आरक्षण नहीं, अभिव्यक्ति का मुद्दा
मुद्दा
आरक्षण नहीं, अभिव्यक्ति का मुद्दा
शैलेंद्र
प्रकाश झा की फ़िल्म ‘आरक्षण’ भले रिलीज हो गई हो लेकिन उसके विरोध का सिलसिला थमता
नज़र नहीं आता. बात फ़िल्म के विरोध तक तो समझ में आती है लेकिन इस फ़िल्म पर
राजनीतिक कारणों से प्रतिबंध की मांग और कुछ राज्य सरकारों द्वारा इस पर लगाया गया
प्रतिबंध एक ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति के सिलसिले को विस्तार देता है, जिसकी जगह कम से
कम किसी स्वस्थ लोकतंत्र में तो नहीं ही हो सकती है.
फ़िल्म ‘आरक्षण’ से जुड़ा मुद्दा आरक्षण के पक्ष या विपक्ष से नहीं, अभिव्यक्ति की
आज़ादी से जुड़ा मामला है. इस लोकतांत्रिक राष्ट्र में अगर किसी को यह कहने का हक़
है कि आरक्षण न्यायपूर्ण है तो किसी को यह भी कहने का हक़ है कि आरक्षण न्यायपूर्ण
नहीं है. मैंने यह फ़िल्म नहीं देखी है, इसलिये मुझे नहीं पता कि प्रकाश झा की इस
फ़िल्म में क्या कहा गया है और क्या नहीं कहा गया है. मैं यह मान कर चल रहा हूं कि
फ़िल्म का विरोध करने वालों की स्थिति भी मेरे जैसी ही है.
आज के समय में अगर कोई यह कहे कि मनुस्मृति ठीक-ठाक है तो जब तक उसे थोपने के लिये
वह डंडे का इस्तेमाल नहीं करता तो उसे रोकने के लिये भी डंडे का इस्तेमाल नहीं किया
जाना चाहिये. उसके खिलाफ एक अभियान चलाया जाना चाहिये. फ़िल्म ‘आरक्षण’ के मामले
में भी पहले उस फ़िल्म को देखा जाना चाहिये और फिर उसकी समीक्षात्मक आलोचना की जानी
चाहिये. उसकी आलोचना की जा सकती है कि यह फ़िल्म समाज के खिलाफ है या मानवता के
मूल्यों का हनन करती है. लेकिन यह तय करने का अधिकार हर किसी को नहीं दिया जा सकता
कि कौन-सी फ़िल्म हमारे शहर में लगेगी और कौन सी फ़िल्म नहीं लगेगी. हरेक व्यक्ति
को दूसरे के लिये सेंसर बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती. देश में अगर एक सेंसर
बोर्ड है तो हमें उसके सदस्यों पर भरोसा करना ही होगा.
फ़िल्म दलितों के खिलाफ हो या पक्ष में, लेकिन यह बात बहुत साफ है कि ऐसा कुछ भी
होने पर मैं अगर उससे असहमत हूं तो उस फ़िल्म के ख़िलाफ एक फ़िल्म बनाने की बात
करुंगा, उसके खिलाफ जनचेतना अभियान चलाने की कोशिश करुंगा, गोष्ठियां करुंगा,
सेमिनार करुंगा. मैं जनता से अपील करुंगा कि प्रकाश झा दलित विरोधी हैं, उनकी चेतना
का हिस्सा सामंती चेतना है. मैं लोगों से अपील करुंगा कि लोग उनकी फ़िल्म न देखें
लेकिन मैं समाज को उल्टी दिशा में ले जाते हुये उस पर प्रतिबंध लगाने की बात नहीं
करुंगा.
प्रतिबंध की यह प्रवृति खतरनाक है और हमें इस तरह की प्रवृति को रोकना चाहिये.
सिनेमा सांस्कृतिक गतिविधि का हिस्सा है और उसका प्रतिरोध भी सांस्कृतिक तरीके से
ही किया जाना चाहिये. लोकतंत्र में प्रतिरोध के जितने तौर-तरीके हैं, उसका इस्तेमाल
किया जाना चाहिये. इसके बजाये प्रतिबंध की मांग न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि
गैरकानूनी भी है. भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में शामिल
है. यह नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है. हालांकि इसका भी एक
दायरा है. लेकिन जब हम प्रतिबंध की बात करते हैं तो हम उन तमाम स्वतंत्रता को भी
खारिज करने की बात करते हैं.
प्रतिबंध एक तालिबानी प्रवृत्ति है और जब भी हम प्रतिबंध की बात करते हैं तो कहीं न
कहीं हम उसी प्रवृत्ति के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं. ‘आरक्षण’ की बात करते हुये
हमें कश्मीर में बुर्का पहनने या न पहनने के फरमान, तस्लीमा के सर को कलम करने के
फरमान, सलमान रश्दी की हत्या पर दिये जाने वाले ईनाम की घोषणा, वाटर फ़िल्म पर लगाये
जाने वाले प्रतिबंध, ए के हंगल पर शिवसेना का प्रतिबंध, मकबूल फिदा हुसैन की
कलाकृतियों की तोड़फोड़, द पैशन ऑफ़ द क्राइस्ट पर प्रतिबंध जैसी सैकड़ों पुरानी
घटनाओं को भी याद करने की जरुरत है कि हम किस ओर खड़े हैं.
यह बात बहुत साफ तरीके से समझने की जरुरत है कि जब हम ऐसी किसी अभिव्यक्ति के खिलाफ
प्रतिबंध का कोड़ा लेकर खड़े हो जाते हैं तो जाने-अनजाने हम एक ऐसे हिंसक समाज की
तैयारी कर रहे होते हैं, जो तालिबान का निर्माण करता है. एक ऐसी जगह, जहां हरेक
संवाद और विचार को नकार दिया जाता है. जबकि एक स्वस्थ समाज में असहमति के लिये भी
जगह होती है. प्रकाश झा के ‘आरक्षण’ को भी इसी सहमति-असहमति के साथ देखने या न देखने
का फैसला किया जा सकता है.
12.08.2011, 16.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित