यह जलसा घर है यारो!
बात पते की
यह जलसा घर है यारो!
कनक तिवारी
इन दिनों 545 लोकसभा के सदस्यों और 120 करोड़ लोगों के संघर्ष में लोक जमात जूझ रहा
है. लोक जमात दूध है, उसे लोकतंत्र की हांडी में पिछले 64 वर्षों से पकाया जा रहा
है. सांसद उसी दूध की मलाई हैं. वे खौलते दूध की छाती पर चढ़कर इतराते हैं. फिर दूध
का साथ छोड़ देते हैं. उनका घी बनाकर उद्योगपति उनके मूल दुग्ध-चरित्र का ईमान ही
छीन लेते हैं. सांसद मलाई और मक्खन से घी बनकर लोक जीवन में हृदय रोग, उच्च रक्तचाप
और शक्कर की बीमारी वगैरह बढ़ाने के काम आते हैं. मलाई निकले दूध से छाछ बनी जनता
गैर पूंजीवादी और सर्वसुलभ तथा लोकतंत्र के लिए स्वास्थ्यकर खूराक होती जाती है.
कुछ सांसद अपनी कोख को कलंकित करते हुए टर्रा रहे हैं कि मातृत्व का उनके जीवन में
कोई अर्थ नहीं होता है. उनके लेखे पथभ्रष्ट बच्चे मातृत्व के लिए आदर्श गढ़ सकते
हैं. मां फिर भी मां है. वह उन्हें समझा रही है कि चाहे कुछ हो जाए, वह अपने स्नेह,
समर्थन और सदाशयता से बच्चों को वंचित नहीं करेगी. बच्चे जवान होने पर अपने बूढ़े
मां बाप को छोड़कर गुलछर्रे भी उड़ाते हैं.
भारतीय संविधान के भाग-2 में संसद का गठन अनुच्छेद 27 में है. इसमें लिखा है ‘संघ
के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी जिनके नाम राज्यसभा
और लोकसभा होंगे.’ अनुच्छेद 122 के अनुसार न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों
की जांच नहीं किए जाने का प्रावधान है.
मौजूदा राष्ट्रीय विवाद में अन्ना हज़ारे के साथ सुर मिलाकर देश कह रहा है कि उसकी
ओर से कथित सिविल सोसायटी द्वारा बनाए गए जन लोकपाल विधेयक का मजमून संसद के विचारण
के लिए रखा जाए. देश नहीं कह रहा है कि उसे संसद की कार्यवाही को उपेक्षित या बातिल
कर देने का अधिकार है. वह अलबत्ता यही चाहता है कि उसके द्वारा तैयार ड्राफ्ट को
सांसदों की बहस, विवेक और निर्णय के लिए पेश तो किया जाए.
मंत्री-सांसद कह रहे हैं कि वे उसी ड्राफ्ट पर विचार करेंगे जिसे सरकार अर्थात
मंत्रिपरिषद ने तैयार किया है. यह भी कि पांच मंत्रियों ने सिविल सोसायटी के पांच
सदस्यों के साथ मिल बैठकर जो विचार विमर्श कर लिया है उस उपकार को देश की जनता को
नहीं भूलना चाहिए. अंगरेज हुक्मरानों ने भारतीयों को डराने के लिए बार बार संसद के
सार्वभौम होने की घुट्टी पिला दी थी. ये प्रतिध्वनियां भारतीय सांसद डकार ले लेकर
हमारे कानों में उड़ेल रहे हैं. शातिर दिमाग के मंत्री कुछ चिकने चुपड़े पांच सितारा
बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और संविधान विशेषज्ञों की मदद से पूरे मामले को संसद बनाम
नागर समाज का विवाद बनाने पर उतारू हैं.
देश यह जानता है कि संसद में कोई भी विधेयक विचारण के लिए संविधान की व्यवस्थाओं के
अनुरूप ही रखा जाता है. इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 118 के अनुसार
"इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद का
प्रत्येक सदन अपनी प्रक्रिया और अपने कार्य संचालन के विनियमन के लिए नियम बना
सकेगा."
तदनुसार संसद ने कार्य संचालन के कई नियम बना लिए हैं. इन नियमों के अनुरूप संसद
में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों को स्थायी समिति अर्थात स्टैंडिंग कमेटी की नज़र से
गुजरना होता है. उसे एक तरह की विशेषज्ञ समिति समझा जा सकता है.
मंत्री गुनगुना रहे हैं कि अन्ना हज़ारे की टीम अब स्थायी समिति के सामने गुजारिश
करे. चुटकुला यह हो रहा है कि जब पांच मंत्रियों की अनौपचारिक गठित टीम ने सिविल
सोसायटी के जन लोकपाल विधेयक के ड्राफ्ट को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया तो अन्ना
की टीम स्टैंडिंग कमेटी के सामने नए सिरे से क्या लेकर सिर फुटौव्वल करे. महान
मंत्रिगण कपिल सिब्बल, चिदंबरम, प्रणव मुखर्जी, पवन बंसल, सलमान खुर्शीद, अंबिका
सोनी, अश्विनी कुमार, नारायण सामी और राजीव शुक्ला सहित कांग्रेस के कर्णधार
दिग्विजय सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी, मनीष तिवारी, राशिद अल्वी, संजय निरुपम वगैरह
देश की जनता को बताएं कि किस संसदीय प्रक्रिया के नियम के तहत देश का कोई नागरिक
उपवर्ग उस स्टैंडिंग कमेटी के सामने अपने तर्क रखेगा जिसके सामने उसी सिविल सोसायटी
का ड्राफ्ट भिजवाने के बदले मंत्रियों के समूह ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया हो.
संविधान जिस लफ्ज़ से शुरू होता है, वह कहता है ‘हम भारत के लोग.’ पूरी इबारत यह है
‘हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष
लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों कोः सामाजिक, आर्थिक
और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और
राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर
अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला,
सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित
और आत्मार्पित करते हैं.’
इस उद्देशिका के सपने को हासिल करना हम भारत के लोगों अर्थात जनता का कर्तव्य और
अधिकार दोनों है. इसमें कहीं भी कार्यपालिका, न्यायपालिका, संसद, राष्ट्रपति,
मंत्रिपरिषद वगैरह का उल्लेख नहीं है. वे तो माध्यम हैं. निमित्त मात्र हैं. जनता
के नुमाइंदे हैं. बाद में भाग 4-क में अनुच्छेद 51-क जोड़ा गया जिसे देश की जनता के
मौजूदा आंदोलन का मकसद समझा जा सकता है, बल्कि समझा ही जाना चाहिए.
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