मेरे देश की संसद मौन है
बात पते की
मेरे देश की संसद मौन है
राजकिशोर
जो लोग संसद बनाम सड़क का सवाल उठा रहे हैं, उनसे मैं एक प्रश्न करना चाहता हूँ. यह
ठीक है कि कानून स़ड़क पर नहीं, संसद में बनाए जाते हैं, लेकिन इस समय जब भ्रष्टाचार
के विरुद्ध और जन लोकपाल विधेयक के समर्थन में देश भर में लोक उभार आया हुआ है,
हमारी संसद मौन क्यों है? अगर संसद अपने आपको देश की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था
मानती है, तो जन लोकपाल विधेयक पर वह चुप क्यों है ? यदि संसद आज के इतने बड़े सवाल
पर, जो चौबीसों घंटे राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है, तुरंत विचार करने की
बैचैनी नहीं दिखाती, तो किस आधार पर हम यह दावा कर सकते हैं कि संसद देश की भावनाओं
का प्रतिनिधित्व करती है?
यहाँ मैं संसद और सरकार में फर्क करना चाहता हूँ. लोकपाल व्यवस्था के संदर्भ में
सरकार की सीमाएँ उजागर हो चुकी हैं. उसने संसद में अपना लोकपाल विधेयक पेश कर दिया
है. सरकारी विधेयक उस विधेयक के पासंग के बराबर भी नहीं ठहरता जिसके लिए अन्ना हजारे
पिछली बार जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे थे. अन्ना को मनाने के लिए सरकार ने संयुक्त
मसौदा समिति का प्रस्ताव रखा था. कायदे से इस समिति की बैठकों में सरकार और अन्ना
पक्ष को एक-दूसरे के करीब आना चाहिए था तथा अंत में एक सर्वसहमति उभरनी चाहिए थी.
अन्ना पक्ष इस समिति में शामिल हुआ तो हम यह मान कर चल सकते हैं कि वह कुछ मामलों
में लचीला रुख अख्तियार करने के लिए तैयार रहा होगा. यही अपेक्षा सरकार से भी थी.
पर धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि सरकार जन लोकपाल विधेयक की मूल व्यवस्थाओं पर
विचार करने के तक के लिए तैयार नहीं है. बाद में यह भी साबित हुआ कि सरकार अन्ना
हजारे के साथ वही सलूक करना चाह रही थी जो उसने बाबा रामदेव के साथ किया था.
लेकिन जो रुख सरकार का है, क्या वही संसद का भी नहीं है? संसद में जिन राजनीतिक दलों
का प्रतिनिधित्व है, उनकी एक संयुक्त बैठक लोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए
सरकार ने बुलाई. आखिर इन्हीं दलों के सदस्यों से ही तो संसद बनती है. सो कहा जा सकता
है कि यह मिनी संसद की बैठक थी. लेकिन इस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला. सरकार ने
अपना पक्ष नहीं रखा कि वह किस तरह का लोकपाल चाहती है. दूसरे दलों ने भी यह नहीं
बताया कि वे किस तरह का लोकपाल चाहते हैं. यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी ने भी, जो
शुरू से ही अन्ना के आंदोलन का समर्थन करती आ रही है, सुरक्षित रास्ता अपनाते हुए
कहा कि पहले कांग्रेस पार्टी बताए कि वह किस तरह का लोकपाल चाहती है, तब हम अपना
दृष्टिकोण रखेंगे. आज भी भाजपा का रुख यही है. कई अन्य दलों ने भी भाजपा की लाइन को
ही दुहराया.
क्या मिनी संसद अनिर्णय के भँवर में फँसी हुई थी? यह दावा करना कठिन होगा. असल में
मिनी संसद के सभी सदस्य अन्ना के विधेयक का समर्थन करने से बचना चाहते थे. उन्हें
यह विधेयक कतई पसंद नहीं है, क्योंकि वे सभी भ्रष्टाचार के दलदल में गले तक डूबे
हुए हैं. वे सिर्फ कहने के लिए मजबूत और निष्पक्ष लोकपाल की जरूरत की बात करते हैं.
लेकिन जब उन्हें सचमुच के शक्तिशाली और निष्पक्ष लोकपाल का चेहरा दिखाया जाता है,
तो वे डर जाते हं. और बहाना बनाने लगते हैं कि इस पर संसद में विचार-विमर्श होना
चाहिए. यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी ऐसा लोकपाल नहीं चाहतीं जो राजनीतिक और
प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सक्षम हो.
भ्रष्टाचार की वर्तमान प्रणालियाँ जारी रहें, इस मामले में जब इतनी दृढ़ और जिद्दी
सर्वसहमति हो, तो संसद से क्या उम्मीद की जा सकती थी? लोकपाल का मामला सिर्फ मनमोहन
सिंह की सरकार या सोनिया गांधी की कांग्रेस का नहीं है. अब यह हमारी संसदीय व्यवस्था
का एक शीर्ष मुद्दा बन चुका है. इसलिए लोकपाल व्यवस्था का सही स्वरूप क्या हो, यह
तय करने का काम संसद को ही सौंप दिया जाना चाहिए था.
जिस संसद की संप्रभुता का आजकल इतना गुणगान किया जा रहा है, उसका कर्तव्य क्या यह
नहीं था कि वह आम राय से एक आदर्श लोकपाल विधेयक बनाती? अगर ऐसा होता, तो वह विधेयक
जुलाई के अंत तक पास भी हो सकता था. लेकिन संसद ने इस मामले में कोई पहल नहीं की.
वह खामोशी से इंतजार करती रही कि सरकार क्या करती है. जिस संसद ने अपने आपको सरकार
के हवाले कर दिया हो, उसकी संप्रभुता की चर्चा करना महज एक राजनीतिक रूढ़ि है – इसके
सिवा कुछ भी नहीं. इस रूढ़ि के विद्वान पैरवीकार हमसे यह मनवाना चाहते हैं कि संसद
का मतलब सरकार है और हमें भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन जारी रखने के बजाय समाधान
निकालने की जिम्मेदारी सरकार पर सौंप देनी चाहिए. ज्यादा साफ ढंग से कहें तो
अपराधियों से ही यह उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपराध रोकने का कारगर तरीका बताएँगे.
भ्रष्टाचार के ज्वलंत मुद्दे पर संसद की उदासीनता इस तथ्य से भी प्रगट होती है कि
जब सरकार ने अपना लोकपाल विधेयक पेश किया, तो संसद में एक भी आवाज नहीं उठी कि आप
यह झुनझुना पेश कर संसद का अपमान कर रहे हैं. सरकार ने एक लूला-लँगड़ा विधेयक पेश
किया और थोड़ी देर की औपचारिक बहस के बाद उसे संसद की स्थायी समिति के सुपुर्द कर
दिया गया. संसद ने स्थायी समिति से यह अनुरोध भी नहीं किया कि मामला बहुत ही फौरी
महत्व का है और इस मुद्दे पर अन्ना हजारे फिर अनशन करने जा रहे हैं, इसलिए स्थायी
समिति रोज बैठक कर अपनी सिफारिशें तय करे और संसद को सौंप दे, ताकि विधेयक को अंतिम
रूप दे कर पारित किया जा सके.
अन्ना के अनशन के मामले में दिल्ली पुलिस और प्रशासन की काफी किरकिरी हो चुकी है.
कांग्रेस के नेता शर्मसार हैं. केंद्र सरकार की घिग्घी बँधी हुई है. अब संसद ही
एकमात्र आशा है. इसलिए संसद का राष्ट्रीय कर्तव्य है कि वह लोकपाल के मुद्दे पर
तुरंत इमरजेंसी बैठक करे और किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुँचे. मेरा खयाल है, अगर
संसद लोक भावनाओं का सम्मान करते हुए लोकपाल विधेयक को एक नया रूप देती है, तो उसके
और अन्ना के विधेयक के बीच खास अंतराल नहीं रह जाएगा.
अगर ऐसा नहीं होता है और सरकार तथा विपक्ष अभी भी ठस और संवेदनहीन बने रहते हैं, तो
धूमिल की ये पंक्तियाँ एक बार फिर प्रासंगिक हो जाएँगी-
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है.
24.08.2011, 00.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित