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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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हमको अण्णा मांगता !

बात पते की

 

हमको अण्णा मांगता !

सुभाष गाताडे


प्रस्तावना
कभी-कभी वास्तविक जिन्दगी यानी रियल लाईफ, रील लाईफ अर्थात फिल्मी जिन्दगी का अनुकरण करती दिखती है. पिछले दिनों वही नज़ारा हम सबके सामने नमूदार रहा है. ऐसे दृश्य बॉलीवुड की फिल्मों का ही हिस्सा हुआ करते थे, जब कोई नामालूम-सा नायक अचानक ऐसा कोई कदम उठाता कि लाखों लोग सड़कों पर उतर आते और शैतान यानी जनता के दुश्मन का खातमा हो जाता है.

अन्ना हजारे

अभी उस मुहिम पर पटाक्षेप हो चुका दिखता है, मगर विगत कुछ दिनों से (बकौल 24 *7 मीडिया) ‘अण्णा की अगस्त क्रान्ति’ से या ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ से हम रूबरू हो रहे हैं, जिसमें 74 साल का एक रिटायर्ड फौजी - जिसका नाम चन्द माह पहले तक सूबा महाराष्ट्र तक सीमित था- तमाम लोगों का नायक बन कर उभरा है. राजनीति से दूर रहनेवाली युवा पीढ़ी से लेकर गृहिणियों, किशोरों, बुजुर्गों तक, समाज के विभिन्न तबकों को उसकी मराठीमिश्रित हिन्दी में व्यक्त विचारों में उम्मीद की नयी किरण नज़र आ रही है. देश के विभिन्न शहरों, नगरों, कस्बों में उसके समर्थन में जुलूस निकले हैं. और अगर स्वतंत्र स्त्रोतों से आने वाली ख़बरों पर यकीन करें तो यही सुनाई दे रहा है कि हुकूमत की बागडोर सम्भालने वाले लोग इस अलग ढ़ंग की ‘सुनामी’ से निपटने के लिए नये नये फार्मूलों पर सोचते रहे हैं. ताज़ा ख़बर यह भी है कि संसद की बैठक में लोकपाल बिल के विभिन्न मसविदों को लेकर चर्चा शुरू करने का आश्वासन दिया गया है.

अगर हम फिलवक्त इस ‘उभार’ से जुड़े कई विवादास्पद/कम चर्चित पहलुओं पर गौर न करें तब भी यह मानना ही पड़ेगा कि भ्रष्टाचार के मसले पर ली गयी इस पहल ने तमाम लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है. भले ही जनलोकपाल के प्रावधानों से लोग परिचित न हों, मगर उन्हें लगता है कि इस नये नुस्खे से उन्हें उन तमाम दिक्कतों, परेशानियों से निज़ात मिलेगी, जिसका सामना उन्हें आए दिन सरकारी दफ्तरों में करना पड़ता है.

स्पष्ट है कि इस अप्रत्याशित ‘आंधी’ ने तमाम सियासी पार्टियों के समीकरण फिलवक्त ध्वस्त किए हैं. अपने युवराज की छवि से आल्हादित कांग्रेस पार्टी रक्षात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर हुई है; भाजपा जो इस पूरे आलोडन के खतम हो जाने के बाद सबसे अधिक सियासी लाभ ले पाने की स्थिति में दिखती है, वह भी फिलवक्त उस सेनापति की तरह नज़र आ रही है, जिसकी तमाम दूरंदेशी का फायदा दूसरे लोग उठाते दिख रहे हैं. यह अकारण नहीं है कि संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की हालिया बैठक, जिसमें आडवाणी, गडकरी एण्ड कम्पनी के लोगों को भी बुलाया गया था; वहां भाजपा के इन कर्णधारों को संघ सुप्रीमो की यह डांट सुननी पड़ी कि आखिर वे क्यों नहीं ऐसी सरगर्मी खड़ा कर सके ! इतना ही नहीं, भाजपा संसदीय दल की बैठक में भी कुछ वरिष्ठ सांसदों ने पार्टी के इस मसले पर रूख को ढुलमूल करार दिया है और नेतृत्व को यह कह कर कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की कि वह जनता के अन्दर उफनते गुस्से को भांप नहीं सकी.

मगर समाजी-सियासी बढ़ते पारे में सबसे अधिक दिग्भ्रम की स्थिति में सामाजिक आन्दोलनों के लोग या वाम के धड़े दिखे हैं, जिनके सामने यह यक्ष प्रश्न बना रहा है कि किया क्या जाए ?

आधिकारिक तौर पर वामपंथी पार्टियों ने ‘जन लोकपाल बिल’ के बारे में कोई पोजिशन नहीं ली है, मगर स्थानीय स्तर पर हम पा रहे हैं कि उनके संगठनों के कार्यकर्ता इस ‘ऐतिहासिक क्षण’ में जनता के साथ खड़े रहे दिखना चाहते रहे हैं. शायद इस उलझन की स्थिति का ही नतीजा था कि जनान्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के अन्दर भी लम्बे समय तक उहापोह की स्थिति बनी रही. औपचारिक तौर पर अण्णा हजारे की मुहिम को समर्थन देने के बावजूद मेधा पाटेकर जैसे उसके अग्रणी नेता पहले उससे दूर रहे, और आज भी कई लोग अन्दर ही अन्दर दूरी बनाये हुए हैं.

दिग्भ्रम की स्थिति का आलम यह है कि मैं खुद यह पा रहा हूं कि विगत लगभग दो दशक से तमाम ऐसे साथी, दोस्त जो साम्प्रदायिकता, मजदूरों के जनवादी अधिकार, जातीय उत्पीड़न, अमरीकी दादागिरी या ऐसे ही तमाम जनपक्षीय मसलों पर हमेशा साथ खड़े रहते आए हैं, वह स्पष्टतः अलग खेमे में बंटे हुए हैं. प्रस्तुत आलेख एक कोशिश है इस मसले पर मित्रों द्वारा या आंदोलन से जुड़े विचारकों द्वारा या स्वतंत्र विश्लेषकों द्वारा जो कुछ लिखा गया है/ लिखा जा रहा है, उसकी चुनिन्दा बातों को आप के साथ साझा करना और यह उम्मीद करना कि विभ्रम की यह स्थिति जल्द ही दूर होगी. (पाठक समुदाय से इस बात के लिए माफी चाहूंगा कि यह आलेख उनके पास तब पहुंच रहा है, जब आंदोलन का यह चरण समेटे जाने के करीब है.)

वैसे कोई सत्तर के दशक का एक उद्धरण देकर यह भी कह सकता है- “यह जमाना ही ऐसा है कि अगर आप कनफ्यूज्ड नहीं हैं तो इसका मतलब है कि आप सही ढ़ंग से सोच नहीं रहे हैं.”

एक
भारत के स्वतंत्र वाम की यह खासियत है कि वह हमेशा अपने आप को लोकप्रिय उभारों के खिलाफ खड़ा पाता है. लोकपाल आंदोलन इसका अपवाद नहीं है. (मेल टुडे में प्रकाशित आलेख से).

निवेदिता मेनन, जो इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाती है, ने अपने एक आलेख में आंदोलन के बारे में अपनी चिन्ताओं को सांझा किया है. (मेलटुडे, 24 अगस्त 2011, kafila.org) लोकपाल आंदोलन के प्रति वाम के रूख पर इस लेख में उनका फोकस है. वाम के अपने मायने स्पष्ट करते हुए वह लिखती हैं कि वह कुछ सौ लोग “जो उनकी अपने समूह/कम्युनिटी का हिस्सा हैं- ऐसे लोग जिनके साथ मैंने विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया है, अभियानों का संचालन किया है, धरने पर बैठी हूं और विभिन्न मसलों पर याचिकाएं भी दायर की हैं.”. उनका कहना है कि ‘वाम’ हमेशा ‘अपने आप को ऐसी स्थिति में क्यों पाता है, जहां ‘पीपुल/अवाम’ नहीं होता है.’
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