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संसद, कानून और जनता

मुद्दा

 

संसद, कानून और जनता

शशि कुमार झा


पश्चिमी राजनीतिक और विधिशास्त्रीय चिंतन में थॉमस हॉब्स और जॉन ऑस्टिन के ‘संप्रभु’ की संकल्पना को हमारे विधिवेत्ताओं ने जिस रूप में भी समझा हो, हमारे पेशेवर राजनीतिज्ञों और इस देश के सर्वसाधारण के लिए इस गुत्थी का सुलझना आज बेहद जरूरी हो गया है. क्योंकि कानून, और इसे बनाने तथा लागू करने का प्रक्रिया का सारा कार्य-व्यापार आज भी इस देश में इसी ‘संप्रभुता’ के एक अर्द्ध-सत्य के सहारे चलाया जा रहा है. वकीली के जरिए राजनीति में घुसपैठ करने वाली एक पूरी जमात ने अपने जिस ज्ञान को अपना हथियार बनाकर लोकतंत्र को एक अदालती अखाड़ा समझ लिया है, उनके वितंडावादी अहंकार को काबू में करने के लिए भी इससे जुड़े कुछ राजनीतिक सबक ज़रूरी जान पड़ते हैं.

अन्ना हजारे

लगभग 200 वर्ष पूर्व ऑस्टिन ने कहा था कि ‘कानून संप्रभु का आदेश है’. बाद में लोग इस परिभाषा से आगे भी बढ़े. लेकिन संप्रभुता की अवधारणा न केवल एक राष्ट्र-राज्य का दूसरे राष्ट्र-राज्य के साथ संबंधों में, बल्कि एक राज्य के भीतर भी जनता और राज्य-सत्ता के संदर्भ में भी एक विशेष अर्थ लिए रहा है. रज्य-सत्ता और जनता के बीच संप्रभुता को केवल मात्र एकतरफा बंधनकारिता या ऑबलिगेशन के संदर्भ में ही दुरूपयोग किए जाने के चलते इसका सरलार्थीकरण और विस्तारीकरण आवश्यक हो गया है.

लोकतंत्र में संप्रभु कौन है, इसका सैद्धांतिक और मूर्त्तमान स्वरूप क्या है, और किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में व्यवहारतः इसे घटित होते हुए कैसे समझा जाय, इन तमाम प्रश्नों को जब तक इनके राजनीतिक अर्थ में निरूपित नहीं किया जाता, तब तक इसके कानूनी अर्थ के डंडे से ही हम हाँके जाते रहेंगे.

संसदीय लोकतंत्र में संविधान, जनता और संसद, इन तीनों में कौन संप्रभु है, यह समस्या प्रथम दृष्ट्या ‘मुर्गी पहले या अंडा’ जैसी स्थिति जान पड़ती है. सैद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है. अस्थायी और परिवर्तनीय शासन को कायम करने के लिए सशर्त्त और तात्कालिक बहुमत एक व्यवस्था मात्र है, और इसलिए अल्पमत के हितों और विचारों का सम्मान करना भी इससे अपेक्षित है. संविधान भी जनता द्वारा चुने गए नुमाइंदों ने बनाया जिसे जनता ने स्वयं को ही आत्मर्पित किया. संसद जैसी संस्था जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के लिए बनाया गई वह संवैधानिक व्यवस्था है, जो अपने ‘प्रत्येक कार्य’ के लिए जनता के प्रति ‘हर क्षण’ उत्तरदायी है. संप्रभुत्त्वसंपन्न जनता के आदेश पर या उसकी सहमति से संसद संविधान में संशोधन भी कर सकती है, और इसका प्रावधान जनता ने अपने नुमाइंदों के माध्यम से स्वयं संविधान में किया हुआ है.

कानून संवैधानिक उपबंधों के दायरे में रहकर बनाए गए ऐसे सकारात्मक, निषेधात्मक और दंडात्मक प्रावधान या विनियम हैं, जिन्हें जनता ने एक सुचारू व्यवस्था के संचालन के लिए अपनी गतिशील मांगों और ज़रूरतों के आधार पर, अपने सक्रिय सहयोग और भागीदारी से अपने प्रतिनिधियों द्वारा बनवा कर इसे मान्यता प्रदान किया है, और सब पर समान रूप से आरोपित किया है.

इस प्रकार संसद, कानून और जनता, इन तीनों में जो कॉमन या सर्वनिष्ठ है, वह है जनता. बाह्य रूप से एक संप्रभुत्त्व संपन्न राज्य की संप्रभुता का वास्तविक श्रोत जनता की भौगोलिक चेतना से युक्त एक एकीकृत इच्छा ही है. राज्य के भीतर राजनीतिक रूप से बाँकी सारी व्यवस्थाएँ अस्थायी, तात्कालिक, परिवर्तनीय और गतिशील हैं. केवल उन मौलिक मानवीय और लोकतांत्रिक अधिकारों को छोड़कर जिनकी सार्वभौमिकता को स्वीकारते हुए उसे स्वयं जनता ने ही अपरिवर्तनीय या असंशोधनीय बनाया हुआ है. संप्रभु जनता की इस लोकतांत्रिक संकल्पना को समझने और आत्मसात करने के लिए हमारे कुछ कानूनविद् राजनेताओं और मंत्रियों को अपने कुछ अंधकानूनी आग्रहों को दिमाग से निकालने की ज़रूरत होगी, और यह समय की मांग और बढ़ रही जन-जागरुकता के हिसाब से उनके लिए एक बाध्यता है, न कि उनकी उदारता या सनक का मोहताज एक विचार मात्र.

एक प्रचंड कानून के लिए अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में अधीरता का परिचय देते हुए जिस गुस्से के साथ लोग सड़क पर आ रहे हैं, उसके तात्कालिक चरित्र को समझने की चौकसी के साथ ही उसके पीछे जाने की ज़रूरत कहीं ज़्यादा जान पड़ती है.
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