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अपहरण यहां अब पेशा है

राज्य

 

अपहरण यहां अब पेशा है

विनोद रिंगानिया गुवाहाटी से


10 अगस्त को न्यूज रूम में एक खबर आई कि कुछ ऐसे लोग पकड़े गए हैं, जो किसी को अगवा करने की साजिश कर रहे थे. असम में ऐसी खबरें इतनी आम हो गई हैं कि अब ये खबरें चौंकाती नहीं हैं. सरकारी आंकडों के अनुसार असम में 2001 से 2010 तक कुल 18,828 अपहरण हुए, जिनमें से केवल 16,402 लोग ही सकुशल घर वापस लौट पाए. घर लौटने वालों में अधिकतर को छूटने के लिए फिरौती की रकम चुकानी पड़ी थी. सरकारी आंकडों के अनुसार अगवा किए गए इन लोगों में से 2426 लोगों ने फिरौती नहीं चुकाई. इसका अंजाम क्या हुआ, इसका सरकारी आंकडों में उल्लेख नहीं है. सिर्फ यही दर्ज है कि ये लोग घर नहीं लौट पाए.

असम


अपहरण और हत्याओं की खबरें छापते-छापते एक हद तक अपनी संवेदना गंवा देने वाले पत्रकारों के लिए भी न्यूज रूम में आई इस नई खबर में चौंकाने वाला तत्व था. वह यह है कि ये अपहर्ता किसी उग्रवादी संगठन से ताल्लुक नहीं रखते थे. ये किराए पर अपहरण का काम करने वाले अपराधी थे. एक संगठित गिरोह द्वारा इस तरह उग्रवादियों के लिए पैसे पर काम करने का वाकया पहले सामने नहीं आया था. लगता है, हत्या-अपहरण के लगभग दो दशकों तक चलने वाले दौर ने इसे कुछ लोगों के लिए एक पेशा बना दिया है.

पकड़े गए अपराधियों में से एक दयाल दास उर्फ राहुल ने कहा कि उन्हें एक चाय बागान मालिक के अपहरण का ठेका उग्रवादी संगठन एनडीएफबी की ओर से मिला था. एनडीएफबी असम से अलग बोडोलैंड राज्य की मांग कर रहा है तथा इसका मुख्य कमांडर रंजन दैमारी इस समय जेल में है. दरअसल इस गुट के एक सदस्य उत्पल बोडो का एक रिश्तेदार एनडीएफबी का छोटा-मोटा कमांडर था और वहीं से इन लोगों के उग्रवादियों के साथ तार जुड़ने शुरू हुए. इस अपहरण के एवज में उन्हें एक चमचमाती कार पारिश्रमिक के रूप में दी जाती थी.

10 अगस्त को पकड़े गए गुट में तीन युवक और दो युवतियां थीं. युवतियों का काम काल गर्ल के रूप में अपने शिकार को किसी होटल में आने के लिए मनाना होता था और बाद में खाने की चीज में नशे वाली दवा मिलाकर शिकार को बेहोश कर दिया जाता था. बेहोश होने के बाद शिकार को उठाकर आराम से उग्रवादी संगठन को सौंप दिया जाता था. पुलिस का कहना है कि अभी भी ऐसे कुछ लोग हैं, जो पैसे के एवज में अपहरण का काम करते हैं और शहर के आसपास के इलाकों के व्यापारियों को अपना शिकार बनाते हैं.

असम में दो दशकों तक चले उग्रवाद ने हर उम्र के लोगों की मानसिकता को प्रभावित किया है. किशोरों की मानसिकता पर उग्रवाद ने कैसा प्रभाव डाला है, उसका जीता-जागता उदाहरण है शोणितपुर जिले के अंदरूनी गांव बालीपाड़ा का वाकया.

वहां पास के कस्बे के मध्यवर्गीय व्यापारी को एक डिमांड नोट मिलता है, जिसमें लिखा होता है कि इतनी रकम इस समय तक नहीं दी गई तो जान से मार दिया जाएगा. व्यापारी डरता-सहमता पुलिस के पास पहुंचता है. तहकीकात पूरी होने के बाद यह तथ्य सामने आता है कि बालीपाड़ा के ही एक स्कूल में पढ़ने वाले दो छात्रों ने आसानी से पैसा कमाने के लिए यह डिमांड नोट भेजा था. इस समय दोनों छात्र जेल में हैं.

गुवाहाटी में 30 जुलाई को घटी एक घटना तो हृदय विदारक है. इस घटना में कुछ लड़कों ने, जिनमें से एक अच्छी-खासी नौकरी करता है; अपने पड़ोसी के एक बारह वर्षीय किशोर का अपहरण कर फिरौती के रूप में उसके बाप से बड़ी रकम ऐंठने की साजिश रची. अपहर्ताओं ने 15 लाख रुपयों की मांग की और नौ दिन का समय दिया. मजेदार बात यह है कि उस बच्चे का बाप कोई रईस नहीं बल्कि लोहे की आलमारियां बेचने वाला साधारण दुकानदार था.

फिरौती मिली नहीं और घटनाओं ने इस तरह रुख मोड़ा कि लड़कों ने पड़ोसी के बच्चे की हत्या कर दी. इससे भी वीभत्स यह रहा कि उन लोगों ने बच्चे की लाश को कई टुकड़ों में काटा और एक बैग में भरकर गुवाहाटी शहर के बाहर एक तालाब में फेंक आए. बाद में मोबाइल नंबर की ट्रेकिंग के आधार पर घटना में शामिल सभी आरोपी पकड़े गए और पुलिस तहकीकात में सारे राज पर से पर्दा उठने के बाद उक्त तालाब में से वह बैग भी बरामद कर लिया गया, जिसमें लाश के टुकड़े भरकर फेंके गए थे. यहां गौरतलब है कि ये युवक पेशेवर अपराधी नहीं थे, लेकिन लंबी चली उग्रवादी हिंसा ने आपराधिक गतिविधियों के प्रति उनमें आकर्षण पैदा कर दिया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

prashant dubey [dubey.prashant128@yahoo.com] raipur - 2011-10-03 06:47:30

 
  अच्छी स्टोरी है. असम के बारे में आपने जो लिखा है, वो एक नई जानकारी है. क्या मैं इसे अपने समाचार पत्र में प्रकाशित कर सकता हूं ? + + + आप आलेख का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन आलेख के साथ www.raviwar.com का स्पष्ट उल्लेख करें. 
   
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