सच्चिदानंद सिन्हा से रेयाज-उल-हक की बातचीत
संवाद
राजनीति में अब
नैतिकता की कोई जगह नहीं
सच्चिदानंद सिन्हा से
रेयाज़-उल-हक़ की बातचीत
मुजफ्फरपुर के मुसहरी प्रखंड में एक छोटे-से गांव मणिका-जो उनका गांव नहीं है,
लेकिन 29 वर्षों से रहने के बाद अपने गांव जैसा हो गया है; में
रहते हुए सारी दुनिया में चल रही गतिविधियों पर उनकी पैनी नजर रहती है. इस
सितंबर में वे अपने जीवन के 80 वर्ष पूरे करेंगे-एक कार्यकर्ता और एक
अध्येता-विचारक के रूप में अपने जीवन के 80 वर्ष. हाल में भारतीय समाज में घट रही
घटनाओं और सतह के नीचे आ रहे बदलावों पर समाजवादी लेखक-विचारक
सच्चिदानंद सिन्हा से एक लंबी बात हुई. प्रस्तुत हैं इसके कुछ प्रमुख अंश.
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इस पूरी
व्यवस्था में ही फ्रॉड (धोखा) निहित है |
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शुरुआत संसद में कथित तौर पर वोट के लिए दी गयी अवैध रकम को दिखाये जाने से
करते हैं. एक संसदीय लोकतंत्र में ऐसी घटना का होना और इस पर समाज की प्रतिक्रिया,
या कह सकते हैं कि प्रतिक्रिया की अनुपस्थिति-क्या संकेत देते हैं ?
जिस पतन की आजकल इतनी चर्चा होने लगी है, यह पतन कोई नयी चीज
नहीं है. दरअसल हमने पूंजीवादी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है, बिना यह देखे कि
पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर कितना पतन है, कितनी बुराई है. इसी वजह से इस व्यवस्था
की सारी बुराइयां हमारे समाज में आ गयी हैं और सामने दिखती हैं. पूंजीवाद ने अपने
विकास के क्रम में जितनी धोखेबाजियां की हैं, दुनिया में कहीं भी-किसी भी व्यवस्था
ने इतनी धोखेबाजियां नहीं की हैं. हमारे देश में भी हर स्तर पर जो पतन दिख रहा है,
वह भी यही है.
हमारे समाज ही नहीं, दुनिया भर की पूंजीवादी व्यवस्थाओं के भीतर जितनी बुराइयां और
पतन दिखता है, उसकी वजह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में छिपी हुई है. पूंजीवाद पहले
की तमाम व्यवस्थाओं से अलग है. इसमें उत्पादन पूर्व की सभी व्यवस्थाओं से व्यापक
पैमाने पर होता है, लेकिन इस उत्पादन की सामाजिक उपयोगिता नहीं है. इसमें सिर्फ
मुनाफे के लिए उत्पादन होता है. इस क्रम में ऐसी कई वस्तुओं का भी बडे पैमाने पर
उत्पादन होता है, जो सामाजिक उपयोग की दृष्टि से किसी महत्व की नहीं हैं, लेकिन उनसे
मुनाफा होता है, इसलिए उनका उत्पादन होता है.
उदाहरण के लिए सिगरेट को ले सकते हैं. इसका जीवन जीने के लिए
क्या उपयोग है ? उल्टे यह तो नुकसान ही पहुंचाता है. लेकिन इसमें मुनाफा है, इसलिए
इसका उत्पादन भी होता है. और चूंकि मुनाफे की कोई हद नहीं है, इसलिए उत्पादन की भी
कोई हद नहीं है. इस प्रकार हम देखते हैं कि इस पूरी व्यवस्था में ही फ्रॉड (धोखा)
निहित है. यह कोई नयी चीज नहीं है.
पहले भी घूस लेकर सरकारें बचायी गयी हैं. झारखंड मुक्ति मोरचा रिश्वत कांड तो सभी
जानते हैं. कांग्रेस ने पहले भी ऐसा किया है. इसे लगभग मान लिया गया है कि सरकारें
गिराने-बचाने में पैसे का लेन-देन होता है. सभी ऐसा करते हैं. शिबू सोरेन की चर्चा
बहुत हो गयी, क्योंकि वे आदिवासी समाज से आते हैं, इसलिए वे इसे छिपा नहीं पाये.
दूसरे वर्गों से आनेवाले लोगों में इतनी होशियारी है कि वे ऐसी बातें आसानी से छिपा
लेते हैं.
पूंजीवादी व्यवस्था में चूंकि हर बात के पीछे संपत्तिशाली और सत्तासीन वर्ग के
मुनाफे की लालसा रहती है, समाज का और जनता का कोई हित उनके सामने नहीं रहता. आप हाल
के अमरनाथ विवाद को देख सकते हैं. यहां कोई विवाद नहीं था, लेकिन इतने छोटे-से मामले
को इतना बडा कर दिया गया कि अब इससे पूरा कश्मीर और देश प्रभावित हो रहा है. यह
केवल पावर (सत्ता) हाथ में रखने के लिए किया गया. और देख कर हैरत होती है कि जो
भाजपा राष्ट्रभक्ति की इतनी बातें करती है, वही इस मुद्दे
को इतना बढा रही है और कश्मीर के तीन भागों में विभाजन की बातें होने लगी हैं-जो कि
कभी पाकिस्तान की मांग हुआ करती थी.
जब पूरी अर्थव्यवस्था इस आधार पर बनी हुई है कि बहुत सारे लोगों को लूट कर कुछ लोगों
को मुनाफा दिया जाये, तो यह व्यवस्था हर तरह के कुकर्म करायेगी.
दक्षिण अमेरिका में सीआइए ने हर तरह के कुकर्म किया. उसने राष्ट्राध्यक्षों की
हत्याएं कीं. पनामा के राष्ट्रपति को पकड कर अमेरिकी ले जाया गया. तो इस व्यवस्था
के तहत जो सारे काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे हैं, वही हमारे देश में राष्ट्रीय
स्तर पर भी हो रहे हैं. पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था झूठ, चोरी, लूट, बेइमानी पर
टिकी हुई है, भारत में भी यही हो रहा है. इसलिए मुझे नहीं लगता कि हमारे देश में
खासतौर से कोई गिरावट आयी है. इस व्यवस्था का आधार अमेरिका है और हम अधिक तेजी से
अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं. इसलिए अमेरिका जैसे बडे माफिया से भारत जैसा छोटा
माफिया परमाणु करार करना चाहता है.
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अब तक जो बडे रिश्वत कांड राजनीतिक गलियारों में चर्चा में रहे, उनमें
अधिकतर लोग दलित-आदिवासी समूहों से आते हैं. बंगारू लक्ष्मण हों या मायावती या फिर
शिबू सोरेन. संसद में जिन सांसदों ने नोट लहराये, वे भी पिछडे-दलित समुदायों से ही
आते हैं. जैसा आप बता रहे हैं, पैसा तो सभी समूहों के पास आ रहा है, लेकिन सिर्फ
वंचित समूहों से आनेवाले ही इसके शिकार अधिक बनते दिख रहे हैं. राजनीतिक हितों की
पूर्ति के नाम पर क्या वे पूंजी के आसान शिकार बनाये जा रहे हैं ?
किसी दलित-आदिवासी समूह से आदमी आता है तो वह सामाजिक-आर्थिक
तौर पर इतना वंचित रहता है कि उसे लुभा लेना आसान होता है. आप देखिए कि संसद में
नोटवाली घटना में अगर कोई अपर कास्ट का सांसद होता तो वह ३० करोड लेता. जबकि
दलितों-आदिवासियों को बहुत कम राशि भी स्वीकार होती है. इसलिए वे इस फंदे में आसानी
से आ जाते हैं.
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क्या प्रचलित अर्थों में अनैतिकता और पतन की स्वीकार्यता बढी है ? अब जनमानस
में ऐसी घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. १९४७ के बाद के वे न्यूनतम आदर्श भी
भुला दिये गये, जिनको एक प्रस्थान बिंदु मान कर देश आगे बढा था. अब कहीं कोई
उद्वेलित नहीं होता. क्या वजह है ? क्या समाज उन मूल्यों को त्याग चुका है ?
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संसद में
नोटवाली घटना में अगर कोई अपर कास्ट का सांसद होता तो वह ३०
करोड लेता |
दिक्कत यह है कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिमान
नहीं बन पाये. इसके प्रतिमान यूरोप में ही बने थे, वह भी उन दिनों जब वहां यह
व्यवस्था अभी शुरुआती दौर में थी. एक आकार ग्रहण कर रही थी. लोकतंत्र के दायरे
उन्होंने तय किये. भारत में भी आजादी के बाद इस दिशा में कुछ कोशिशें हुईं. लेकिन
विदेशी पूंजी का जब प्रवेश हुआ, तब सब खत्म हो गया. राजनीति में अब नैतिकता के लिए
कोई जगह नहीं रही.
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लेकिन हमारा समाज तो इनसे रिक्त कभी नहीं रहा. वहां तो इन मूल्यों के लिए एक
सुदृढ जगह रही है. उसका क्या हुआ ? इन बदलावों पर वह मौन क्यों दिखता है ?
नैतिकता आदि मूल्य हमारे देश के समाज में भी रहे हैं, अब भी
हैं, लेकिन वे हमारे निजी जीवन तक सीमित रहे हैं. ये मूल्य हमारे घर-परिवार के लिए,
हमारे सीमित सामाजिक व्यवहार के लिए हमारे द्वारा ही तय किये हुए थे. लेकिन
लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके प्रतिमान हमारे अपने नहीं थे. इनके रूप में हमने बाहर
की चीजें स्थापित करनी चाहीं. इसलिए इस व्यवस्था के लिए हमारे अपने प्रतिमान नहीं
विकसित हो पाये. वे हमारे घरों तक ही सीमित रहे, सार्वजनिक जीवन तक विस्तारित नहीं
हो पाये.
शुरुआती दिनों में, जब तक विदेशों में पढे-लिखे भद्रलोक के हाथ में सत्ता रही, तब
तक कुछ ठीक चला. लेकिन जब पूंजीवाद का दबाव बढा, सब खत्म हो गया. पहले हमलोग नारा
लगाते थे, टाटा-बिडला की सरकार नहीं चलेगी. अब तो हालात बिल्कुल बदल चुके हैं.
हालांकि तब भी बिडला राष्ट्रीय आंदोलन से जुडे रहे, उनमें कुछ नैतिकता थी. अब तो जो
संपत्तिशाली वर्ग है, उसमें कुछ भी नैतिकता नहीं बची है. अब अंबानी जैसे लोग हैं,
जो अरबों रुपये का घर बना रहे हैं. पूंजीपतियों द्वारा सिर्फ लूट-खसोट की कवायद चल
रही है.
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जब यूरोप अपने लिए लोकतांत्रिक प्रतिमान विकसित कर सकता है तो आधी सदी से
अधिक समय बीतने के बाद भारत का लोकतंत्र ऐसा क्यों नहीं कर सकता ?
यूरोप में ऐसा एक लंबी प्रक्रिया के दौरान हुआ. 400-500 वर्षों
पहले वहां भी कई कमियां थीं व्यवस्थाओं में. १६-१७ वीं शताब्दी में एक व्यक्ति हुआ
वहां-फ्रांसिस बेकन. वह जज था और विद्वान दार्शनिक भी था. तब सभी जज घूस लेकर फैसले
करते थे. यह आम था. एक बार बेकन ने घूस लेकर फैसला किया. लेकिन दोषी सिद्ध होने पर
भी राजा ने उसे छोड दिया. तब बेकन ने कहा कि मैंने जो फैसला दिया था, उससे सही फैसला
कोई नहीं हो सकता था और राजा ने जो फैसला दिया है, उससे भी सही कोई फैसला नहीं हो
सकता है. तो चार-पांच सौ वर्ष पहले यूरोप की ऐसी स्थिति थी. लेकिन धीरे-धीरे वहां
कई सुधार हुए.
इस तरह हम देखते हैं कि इंस्टीट्यूशंस जो विकास करते हैं, उनके साथ ही उनके लिए
आवश्यक प्रतिमान भी बनते हैं. ब्रिटेन में पहले पैसेवाले लोग ही सांसद हुआ करते थे,
इसलिए उन्हें वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं था. लेकिन बाद में, एक-डेढ शताब्दी
पूर्व, जब लेबर पार्टी के लोग सांसद चुन कर आने लगे, तब सांसदों को भी वेतन देने की
बात उठी, क्योंकि वे संपन्न लोग नहीं थे. तब सांसदों को वेतन मिलने लगा.
लेकिन भारतीय समाज की जो नैतिकता है, वह निजी संबंधों की नैतिकता है. वह सार्वजनिक
क्षेत्र के लिए नहीं है. अगर यह निजी जीवन से बाहर किसी के लिए था भी तो राजाओं के
लिए था, किसी चुनी हुई संस्था के लिए नहीं था. राजाओं के लिए आचरण के संहिता और
नियम थे और जो उनका उल्लंघन करता, वह दुराचारी मान लिया जाता. कौटिल्य के
अर्थशास्त्र में इसी तरह की कई नीतियां हैं, लेकिन आधुनिक लोकतंत्र के लिए उनका कोई
मतलब नहीं है.
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इसका मतलब है कि देश का लोकतंत्र एक गतिरोध के दौर से गुजर रहा है, जिसमें
एक ओर तो अपने प्रतिमानों का अभाव है, दूसरी ओर इस पर विदेशी पूंजी का दबाव है. ऐसे
में उपाय क्या है ?
उपाय कहीं बाहर से नहीं होगा. निजी आचरण को ही सामाजिक जीवन
तक विस्तारित करना होगा. सार्वजनिक जीवन में एक ऐसे चरित्र की जरूरत है-गांधी जी
जैसे किसी चरित्र की-जो देश के लोगों के सामने आदर्श बन सके. अगर ऐसा कुछ हो तो एक
आधार बन सकता है.
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लेकिन क्या सामाजिक बदलावों के लिए किसी आदर्श चरित्र की प्रतीक्षा एक
व्यावहारिक विकल्प है ?
ऐसा नहीं है. देश में हजारों ऐसे लोग हैं, जो गांधी जी जैसों
के आचरण से प्रभावित हैं और छोटी-छोटी जगहों पर काम कर रहे हैं. अभी बाबा आम्टे के
बेटे और बहू को मैग्सेसे सम्मान मिला है. तो इसी तरह के अनेक लोग हैं, जिनसे भारतीय
समाज प्रेरणा ले सकता है.
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भारतीय राजनीति में कारपोरेट की दखल राजनीति के चरित्र को किस तरह प्रभावित
कर रही है ?
कारपोरेटीकरण एक लगातार चलनेवाली प्रक्रिया है. यह हमेशा होता
है कि पूंजीपति आते हैं तो वे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को भ्रष्ट करते हैं,
ठेके लेते हैं. यह दिन-रात चलता रहता है. जो बडी कारपोरेट पूंजी है, वह फैलती ही है
धोखाधडी, चोरी और जुल्म के आधार पर. अभी ओडिशा में पोस्को को खनन का लीज मिला.
आदिवासियों ने विरोध किया, पर उसे नजरअंदाज कर दिया गया. और सिर्फ यहां की ही बात
नहीं है, जहां भी पूंजी का प्रसार हुआ है, वहां ऐसा हुआ. पूरी व्यवस्था ही ऐसी है
कि पावर का इस्तेमाल करके सत्ता के सहारे जनता का धन, संसाधन, जमीन आदि हडप ले. तो
आप कैसे नैतिकता की बातें कर सकते हैं ? जो मार्क्स ने कहा है कि पैसा सभी मानवीय
रिश्तों को खत्म कर देता है, तो यही दिख रहा है भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन
में भी.
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पंचायतों से जो
भी संभावनाएं बनती थीं, वे खत्म हो गयीं. |
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बाहरी पूंजी का यह प्रवेश जनजीवन को किन सीमाओं तक और किस रूप में प्रभावित
कर रहा है ? यह गांवों पर कैसा प्रभाव डाल रहा है ? क्या यह समाज के सामूहिक चरित्र
को भी बदल रहा है ?
गांव सिर्फ पूंजी के आने के कारण नहीं बदल रहे हैं. पूंजी के
आने के पहले ही गांव बिखर चुके थे. कुछ समय पहले तक, गांव का अपना एक समाज हुआ करता
था. जाडे के दिनों में घूर के पास या गरमियों में पेडों के नीचे या ऐसी ही किसी जगह
पर गांव भर के लोग बैठते थे. गांव और इलाके की समस्याओं पर चर्चा करते थे. उन्हीं
में समाधान भी निकल आते थे. अब तो वह सब खत्म हो चुका है. अब गांव के भीतर गांव की
किसी समस्या को लेकर बातें करने के लिए १०-२० लोग बैठे हुए कहीं नहीं मिलेंगे. इनकी
जगह अब ठेकेदार बैठते हैं, कुछ उनके दलाल, कुछ अपराधी किस्म के लोग और इसी में
दारू-मीट भी है. कुछ लोग इन लोगों के विरोध में भी बैठते हैं. अब गांवों का यह
स्वरूप उभर रहा है.
मैं इस गांव (मणिका) में 1956-57 के अंत में आया था. तब ऊंची जातियों के लोग ताड़ी
पी लेते थे तो यह बात चर्चा का विषय बन जाती थी. अब तो यह आम हो गया है और कहीं कोई
चर्चा नहीं होती. पहले खजूर-ताड़ की नंबरिंग होती थी, इनकी बिक्री दुकानों में होती
थी. अब तो यह खत्म कर दिया गया है, हर जगह दारू-ताड़ी की बिक्री होती है-घरों में
भी और वहां जाकर सभी पी सकते हैं. अब वहां जाति-पांत की बात भी नहीं रही.
इनके अलावा नीतीश कुमार सरकार की यह एक उपलब्धि है कि उन्होंने हर पंचायत में शराब
की दुकानें खोल दीं हैं, जो पहले ब्लॉक आदि में होती थीं और जो पूरे समाज का चरित्र
भ्रष्ट कर रही हैं.
सरकारों को चूंकि सत्ता में बने रहना है, इसलिए उन्हें कुछ तो करना होता है. वे कुछ
लोगों को लाल कार्ड देती हैं तो कुछ को इंदिरा आवास योजना के तहत मकान. गरीबी इतनी
है कि जो समय की रोटी और मकान पाकर लोग खुश हो जाते हैं. इसमें सरकार की जेब से जाता
कुछ नहीं है, लेकिन श्रेय उसे मिल जाता है.
लेकिन इनके जरिये बिचौलिये, ठेकेदार, राशन दुकानदार सत्ता के नये प्रतिष्ठान बन रहे
हैं और गांव का समाज इनके इर्द-गिर्द केंद्रित हो रहा है. अभी गांव की पूरी संरचना
कुल मिला कर यही उभर रही है.
बिहार में 22 साल तक पंचायतें नहीं थीं. उनका काम
ब्यूरोक्रेसी करती रही. जब चुनाव हुए और काम करने की संभावनाएं पैदा हुईं, तो मुखिया
जैसे पद भी महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिये गये. मुखिया पहले ग्रामीण समाज के लिए
एक नेतृत्वकर्ता हुआ करता था. वह ग्रामीण संरचनाओं का एक केंद्र था. यह पद भी
महिलाओं को मिलने के कारण अब महिलाएं भी मुखिया होने लगीं और पंचायतों से जो भी
संभावनाएं बनती थीं, वे खत्म हो गयीं.
हम विकेंद्रित सत्ता की बात करते हैं, लेकिन नेतृत्व को तो शक्तिशाली होना चाहिए.
महिला आरक्षण के कारण यह खत्म हो गया.
पहले पंचायतों के जरिये विकास कार्यों में जनता की भागीदारी होती थी. अब तो बस बाहर
से पैसा आता है, जैसे-तैसे काम होता है और बाकी की लूट-खसोट होती है.
पंचायतों का सही मायने में विकास होता तो वे एक ताकत बन सकती थीं. अब तो पंचायतों
की एक संस्था के रूप में ताकत ही खत्म हो गयी है. जब २२ साल तक चुनाव नहीं हुए तो
स्वायत्त शासन की एक पूरी परंपरा ही खत्म हो गयी. अब तो मुखिया पति जैसा एक पद भी
मान्य हो गया है. पूरी प्रक्रिया तमाशा बन गयी है. नीतीश कुमार ने यह आरक्षण लागू
किया, वही नीतीश कुमार केंद्र में, लोकसभा चुनावों में महिलाओं के आरक्षण का विरोध
कर रहे हैं, जहां इस आरक्षण की कुछ अधिक सार्थकता है. पहले पंचायतों की अपनी कचहरी
होती थी, वह भी अब नहीं रही.
गांवों का नेतृत्व कमजोर हुआ और बाहरी पैसे का प्रवाह बढा. इन कारणों से अब ठेकेदार
और बिचैलिये शक्ति के केंद्र बन गये हैं. राजनीति भी अब इन्हीं के इर्द-गिर्द सिमट
गयी है.
ऐसी समस्या पंचायतों से राजनीतिक पार्टियों को अलग रखने से भी पैदा हुई है.
राजनीतिक पार्टियों से जुडे लोगों में कुछ तो नैतिकता और मान्यताएं होती हैं. इसलिए
अगर पंचायत चुनाव दलगत आधार पर हों तो स्थिति कुछ बेहतर होगी.
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यह तो पंचायतों के सशक्तीकरण की बात है. लेकिन सवाल तो पूरी व्यवस्था के
चरित्र का है. छत्तीसगढ में यह कानून है कि वहां की पंचायतों में ग्राम सभा की
अनुमति के बगैर जमीन नहीं बेची जा सकती. ऐसे अधिकारों के बावजूद वहां जबरदस्ती जमीनें
हथिया ली जाती हैं. झूठी ग्रामसभा की बैठक दिखा कर या यहां तक कि पुलिस द्वारा
जबरदस्ती ग्रामसभा की बैठक बुला कर और बंदूक के बल पर उससे जमीन की बिक्री पर
स्वीकृति दिलवायी जाती है. ऐसे में वर्तमान व्यवस्था के इसी तरह रहते पंचायतों को
सशक्त करना क्या पर्याप्त है ?
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ऐसे हालात हो सकते हैं, लेकिन तब भी पंचायतों की जो पहलेवाली
स्थिति थी, वे कुछ तो लड सकती थीं. अब तो वह संभावना भी जाती रही.
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पूंजी समाज के समीकरणों को किस तरह बदल रही है ? क्या वह उन्हें बदल पाने
में सक्षम है ? दलितों-वंचितों की स्थिति में क्या इससे कुछ सुधार आने की उम्मीद है
?
पूंजीवाद में जिसके पास पूंजी रहेगी, वह शक्तिशाली होगा. दलित
संपत्तिहीन-शक्तिहीन हैं. ऐसे समाज में उस वर्ग की स्थिति कैसे सुधरेगी जो
पूंजीहीन-भूमिहीन-शक्तिहीन है ? हां यह जरूर हो सकता है कि किसी व्यक्ति के पास जैसे
कि मायावती के पास करोडों रुपये इकट्ठे हो जायें. लेकिन मायावती तो एक हैं, दलित
करोडों हैं. मायावती के करोडपति होने से उनकी स्थिति में कैसे सुधार आ सकता है ?
बल्कि होना तो यह है कि पूंजीवाद के विरोध में जो संघर्ष चल रहे हैं, उनके बडे आधार
दलित ही हैं. दलितों की स्थिति ही ऐसी है कि वे पूंजीपतियों की दलाली नहीं कर सकते
हैं.
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माओवादी भी
सिर्फ पुराने नारों को दोहरा रहे हैं. वे इस पर विचार नहीं करते
कि हिंसा से क्या होगा. |
दिक्कत यह है कि दलित नेता सोचते-समझते नहीं हैं. आंबेडकर ने कहा था कि ग्रामीण
समाज में अंधविश्वास और पिछडेपन के कारण वहां स्थिति खराब है और शहर में शिक्षा के
कारण स्थिति अच्छी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शहरों में भी बुरी स्थिति है. जो दलित शहरों
में रह रहे हैं, उनकी समस्याएं गांवों के दलितों से कम नहीं हैं. हां, यह जरूर हो
सकता है कि शहर में सिर पर बोझा ढोनेवालों में भूमिहार भी हों और दलित भी. लेकिन
इससे दलितों की समस्याएं कम नहीं हो जातीं.
वैश्वीकरण से विस्थापित होकर शहरों के स्लमों में जाति का भेद किये बगैर लोग रह रहे
हैं. इससे एक अंतर जरूर पडता है कि जातिगत विभाजन टूटता है. इस तरह यह एक
क्रांतिकारी समूह बनेगा-एक नयी शक्ति पैदा हो रही है. लेकिन अभी वैसे इसकी शुरुआत
ही हुई है.
एक और दिक्कत राजनीतिक पार्टियों की गलत समझ से पैदा हुई है. उन्होंने नये बदलावों
की ओर ध्यान नहीं दिया है. कम्युनिस्ट पार्टियों ने सोचा कि पूंजीवाद का विकास होगा
तो समाजवाद आयेगा. वे चीन की ओर आकर्षित हुए. लेकिन इसी बीच नंदीग्राम घटित हो गया.
पूंजीवाद का विकास विनाश के बगैर नहीं होता. इसे समझा नहीं गया.
कांग्रेस के लिए इन बदलावों का कोई मतलब भी नहीं था. उसको तो आजादी मिल गयी तो बात
खत्म हो गयी. बाद में इसके कारण उसमें टूट पडी और क्षेत्रीय पार्टियां बनीं. इन
पार्टियों में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिली. क्षेत्रीय चेतनाओं का उभार
हुआ. असम, महाराष्ट्र आदि में यह सब देखने को मिला. हालांकि बिहार में ऐसा नहीं हुआ.
यहां एक वैचारिक शून्यता की स्थिति है. यह विघटनकाल है. पूरे देश भर से आंतरिक
उपनिवेशवाद के विरोध में आवाजें उठ रही हैं-जैसे कामतापुरी, गोरखालैंड और पृथक असम
के लिए उल्फा के आंदोलन. एक केंद्रीकृत व्यवस्था में इनका जो शोषण होता आ रहा है,
इन आंदोलनों में इसका प्रतिरोध दिखता है. मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि असम में जो
सेना का अधिकारी जाता था, वह मालगाडी के डिब्बों में भर कर लकडियां लाता था. इस तरह
ब्रह्मपुत्र के किनारे की कीमती लकड़ियां खत्म हो गयीं. अब अरुणाचल प्रदेश में यह
काम शुरू हुआ है. वहां भी लोग आंदोलन करेंगे.
इनके अलावा देश के कुछ इलाकों में जो माओवाद है, मैं उसे भी यही मानता हूं. आप जब
शोषण करेंगे, उसका प्रतिरोध भी होगा. जिन इलाकों में माओवाद है, उनकी स्थिति ऐसी है
कि वहां गुरिल्ला युद्ध चलाया जा सकता है. इसके अलावा उन इलाकों में आदिवासी
विद्रोह की परंपरा रही है. हालांकि माओवादी भी सिर्फ पुराने नारों को दोहरा रहे
हैं. वे इस पर विचार नहीं करते कि हिंसा से क्या होगा. नेपाल में हाल के घटनाक्रम
में भी यही हुआ. जो माओ की कार्यनीतियां थीं-एक आधार क्षेत्र विकसित करके अपने को
विस्तार देना और फिर शत्रु को पहले थका देना और तब हमला करना, नेपाल में उन्होंने
यही किया. नेपाल में भी पहाड हैं, दूसरे वहां की सत्ता कमजोर थी. इसलिए उससे लडना
आसान था. लेकिन एक सीमा के बाद उन्हें भी लगा कि हम इस तरह सत्ता में नहीं आ सकते.
तो उन्होंने गंठबंधन बनाया. लेकिन आगे वे कैसी सत्ता बनायेंगे, यह देखने की बात है.
क्या वे चीनी समाजवादी व्यवस्था लायेंगे या भारत जैसी लुंजपुंज व्यवस्था ?
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कुल मिला कर समाज के बदलाव की शुरुआत कहां से हो सकती है ? पहला कदम कहां से
उठ सकता है ?
शायद शुरुआत दलीय राजनीति के आधार पर ग्रामीण राजनीति की
शुरुआत से होगी. अभी तो ग्रामीण स्तर पर कोई दिशा ही नहीं है कहीं. आदिवासी समुदाय
पर चूंकि दमन होता है, इसलिए वहां एक दिशा बनती है. हमारे यहां तो वैसा कुछ भी नहीं
है. इसलिए शुरुआत हम बहुत निचले स्तर से राजनीति की शुरुआत करके कर सकते हैं.
13.08.2008,
13.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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