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सबका इलाज करेंगे डेंटिस्ट

मुद्दा

 

सबका इलाज करेंगे डेंटिस्ट

रघु ठाकुर


मध्य-प्रदेश की सरकार ने विचाराधीन निर्णयों में एक हास्यास्पद निर्णय को शामिल किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में बी.डी.एस. चिकित्सकों यानी दंत चिकित्सकों को नियुक्त किया जायेगा. इस आशय का पत्र संचालक चिकित्सा के स्तर पर स्वीकृत हो चुका है और अखबार की सूचना के अनुसार इसे अंतिम निर्णय के लिये सितंबर माह में प्रदेश के मंत्रिमण्डल में रखा जायेगा.

डाक्टर


इस आशय के निर्णय के लिये दो तर्क चिकित्सा विभाग के अधिकारियों के द्वारा दिये गये हैं. पहला ये कि ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों की कमी है और 2500 चिकित्सकों की आवश्यकता है और दूसरा ये कि एम.बी.बी.एस. पास करने वाले डॉक्टर या तो स्नातकोत्तर डिग्री के लिये या फिर असुविधाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जाना चाहते.

इन दोनों का निष्कर्ष यह है कि सरकारें चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्रों में जाने को बाध्य करने की क्षमता नहीं रखतीं और इसके लिये उन्होंने यह तरीका निकाला कि दंत चिकित्सकों के लिये एक वर्ष का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम किया जायेगा और वे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में नियुक्त किये जायेंगे.

दंत चिकित्सक अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं और दंत चिकित्सा के लिये विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है. देश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति इतनी बदतर है कि वहां चिकित्सकों या कर्मचारियों को बैठने और रहने के लिये सुरक्षित स्थान तक नहीं है. अभी जिन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में जो चिकित्सक नियुक्त किये गये है, वे शायद ही कोई उन कस्बाई केन्द्रों में रहते हों. वरना वे आसपास के शहरी क्षेत्र में जाकर रहते हैं तथा अपनी सुविधा से आना जाना करते हैं.

जिन बी.डी.एस. को सरकार नियुक्त करना चाहेगी, वे नौकरियॉं, वेतन के लिये भले ही स्वीकार कर लें परन्तु वे उन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में ठहरने वाले नहीं हैं. इसके अलावा उनकी विशेषज्ञ योग्यता का कोई इस्तेमाल भी इन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में नहीं होगा क्योंकि वहां उनके पास आवश्यक उपकरण नहीं होंगे. प्रदेश में 2500 चिकित्सकों की आवश्यकता है और 750 दंत चिकित्सकों की. परन्तु राज्य सरकार 2500 चिकित्सकों यानी एम.बी.बी.एस. डॉक्टरों को नियुक्त नहीं कर पर रही है और 750 दंत चिकित्सकों को उन शहरी अस्पतालों में जहां दंत चिकित्सक के पद रिक्त हैं, इसलिये नहीं नियुक्त कर पा रही क्योंकि उनके वेतन आदि के लिये वित्तीय प्रावधान नहीं किये गये. इसके लिये सरकार के पास धनाभाव है.

हमारे देश में भले ही संविधान में लिखा हो कि कानून की नजरों में सब समान हैं परन्तु देश में दो प्रकार के कानून चलाये जाते हैं. एक, संपन्न और ताकतवर तबके के लिये और दूसरा कमजोर लोगों के लिये. यह भी दुखद है कि ने केवल सरकारें बल्कि न्यायपालिकायें भी अपने वर्गीय संबंधों के आधार पर फैसला देती हैं. दिल्ली के एम्स के डॉक्टर जब बगैर सूचना के हड़ताल करते हैं और एम्स प्रबंधन या सरकार कोई कार्यवाही करने की पहल करती है तो सर्वोच्च न्यायालय तत्काल हस्तक्षेप करता है तथा सरकारी कार्यवाही को निरस्त कर उन अवैधानिक हड़ताली चिकित्सकों की मांग को पूरा करने का आदेश देता हैं क्योंकि एम्स के अधिकांश चिकित्सकों के संबंधों के तार कहीं न कहीं श्रेष्ठि वर्ग के साथ जुड़ जाते हैं.

म.प्र. के सिहोरा के एक पैथालॉजी लैब चलाने वाले डिप्लोमाधारी की रपट में त्रुटि पाये जाने पर माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर ने सारे प्रदेश में डिप्लोमाधारी पैथालॉजिकल जांच करने वालों पर रोक लगा दी और यह अनिवार्य कर दिया कि किसी न किसी एम.बी.बी.एस. डॉक्टर की देखरेख में जांच रिर्पोट तैयार होनी चाहिये. जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि पैथालॉजिकल लैब एम.बी.बी.एस. उत्तीर्ण चिकित्सकों ने चार-चार, पांच-पांच संग्रह केन्द्र खोल लिये हैं तथा बगैर डिप्लोमाधारी थोड़ी-सी तनख्वाह या पैसों में उनके यहां जांच करते हैं. वे केवल हस्ताक्षर करते हैं. पुराने डिप्लोमाधारी जांचकर्ता भी अपने अपने इलाकों में संग्रह व जांच करते हैं और रपट पर हस्ताक्षर कराने के लिये पैथालॉजी लैब के एम.बी.बी.एस. चिकित्सकों को कमीशन या रिश्वत देते हैं. अगर इसका सर्वेक्षण होगा कि एक पैथालॉजिकल डॉक्टर के हस्ताक्षर से एक माह, एक दिन में औसतन कितने परीक्षण हुए हैं, जिन पर उनके हस्ताक्षर रहे हैं तो यह स्पष्ट हो जायेगा.

प्रदेश सरकार ने कुछ स्थानों पर चिकित्सकों के ऊपर हुए हमलों को लेकर चिकित्सकों के ऊपर हमलों के संबंध में एक पृथक कानून बना दिया है, जिसमें अलग से ज्यादा दण्ड का प्रावधान है. निःसंदेह रूप से कोई भी समझदार व्यक्ति चिकित्सकों के ऊपर होने वाले हमलों का सर्मथन नहीं करेगा और इसके विरूद्ध में खड़ा होगा परन्तु चिकित्सकों पर हमले का दण्ड अलग हो और सामान्य व्यक्ति पर अलग हो, यह भेदभावपूर्ण कानून है और जो सरकार की सामंती मानसिकता का द्योतक है. क्या यह 21 वीं सदी की मनु स्मृति जैसी नहीं है, जिसमें जाति आधार पर अलग अलग दण्ड के प्रावधान किये गये थे ?

दूसरी तरफ यह भी एक सुविदित तथ्य है कि विशेषतः सरकारी अस्पतालों में बहुतेरे डॉक्टर न केवल मरीज को अपने घर पर देखते हैं बल्कि उन्हें निजी संस्थानों में या निजी चिकित्सालयों में जाने को प्रेरित करते हैं. उनके अपने मरीजों के लिये फीस के बदले में सरकारी चिकित्सालय में प्राथमिकता से बेड दे दिये जाते है, अनावश्यक जांचों, दवाओं के ऊपर मरीजों का हजारों रुपया निरर्थक व्यय कराते हैं क्योंकि उसमे उनका कमीशन शामिल होता है. परन्तु ऐसे चिकित्सकों पर आज तक एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है. मुकदमा दर्ज होना तो दूर की बात है, इन चिकित्सकों के विरूद्ध रपट भी तभी लिखी जा सकती है, जब दो चिकित्सक विशेषज्ञ अपनी रपट में इस बात की पुष्टि करें कि उपेक्षा बरती गई या गलत चिकित्सा हुई. जाहिर है कि चिकित्सा विशेषज्ञ इन एम.बी.बी.एस. डॉक्टरों के विरूद्ध शायद ही कभी रिर्पोट दें.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दुर्वेश [vichar2000@gmail.com] भोपाल - 2011-10-08 11:37:52

 
  रघु जी, लूटरे लूटने का धर्म निभा रहे है. आम जनता लुटने का धर्म निभा रही है. आप भी लेखक का धर्म निभाते रहिये. ...सब अपनी जगह खुश है.  
   
 

mujeeb alam ansari [ansari085@gmail.com] lucknow - 2011-10-07 09:22:47

 
  its an excellent step to remove unemployment from dental field. 
   
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