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मोहन राणा की तीन कविताएं

साहित्य

 

मोहन राणा की तीन कविताएं


परसों का नाश्ता आज

मोहन राणा

समय पर सब कुछ होने की सलाह दी जाती
जल्दी क्या !
और मैं खुद ही देता हूँ
अपनी मोच पर किस्मत का मरहम लगाते हुए
पर तारीखें जैसे पहले से तय
बस याद नहीं कि क्या हो चुका
असावधान वर्तमान में हमेशा अतीत ही उपस्थित,
हाथ बाँधे सिर झुकाए. पर मैं कभी नहीं पहचान पाता.

हरे पेड़ भी भयभीत उस बादल की छाया में
जो प्रकट होता है बेआवाज़,
मुझे बताने से क्या फायदा
आप खुद सुनना नहीं चाहते अपनी जुबानी
कि हजारों फीट से मिसाइल कहीं और ही गिराई जाती है,
सुबह आराम से चाय के साथ पढ़ते हुए
आज खा रहा हूँ परसों का नाश्ता


पानी का रंग
(जेन के लिए)
यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज़ पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुजर चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से

कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,

शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज़ तब पानी के रंग की होगी !


पनकौआ
कुछ दिनों में आएगा एक मौसम
इस अक्षांश में अगर वसंत हुआ
मैं कपड़ों को बदलूँगा
आस पास के नक्शे देखूँगा टहलने के लिए
पेड़ों पर कोंपले आएँगी
बची हुई चिड़ियाएँ लौटेंगी दूर पास से,
आशा बनी है ऐलान ना होगा खबरों में
किसी नई लड़ाई का
खंखारूँगा गला पूरा कहने अधूरा कि चुप हो जाउँगा
लंबा हो इतना इस बार कि यादें जल्दी ना लौटें
पतझर की, शब्दों के एकांत में

#

छोटा होता जा रहा वसंत हर साल
हर साल छोटा हो रहा है वसंत में,
कभी लगता शायद दो ही मौसम हों अब से
दो जैसे
अच्छा बुरा
सुख दुख
प्रेम और भय
तुम और मैं
जिनमें बंट जाएँ पतझर और वसंत और होती रहे सूखती बारिश साल भर

#

यूँ ही सोचा लिखा जाना रसोई से आती किसी स्वाद की गंध
अपनी आस्तीन में पाकर
नीरव पिछवाड़े में कुछ बूझने की चाह में
एक छोटी सी जगह में कोई तिल भर कुनिया खोजता
तो कुछ दिनों में आए केवल एक समय
दुनिया को बाँटने
जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सब कुछ


जरूरी सामान की पर्चियों के साथ अकेले,
जीने के लिए केवल सांस ही नहीं
प्रेम की आँच मन के सायों में
हाथ जो गिरते हुए थाम लेता

#

रोज की रेजगारी गिनतारा में बेगार के उधारों को जोड़ते
जर्जर समकाल में घबराए सूखे गालों को टटोलते
नहीं देखा मैंने अब तक इस व्यतीत को,
आइने के भीतर से
जब लगाता हूँ मैं छलांग उसके उजले अनजान में
कुछ पाने कुछ खोकर.

04.09.2011, 08.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Raj Rawat [rawatraju7@gmail.com] rishikesh Uttranchal - 2011-10-18 11:55:06

 
  बहुत अच्छी कविताएं शब्दों में बाँध कर उसका एक निरूपित कर देने वाली प्रतिभा है. 
   
 

sarita sharma [] gurgaon - 2011-10-04 23:16:26

 
  बहुत अच्छी कवितायेँ.मोहन राणा की पहले की कविताओं की अपेक्षा इनमें नया स्वर उभर रहा है जो इन्हें और भी दिलचस्प और गहन बना देता है. 
   
 

sudarshanvashishtha [vashishthasudrashan@yahoo.com] shimla - 2011-09-13 02:17:30

 
  बहुत अच्छी कविताएं... 
   
 

(डॉ.) कविता वाचक्नवी [kavita.vachaknavee@gmail.com] United Kingdom - 2011-09-12 09:25:57

 
  मोहन राणा बहुत साधारण-से प्रतीत होने वाली संवेदना को शब्दों में बाँध कर उसका एक विशिष्ट अर्थ निरूपित कर देने वाली प्रतिभा के सहज व्यक्तित्व वाले कवि हैं। नई कविता और उसके बाद की परंपरा और मुहावरे को समझने वाले पाठक के लिए ये सहज ग्राह्य हैं। सभी कविताएँ अच्छी लगीं,विशेषतः पनकौआ। बधाई !! 
   
 

shashankmisra [shashank.misra73@rediffmail.com] shahjahanpur - 2011-09-11 16:13:56

 
  सुंदर प्रस्तुति. लेखनी को सार्थक बनाती हुई. मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

Usha Raje Saxena [usharajesaxena@gmail.com] Britain - 2011-09-05 12:29:40

 
  मोहन राणा अपनी कविताओं में भावो को एक बिशेष अँदाज़ में अभिव्यक्त करते है जिसे पढ़ कर आनंदित हर पाठक हो सकता है परंतु कविता में छिपे मूल भाव को पूरी तरह वही ग्रहण कर सकता है जो मुक्तिबोध और मंगलेश डबराल जैसे कवियो की कविता को आत्मसात कर सकता है. बधाई! मोहन राणा.  
   
 

shikha varshney [shikha.v20@googlemail.com] - 2011-09-05 10:38:38

 
  दिल की गहराइयों तक असर करती क्षणिकाएं.बेहतरीन. 
   
 

गिरीन्द्र नाथ झा [girindranath@gmail.com] कानपुर - 2011-09-04 11:20:53

 
  राणा साब को धूप के अंधेरे से पढ़ रहा हूं। वे शब्दों के जरिए मन के द्वार खोलते हैं। अब इसी में देख लें, कवि कहते हैं-असावधान वर्तमान में हमेशा अतीत ही उपस्थित. सीधे मन तक वे पहुंच गए। उन्हें पढते हुए पाठक को कई कोणों पर विचार करना होता है..कई कोणों पर..। कोसी इलाके में कहावत है- घाट न सूझे बाट न सूझे..सूझे न अप्पन हाथ....राणा साब उसी अप्पन हाथ से हमारी मुलाकात कराते हैं। 
   
 

Himanshu [patrakar.himanshu@gmail.com] Noida - 2011-09-04 03:10:26

 
  इन कविताओं में हमारा जीवन सत्य सामने आता है. अचरज की बात है कि हिंदी आलोचना को इतनी सुंदर कविता लिखने वाले कवि की सुध लेने की फुरसत नहीं है. 
   
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