क्यों असफल हुआ शब्दो
एक गांव का भ्रम और यथार्थ
रेयाज-उल-हक
पटना से
सरिता-महेश की हत्या के चार साल बाद शब्दो में दिन की शुरुआत किसी भी दूसरे गांव की
तरह होती है. लगभग 100 परिवारों और 600 की आबादी वाला यह गांव अपनी धूसर उम्मीदों
के साथ सुबह का स्वागत करता है. लोग पशुओं को सानी-पानी देने और दैनिक कामों में लग
जाते हैं.
उन 200 बीघे खेतों में फिर से निजी तौर पर खेती शुरू हो चुकी है, जिनकी मेंडें तोड
दी गयी थीं.
पशुधन प्रांगण की इमारत अब भी अधूरी पडी है. मछलीपालन के लिए बन रहा विशाल आहर पानी
के बिना सूखा पडा है. लाखों की लागत से बने ग्राम सेवा केंद्र और जगजननी भवन का अब
कोई इस्तेमाल नहीं होता.
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सरिता-महेश की हत्या के बाद
सब बिखर गया |
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सरिता-महेश के प्रयोगों
को लेकर देश भर में चर्चा हुई. शब्दो गांव में
सामूहिक खेती शुरु हुई और सामूहिक नशाबंदी, सामूहिक डेयरी, सामूहिक मछली
पालन की
योजनाओं पर काम होना
था लेकिन 24 जनवरी, 2004 को
सरिता-महेश की हत्या हो गयी. |
अगर आप सरिता-महेश के उन बहुचर्चित-प्रशंसित प्रयोगों को लेकर अब भी आशान्वित
हैं, तो सत्येंद्र प्रसाद की सुनिए. शब्दो निवासी और इरा ग्राम समिति के
अध्यक्ष सत्येंद्र प्रसाद का कहना है-“प्रयोग फेल किया.”
...और जब वे ऐसा कहते हैं, तो उनके पास इसके वाजिब कारण होते हैं.
2000 में इरा यानी इंस्टीटूट फॉर रिसर्च एंड एक्शन नामक इस सोसाइटी के सदस्य के
बतौर सरिता और महेश गया जिले के फतेहपुर प्रखंड स्थित इस छोटे से गांव शब्दो आये.
उनके पास शब्दो और आस-पास के 40 गांवों को एक आदर्श गांव के रूप में विकसित करने
की योजना थी.
ऐसे हुई शुरुवात
शुरुवात उन्होंने शब्दो से की.
मुख्यतः कृषि पर आश्रित इस गांव में कोई भी काम सिंचाई की सुविधा बढाये बगैर नहीं
हो सकता था. बिहार के अन्य दूसरे बहुत सारे गांवों की तरह इस गांव के किसानों के
लिए भी सिंचाई एक समस्या थी. जनवरी, 2002 में सैकडों साल पुराने हदहदवा पईन की
मरम्मत का काम शुरू किया गया.
यह योजना पूरी तरह जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए), जिला परिषद और मगध जोन के
तत्कालीन आयुक्त एचसी सिरोही की आर्थिक सहायता पर निर्भर थी.
पईन का काम पूरा हो जाने के बाद शब्दो में सामूहिक खेती शुरू होनी थी. गांव का सबसे
बडा किसान वह था, जिसके पास 13 बीघे खेत थे. शुरुआती हिचक के बाद किसान सामूहिक खेती
के लिए मेंड़ तोडने पर राजी हो गये. धान-गेहूं मिला कर दो हजार क्विंटल की सालाना
उपज होती. इसके अलावा कुछ अन्य फसलें भी उगायी जातीं. उपज और श्रम का बंटवारा जमीन
के स्वामित्व के अनुपात में होता.
सामूहिक खेती के अलावा सामूहिक नशाबंदी, सामूहिक डेयरी, सामूहिक मछलीपालन की योजनाओं
पर काम होना था. कुछ में तो निर्माण कार्य शुरू भी हुए. गांव में कंप्यूटर कक्ष
सहित अनेक कमरोंवाला एक ग्राम सेवा केंद्र बनाया गया. इसके पास ही महिलाओं और बच्चों
के लिए एक जगजननी भवन का निर्माण हुआ.
सामूहिक डेयरी के लिए पशुधन प्रांगण बनना शुरू हुआ. इसमें लगभग 200 मवेशियों के रहने
की व्यवस्था थी. दो नलकूप भी लगाये जाने थे. इन सबके लिए 2003 में 32 लाख रुपये इरा
ग्राम समिति को मिले.
मगर अभी पशुधन प्रांगण और बोरिंग का काम चल ही रहा था कि 24 जनवरी, 2004 को
सरिता-महेश की हत्या हो गयी.
और सब कुछ खत्म
इसके बाद सारा काम रुक गया. जितना पैसा समिति के पास था, उसने उसे खर्च किया.
जब पैसे खत्म हो गये तो सरकार ने आगे पैसे देने से मना कर दिया. सत्येंद्र प्रसाद
बेहद कटुता से उन बातों को याद करते हैं-“ जब गांववाले अधिकारियों के पास जाते हैं,
तो कोई सीधे मुंह बात तक नहीं करता. ऐसे में कैसे गांव के विकास के लिए सोची गयी
योजनाएं पूरी की जायें? ”
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सत्येंद्र प्रसाद जैसे लोगों के लिए
सब कुछ खत्म हो गया. |
समिति के सचिव रामाशीष प्रसाद का कहना है कि सरिता-महेश की हत्या के बाद स्थिति यह
हो गयी कि गांव के लोग दो वर्षों तक खेती नहीं कर पाये. सरकार आश्वासन देती रही कि
गांव को सभी सुविधाएं दी जायेंगीं, मगर पहले जो मिलता था, वह भी बंद हो गया. बोरिंग
का काम बीच में ही रुक गया. आगे पैसा मिला नहीं कि वह पूरा हो पाता. इसके बाद किसी
ने कोई मदद नहीं की. जब गांववालों को लगा कि आसरा देखने में तो वे भूखे मर जायेंगे,
तो उन्होंने फिर से मेंडें खडी कर दीं और निजी तौर पर खेती करने लगे.
शब्दो के लोगों से बात करने के दौरान अनेक सवाल उठते हैं. ऐसा क्यों हुआ कि यह
बहुप्रचारित-बहुप्रशंसित प्रयोग व्यक्तिगत उपलब्धियों-चमत्कारों जैसी चीज बन कर रह
गया ?
जनता की व्यापक भागीदारी और जागरूकता के तमाम दावों के बावजूद हमें श्रमदान को छोड
कर इसके कभी दर्शन ही नहीं हुए, तब भी नहीं जब खुद गांव के लोग संकट में घिर गये.
ऐसा क्यों हुआ कि लोग अब उन प्रयोगों पर से खुद ही भरोसा खो बैठे हैं, जिन्हें वे
कभी अपने लिए वरदान मानते थे?
शब्दो से सीखने की ज़रुरत
शब्दो पर बात करना असल में हमें कई बातें फिर से दोहराने के अवसर देता है. शब्दो
में लगभग सौ फीसदी आबादी एक जाति की है-यादवों की. उनके पास जमीन है, मवेशी हैं.
आसपास के इलाके में भूमिहीनों की पर्याप्त संख्या है और उन पर सामंती उत्पीडन
बदस्तूर जारी हैं. इसके अलावा गांव के किसानों के लिए उनकी खेती की उपज उनकी जीविका
के लिए पूरी नहीं पडती.
उनके सामूहिक खेती के लिए राजी होने की बडी वजह यह रही कि उन्हें समझाया गया कि इससे
उपज बढेगी और उन्हें फायदा होगा. मगर इसके बावजूद लोगों की स्थिति में पर्याप्त
सुधार नहीं आया. वे भी उस व्यापक कृषि संकट की चपेट में हैं, जिसने कथित हरित
क्रांति के बाद सबसे भयानक रूप ले लिया है तथा जो और कुछ नहीं, अपने बाजार और खेतों
को विदेशी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल देने और सरकार द्वारा दूसरे
तमाम क्षेत्रों सहित कृषि में सार्वजनिक खर्च घटाते जाने का नतीजा है.
जाहिर है कि इलाके से, राज्य और देश के दूसरे गांवों की तरह सामंतवाद खत्म नहीं हुआ
है. एक ऐसी व्यवस्था में, जहां संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया-पूरा लोकतंत्र
ही-वित्त पूंजी के हित में, एमएनसी-टीएनसी के भारी मुनाफों के हित में नीतियां बना
रहा हो, उसे लागू कर रहा हो और इसके विरोध की हर आवाज को चुप करा दे रहा हो तथा उस
तंत्र को आंतरिक तौर पर सामंती शक्तियां टिकाये हुए हों, कोई भी बदलाव सामंती
शक्तियों और साम्राज्यवादी हितों दोनों के खिलाफ निर्णायक तौर पर संघर्ष छेडे बिना
संभव नहीं है.
सरिता-महेश के प्रयोगों में न सिर्फ यह कि इसकी कोई जगह ही नहीं थी, बल्कि वे पूरी
तरह इन्हीं शक्तियों पर निर्भर थे. उनकी सारी योजनाएं बाहरी आर्थिक मदद पर निर्भर
थीं. यह मदद हमेशा बनी नहीं रहती, और इन चार सालों ने इसके अलावा किसी भी दूसरी चीज
को इतनी स्पष्टता से प्रमाणित नहीं किया है कि उसे बंद होना ही था. तब इन प्रयोगों
का चरमरा कर बैठ जाना था. यह स्थिति जब सरिता-महेश जीवित रहते तब भी होती.
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देशज से दूर
उन्होंने जनता की अपनी तकनीक और गांव के संसाधनों के आधार पर बदलाव की कोशिश नहीं
की. उन्होंने पुराने भूमि और सामाजिक संबंधों को भी नहीं छुआ, जिसके बगैर कोई भी
बदलाव संभव नहीं है. यहां भूमिहीनों को उत्पादन के साधनों पर-जो कि यहां भूमि थी-कोई
अधिकार नहीं मिलना था. वे केवल श्रम कर सकते थे और बदले में उन्हें मजदूरी मिलती.
उनके लिए उनकी बदतरी की सबसे बडी वजह-उत्पादन के साधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं
होना और मजदूरी के रूप में उनका शोषण दोनों को बदस्तूर जारी रहना था.
किसान जमीन और श्रम देते थे और उन्हें जमीन के अनुपात में उपज का उनका हिस्सा दे
दिया जाता. इसमें संपन्न किसान और संपन्न होते जाते और जो भूमिहीन थे या छोटे किसान
थे, उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आता, बल्कि वह और बदतर होती चली जाती.
महिलाओं की मुक्ति के लिए शब्दो के पास कोई योजना नहीं थी, सिवाय इसके कि वे पापड़
बेलने और मशरूम उगाने जैसे कामों में लगतीं.
शब्दो के पास बच्चों की शिक्षा का कोई वैकल्पिक पाठ्यक्रम भी नहीं था, जो उन्हें
बाजार के दबावों से मुक्त करता. इसके अलावा उन सारी योजनाओं में, जो शब्दो के लिए
बनायी गयीं और जिन्हें लागू करने के प्रयास हुए, जनता की नेतृत्वकारी भूमिका नहीं
थी. उन्हें सिर्फ उन फैसलों पर राजी कर लिया जाता, जो पहले से तय किये हुए होते. और
ऐसी योजनाओं और पद्धतियों के साथ शब्दो को 21वीं सदी के भारत का एक आदर्श गांव बनना
था.
स्थानीय जरूरतों और संसाधनों की अनदेखी करके की जा रही सामूहिक खेती ने किसानों की
निर्भरता खरीदे गये बीज, कीटनाशकों और कृषि उपकरणों पर बढा दी. इससे कृषि पर खर्च
बढ जाता और उपज अपेक्षाकृत महंगी हो जाती. हालांकि इससे उपज भी बढती, मगर वह बाजार
में मौजूद अनाज से महंगी ही रहती. ऐसा इसलिए होता कि देश भर के किसानों की तरह शब्दो
के किसान भी कृषि क्षेत्र में सब्सिडी में लगातार हो रही कटौती के बीच उत्पादन करते
और उनकी उपज विदेशों की भारी सब्सिडी प्राप्त कृषि उपज का मुकाबला नहीं कर सकती थी.
सामूहिक खेती लगभग दो ही वर्षों तक चल पायी, इसलिए उसके अंतर्विरोध सामने नहीं आये.
अगर यह लंबे समय तक चलती तो हम पाते कि किसान और गहरे संकट में फंस गये हैं. उनकी
उपज लगातार महंगी होती जाती और उनकी आमदनी घटती जाती. इसके अलावा खर्च में कमी होने
से कुल उत्पादन भी घट जाता.
बाज़ार के खेल
राज्य में स्थानीय और सहकारी बैंकों की जो हालत है, उनसे भी गांववालों को कोई
मदद नहीं मिल सकती थी. कृषि के आगे के विकास के लिए जरूरी सांस्थानिक ऋणों के मिलने
की संभावना नहीं थी, क्योंकि बैंकों ने पहले ही कृषि क्षेत्र को ऋण देना कम कर दिया
है. अगर ऋण मिल भी जाता तो उस पर सरकार द्वारा रियायतें घटा दिये जाने की वजह से
किसानों को भारी ब्याज दर का भुगतान करना पडता, जो कि उनके लिए और नुकसानदेह होता.
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पशुधन प्रांगण अब भी अधूरा
पड़ा है |
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पशुधन प्रांगण की इमारत अब भी अधूरी पडी है. मछली
पालन के लिए बन रहा विशाल आहर
पानी के बिना सूखा पडा है. लाखों की लागत से बने ग्राम सेवा केंद्र और जगजननी
भवन का अब कोई इस्तेमाल नहीं होता. |
सामूहिक श्रम पर बनी पईन और आहर और कृषि-डेयरी उत्पादों का लाभ अंततः किसे मिलता?
क्या उससे शब्दो के किसान लाभान्वित होते? जहां सारा बाजार बिचौलियों और निजी
क्षेत्र के हवाले है और सरकार अपनी भूमिका लगातार घटाती जा रही है, इस बात की
गारंटी कैसे की जा सकती थी कि शब्दो जो उपजाता-अगर बाजार में वह बिक भी जाता तो
शब्दो को उतना मुनाफा मिल जाता, जिससे वह आगे विकास कर पाता?
शब्दो का प्रयोग कोई नया प्रयोग भी नहीं था. उसने सिर्फ गांव की कृषि योग्य भूमि
को मिला कर एक बडी जोत बना दी थी. बाकी चीजें ज्यों की त्यों रहीं. बडी जोत होने
से किसानों को यह लाभ मिलता है कि वे उनमें आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सकते
हैं. मगर देश में बडी जोतवाली कृषि अथवा सहकारी खेती के जो भी प्रयोग हुए हैं
या हो रहे हैं, उनमें से कोई भी किसानों को उनके वास्तविक संकट से नहीं निकाल
सका है.
पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में हमें इसके व्यापक उदाहरण मिलते
हैं, जहां किसानों के लिए संकट इस हद तक बढ गया कि उन्हें आत्महत्याएं तक करनी
पड रही हैं. उन्हें दिये गये ऋणों ने भी उनके संकट को दूर करने में कोई मदद नहीं
की बल्कि उसे कई गुना बढा ही दिया है. अगर शब्दो उन प्रयोगों को ही यहां दोहरा
रहा था-और निस्संदेह दोहरा ही रहा था-तो वह उन दुष्प्रभावों से कैसे बचा रह सकता
था, जो इन राज्यों के किसानों को झेलने पड़ रहे हैं?
स्थानीय सामंती तत्वों-जिन्होंने अंततः सरिता-महेश की जान ले ली-से निपटने के
लिए और इन तत्वों पर जिनका वरदहस्त रहता है, उस प्रशासन से निपटने के लिए शब्दो
के पास कौन-से हथियार थे ? उनकी तरफ से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया को
निष्प्रभावी बनाने के लिए क्या शब्दो के पास कोई संगठन था ?
एक प्रयोग किया गया और जब तक उसकी अंतर्निहित कमजोरियां सामने आतीं, वह एक
दुर्घटनावश खत्म हो गया. उसके बारे में अब भी भ्रम बना हुआ है कि अगर
सरिता-महेश जीवित रहते तो वह सफल हुआ रहता और शब्दो नव उदारवादी व्यवस्था का एक
नया तीर्थ स्थल बन गया रहता-नक्सलियों की व्यवस्थाओं को टक्कर देता एक चमचमाता
हुआ आदर्श गांव.
मगर क्या यह इस वाक्य में अगर का लगना ही इस प्रयोग को विफल करार देने के लिए काफी
नहीं है?
04.05.2008, 00.01 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित