जन लोकपाल-कड़वे सच
मुद्दा
जन लोकपाल-कड़वे सच
कनक तिवारी
अन्ना-आंदोलन रामलीला मैदान की छाती पर होगा. सरकार ‘जंतर मंतर‘ और ‘जयप्रकाश
नारायण‘ के नाम से डरी हुई है. पूर्व प्रधानमंत्रियों सहित महत्वपूर्ण नेताओं ने
यही जनता में जोश का जज़्बा पैदा किया है. अन्ना को शायद 15 दिन तक अनशन नहीं करना
पड़े. सियासी और स्वास्थ्यगत हालात दबाव बना सकते हैं. केन्द्र सरकार ऐसे मुकाबला कर
रही है, जैसे ब्रिटिश हुकूमत ने किताबी कानूनी इबारत के सहारे किया था.
कानून के
नहर प्रवाह के मुकाबले जन आंदोलन नदियों के प्रवाह की तरह होते हैं. आंदोलनों को
अपना निकटतम भविष्य तो नहीं मालूम होता लेकिन नज़र ध्रुवतारे जैसे पाथेय पर टिकी
होती है. कोई नहीं जानता, भ्रष्टाचार कब मिटेगा या उस पर कारगर नियंत्रण होगा लेकिन
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम आसानी से मिटने वाली नहीं है. रामलीला मैदान देने से
कपिल सिब्बल के निर्वाचन क्षेत्र में अन्ना को सेंधमारी करने का आदेश किसी सिब्बल
विरोधी नेता ने ही दिलवाया होगा.
जन लोकपाल आंदोलन पहला और अनोखा है, जब राजनीतिक पार्टियों, ट्रेड यूनियनों और अन्य
संगठित समूहों की बैसाखी पर चढ़े बिना जनता मुकाम को हासिल करने के लिए खुद पैदल
मार्च कर रही है. कहीं कोई हिंसात्मक उत्तेजना नहीं है. यहां तक कि फिलहाल पुलिस
में भी नहीं. किराए की बसें और ट्रक, पूड़ी सब्जी के पैकेट, शराब की बोतलें, शोहदों
की हुल्लड़बाजी और सिखाए गए नेता समर्थक नारे वगैरह गायब हैं. लोग अपने साधनों से सब
कुछ कर रहे हैं. उनमें अनायास जोश है. उससे ही जनमत बन रहा है.
जे.पी. के 1974-75 के आंदोलन में राजनीतिक पार्टियों ने कांग्रेस की सत्ता उखाड़कर
वैकल्पिक सत्ता ढूंढ़ ली थी लेकिन देश सांप्रदायिक शक्तियों के चंगुल में फंस गया
था. अन्ना का आंदोलन बिखरी जनता के जुड़ने की पहली कथा है. जनमत का चेहरा अन्ना की
अगुवाई में संवैधानिक कम लेकिन लोकतंत्रीय ज्यादा ताकत के रूप में इतिहास से अपनी
पहचान मांग रहा है. यह आंदोलन तुर्त फुर्त कुछ हासिल कर पाए या नहीं, उसने जनता के
हौसले को दिशा, सहारा और मकसद तो दिया है. नेताओं से बचते अन्ना को येदियुरप्पा से
बचना होगा क्योंकि उन्होंने अन्ना के साथ अनशन करने का ऐलान किया है.
अन्ना हज़ारे के मुकाबले खड़ी कांग्रेस पार्टी के सलाहकारों में वकीलों की भरमार है.
दोनों पक्ष जब चर्चा में बैठे, तब महिलाओं, पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों और
गैर वकीलों के जमावड़े से भी प्रतिनिधि शामिल किए जा सकते थे. कमेटी की कार्यवाही
सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व वकीलों के चाय क्लब की बहस की तरह हो गई. शांति भूषण,
प्रशांत भूषण, चिदंबरम, संतोष हेगड़े, सलमान खुर्शीद और कपिल सिब्बल वगैरह जब एक साथ
बैठेंगे तो यही तो लगेगा.
राज्य सभा में अरुण जेटली ने कटाक्ष के लहज़े में कहा लेकिन सच तो यही है कि
प्रधानमंत्री बहुत से वाचाल वकीलों के मुअक्किल बन गए हैं. प्रधानमंत्री को संसद के
इजलास में किसी गवाह की शक्ल में खड़ा कर दिया जाता है जो लिखित बयान पढ़ता रहता है.
विपक्ष से पूरक प्रश्न उछाले जाने पर वह जवाब नहीं देता बल्कि अपने सलाहकार वकीलों
की निगाहों में झांकता रहता है. प्रधानमंत्री के पद का भ्रष्टाचार और राजनीतिक
नासमझी के कारण इतना अवमूल्यन हो ही चुका है कि प्रधानमंत्री को जन लोकपाल के दायरे
में ज़रूर लाना चाहिए. अभी भी तो सी. बी. आई. तक उनके आचरण की जांच कर सकती है.
आश्चर्यजनक है कि मायावती को छोड़कर देश की सशक्त महिलाएं ममता बनर्जी, जयललिता, उमा
भारती, साध्वी ऋतंभरा, वसुंधरा राजे वगैरह अपनी राजनीतिक और यौन-प्रकृति के खिलाफ
खामोशी अख्तियार किए हुए हैं. भ्रष्टाचार का खमियाजा भारतीय गृहणियों को सबसे
ज़्यादा झेलना पड़ता है. इसके बाद भी ये महान महिलाएं जाने क्यों चुप हैं. क्या
भविष्य की राजनीति और राजनीति के भविष्य को जन आंदोलनों के वर्तमान से ज़्यादा
तरजीह दी जानी चाहिए? सोनिया गांधी भारत में रहतीं तो भी शायद चुप ही रहतीं. उच्च
पदस्थ कुछ कुलीन महिलाओं को अंगरेजी में अन्ना के आंदोलन के खिलाफ बतियाना बहुत
सुहा भी रहा है.
भाजपा और आर. एस. एस. वगैरह को छोड़कर कम्युनिस्ट पार्टियां, समाजवादी समूह और
बहुलांश क्षेत्रीय पार्टियां भी इस तरह चुप हैं मानों अन्ना का आंदोलन उनके ही
भ्रष्टाचार के खिलाफ है. कम्युनिस्ट पार्टियां जिन देशों से प्रभावित हैं वहां ठेठ
भारतीय शैली के ऐसे जन आंदोलनों का रिवाज़ कहां है? क्या इसीलिए? क्या वे पश्चिम
बंगाल और केरल की हार को लेकर अगले चुनावों तक अरण्य रोदन ही करते रहेंगे?
पी. यू. सी. एल. जैसे जे.पी. आंदोलन के सामाजिक-राजनीतिक उत्पाद भी बहुत सक्रिय
नहीं हैं. मसलन क्या विनायक सेन जैसे नए प्रचारित नायक को इस मामले में कुछ नहीं
बोलना चाहिए? भाजपा भी मिली जुली कुश्ती के बदले चाहती तो सरकार को बुरी तरह कटघरे
में खड़ा कर सकती थी.
संतोष हेगड़े, अग्निवेश, बाबा रामदेव वगैरह अन्ना के कुछ साथियों को प्रस्तावित जन
लोकपाल विधेयक की कुछ धाराओं पर आपत्ति भी है जो जायज़ प्रतीत होती है. सुप्रीम
कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को इसके दायरे में लाए जाने की खिलाफत कुछ पूर्व
मुख्य न्यायाधीशों ने भी की है. यदि इसी ज़िद के कारण बना कोई कानून सुप्रीम कोर्ट
की टेढ़ी नज़र की भेंट चढ़ गया तो क्या होगा-यह भी अन्ना समर्थकों को सोचना होगा.
राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री प्रचारित किया जाए और उन्हें प्रायोजित ढंग से
सलाहकारों की बुद्धि पर उभारा जाए-इसमें कांग्रेस की कैसी सोच है. दिग्विजय सिंह
कोच बनकर खुद मैदान में उतरकर खेलने लगते हैं और कांग्रेस के सबसे आकर्षक और युवा
खिलाड़ी को दर्शकों की गैलरी में बिठा देते हैं. गैरी कस्र्टन खेल रहे हों और सचिन
नेट प्रेक्टिस कर रहे हों तो बेचारे क्रिकेट के बैट और बल्ले को कैसा लगेगा.
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यह क्यों प्रचारित किया गया कि अन्ना को रिहा करने का फैसला राहुल गांधी के दबाव
में किया गया है. यह भी क्यों नहीं कह दिया गया कि राहुल गांधी के कारण अन्ना को
रामलीला मैदान अनशन के लिए बिना शर्त मुहैया करा दिया जाएगा. श्रेय बेचारी दिल्ली
की पुलिस को दिया गया, जो दिमाग से ज़्यादा घुटनों पर विश्वास करती है. बहुत हुआ तो
उस सर को ही तोड़ देती है जिसमें दिमाग होता है.
क्या केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी की दिशाएं अलग अलग हो रही हैं? सोनिया गांधी
ने कांग्रेस का कामकाज जिन चार महारथियों राहुल गांधी, ए. के. एन्टनी, अहमद पटेल और
जनार्दन द्विवेदी को सौंपा-उनकी तो कोई भूमिका ही नज़र नहीं आई. अन्ना का सैलाब,
पुलिसिया कानून और व्यवस्था का सवाल वाचाल कपिल सिब्बल और चिदंबरम तथा प्रणव
मुखर्जी वगैरह को सौंप दिया गया. ऐसी ही सलाह तो सिद्धार्थ शंकर राय ने भी इंदिरा
गांधी को दी थी.
कपिल सिब्बल भी भारतीय संविधान की संकीर्ण, जनविरोधी और प्रतिगामी व्याख्याओं के
महारथी हैं. यह बात कांग्रेस को इसलिए समझ नहीं आती क्योंकि उसके शीर्ष संगठन में
बुद्धिजीवियों का सूपड़ा साफ है. अंगरेज़ से टकराने के लिए गांधी, नेहरू, मौलाना
आज़ाद, सुभाष बोस और उसके भी पहले तिलक जैसे असाधारण बुद्धिजीवी कांग्रेस के कुनबे
में थे. चिकने चुपड़े अमीर शहजादों तथा बबुओं से इक्कीसवीं सदी की राजनीति संभालने
का जोखिम कांग्रेस क्यों उठा रही है?
चारा-विशेषज्ञ से बेचारा बने लालू यादव अन्ना के खिलाफ इसलिए दहाड़ रहे हैं कि
कांग्रेस मेहरबान होकर एक दर्जन संतानों को पालने के लिए मंत्री तो बना दे.
कांग्रेस अन्ना पर हमला करने के लिए आपातकाल की खलनायिका समझी जाने वाली मंत्री को
आगे क्यों कर रही है?
अन्ना के साथ मैनेजमेन्ट टीम तो है. उनमें से अधिकांश का जनसेवा या जन आंदोलनों से
सक्रिय नाता नहीं रहा है. फिर भी वे ईमानदार, कर्मठ और समझदार हैं. अन्ना को देखना
होगा कि देश भर से स्वेच्छा से जो समर्थन मिल रहा है, उनमें से चुनिंदा लोगों को
छांटकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक आंदोलन समितियां किस तरह बनाई जाएं. सरकार की एक
क्रूर ताकत होती है. वह मुंह से नहीं बोलती. छाती और पीठ पर वार करती है. अफवाह
फैलाएगी और दमन भी कर सकती है. आंदोलन तो अभी और चलेगा ही चलेगा. सेना के
सेवानिवृत्त नायक, डॉक्टर, वकील, पेंशनयाफ्ता अधिकारी, गृहणियां, युवा, बुद्धिजीवी
और छात्र वगैरह आंदोलन के हाथ पैर और दिमाग यदि बना दिए जाएं तो अन्ना को इतिहास
में बड़ी जगह मिल सकती है. यह अच्छी बात है कि राजनीतिक पार्टियां खेल से बाहर हैं.
देश में नामालूम लोगों का जनतांत्रिक नेतृत्व उभर रहा है. देश के कुछ दलाल सम्पादक,
उद्योगपति और सरकारों से अनुदानित स्वैच्छिक संगठन चरित्र हत्या के अभियान में जुट
गए हैं.
मीडिया कई बार अकारण भी दोषी करार दिया जाता है, हालांकि आरोप ठीक भी लगते हैं. बड़े
इजारेदारों ने भारतीय रूपर्ट मर्डक बनकर मीडिया को हथिया लिया है. ये कारपोरेट
घराने ही तो भ्रष्टाचार के जनक हैं. घूस और कमीशनखोरी के जरिए नेताओं और नौकरशाहों
को भ्रष्ट करते हैं. देश अब इनके लिए ही तो जी रहा है. नहीं तो ये बेचारे दुनिया के
धनाढ्यों में शामिल हुए बिना ही मर जाएंगे. इसके बावजूद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तेज़
गति के कारण अन्ना के आंदोलन को लोगों को दिखा दिया गया. प्रिन्ट मीडिया ने भी अपने
कर्तव्यों का पालन तो किया है. यह सरंजाम आगे भी इसी तरह चलेगा-कहा नहीं जा सकता.
मीडिया को क्रिकेट मैच, फिल्मी तारिकाओं के अर्ध नग्न बदन, हत्याओं, दुर्घटनाओं,
मंत्रियों के स्तवन वगैरह के लिए भी तो स्पेस, समय और शक्ति चाहिए. साथ साथ कई
चिकने चुपड़े स्वयंसेवी संगठन, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद वगैरह के सदस्य और
उद्योगपतियों के बगलगीर पत्रकार, सम्पादक आदि अन्ना में खोट भी ढूंढ़ रहे हैं.
कांग्रेस एक दिलचस्प संगठन होता जा रहा है. प्रवक्ता मनीष तिवारी नथुने फुला फुलाकर
उस महिला अमरीकी राजनयिक को कोसते हैं कि वह भारत को नहीं सिखाए कि लोकतंत्र किस
तरह चलाया जाना है. दूसरे प्रवक्ता राशिद अल्वी खुले आम कहते हैं कि अन्ना को
अमरीका का समर्थन है. प्रधानमंत्री इस पर कुछ नहीं कहते जबकि खुद अमरीकी परमाणु
नीति की गोद में हैं.
कांग्रेस में कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, अश्विनी कुमार, जनार्दन द्विवेदी, राजीव
शुक्ला, सत्यव्रत चतुर्वेदी, संजय निरुपम, अभिषेक मनु सिंघवी, दिग्विजय सिंह,
चिदंबरम, अंबिका सोनी वगैरह की दूरदर्शनीय बहार है. कांग्रेस को आदिवासियों,
दलितों, पिछड़े वर्गों, महिलाओं वगैरह को बड़ी मात्रा में प्रवक्ता बनाने से उसका
शहरी चोचला भला कैसे कायम रह पाएगा? कांग्रेस में गांव, खादी, महात्मा गांधी, लाल
बहादुर शास्त्री, मद्य निषेध, प्रभात फेरी, प्रार्थना सभा, चरखा जैसे प्रतीक कहां
हैं?
गांधी को किस तरह केन्द्र में रखकर आंदोलन करना चाहिए? अन्ना अपनी ग्रामीण अदा में
बीच बीच में शिवाजी को भी याद करते हैं. शिवाजी और गांधी की कोई युति नहीं होती.
दोनों के ऐतिहासिक संदर्भ अलग रहे हैं. दुनिया के सबसे बड़े वणिकों अंगरेज़ों के
खिलाफ गांधी ने असाधारण अभय के साथ साथ काठियावाड़ी वणिक वृत्ति की छटाएं भी अपनाई
थीं. उनका मन फौलाद का था लेकिन वे ज़रूरत पड़ने पर लचीले और भविष्यमूलक भी हो जाते
थे.
अन्ना की टीम को बहुत गंभीरता, अध्यवसाय और प्रतिबद्धता के साथ महात्मा गांधी की
शैली का पुनराविष्कार भी करना होगा. अन्ना को छोटा या नया गांधी बनाने की खतरनाक
भूल उनके समर्थकों सहित देश को नहीं करनी चाहिए. अन्ना खुद अपनी सीमाओं को समझते
होंगे. स्वैच्छिक संगठनों पर भरोसा करने से ज्यादा जन आन्दोलन संगठनों को जोड़ना
होगा. सिविल सोसायटी जैसा शब्द अन्ना के साथ खड़े भारत के लिए बिलकुल नाकाफी और
नाकाबिल है. यह विदेशी भाषा और तेवर का भी है. इसके बदले समाज, नागर समाज, जनता,
‘हम भारत के लोग‘, देशहितैषी, लोकजमात जैसी कोई अभिव्यक्ति ढूंढ़ी जा सकती है.
19.08.2011, 10.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित