‘तुम' दबंग और तीसमारखां, जनता सिंघम
मुद्दा
'तुम' दबंग और तीसमारखां, जनता सिंघम
कनक तिवारी
अन्ना हजारे ने एक अहिंसक लोकतांत्रिक युद्ध का आगाज़ कर दिया है. कोई नहीं जानता आगे
क्या होगा. केन्द्र सरकार ने अत्याचार करने का क्रूर ऐलान कर दिया है. उसे अहिंसक
लोकतांत्रिक आंदोलनों से भी परहेज़ होने लगा है, जबकि सत्ता सुख भोग रही कांग्रेस
पार्टी अहिंसक, लोकतांत्रिक आंदोलनकर्ताओं की ही वंशज है. पूरी सरकार पांच सितारा
संस्कृति के कुलीन भद्रलोक की ऑक्टोपस-गिरफ्त में है.
सरकार और पार्टी के प्रवक्ता मुंहफट, अनियंत्रित और कई बार असभ्य कटाक्ष भी करते
हैं. ऐसा लगता है कि कई प्रवक्ता उस दिन स्कूल नहीं गए होंगे जिस दिन व्याकरण की
कक्षा में गुरुजी ने पूर्णविराम का पाठ पढ़ाया होगा. वे अपने चेहरे पर नफरत, व्यंग्य
और विदूप के ऐसे सत्तासीन भाव लीपते रहते हैं मानो उनके अलावा दुनिया में किसी को
कुछ भी नहीं आता. कोई संविधान की शेखी बघारता है. कोई संसदीय प्रजातंत्र के पाठ
पढ़ाता है. कोई प्रधानमंत्री के मुकाबले दबंग पुलिस को ज़्यादा अधिकार होना प्रचारित
करता है. कोई खामोश रहता है और ढिंढोरचियों को उकसाता रहता है.
देश पहली बार महसूस कर रहा है कि यहां प्रधानमंत्री का कोई पद ही नहीं है.
जम्हूरियत के सामने एक बंदी प्रधानमंत्री के साफ पाक बने रहने का सवाल पहली बार इतने
बड़े आयामों को लेकर उठ खड़ा हुआ है. देश एक अनुपस्थित प्रधानमंत्री को उपस्थित देख
रहा है. जन लोकपाल कानून के तहत प्रधानमंत्री को नहीं लाने का तर्क इसलिए होता है
कि यह पद लोकतंत्र का धु्रुवतारा है, बुनियाद है और उसका हृदय भी. यह कैसा हृदय है
जो मुसीबत आने पर बाइपास सर्जरी कराए बैठा है?
लगता तो यही है कि कपिल सिब्बल देश के प्रधानमंत्री हैं. वे जितना कुशल अभिनय कर रहे
हैं उसे देखकर चुलबुल पांडे की याद आती है. उनका कहना है कि अन्ना को संविधान की
जानकारी ही नहीं है. इसका अर्थ क्या यह है कि देश में जिसे भी संविधान की जानकारी
नहीं है वह जन आंदोलनों की अगुवाई नहीं कर सकता? क्या उलट अर्थ यह है कि जो संविधान
का जानकार है उसे ही तय करना होगा कि जन आंदोलन कब और कैसे किए जाएं? पूरक प्रश्न
यह भी है कि क्या कपिल सिब्बल के मुकाबले डॉ. मनमोहन सिंह को भी संविधान की कोई
जानकारी है? यदि नहीं तो क्यों नहीं कुर्सियां अदल बदल कर ली जाएं.
कांग्रेस के कुछ वकील-प्रवक्ता बार बार इस बात की दुहाई देते हैं कि प्रजातंत्र में
संसद सर्वोपरि है. वे सबको संविधान की पोथी पढ़ने की सलाह देते हैं. संविधान वकीलों
और न्यायाधीशों की जागीर नहीं है. यह भारत का संविधान है जिसे देश की जनता ने लिखकर
खुद को आत्मार्पित किया है. संविधान ने हर भारतीय में यह आत्मविश्वास गूंथा है कि
वह राष्ट्रीय जीवन में जनतांत्रिक राजनीतिक व्यवहार के जरिए अपनी तकदीर खुद गढ़ सकता
है.
साठ वर्षों के बाद संविधान की जुगाली करने से यही समझ में आता है कि विधायिकाओं,
सचिवालयों, राजभवनों और न्यायालयों में अपनी दैनिक हाजिरी भरते संविधान को सड़कों पर
चलने का वक्त ही नहीं मिल पाया. आज संविधान की सड़क-व्याख्या की इतिहास को ज़्यादा
ज़रूरत है. वह अब तक पेट भरे उद्योगपतियों, नौकरशाहों, राजनेताओं, वकीलों और
न्यायाधीशों के अकादेमिक चोचलों का व्याख्यान बनाया गया है. इक्कीसवीं सदी के
भारतीय नागरिकों को संविधान की सक्रियता, उदारता और न्यायप्रियता की ज़रूरत है.
संविधान एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, स्वधर्म पोथी है. इसे जनता लेकिन
पढ़ कहां पाती है? यह अब तक राजपथ समझा गया है. संविधान भारत की इक्कीसवीं सदी का
जनपथ है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ही सबसे बड़ी दुनिया है.
अन्ना ने यह लिख क्या दिया कि जो प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं
कर सकते उन्हें लाल किले पर झंडा फहराने का क्या हक है-कांग्रेस प्रवक्ता मनीष
तिवारी ने अभद्र भाषा में अन्ना को ‘तुम’ कहकर संबोधित किया और सिविल सोसायटी को
दाऊद इब्राहिम की डी. कंपनी की तर्ज़ पर ए. कंपनी की उपाधि दे दी.
कांग्रेस प्रवक्ता मुंह से बोलते कम हैं, मितली ज्यादा करते हैं. लाल किले की
प्राचीर से हिन्दुस्तान की छाती के लाल गुलाब जवाहरलाल ने तिरंगा झंडा फहराया था.
डॉ. मनमोहन सिंह ने इंग्लैंड जाकर यह बयान दिया कि अंगरेज़ कौम का हिन्दुस्तानियों
को रचने गढ़ने में बहुत बड़ा अहसान है!
प्रधानमंत्री के पद को आसमान की बुलंदी समझाने वाले कांग्रेस प्रवक्ताओं को गांधीजी
की किताब ‘हिन्द स्वराज‘ पढ़ना चाहिए जिससे समझ में आए कि प्रधानमंत्री और सांसदों
को जन लोकपाल कानून में लाने के पीछे अन्ना का कौन सा गांधीवादी सोच हैः “पार्लियामेन्ट
को मैंने वेश्या कहा, वह भी ठीक है. उसका कोई मालिक नहीं है. उसका कोई एक मालिक नहीं
हो सकता. लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है. जब कोई उसका मालिक बनता है-जैसे
प्रधानमंत्री-तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती. जैसे बुरे हाल वेश्या के होते
हैं, वैसे ही सदा पार्लियामेन्ट के होते हैं. प्रधानमंत्री को पार्लियामेन्ट की थोड़ी
ही परवाह रहती है. वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है. अपना दल कैसे जीते इसी
की लगन उसे रहती है. पार्लियामेन्ट सही काम कैसे करे, इसका वह बहुत कम विचार करता
है. अपने दल को बलवान बताने के लिए प्रधानमंत्री पार्लियामेन्ट से कैसे कैसे काम
करवाता है, इसी की मिसालें जितनी चाहिये उतनी मिल सकती हैं. यह सब सोचने लायक है.”
हो सकता है अन्ना शहीद हो जाएं. सरकार अपनी हठधर्मी तो नहीं ही छोड़ेगी. वह कपिल
सिब्बल, प्रणव मुखर्जी, दिग्विजय सिंह, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, अम्बिका सोनी,
जर्नादन द्विवेदी वगैरह बीसियों कांग्रेसी नेताओं की बैसाखी पर मनमोहन सिंह को चढ़ाए
हुए है. सोनिया गांधी बीमार हैं और राहुल गांधी खामोश हैं. हो सकता है अन्ना और साथी
गिरफ्तार कर दिल्ली से बाहर कर दिए जाएं और आंदोलन को निर्ममतापूर्वक कुचल दिया जाए.
हो सकता है आंदोलन गुमराह या हिंसक हो जाए. जयप्रकाश नारायण का आंदोलन भी सही मुकाम
तक नहीं पहुंच पाया था.
सरकार एक नक्कारखाना है और अन्ना तूती की आवाज़ हैं-यदि ऐसा भी कहा जाए तब भी
लोकतंत्र में जनमत के जुटने का एक अरुणोदय तो देश में हो गया है. असली भ्रष्टाचार
तो यही है कि जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोले उसे भ्रष्ट कह दिया जाए. जो सरकारी
हिंसा के खिलाफ बोले उसे नक्सली कह दिया जाए. जो साझा संस्कृति की बात करे उसे
काफिर कह दिया जाए. ऐसे में लोकतंत्र का क्या भविष्य होगा?
कांग्रेस के तीसमार खां वकील प्रवक्ताओं को यह मालूम है कि संविधान, संसद,
राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद सार्वभौम नहीं है. यदि कोई सार्वभौम है तो हम भारत के
लोग अर्थात जनता. पांच वर्ष में एक बार वोट डालने के बाद जनता को अगले पांच वर्षों
तक सांसदों की गुलामी करनी पड़ेगी-यह कुटिल, बांझ और दुष्ट तर्क कूड़ाघर पर फेंक दिए
जाने के लायक है. दुनिया का इतिहास बताता है जिस सरकार ने वाचाल वकीलों पर भरोसा
किया है उसका सूर्यास्त हो गया.
यह भी गांधी ने कहा था “वकालत का पेशा बड़ा आबरूदार पेशा है, ऐसा खोज निकालने वाले
भी वकील ही हैं. कानून वे बनाते हैं, उसकी तारीफ़ भी वे ही करते हैं. लोगों से क्या
दाम लिये जायें, यह भी वे ही तय करते हैं; और लोगों पर रोब जमाने के लिए आडंबर ऐसा
करते हैं, मानो वे आसमान से उतर कर आये हुए देवदूत हों! वे मजदूर से ज्यादा रोज़ी
क्यों मांगते हैं? उनकी जरूरतें मज़दूर से ज्यादा क्यों हैं? उन्होंने मजदूर से
ज्यादा देश का क्या भला किया है?”
अन्ना के समर्थकों की पहली टोली को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर जिस बस में बिठाया,
उस पर ‘विजय' लिखा था. पुलिस जितनी सक्रिय होगी, आन्दोलन उतना ही निखरेगा. यक्ष
प्रश्न यह है कि चेहरे शराबखोरी से सुर्खरू हैं. देह से पसीना नहीं निकलता. विदेशों
में संतानों को पढ़ाते और खुद का इलाज कराते हैं. विदेशों का काला धन लाने में
सुप्रीम कोर्ट के काम में टांग अड़ा रहे हैं. राजनीतिक कमीशनखोरी करते खुदगर्ज़ कानून
बनाकर किसानों और आदिवासियों की ज़मीनें लूट रहे हैं. जनता को महंगाई, भ्रष्टाचार,
पुलिस और आतंक की लाठियों से लहूलुहान कर रहे हैं. ऐसे शोषकों के देश कब मुंहतोड़
जवाब देंगे?
विवेकानंद और गांधी ने मौज़ूदा राजनीतिक नेतृत्व की तरह के लोगों को ही तो ‘अजगर‘ कहा
था. जो करता धरता कुछ नहीं है लेकिन लील जाने में विश्वास करता है. सतयुग आसमान से
नहीं टपकता. जनयुद्ध जब परवान चढ़ता है तब ही जनसत्ता का समय आता है. यह लड़ाई अभी न
तो खत्म होगी, न तत्काल कुछ भौतिक रूप से हासिल कर पाएगी और न ही पस्तहिम्मत होकर
इतिहास की गुमनाम इकाइयां बने मंत्रियों से हारने वाली है.
16.08.2011, 10.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित