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इस अंक में

 

ऐसे हुई लादेन से मुलाकात

क्यों असफल हुआ शब्दो

और बड़े हमले कर सकता है लादेन

बांस के बीज यानी वियाग्रा

सहेलियों के ब्याह पर बवाल

बालश्रम को कानूनी मान्यता

प्रदूषण का घर पलक्कड

गरम हुआ गोरखालैंड

पंचायती क़ानून को कुष्ठ

बेरंग हो रहा है काजीरंगा

भगवान नहीं राजा राम

एक स्वयंसेवक की कहानी

किए कराए पर मुहर

अनूठा संपादक

मेरे उस्ताद मेहदी हसन

बड़े भैया

हेनरी मीहोक्स की कविता

एक ही रंग

साफ़ माथे का समाज

 
 
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क्यों असफल हुआ शब्दो

एक गांव का भ्रम और थार्थ

रेयाज-उल-हक

पटना से

सरिता-महेश की हत्या के चार साल बाद शब्दो में दिन की शुरुआत किसी भी दूसरे गांव की तरह होती है. लगभग 100 परिवारों और 600 की आबादी वाला यह गांव अपनी धूसर उम्मीदों के साथ सुबह का स्वागत करता है. लोग पशुओं को सानी-पानी देने और दैनिक कामों में लग जाते हैं.

उन 200 बीघे खेतों में फिर से निजी तौर पर खेती शुरू हो चुकी है, जिनकी मेंडें तोड दी गयी थीं.

पशुधन प्रांगण की इमारत अब भी अधूरी पडी है. मछलीपालन के लिए बन रहा विशाल आहर पानी के बिना सूखा पडा है. लाखों की लागत से बने ग्राम सेवा केंद्र और जगजननी भवन का अब कोई इस्तेमाल नहीं होता.

सरिता-महेश की हत्या के बाद सब बिखर गया

sarita & mahesh

सरिता-महेश के प्रयोगों को लेकर देश भर में चर्चा हुई. शब्दो गांव में सामूहिक खेती शुरु हुई और सामूहिक नशाबंदी, सामूहिक डेयरी, सामूहिक मछली पालन की योजनाओं पर काम होना था लेकिन 24 जनवरी, 2004 को सरिता-महेश की हत्या हो गयी.


अगर आप सरिता-महेश के उन बहुचर्चित-प्रशंसित प्रयोगों को लेकर अब भी आशान्वित हैं, तो सत्येंद्र प्रसाद की सुनिए. शब्दो निवासी और इरा ग्राम समिति के अध्यक्ष सत्येंद्र प्रसाद का कहना है-“प्रयोग फेल किया.”

...और जब वे ऐसा कहते हैं, तो उनके पास इसके वाजिब कारण होते हैं.

2000 में इरा यानी इंस्टीटूट फॉर रिसर्च एंड एक्शन नामक इस सोसाइटी के सदस्य के बतौर सरिता और महेश गया जिले के फतेहपुर प्रखंड स्थित इस छोटे से गांव शब्दो आये. उनके पास शब्दो और आस-पास के 40 गांवों को एक आदर्श गांव के रूप में विकसित करने की योजना थी.

ऐसे हुई शुरुवात
शुरुवात उन्होंने शब्दो से की.

 

मुख्यतः कृषि पर आश्रित इस गांव में कोई भी काम सिंचाई की सुविधा बढाये बगैर नहीं हो सकता था. बिहार के अन्य दूसरे बहुत सारे गांवों की तरह इस गांव के किसानों के लिए भी सिंचाई एक समस्या थी. जनवरी, 2002 में सैकडों साल पुराने हदहदवा पईन की मरम्मत का काम शुरू किया गया.

यह योजना पूरी तरह जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए), जिला परिषद और मगध जोन के तत्कालीन आयुक्त एचसी सिरोही की आर्थिक सहायता पर निर्भर थी.

पईन का काम पूरा हो जाने के बाद शब्दो में सामूहिक खेती शुरू होनी थी. गांव का सबसे बडा किसान वह था, जिसके पास 13 बीघे खेत थे. शुरुआती हिचक के बाद किसान सामूहिक खेती के लिए मेंड़ तोडने पर राजी हो गये. धान-गेहूं मिला कर दो हजार क्विंटल की सालाना उपज होती. इसके अलावा कुछ अन्य फसलें भी उगायी जातीं. उपज और श्रम का बंटवारा जमीन के स्वामित्व के अनुपात में होता.

सामूहिक खेती के अलावा सामूहिक नशाबंदी, सामूहिक डेयरी, सामूहिक मछलीपालन की योजनाओं पर काम होना था. कुछ में तो निर्माण कार्य शुरू भी हुए. गांव में कंप्यूटर कक्ष सहित अनेक कमरोंवाला एक ग्राम सेवा केंद्र बनाया गया. इसके पास ही महिलाओं और बच्चों के लिए एक जगजननी भवन का निर्माण हुआ.

सामूहिक डेयरी के लिए पशुधन प्रांगण बनना शुरू हुआ. इसमें लगभग 200 मवेशियों के रहने की व्यवस्था थी. दो नलकूप भी लगाये जाने थे. इन सबके लिए 2003 में 32 लाख रुपये इरा ग्राम समिति को मिले.

मगर अभी पशुधन प्रांगण और बोरिंग का काम चल ही रहा था कि 24 जनवरी, 2004 को सरिता-महेश की हत्या हो गयी.

और सब कुछ खत्म
इसके बाद सारा काम रुक गया. जितना पैसा समिति के पास था, उसने उसे खर्च किया. जब पैसे खत्म हो गये तो सरकार ने आगे पैसे देने से मना कर दिया. सत्येंद्र प्रसाद बेहद कटुता से उन बातों को याद करते हैं-“ जब गांववाले अधिकारियों के पास जाते हैं, तो कोई सीधे मुंह बात तक नहीं करता. ऐसे में कैसे गांव के विकास के लिए सोची गयी योजनाएं पूरी की जायें? ”

satyendra prasad

सत्येंद्र प्रसाद जैसे लोगों के लिए सब कुछ खत्म हो गया.

 

समिति के सचिव रामाशीष प्रसाद का कहना है कि सरिता-महेश की हत्या के बाद स्थिति यह हो गयी कि गांव के लोग दो वर्षों तक खेती नहीं कर पाये. सरकार आश्वासन देती रही कि गांव को सभी सुविधाएं दी जायेंगीं, मगर पहले जो मिलता था, वह भी बंद हो गया. बोरिंग का काम बीच में ही रुक गया. आगे पैसा मिला नहीं कि वह पूरा हो पाता. इसके बाद किसी ने कोई मदद नहीं की. जब गांववालों को लगा कि आसरा देखने में तो वे भूखे मर जायेंगे, तो उन्होंने फिर से मेंडें खडी कर दीं और निजी तौर पर खेती करने लगे.

शब्दो के लोगों से बात करने के दौरान अनेक सवाल उठते हैं. ऐसा क्यों हुआ कि यह बहुप्रचारित-बहुप्रशंसित प्रयोग व्यक्तिगत उपलब्धियों-चमत्कारों जैसी चीज बन कर रह गया ?

जनता की व्यापक भागीदारी और जागरूकता के तमाम दावों के बावजूद हमें श्रमदान को छोड कर इसके कभी दर्शन ही नहीं हुए, तब भी नहीं जब खुद गांव के लोग संकट में घिर गये. ऐसा क्यों हुआ कि लोग अब उन प्रयोगों पर से खुद ही भरोसा खो बैठे हैं, जिन्हें वे कभी अपने लिए वरदान मानते थे?

शब्दो से सीखने की ज़रुरत
शब्दो पर बात करना असल में हमें कई बातें फिर से दोहराने के अवसर देता है. शब्दो में लगभग सौ फीसदी आबादी एक जाति की है-यादवों की. उनके पास जमीन है, मवेशी हैं. आसपास के इलाके में भूमिहीनों की पर्याप्त संख्या है और उन पर सामंती उत्पीडन बदस्तूर जारी हैं. इसके अलावा गांव के किसानों के लिए उनकी खेती की उपज उनकी जीविका के लिए पूरी नहीं पडती.

उनके सामूहिक खेती के लिए राजी होने की बडी वजह यह रही कि उन्हें समझाया गया कि इससे उपज बढेगी और उन्हें फायदा होगा. मगर इसके बावजूद लोगों की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं आया. वे भी उस व्यापक कृषि संकट की चपेट में हैं, जिसने कथित हरित क्रांति के बाद सबसे भयानक रूप ले लिया है तथा जो और कुछ नहीं, अपने बाजार और खेतों को विदेशी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल देने और सरकार द्वारा दूसरे तमाम क्षेत्रों सहित कृषि में सार्वजनिक खर्च घटाते जाने का नतीजा है.

जाहिर है कि इलाके से, राज्य और देश के दूसरे गांवों की तरह सामंतवाद खत्म नहीं हुआ है. एक ऐसी व्यवस्था में, जहां संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया-पूरा लोकतंत्र ही-वित्त पूंजी के हित में, एमएनसी-टीएनसी के भारी मुनाफों के हित में नीतियां बना रहा हो, उसे लागू कर रहा हो और इसके विरोध की हर आवाज को चुप करा दे रहा हो तथा उस तंत्र को आंतरिक तौर पर सामंती शक्तियां टिकाये हुए हों, कोई भी बदलाव सामंती शक्तियों और साम्राज्यवादी हितों दोनों के खिलाफ निर्णायक तौर पर संघर्ष छेडे बिना संभव नहीं है.

सरिता-महेश के प्रयोगों में न सिर्फ यह कि इसकी कोई जगह ही नहीं थी, बल्कि वे पूरी तरह इन्हीं शक्तियों पर निर्भर थे. उनकी सारी योजनाएं बाहरी आर्थिक मदद पर निर्भर थीं. यह मदद हमेशा बनी नहीं रहती, और इन चार सालों ने इसके अलावा किसी भी दूसरी चीज को इतनी स्पष्टता से प्रमाणित नहीं किया है कि उसे बंद होना ही था. तब इन प्रयोगों का चरमरा कर बैठ जाना था. यह स्थिति जब सरिता-महेश जीवित रहते तब भी होती.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

M Rohini

 
 hum mahesh aur sarita ke hausle ko salam karte hue kahna chahenge ki es tarah ke kaam bhavishya main aur hona chahiye. Sarita-mahesh ke kaam main ho sakta hai kuchh gadbadiyan hon, lekin gadbadiyon ke kaaran koi kaam band nahi kiya jaana chahiye. 
   
 

www.ashishanshu.blogspot.com(ashishkumaranshu@gmail.com)

 
 किसी ने कहा है असंभव कुछ भी नहीं
हाँ, नई बातों को स्वीकार पाना समाज के लिय कई बार मुश्किल जरूर होता है
 
   
 

Pratibha Shinde

 
 DEVELOPMENT work in Bihar often gets enmeshed with local politics, and Sarita and Mahesh's work was no exception. Speculation is rife regarding the identity and motivations of the killers. A criminal-politician-police-administration nexus is also talked about as a possible reason for the murders, on the basis of a few recent incidents.  
   
 

Narendra Jharkhandi

 
 Sarita mahesh ne jo kaam kiya hai, wah kabile tarif hai. lekin sawal wahi hai ki aakhir ye prayog asafal kyon hote hai ? eska zawab yahi hai ki es main janbhagidari nahi hai. 
   
 

संजीव तिवारी

 
 शब्दो जैसे प्रयोग असफल ही रहेंगे, जब तक उसमें पूर्णतः जनभागेदारी नहीं हो. सरकारी दलाल बन कर समाज को नहीं सुधारा जा सकता. 
   
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