कौरवों, हस्तिनापुर छोड़ो!
बात पते की
कौरवों, हस्तिनापुर छोड़ो!
कनक तिवारी
डॉ. लोहिया ने यह मौलिक स्थापना की है कि व्यक्ति का हो न हो, इतिहास का पुनर्जन्म
होता है. कुरुक्षेत्र, हस्तिनापुर, पानीपत वगैरह के आसपास के इलाके में एक और
महाभारत होने होने की भूमिका देश इन दिनों लिख रहा है.
महाभारत में पांडवों ने जब पांच गांव मांगे थे, तब वे सर्वहारा के इक्कीसवीं सदी के
प्रतिनिधियों की तरह राजा की आतंककारी ताकत से केवल किसान बनकर अपनी भूमि बचाने की
प्रार्थना कर रहे थे. दुर्योधन और दुःशासन अर्थात उद्योगपतियों और सरकार का अहंकार
इतना बढ़ा हुआ था कि उन्होंने सुई की नोक के बराबर भी भूमि को अधिग्रहण करने से,
छोड़ने से मना कर दिया था. शीर्ष शासन अंधा था क्योंकि वह मोहग्रस्त था. उसे अपने
महल की हर हलचल की जानकारी होती थी. धृतराष्ट्र इतना ताकतवर था कि उसने अपने पुत्र
दुर्योधन के संहारक भीम के बदले कृष्ण की चालाकी के कारण खंभे को पकड़ लिया था तो उसे
ही चूर चूर कर डाला था.
आज के हर प्रदेश में शीर्ष शासक भी अपने मंत्रिपरिषद की पूरी जानकारी रखता है लेकिन
कहता है कि देख नहीं पाता है. उसे ए. राजा, शरद पवार, सुरेश कलमाड़ी, अशोक चव्हाण,
कनिमोझी, येदियुरप्पा, रेड्डी बन्धु वगैरह बड़े अच्छे लगते हैं. महाभारत के युद्ध
में सत्ता को अपनी ग्यारह अक्षौहिणी सेना पर बड़ा गुमान था जो पांडवों की सात
अक्षौहिणी सेना के मुकाबले कहीं ज़्यादा थी. आज भी देश में सेना और सभी तरह के
अर्धसैनिक बल मिलाकर इतनी बड़ी संख्या में पहुंच जाते हैं कि उससे ज़्यादा लोग किसी
भी जन आंदोलन में जुट नहीं पाते. तब नहीं लेकिन अब जन आंदोलन कुचल दिए जाते हैं.
सेना के कंधे पर बंदूक रखकर धृतराष्ट्र की कौरव संतानें अर्थात देश के सभी राज्यों
की मंत्रिपरिषदें राजसी वैभव में अट्टहास करती रहती हैं.
महाभारत में कोई जनतांत्रिक संविधान की पोथी नहीं थी. उसके संग्राम के गर्भगृह में
महर्षि वेदव्यास ने कृष्ण के मुंह से गीता का पाठ कराया. भारतीय आज़ादी के युद्ध में
भी कोई सर्वस्वीकृत संविधान नहीं था. इसलिए आज़ादी की दहलीज़ पर गांधीजी के सुझाव पर
संविधान सभा का गठन किया गया. उसने पहली बार सामूहिक लेखन का एक वैचारिक दस्तावेज़
जनता के हस्ताक्षरों से लिखा. उसका लोकार्पण भी जनता ने ही किया. गीता का उपदेश
कृष्ण की जुबानी अर्जुन की नपुंसकता को दूर करने का जतन बना. इसलिए उसे द्वापर युग
कहते हैं.
बीसवीं सदी का संविधान कलियुग में लिखा गया लेकिन जनता है कि उसका क्लैव्य दूर नहीं
होता. संविधान बनने के पहले ही कृष्ण की राजधानी द्वारका के इलाके में पैदा हुआ एक
मोहन संविधान-गीता के पहले ही लोगों में पौरुष का संचार कर चुका था. तब लोगों ने
अंगरेज़ों को कौरव समझकर भारत के बाहर खदेड़ भी दिया था. इतिहास कभी मरता नहीं. युद्ध
भी नहीं मरते. कौरव भी नहीं और पांडव भी नहीं. अंगरेज़ चले गए. लेकिन वे अपनी राजवंशी
परंपरा जिन भारतीयों में छोड़ गए उनमें कौरव वंश के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं. अंगरेज़ों
से लड़ाई करने में जनता की पांडव शक्ति को नब्बे वर्ष लगे तब कहीं आज़ादी मिली. अपने
खून से बने शासकों से लड़ने में जनता के चैसठ वर्ष खप गए. हो सकता है आगे कहीं उसकी
विजय का सूरज चमके.
महाभारत का मूल कारण द्वौपदी के चीरहरण से जुड़ता है. आज भी हिन्दुस्तान में गरीब और
मध्य वर्ग की युवतियां और बच्चियां हज़ारों की संख्या में बलात्कार का शिकार हो रही
हैं. वे पुलिस थाने को कृष्ण जन्म स्थान समझकर रपट लिखाने जाती हैं ताकि कोई चीरहरण
से उनकी रक्षा कर सके. पुलिस विभाग तो दुर्योधन परिवार का एक्सटेंशन काउंटर बन गया
है. तब की राजरानियां चरित्र के मामले में बहुत सचेत, सात्विक और संकोची थीं.
धनाढ्य वर्ग की बहुत सी महिलाएं स्त्री आज़ादी के नारे लगाती इतनी पौरुषमयी हो गई
हैं कि पुरुषों के भी चीरहरण के किस्से सुनाई पड़ते हैं. महाभारत के महान शिक्षक
द्रोणाचार्य पक्षपाती थे. अर्जुन को धनुष बाण चलाना उन्होंने खूब सिखाया लेकिन
आदिवासी बेटे एकलव्य का अंगूठा काट लिया.
आज के द्रोणाचार्य भी मंत्रियों, विधायकों, साहबों, शराब ठेकेदारों और कारखाना
मालिकों की बिगड़ी औलादों को पढ़ाने के नाम पर उनकी खुशामदें, मिन्नतें करते हैं. वे
शिक्षाकर्मी कम, खुशामदकर्मी ज़्यादा हो जाते हैं. उनमें से कोई भी आदिवासी और दलित
इलाकों और गांवों के स्कूलों में कभी पढ़ाने नहीं जाता. प्रतिभाशाली गरीब घरों के
बच्चे स्कूल की पढ़ाई खत्म करते करते सामाजिक षड़यंत्र के द्वारा ठिकाने लगा दिए जाते
हैं. शिक्षक वही है जो खुद जीवन भर विद्यार्थी बना रहे. कुलपति जैसे महत्वपूर्ण पद
पर पहले विश्वामित्र और संदीपनि मुनि जैसे महान लोग बैठते थे. अब तो पुलिस, राजस्व,
वन और आबकारी विभाग तक के चुनिंदा शातिर अधिकारी महिमामंडित किए जाकर कुलपति बना
दिए जाते हैं. उनकी शामें गीली और रंगीन होती हैं. वे स्त्रियों को छिनाल तक कहने
में सकुचाते नहीं और उसी मुंह से तत्काल महात्मा गांधी की जय भी बोलते हैं.
महाभारत में शकुनि ने चैपड़ खेली थी और सचाई पर चलने वाले युधिष्ठिर की अगुवाई में
पांडवों का बेड़ा गर्क किया था. आज भी हिन्दुस्तान में जुएं के अड्डे, क्लब, कैसिनो
और पब वगैरह शकुनि के रक्त से फलफूल रहे हैं. जनता के पसीने की कमाई शराब ठेकेदारों
की तिजोरियों में भरती चली जा रही है. उसे गिनने तक की उन्हें फुर्सत नहीं होती.
खेतिहर मज़दूरों, बेकारों, मुफलिसों और मामूली कमाई करने वालों के घरों में शराबखोरी
के कारण तबाही का मंजर होता है.
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