खेल पर ज़रूरी सवाल
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खेल पर ज़रूरी सवाल
एम जे अकबर
भारतीय खेल फ़ेडरेशन के
कामकाज को लेकर प्रफ़ुल्ल पटेल ने अपनी तरफ़ से एक मजबूत दलील पेश की. उड्डयन मंत्री
रह चुके पटेल का कहना था कि अगर नेशनल खेल विधेयक पारित हो जाता है, तो संयुक्त
सचिव जैसे नौकरशाह फ़ेडरेशनों को चलाएंगे. आखिर खेल प्रशासन पर इनकी कितनी पकड़ है?
प्रफ़ुल्ल जी बिलकुल सही हैं. लेकिन इसमें एक छोटी-सी दिक्कत है. आखिर आपने क्यों
एयर इंडिया के मुख्य कार्यकारी के पद पर एक के बाद एक संयुक्त सचिवों की नियुक्ति
की. क्या उनमें एयर इंडिया को चलाने की योग्यता थी? बेशक वे खुद को ताउम्र भ्रमण
सुविधाएं देने में माहिर थे.
राजनेताओं और संयुक्त सचिवों के इस गठजोड़ ने कभी देश की शान कहलाने वाली इस
एयरलाइंस को बर्बाद कर दिया. यह सही है कि इंडियन एयर लाइंस राष्ट्रीय खुशी से
ज्यादा तनाव देती थी. इसके बावजूद यह उड़ तो रही थी. अपना ईंधन खुद खरीद सकती थी.
अपने कर्मचारियों को वेतन दे सकती थी. एयर इंडिया में इसके विलय ने इसे जीवन की ओखरी
सांसे गिनने की स्थिति में ला खड़ा किया है. अब यह राजकीय खजाने की मदद पर अश्रित
है.
बहुत मुमकिन है कि प्रफ़ुल्ल पटेल इन सारी बातों का जवाब देने के लिए व्यवस्था को
दोष दें. यह सही है कि पिछले दो दशकों में भारत में नौकरशाही ने कभी पेशेवरों द्वारा
चलायी जाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है.
जबकि इस नौकरशाही को मूलत: लोकप्रशासन के प्रबंधन की ट्रेनिंग दी गयी थी. यह
हस्तांतरण राजनेताओं की इच्छा से ही हुआ है. ऐसा शायद इसलिए है कि हमारे राजनेता
पेशेवरों की बनिस्बत नौकरशाहों के साथ ज्यादा सहज महसूस करते हैं.
प्रफ़ुल्ल पटेल राजनेताओं के समूह में सबसे कम कसूरवार माने जा सकते हैं. हमारी
व्यवस्था में इस परिवर्तन की शुरुआत इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल के दौरान हुई.
उनके उत्तराधिकारियों के कार्यकाल में यह चलन जीवन गंभीर रोग की शक्ल अख्तियार कर
चुका है. नौकरशाही ने सार्वजनिक क्षेत्र को अपनी जागीर की तरह हस्तगत कर लिया. अब
नौकरशाही सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधन के लिए अपने गलियारे के बाहर झांकने का
दिखावा भी नहीं करती.
यह इस तथ्य के बावजूद है कि इसने कई संस्थानों को धराशायी कर दिया है. धराशायी करने
का यह रूपक एयर इंडिया पर तो बिलकुल सटीक बैठता है.इस मामले में एक ध्यान देने लायक
अपवाद भी है. जब स्वर्गीय माधव राव सिंधिया को उड्डयन मंत्रालय की कमान सौंपी गयी
थी, तब उन्होंने योगी देवेश्वर को निजी कंपनी आइटीसी से बुलाकर एयर इंडिया का
प्रमुख बनाया था. देवेश्वर ने करार की अवधि तक अपने पद पर काम किया और जाते वक्त
सरकार को फ़ायदे का एक बड़ा-सा चेक थमा कर गये. उसके बाद से अब तक चेक देने का काम
प्राय: सरकार ही करती रही है.
एक तरह से खेल मंत्री अजय माकन भी बीसीसीआइ के साथ वही करना चाह रहे हैं, जो दूसरे
मंत्रियों ने अन्य उद्योगों के साथ किया है-पूरी तरह से एक स्वस्थ संस्थान को जनहित
के नाम पर अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश.
इस मसले पर कि संयुक्त सचिवों को राजनीतिज्ञों के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से
रोका जाना चाहिए, मैं प्रफ़ुल्ल पटेल और फ़ारूक अब्दुल्ला से पूरी तरह सहमत हूं,
जिनको लगता है कि वे अपने काम को बिलकुल सही तरीके से कर सकते हैं. उन राजीव शुक्ला
से भी, जो आइपीएल को संसद चलाने के बाद बचने वाले खाली समय में चलाना चाहते हैं. उन
शरद पवार से भी, जो भारतीय क्रिकेट के नये पिता बने हैं.
आप लोगों में कुछ ऐसे जरूर होंगे, जो अकसर यह सवाल करते हैं कि ऐसे राजनीतिज्ञों को
आखिर क्रिकेट या हॉकी के नियंत्रण का जिम्मा कैसे दिया जा सकता है, जिन्होंने अपने
जीवन में कभी न तो बैट पकड़ा है, और न हीं एक भी गोल किया है. यहां इस बहस को किसी
दूसरे दिन के लिए छोड़ देते हैं.
मेरा कहना है कि पवार और उनके जैसे कुछ भी हो, कम से कम एक ऐसी कमिटी से चुन कर उस
पद बिठाये गये हैं, जिनके पास अपने पसंद के मुताबिक लोगों को चुनने का हक है.
कैबिनेट ने अजय माकन को प्रस्तावित नेशनल स्पोर्ट्स बिल का नये सिरे से प्रारूप
बनाने को कहा है.
सवाल है आखिर किसी सरकार में खेल मंत्रालय हो ही क्यों? अगर अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल
के लिए इंग्लिश प्रीमियर लीग को आज अपरिहार्य माना जाता है, या बीसीसीआइ का शुमार
उल्लेखनीय सफ़लता की कहानी के तौर पर किया जाता है, तो इसकी वजह यही है कि ये कभी
भी सरकार की मदद पर आश्रित नहीं रहे. हद से हद एक खेल विभाग का काम किसी संकटग्रस्त
खेल को मदद देने के लिए हो सकता है. यह काम वित्त मंत्रालय आसानी से कर सकता है. इसी
तर्क पर आखिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय का क्या काम है? जबकि दूरदर्शन एक स्वायत्त
निकाय है.