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चार चौधरीः एक अंतर्कथा
बात पते की
चार चौधरीः एक अंतर्कथा
कनक तिवारी
बीमारी तथा ऑपरेशन की वजह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक माह से अधिक की
अनुपस्थिति के कारण एक अंतरिम व्यवस्था का लोकतंत्रीय अर्थ दिलचस्प व्याख्याएं ढूंढ़
लाता है. किसी राजनीतिक पार्टी का संविधान अमूमन ऐसी तमाम स्थितियों का पूर्वानुमान
कर लेता है, जिसके कारण आकस्मिक स्थितियों में भी पार्टी का कार्य सुचारू रूप से
चलता रहे. कांग्रेस का संविधान भी ऐसी व्यवस्था से परे नहीं है. मोटे तौर पर
कांग्रेस अध्यक्ष के बाद पार्टी के कोषाध्यक्ष की बड़ी अहमियत होती है. भले ही वह
पार्टी का दूसरे नंबर का नेता नहीं है. मोतीलाल वोरा के समर्थक उनके कोषाध्यक्ष पद
को लेकर सोनिया गांधी के साथ उनके विश्वासपात्र होने की कहानी चटखारे लेकर सुनाते
हैं. वैसे यह बात अलग है कि वोरा अब खुद ऊंचा सुनने लगे हैं.
पार्टी में आठ-दस महासचिव भी हैं, जिनमें से कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं.
कोई एक वर्ष से दिग्विजय सिंह मृग शावकों की तरह सत्ता के बियाबान की राजनीति में
कुलांचे भर रहे हैं. वे एक साथ योग गुरु बाबा रामदेव, खुर्राट वकील शांतिभूषण,
गांधीवादी बुजुर्ग अन्ना हज़ारे और पूरे संघ परिवार को अभिमन्यु शैली में कांग्रेस
रथ का पहिया उठाए, उत्तरप्रदेश को प्रश्न प्रदेश बनाते चले जा रहे बहुत से महासचिव
कार्यालयीन प्रभारियों की तरह केवल दफ्तरनवीसी कर रहे हैं. कांग्रेस में मैदानी
महारथियों का अभाव हो गया है.
डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के दिनों से कांग्रेस पार्टी पर भूतपूर्व
सामंतों, भूतपूर्व नौकरशाहों, चुनाव में पराजित राज्यसभा के विजयी सदस्यों,
उद्योगपतियों, फिल्म अभिनेताओं, खिलाड़ियों और दूसरी पार्टियों से कांग्रेस में आए
दल बदलुओं का वर्चस्व बढ़ गया है. आर. डी. प्रधान, माखनलाल फोतेदार, राजकुमार धवन,
विन्सेंट जॉर्ज, मणिशंकर अय्यर, जयराम रमेश वगैरह का भी समय-समय पर बोलबाला रहा है.
सोनिया गांधी ने अपनी गैर मौजूदगी में पार्टी के फैसलों के लिए पुत्र राहुल गांधी,
रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी, राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और महासचिव जनार्दन
द्विवेदी की चौकड़ी को सभी विशेषाधिकार सौंप दिए. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि
उन्होंने उत्तराधिकार का अस्थायी प्रभार राहुल गांधी को सौंप दिया है. उनकी मदद के
लिए तीन सिपहसालार नियुक्त कर दिए गए हैं. शायद भारत की अन्य किसी पंजीबद्ध
राजनीतिक पार्टी में कांग्रेस अध्यक्ष की तरह इतने अधिक अधिकार नहीं होंगे.
ऐसे ही अधिकारों का उपयोग करते हुए हेमवतीनंदन बहुगुणा को एक बार कांग्रेस का मुख्य
महासचिव अर्थात सेक्रेटरी जनरल बनाया गया था. उनके मातहत बाकी महासचिव अर्थात जनरल
सेक्रेटरी काम करते थे. नाराज़ बहुगुणा को कांग्रेस की मुख्यधारा में लाने के लिए यह
जुगत बिठाई गई थी. राजीव गांधी ने भी पंजाब के राज्यपाल पद से लौटने वाले अर्जुन
सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया था, जबकि कांग्रेस के संविधान
में उपाध्यक्ष पद होता ही नहीं है. यह अलग बात है कि भाजपा सहित तमाम राजनीतिक
पार्टियों में नेताओं को खपाने के लिए उपाध्यक्षी के ढेर से पद भरे हुए हैं.
बहुगुणा और अर्जुन सिंह मजबूत मैदानी राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने पार्टी को तरह-तरह के
योगदान भी किए थे. लेकिन कांग्रेस की परंपरा में कुछ नेताओं की एक टुकड़ी को
कांग्रेस अध्यक्ष की अनुपस्थिति में पार्टी की ओर से नीतिगत फैसले भी कर लेने का
शायद यह पहला उदाहरण होगा.
दूरसंचार की तकनीकी के युग में क्षण प्रतिक्षण कांग्रेस अध्यक्ष से संबंधित
पदाधिकारी निर्देश लेते रहने को स्वतंत्र ही होते. राहुल गांधी, ए. के. एंटनी, अहमद
पटेल और द्विवेदी का चयन बड़े नेताओं के लिए तो एक इशारा है ही. वह पार्टी के अंदर
अपने-अपने मुखिया ढूंढ़ रहे कार्यकर्ताओं के लिए नया संदेश लेकर आया है. इसे कई तरह
से समझा जा सकता है.
राहुल गांधी वंशानुगत क्रम में पारसी फीरोज़ गांधी और हिन्दू इंदिरा गांधी के पोते
हैं. पिता हिन्दुस्तानी और मां इतालवी हैं. यदि राजीव गांधी को पारसी मतावलंबी भी
समझा जाए तो सोनिया रोमन कैथलिक ईसाई हैं. ए. के. एंटनी भी ईसाई हैं और इस नाते भी
उनकी कई अन्य नेताओं के मुकाबले नजदीकियों पर चर्चाएं होती रही हैं. अहमद पटेल
खांटी मुसलमान हैं. यह अलग बात है कि अपनी धर्मनिरपेक्ष छबि के चलते अहमद भाई
मुसलमानों के राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं उभरे. उनकी हिन्दुओं से भी नज़दीकियां
सर्वज्ञात हैं. जनार्दन द्विवेदी उत्तर भारत के पूर्वी इलाके के ब्राम्हण हैं. अखिल
भारतीय कांग्रेस कमेटी में वे बीसियों वर्षों से अदना हैसियत से शुरू करके सेवारत
हैं. वे न तो मैदानी नेता रहे हैं और न ही उनकी सांगठनिक क्षमता राष्ट्रीय जानकारी
में रही है. उनके दफ्तरी अनुभव और गांधी परिवार के प्रति वफादारी कभी भी शक का विषय
नहीं बनी.
राहुल गांधी दिल्ली तथा उत्तरप्रदेश के इलाके के कद्दावर नेता के रूप में उभारे जा
रहे हैं. पिछले दिनों बुंदेलखंड और भट्टा पारसौल आदि की घटनाओं के कारण उनकी
सक्रियता से उनका भविष्य आंका जा रहा है. इस काम में महासचिव दिग्विजय सिंह और
उत्तरप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा उनके लिए ताबड़तोड़ प्रयास करने का श्रेय
लिए हुए हैं.
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अहमद पटेल गोपनीयता के मूर्तिमान अवतार हैं. उनकी आंतों से गोपनीय बातें बाहर नहीं
आ पातीं. जबकि सोनिया गांधी के हर महत्वपूर्ण निर्णय की सलाह और जानकारी को लेकर
अहमद पटेल का नाम अखबारी सुर्खियों में होता है. उन्हें एक तरह से पश्चिम भारत का
नुमाइंदा समझा जा सकता है. उन्हें खासतौर पर महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों की
बारीक जानकारियों से लैस बताया जाता है.
जनार्दन द्विवेदी बीमारू राज्यों अर्थात बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश,
उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ वगैरह से ज़्यादा परिचित समझे जाते होंगे. वे इस बात
का सदैव ध्यान रखते हैं कि उन्हें अदब और अनुशासन सहित दफ्तर की फाइलों में दर्ज
हुक्मनामों की लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं करना है. वफादारी का प्रमाणपत्र भले ही
योग्यता के सूचकांक पर औंधे मुंह लुढ़कता रहे.
ए. के. एंटनी ईमानदार, पारदर्शी, अल्पभाषी और संकोची राजनेता होने के बावजूद
अनुभवों के लिहाज़ से इनमें सबसे वरिष्ठ हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के सामने उठे कई
सवालों को लेकर एंटनी पहले भी ‘खामोश अदालत जारी है‘ की शक्ल में शीर्ष नेतृत्व के
काम आते रहे हैं. देश का रक्षा मंत्री होने के नाते भी सोनिया गांधी को उनकी
आकस्मिक उपयोगिता का अंदाज़ रहा होगा.
पार्टी के संविधान से अलग हटकर ऐसी नियुक्तियों का एक दीर्घकालीन संदेश पढ़ने की
कांग्रेसियों की राष्ट्रीय आदत से भी लोग परिचित होंगे. इन चारों नेताओं के दफ्तरों
और बंगलों पर भारी भीड़ जुटने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता.
मौज़ूदा संसद का सत्र मनमोहन सरकार के स्वर्णिम घोटालों पर विपक्ष के हमलों का
मानसून लेकर आया है. जन लोकपाल बिल को लेकर कांग्रेस के वकील मंत्रियों का जमावड़ा
पार्टी और सरकार तो क्या, पूरे देश को अपना ऐसा मुअक्किल समझता है, जिसके पास भारत
के सबसे बड़े सरकारी वकील मनमोहन सिंह के कारण फीस देने के लिए जेब में पैसा ही नहीं
है. वह इसलिए नहीं है क्योंकि सरकार ने ही जनता की जेब काट ली है. ऐसे में मनमोहन
सिंह सहित प्रणव मुखर्जी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल, एस. एम. कृष्णा,
शरद पवार जैसे धाकड़ मंत्रियों से कूटनीतिक भाषा में संवाद करना नई चौकड़ी के लिए
कितना संभव होगा?
सोनिया गांधी में एक असाधारण विशेषता है. उन पर चाहे जितने हमले हों, वे तत्काल
प्रतिकार नहीं करतीं. उन पर अकारण भी बहुत गंभीर आरोप लगे हैं लेकिन उन्होंने
चरित्र हत्या तक के आरोपों का शालीनता से उत्तर दिया है अथवा मौन रहना बेहतर माना.
कांग्रेस इन दिनों कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, राजीव शुक्ला, संजय निरुपम, मनीष
तिवारी, अभिषेक मनु सिंघवी, सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे चेहरों को दूरदर्शन का स्थायी
अतिथि बनाकर अपनी मिट्टी पलीद करने को ठोस ज़मीन पाना मानती है. राहुल गांधी में
सोनिया गांधी का यही गुण है. उनकी भाषा असभ्य, अभद्र, असंयत और अनावश्यक नहीं होती.
वे एक शरीफ आदमी की तरह चेहरे पर मुस्कराहट तिरती मुद्रा लिए फिरते हैं.
नेताओं के चेहरे, चाल और चरित्र को जनता बूझना चाहती है. कांग्रेस का संविधान और
घोषणा पत्र भारतीय संविधान के मूलभूत अधिकार और नीति निदेशक तत्वों की अनुकृति में
उसी तरह बनाया गया है, जैसे राष्ट्रीय ध्वज की अनुकृति में कांग्रेस का तिरंगा
झंडा. खुशामदखोर उस पर समय-समय पर इंदिरा गांधी, राजीव, सोनिया और राहुल के चित्र
चस्पा करने में नहीं सकुचाते. राहुल युवक कांग्रेस और राष्ट्रीय छात्र संगठन का
पूरा चेहरा नहीं बदल पाए हैं. कहा होगा राजीव गांधी ने कि 'सत्ता के दलालों को दूर
किया जाए', लेकिन देश जानता है कि कांग्रेस में उनकी संख्या और शक्ति का कितना
इजाफा हो गया है. भाजपा शासित राज्यों के भ्रष्टाचार की बू से तो लोग बहुत ज़्यादा
परेशान हैं ही. कांग्रेस के नेता भी क्या दूध के धुले हुए हैं?
जवाहरलाल ने पार्टी में लोकतंत्र, इंदिरा गांधी ने संविधान में समाजवाद और
धर्मनिरपेक्षता, राजीव गांधी ने लोक जीवन में वैज्ञानिक वृत्ति का योगदान तो किया
ही है. इन तीनों पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के
दफ्तर में भी आलोचना की सुगबुगाहट सुनाई देती है. कांग्रेस के खर्च से उन तथाकथित
बुद्धिजीवियों के निबंध छापे जा रहे हैं, जो बुराई तो विचारपूर्वक करते हैं लेकिन
उनके योगदान की मीमांसा नहीं करते. बूढ़े थके, चुनाव हारे, सठिया गए नेताओं को भी
कांग्रेस में सजावट की वस्तु की तरह संगठन और गवर्नरी की कुर्सी में फिट कर दिया
जाता है.
होना तो यह चाहिए कि कांग्रेस खुद अपने पूरे संविधान और उसके संशोधनों सहित अब तक
के तमाम घोषणापत्रों पर राष्ट्रीय विचार विमर्श करे. यहां कांग्रेस से आशय उस
विचारधारा से है, जिसने आज़ादी का संघर्ष लड़ा. भारत में सरकार स्थापित की. संविधान
गढ़ा और कांग्रेस को मुख्य जनतांत्रिक पार्टी के रूप में राजनीतिक अर्थ दिए. उस वक्त
के चार चौधरी गांधी की सक्रिय राजनीति से अनुपस्थिति में जवाहरलाल नेहरू, सरदार
वल्लभ भाई पटेल, मौलाना आज़ाद और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी वगैरह की तरह कांग्रेस का
भविष्य राजनीतिक स्लेट पर जनता की खड़िया से लिख रहे थे. वह इबारत धूमिल हो गई है.
कामचलाऊ चौधरियों से कामचलाऊ निर्णय लिए जा सकते हैं. सोनिया गांधी की राजनीतिक समझ
का उत्तराधिकार कब और किसे कितना मिलेगा-यह सवाल भले ही कांग्रेस राहुल गांधी के
भविष्य में देखना चाहे. जिस तरह के सिपहसालार कांग्रेस-विश्वविद्यालय के तरह-तरह के
विभागाध्यक्ष बने हुए हैं, उनके ज्ञान और विवेक से कांग्रेस का काम अगले चुनाव में
चलने वाला नहीं है.
06.08.2011, 16.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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