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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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चार चौधरीः एक अंतर्कथा

बात पते की

 

चार चौधरीः एक अंतर्कथा

कनक तिवारी


बीमारी तथा ऑपरेशन की वजह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक माह से अधिक की अनुपस्थिति के कारण एक अंतरिम व्यवस्था का लोकतंत्रीय अर्थ दिलचस्प व्याख्याएं ढूंढ़ लाता है. किसी राजनीतिक पार्टी का संविधान अमूमन ऐसी तमाम स्थितियों का पूर्वानुमान कर लेता है, जिसके कारण आकस्मिक स्थितियों में भी पार्टी का कार्य सुचारू रूप से चलता रहे. कांग्रेस का संविधान भी ऐसी व्यवस्था से परे नहीं है. मोटे तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष के बाद पार्टी के कोषाध्यक्ष की बड़ी अहमियत होती है. भले ही वह पार्टी का दूसरे नंबर का नेता नहीं है. मोतीलाल वोरा के समर्थक उनके कोषाध्यक्ष पद को लेकर सोनिया गांधी के साथ उनके विश्वासपात्र होने की कहानी चटखारे लेकर सुनाते हैं. वैसे यह बात अलग है कि वोरा अब खुद ऊंचा सुनने लगे हैं.

सोनिया गांधी


पार्टी में आठ-दस महासचिव भी हैं, जिनमें से कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं. कोई एक वर्ष से दिग्विजय सिंह मृग शावकों की तरह सत्ता के बियाबान की राजनीति में कुलांचे भर रहे हैं. वे एक साथ योग गुरु बाबा रामदेव, खुर्राट वकील शांतिभूषण, गांधीवादी बुजुर्ग अन्ना हज़ारे और पूरे संघ परिवार को अभिमन्यु शैली में कांग्रेस रथ का पहिया उठाए, उत्तरप्रदेश को प्रश्न प्रदेश बनाते चले जा रहे बहुत से महासचिव कार्यालयीन प्रभारियों की तरह केवल दफ्तरनवीसी कर रहे हैं. कांग्रेस में मैदानी महारथियों का अभाव हो गया है.

डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के दिनों से कांग्रेस पार्टी पर भूतपूर्व सामंतों, भूतपूर्व नौकरशाहों, चुनाव में पराजित राज्यसभा के विजयी सदस्यों, उद्योगपतियों, फिल्म अभिनेताओं, खिलाड़ियों और दूसरी पार्टियों से कांग्रेस में आए दल बदलुओं का वर्चस्व बढ़ गया है. आर. डी. प्रधान, माखनलाल फोतेदार, राजकुमार धवन, विन्सेंट जॉर्ज, मणिशंकर अय्यर, जयराम रमेश वगैरह का भी समय-समय पर बोलबाला रहा है.

सोनिया गांधी ने अपनी गैर मौजूदगी में पार्टी के फैसलों के लिए पुत्र राहुल गांधी, रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी, राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और महासचिव जनार्दन द्विवेदी की चौकड़ी को सभी विशेषाधिकार सौंप दिए. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि उन्होंने उत्तराधिकार का अस्थायी प्रभार राहुल गांधी को सौंप दिया है. उनकी मदद के लिए तीन सिपहसालार नियुक्त कर दिए गए हैं. शायद भारत की अन्य किसी पंजीबद्ध राजनीतिक पार्टी में कांग्रेस अध्यक्ष की तरह इतने अधिक अधिकार नहीं होंगे.

ऐसे ही अधिकारों का उपयोग करते हुए हेमवतीनंदन बहुगुणा को एक बार कांग्रेस का मुख्य महासचिव अर्थात सेक्रेटरी जनरल बनाया गया था. उनके मातहत बाकी महासचिव अर्थात जनरल सेक्रेटरी काम करते थे. नाराज़ बहुगुणा को कांग्रेस की मुख्यधारा में लाने के लिए यह जुगत बिठाई गई थी. राजीव गांधी ने भी पंजाब के राज्यपाल पद से लौटने वाले अर्जुन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया था, जबकि कांग्रेस के संविधान में उपाध्यक्ष पद होता ही नहीं है. यह अलग बात है कि भाजपा सहित तमाम राजनीतिक पार्टियों में नेताओं को खपाने के लिए उपाध्यक्षी के ढेर से पद भरे हुए हैं. बहुगुणा और अर्जुन सिंह मजबूत मैदानी राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने पार्टी को तरह-तरह के योगदान भी किए थे. लेकिन कांग्रेस की परंपरा में कुछ नेताओं की एक टुकड़ी को कांग्रेस अध्यक्ष की अनुपस्थिति में पार्टी की ओर से नीतिगत फैसले भी कर लेने का शायद यह पहला उदाहरण होगा.

दूरसंचार की तकनीकी के युग में क्षण प्रतिक्षण कांग्रेस अध्यक्ष से संबंधित पदाधिकारी निर्देश लेते रहने को स्वतंत्र ही होते. राहुल गांधी, ए. के. एंटनी, अहमद पटेल और द्विवेदी का चयन बड़े नेताओं के लिए तो एक इशारा है ही. वह पार्टी के अंदर अपने-अपने मुखिया ढूंढ़ रहे कार्यकर्ताओं के लिए नया संदेश लेकर आया है. इसे कई तरह से समझा जा सकता है.

राहुल गांधी वंशानुगत क्रम में पारसी फीरोज़ गांधी और हिन्दू इंदिरा गांधी के पोते हैं. पिता हिन्दुस्तानी और मां इतालवी हैं. यदि राजीव गांधी को पारसी मतावलंबी भी समझा जाए तो सोनिया रोमन कैथलिक ईसाई हैं. ए. के. एंटनी भी ईसाई हैं और इस नाते भी उनकी कई अन्य नेताओं के मुकाबले नजदीकियों पर चर्चाएं होती रही हैं. अहमद पटेल खांटी मुसलमान हैं. यह अलग बात है कि अपनी धर्मनिरपेक्ष छबि के चलते अहमद भाई मुसलमानों के राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं उभरे. उनकी हिन्दुओं से भी नज़दीकियां सर्वज्ञात हैं. जनार्दन द्विवेदी उत्तर भारत के पूर्वी इलाके के ब्राम्हण हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में वे बीसियों वर्षों से अदना हैसियत से शुरू करके सेवारत हैं. वे न तो मैदानी नेता रहे हैं और न ही उनकी सांगठनिक क्षमता राष्ट्रीय जानकारी में रही है. उनके दफ्तरी अनुभव और गांधी परिवार के प्रति वफादारी कभी भी शक का विषय नहीं बनी.

राहुल गांधी दिल्ली तथा उत्तरप्रदेश के इलाके के कद्दावर नेता के रूप में उभारे जा रहे हैं. पिछले दिनों बुंदेलखंड और भट्टा पारसौल आदि की घटनाओं के कारण उनकी सक्रियता से उनका भविष्य आंका जा रहा है. इस काम में महासचिव दिग्विजय सिंह और उत्तरप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा उनके लिए ताबड़तोड़ प्रयास करने का श्रेय लिए हुए हैं.
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