नेग में मिली हरियालीः मैती
नेग में मिली हरियाली
प्रसून लतांत
उत्तराखंड के इलाकों से
“पैसे दे दो, जूते ले लो ” लोक में इस गीत के बोल चाहे जिस तरह के भी हों, विवाह के
अवसर पर जूते चुराकर नेग लेने की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन उत्तराखंड की
लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को
तिलांजलि दे दी है. वे अब दूल्हों के जूते नहीं चुराती बल्कि उनसे अपने मैत यानी
मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी
परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा देश भर में हो रही है.
अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा चुका है. चार
राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया
है. कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा
डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं.
वे मैती परंपरा
से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया. अब
वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं. मैती परंपरा से प्रभावित होकर
कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके
पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं.
मैती आंदोलन की भावनाओं से अभिभूत होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं वहीं उनके
व्यवहार भी बदल रहे हैं. पर्यावरण के प्रति उनके सोच में भी परिवर्तन आ रहा है. यही
वजह है कि अब लोग अपने आसपास के जंगलों को बचाने और इनके संवर्धन में भी सहयोग करने
लगे हैं. इस आंदोलन के चलते पहाड़ों पर काफी हरियाली दिखने लगी है और सरकारी स्तर
पर होने वाले वृक्षारोपण की भी असलियत उजागर हुई है. गांव-गांव में मीत जंगलों की
श्रृंखलाएं सजने लगी हैं.
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मैती आंदोलन के प्रवर्तक
कल्याण सिंह रावत से
बातचीत
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नीयत
का
कमाल |
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इस आंदोलन की जो अवधारणा थी और
जो ताना-बाना बुना गया था, उससे ही यह उम्मीद की गई थी कि लोग जरूर इस
आंदोलन को अपनाएंगे और इसमें अपनी भावनात्मक दिल्चस्पी दिखाएंगे.
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पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म
देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके प्रेरणा से उत्तराखंड
के एक गांव से शुरु हुआ यह अभियान एक विराट और स्वयं स्फूर्त आंदोलन में बदल जाएगा.
मैती की धुन
अब
तो इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि इसके लिए किसी पर्चे-पोस्टर और बैठक-सभा करने
की जरूरत नहीं होती है. मायके में रहने वाली मैती बहनें शादियों के दौरान दूल्हों
से पौधे लगवाने की रस्म को खुद-ब-खुद अंजाम देती हैं.
विवाह के समय ही पेड़ लगाने
की इस रस्म के स्वयं स्फूर्त तरीके से फैलने की एक बारात में आए लोग भी होते हैं जो
अपने गांव लौटकर इस आंदोलन की चर्चा करने और अपने यहां इसे लागू करने से नहीं
चूकते. शादी कराने वाले पंडित भी इस आंदोलन का मुफ्त में प्रचार करते रहते हैं. अब
तो शादी के समय छपने वाले निमंत्रण पत्रों में भी मैती कार्यक्रम का जिक्र किया
जाता है.
आज की तारीख में आठ हजार गावों में यह आंदोलन फैल गया है और इसके तहत लगाए गए
पेड़ों की संख्या करोड़ से भी उपर पहुँच गई है.
करीब डेढ़ दशक पहले चामोली के ग्वालदम से फैला यह आंदोलन कुमाऊं में घर-घर होते हुए
अब गढ़वाल के हर घर में भी दस्तक देने लगा है. शुरुआती दौर में पर्यावरण संरक्षण के
वास्ते चलाए गए इस अभियान में महिलाओं और बेटियों ने इसमें सर्वाधिक भागीदारी
निभाई.
मैती का अर्थ होता है लड़की का मायका. गांव की हर अविवाहित लड़की इस संगठन से
जुड़ती हैं. इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ, घर में रहने वाली लड़कियां भी
शामिल होती हैं. इस संगठन को लड़कियों के घर परिवार के साथ गांव की महिला मंगल दल
का भी समर्थन-सहयोग प्राप्त होती है. बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी मैती की गतिविधियों में
शामिल होने से नहीं चूकती.
मैती वाली दीदी
मैती संगठन की कार्यविधि बिल्कुल साफ औऱ कदम सरल है. संगठन को मजबूत और रचनात्मक
बनाने के लिए सभी लड़कियां अपने बीच की सबसे बड़ी और योग्य लड़की को अपना अध्यक्ष
चुनती है, अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी का नाम दिया गया है. बड़ी दीदी का सम्मान उनके
गांव में उतना ही होता है जितना एक बड़े परिवार में सबसे बड़ी बेटी का होता है.
गांव के मैती संगठन की देखरेख और इसको आगे बढ़ाने का नेतृत्व चुनी गई बड़ी दीदी ही
करती है. बाकी सभी लड़कियां इस संगठन की सदस्य होती है. जब बड़ी दीदी की शादी हो
जाती है तो किसी दूसरी योग्य लड़की को बहुत सहजता के साथ संगठन की जिम्मेदारी सौंप
दी जाती है और यह क्रम लगातार चलता रहता है.
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प्रेम का पेड़
मैती आंदोलन अब केवल विवाह के मौके पर
दूल्हा-दुल्हन से वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रह गया है. इस संगठन ने
वैलेंटाइन डे जैसे आयातित मैके को भी गुलाब फूल लेने-देने के प्रचलन से
बाहर निकाल कर `एक युगल एक पेड़’ के कार्यक्रम से जोड़ दिया है.
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गांव की हरेक लड़की मायके में अपने घर के आसपास किसी सुरक्षित जगह पर अपने प्रयास
से किसी वृक्ष की एक पौध तैयार करती है. यह पौध जलवायु के अनुकूल किसी भी प्रजाति
की हो सकती है. कुछ लड़कियां जमीन पर पॉलिथीन की थैली पर केवल एक पौधा तैयार करती
है. गांव में जितनी लड़कियां होती हैं, उतने ही पौधे तैयार किये जाते हैं.
हरेक
लड़की अपने पौध को देवता मान कर या अपने जीवन साथी को शादी के समय़ देने वाला एक
उपहार मान कर बड़ी सहजता, तत्परता और सुरक्षा से पालती-पोसती रहती है. इस तरह अगर
गांव में सौ लड़कियां है तो सौ पौध तैयार हो रहे होते हैं.
किसी भी गांव की लड़की की शादी तय हो जाने पर बड़ी दीदी के मां-बाप से बातचीत करके
उनके घर के ही आंगन में या खेत आदि में शादी के समय अपने दूल्हे के साथ पौधारोपण कर
देती हैं. शादी के दिन अन्य औपचारिकताएं पूरी हो जाने पर बड़ी दीदी के नेतृत्व में
गांव की सभी लड़कियां मिल कर दूल्हा-दुल्हन को पौधारोपण वाले स्थान पर ले जाती हैं.
दुल्हन द्वारा तैयार पौधे को मैती बहनें दुल्हे को यह कह कर सौंपती हैं कि यह पौधा
वह निशानी है या सौगात है जिसे दुल्हन ने बड़े प्रेम से तैयार किया है.
मैती कोष भी
दूल्हा मैती बहनों के नेतृत्व में पौधा रोपता है और दुल्हन उसमें पानी देती है.
मंत्रोच्चार के बीच रोपित पौधा दूल्हा दुल्हन के विवाह की मधुर स्मृति के साथ एक
धरोहर में तब्दील हो जाता है. पौधा रोपने के बाद बड़ी दीदी दूल्हे से कुछ पुरस्कार
मांगती है. दूल्हा अपनी हैसियत के अनुसार कुछ पैसे देता है, जो मैती संगठन के कोष
में जाता है. मैती बहनों दूल्हों से प्राप्त पैसों को बैंक य़ा पोस्ट ऑफिस में या
गांव की ही किसी बहू के पास जमा करती रहती हैं.
इन पैसों का सदुपयोग गांव की गरीब बहनों की मदद के लिए किया जाता है. गरीब बहनों के
विवाह के अलावा इन पैसों से उन बहनों के लिए चप्पल खरीदी जाती है, जो नंगे पांव
जंगल में आती-जाती हैं या इन पैसों से गरीब बच्चियों के लिए किताब या बैग आदि खरीदे
जाते हैं. हरेक गांव में मैती बहनों को साल भर में होने वाली दस पंद्रह शादियों से
करीब तीन चार हजार से अधिक पैसे जमा हो जाते हैं. ये पैसे मैती बहनें अपने गांव में
पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रमों पर भी खर्च करती है.
08.08.2008, 14.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित