे में और अन्य चीजो में. एक सामान्य जाति भी किसी-किसी स्थान पर बड़ी कठिनाईयों से जीवन यापन कर रही है लेकिन उसे कोई फायदा नहीं मिल रहा...और ये सब जानते है कि अब आप लोग पिछड़े नहीं रहे....हाँ ये मैं मानता हूँ कि अलग अलग स्थान पर अलग अलग जातीयां पिछड़ी है.उसमें कई जगह सामान्य भी हैं ...जो पहले हुआ उसे आप लोग आज उसकी दुहाई देकर हमारे युवाओ के हक के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.
 
   
 

Prabhat Sinha [prabhat_sinha@yahoo.com] Noida - 2011-08-22 12:46:12

 
  Dear Sir,
The point you have raised is of high importance - how the prejudiced & bised society treat dalit and adivasi with contempt. Is it surprising to see the editorial in a newspaper equaling the move to appoint SC person as speaker of Loksabha to destroying the institution? The constitutional provision of reservation is the ONLY way to address the attitude of the biased society. The premise behind reservation as a mechanism of uplifting people is basically wrong one….It is not the disability of the dalits/oppressed but the disability of “Indian society” that necessitates reservation.

The correct premise behind the Constitutional reservation – that it is a countervailing measure by the state against the socio-cultural disability of Indian society to treat people from the untouchable/oppressed castes as its own. It is a mechanism to ensure that the “deserving people” from these oppressed castes get their due share because otherwise the deep entrenched socio-cultural prejudice will never let them have it as can be seen in the sectors where this mechanism does not exist. It is a mechanism with which the rights of certain sections of society are PROTECTED, because left to itself society is incapable of doing it.”

@Jatin - How come you say that one became engineer because of reservation (otherwise he was not eligible or fit)? He may have got admission in engineering college against the reserve/ quota seat but he had to pass out all his semester exams of the engineering college without any relaxation in passing criteria of those semester exams. Can you tell me whether we have any reservation or relaxation in 10th exam or 12th exam or gaduation exam or any exam for any one? Or any one demanding for it? He could become engineer because he had the ability and the reservation system provided the opportunity and moral encouragement. Reservation or no reservation only capable person would become doctor/ engineer as he/ she has to study and pass college exams without any relaxation.
 
   
 

Jatin [] Bangalore - 2011-08-20 17:11:25

 
  Dear Sir,
Please consider one point here. One person became engineer and got a job in some govt department because of reservation. His son also got admission in govt college and later became engineer because of reservation although he was below the average, I saw a farmer’s son, he also belongs to same caste and same reservation category but he didn’t try to get admission in engineer or any college and left his study because his poor financial condition although farmer’s son was brilliant. Both studied with me.
So I am not saying, reservation is not needed for our society; reservation is needed to our society but in different context. Whatever reservation we have , it is OK at time of 1950-60 but not now. Our politician and few so called leaders are extending the reservation without knowing the credibility of reservation.
 
   
 

durwesh [vichar2000@gmail.com] bhopal - 2011-08-19 04:23:41

 
  @चित्रांश जी,
जाति के नाम पर आपने हम 85% को तिरिस्कार की नजरों से देखा आज भी आप हमें अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहते, आज भी आप की भाषा में हमारे लिये तिरस्कार दिखाई देता है. हमें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं खोते. आपके पास ताकत थी रूतबा था तो आपने पीढी दर पीढी डंडे के बल पर हमसे बेगार कराई. हमें सड़ा-गला खाने पर मजबूर किया. ज्ञान से दूर रखा. हमारी परछाई भी अगर आप पर पड़ जाती तो आप को गंगा स्नान करना पडता था. हम भेड़ बकरियों से भी गये बीते थे. आज आप बराबरी के ज्ञान की दुहाई दे रहे है, पर आप ही ने तो हमें अब तक ज्ञान से दूर रखा था. अगर हमारे कानों में ज्ञान का एक शब्द भी पड़ जाता तो कान में पिघला सीसा डाल देने का प्रावधान भी आप ने बना रखा था.
भला हो लोकतंत्र की, उसने हमें इंसान समझा और आप जैसे लोगों को समझाया कि हम भी आपकी तरह ही जीते जागते इंसान हैं, कोई खतरनाक वाइयरस बेक्टीरिया नहीं कि हमें छूते ही आप का धर्म नष्ट हो जायेगा. उसने हमें वोट देने का अधिकार दिया और नेताओं को हमारी ताकत का पता चला और उन्होंने हमारी खैरियत चिंता होने लगी...भले ही वो दिखावटी हो!
हमारी हजारों वर्षों की लाचारी और गरीबी से हमें उबरने में कुछ तो समय लगेगा ना! हमारे पास आज भी आपके जितना ज्ञान भले ही ना हो, पर इतना ज्ञान तो है ही, कि जिस नौकरी के लिये आवेदन किया है वो हम कर सकें. पहले आपने हमें जाति के नाम पर प्रगति से वंचित रखा था..आज आप ज्ञान की दुहाई देकर हमें वंचित करना चाहते है. आज आप पढाई में लाखों खर्च करते हैं, अच्छे से अच्छे अंग्रेजी स्कूलों और कालेजों में पढते हैं, सबसे बेहतरीन शिक्षकों द्वारा हर विषय पर अलग से ट्यूशन लेते हैं. अब हम गरीब इतना पैसा कहां से लायें और आप की बराबरी करें. फिर भी हम बस इतना कहना चाहते हैं कि बस कुछ समय और दीजिये. उसके बाद आप से ज्ञान में भी बराबरी कर लेगे.
आप गरीबी की दुहाई देते हैं, बोलते हैं कि आरक्षण गरीबों को मिलना चाहिये...अब आप बोलो, हमसे गरीब भी कोई है. वैसे आप के लिये गरीब की परिभाषा क्या है? इस देश में गरीब किसे कहेगे? सरकार सिर्फ बीपीएल धारी को गरीब मानती है. बीपीएल के पास तो खाने तक के लाले हैं, वो क्या पढेगा और आप के हिसाब से क्या ज्ञान हासिल कर पायेगा.
कोटे को सामान्य से भरने पर इसलिये रोक लगाई गई क्योंकी वहां पर भी आपने चाल चलनी शुरू कर दी थी. हमारे उम्मीदवार रहते हुये भी आपने यह दिखाकर कि कोई कोटे का उम्मीदवार नहीं है, उसे सामान्य से भरना शुरू कर दिया. वैसे आरक्षण सिर्फ सरकारी संस्थाओं में ही तो है, बाकी सारा कारोबार तो आपका है, निजी संस्थान, स्कूल कालेज आपके, व्यवसाय आपका, अब कुछ तो हमारे लिये भी छोड़िये. या आप अब भी चाह्ते है कि 85% आबादी आप के रहमो-करम पर जिये...?
 
   
 

chitransh [chitranshmishra24@gmail.com] meerut - 2011-08-08 12:08:53

 
  मैं आप से एक बात पूछना चाहता हूँ कि आरक्षण किस बात पर मिलना चाहिए जातिवाद पर या फिर गरीबों को .....? हमारे देश में आरक्षण जातिवाद पर मिलता है जो कि अनुचित है...आपको मैं एक पहलू से रूबरू करना चाहता हूँ कि यदि कोई नियुक्ति होनी हो और (एक SC या ST के लिए) अथवा कोई भी सीट आरक्षित हो और उसके लिए कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिले तब भी वो नियुक्ति रिक्त रहती है क्यों ...? वो नियुक्ति किसी सामान्य द्वारा क्यों नहीं भरी जानी चाहिए ...? अधिक ज्ञान वाला छात्र किसी मेरिट में जगह नहीं पता है जबकि एक कम योग्यता वाला चयनित हो जाता है क्यों ...? क्योंकि उसके पास आरक्षण है....मैं आरक्षण के खिलाफ नहीं हूँ पर इसका अब गलत फायदा उठाया जाने लगा है..
आज के हमारे युवा कुंठा का शिकार हो रहे हैं...केवल इस आरक्षण की वजह से....क्या इस आरक्षण को जाति से हटा कर गरीब लोगों को नहीं देना चाहिए...? देश के विकास का सबसे बड़ा रोड़ा है आरक्षण (वो भी जातिवाद पर) बस ये केवल एक प्रकार के व्यक्तियों के लिए फायदेमंद है और वो हैं हमारे नेता, जो केवल आरक्षण और जातिवाद के नाम पर लोगों के बीच की खायी को और भी गहरा कर रहे हैं) और एक बात किसी भी नियुक्ति के लिए ज्ञान जरूरी है...आरक्षण नहीं ..if the student is eligible than give him job first, not wail for a reservation student.
 
   
 

PRINCE MAURYA [princemaurya1@yahoo.com] BHADOI..lucknow - 2011-08-08 06:38:50

 
  अनिल जी आपने जो मुद्दा उठाया है यह मुद्दा आज की लोकतंत्रीय व्यवस्था में मीडिया की दोहरी भूमिका को दर्शाता है. जिन के पास पैसे हैं, वो तो स्वयं का मीडिया रखते हैं. और सार्वजानिक उपक्रमों पर भी पीढ़ियो से कब्ज़ा है. आखिरकार यह पिछड़ा दलित समाज जाये तो जाये कहां? 
   
 

Sandeep [sana_sho21@webdunia.com] NA - 2011-08-06 11:29:15

 
  प्रिय अनिल,
बहुत सही मुद्‌दा उठाया है। सरकारी संस्थानों को कमोबेश ऐसे ही चलाया जा रहा है। यह लोकसभा या राज्य सभा टीवी का ही आलम नहीं है। तमाम सरकारी परियोजनाओं के लिए जो भी निगम या अल्पकालिक प्राधिकरण बनाये जाते हैं उनमें भी कंसल्टैंट या सलाहकारों के पदों पर नजर घुमाएंगे तो मालूम पड़ेगा कि स्थिति वाकई गंभीर है। भारत में सामाजिक पृष्ठभूमि का सवाल बेहद पेचीदा है। कमजोर और गरीब वर्गो के लोग सदियों से सामाजिक विकास की दौड़ में पीछे रहे हैं। अब भी हालात कुछ भी बेहतर नहीं हैं। चंद लोगों को जरूर महसूस होता है कि हमारे मुल्क में समाज की तस्वीर बहुत कुछ बदल गई है। लेकिन ऐसे लोगों को उन इलाकों में जाने की जरूरत नहीं जहां असंखय लोग अब भी सामाजिक रूप से भेदभाव का शिकार होने को मजबूर हैं। उच्च स्तर से बहुत निम्न स्तर तक सब की सब जगहों पर गरीब आदिवासियों और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए कोई जगह बचना मुश्किल है।
अच्छी, उम्दा बात कहने के लिए शुक्रिया.
 
   
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