फंदे पर टंगे हुये फैसले
मुद्दा
फंदे पर टंगे हुये फैसले
राजकिशोर
तमिलनाडु की विधानसभा ने राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को मृत्युदंड न दे कर
उम्र कैद की सजा देने का जो प्रस्ताव पास किया, वह शुद्ध रूप से साम्प्रदायिकता है.
आश्चर्य है कि यह प्रस्ताव खुद मुख्यमंत्री जयललिता ने पेश किया. प्रस्ताव में यदि
निर्णय में विलंब, मानवता की मांग आदि का तर्क दिया गया होता, तब भी गनीमत थी.
हालांकि अपनी बात को जायज साबित करने के लिए कई बार शैतान भी बाइबल का हवाला देता
है. लेकिन जयललिता ने प्रस्ताव का औचित्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि तमिल भावनाओं
का सम्मान करने के लिए उन्होंने ऐसा किया है.
समझ में आना मुश्किल है कि एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या करनेवालों का साथ देने
के साथ तमिल भावनाओं का क्या मेल है? बाद में द्रमुक के अध्यक्ष करुणानिधि ने भी
ऐसी ही बातें कही. तमिलनाडु विधानसभा के इस प्रस्ताव के राजनीतिक पहलू हैं और वे
दूर तक जाते हैं. तमिलनाडु के दोनों मुख्य दलों ने श्रीलंका के सिंहल बनाम तमिल
संघर्ष के साथ अपने को गलत तरीके से जोड़ रखा है. अपने लिए अलग देश की मांग कर रहे
श्रीलंकाई तमिलों के साथ तमिलनाडु के तमिलों की सहानुभूति स्वाभाविक है. लेकिन इस
सहानुभूति को राजनीतिक रंग देना और उससे स्थानीय राजनीति में बढ़त हासिल करने की
कोशिश करना राष्ट्र-राज्य के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है.
श्रीलंका के तमिलों के साथ अन्याय हो रहा है या उन पर जुल्म ढाहा जा रहा है तो इसका
विरोध भारत के तमिलों को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को करना चाहिए लेकिन षड्यंत्रकारी
और हिंसा में लिप्त भगोड़े तमिलों को तमिलनाडु की जमीन पर पनाह देना ठीक वैसा ही है
जैसा पाकिस्तान सरकार द्वारा भारत के आतंकवादियों को पनाह देना. इस तरह तो दुनिया
में कभी शांति नहीं आ सकती.
डरा रहे हैं उमर
अफजल गुरु का मामला भी ऐसा ही है. संसद भवन पर आतंकवादी हमले के अपराध में उसे भी
फांसी की सजा मिली हुई है. कुछ लोगों का कहना है कि न्यायालय ने उसके साथ इंसाफ नहीं
किया है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में तर्क कम है, भावना ज्यादा. इस आधार पर
अफजल की दया याचिका को बहुत पहले स्वीकार कर लिया जाना चाहिए था. लेकिन सरकार
मुस्लिम जनमत के आतंक से डरी हुई है. उमर अब्दुल्ला ने अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को
और ज्यादा डराने की कोशिश की है. यानी जिस तरह तमिलनाडु की तमिल राजनीति ने फांसी
की सजा को तमिल भावनाओं से जोड़ने का अपराध किया है, उसी तरह अफजल गुरु की फांसी को
मुस्लिमवादी राजनीति से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. मजे की बात यह है कि केंद्र
को हिंदूवादी भावनाओं की भी फिक्र है. वह अफजल की सजा को मंसूख भी नहीं कर सकती
क्योंकि उसे डर है कि इसे मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़कर भाजपा इसका राजनीतिक फायदा
उठाने की कोशिश करेगी. इस तरह, अफजल गुरु भी एक अरसे से जिंदगी और मौत के बीच झूल
रहा है.
कहते हैं, लोकतंत्र सबसे अच्छी प्रणाली है क्योंकि इसमें सभी की बात सुनी जाती है
लेकिन जब लोकतंत्र अपने आप में कोई आदर्श नहीं रह जाता, बल्कि दल तंत्र और वोट
तंत्र में बदल जाता है, तब वह समानता, न्याय और निष्पक्षता के मूल्यों का हनन करने
का औजार बन जाता है. फांसी जैसे सवाल पर धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन
लोकतंत्र का घोर अलोकतांत्रिक इस्तेमाल है. पतन की इस अंधेरी रात में हम वह दीपक कहां
से ले आएं.
इतिहास बना दी जाए फांसी
दरअसल, मौत की सजा एक बहस तलब मामला है. बहुत-से लोगों की तरह, मैं भी यही मानता
हूं कि इस सजा की उचित जगह अब इतिहास का पिटारा ही है, जिसमें और भी बहुत-सी बेढंगी
चीजें कैद है.
यूरोप के प्राय: सभी देशों से फांसी की सजा को अलविदा कहा जा चुका है. उम्मीद की
जाती है कि दूसरे देश भी सभ्यता की अग्रगति में बहुत दिनों तक पीछे नहीं रहेंगे.
बहुत-से लोगों की तरह, मैं भी यही चाहता हूं कि भारत इस मामले में जल्दी करे. आखिर
यह गौतम बुद्ध, भगवान महावीर और महात्मा गांधी का देश है. फांसी की सजा जीवन पर ऐसा
प्रहार है, जिसे हम चाहें तो रोक सकते हैं. इस रास्ते पर चलते हुए दूसरों की जान
लेनेवालों को सिखाया जा सकता है कि जीवन बहुत मूल्यवान है. लेकिन जब तक फांसी की सजा
कानून की किताबों में मौजूद है, उसके साथ मजाक नहीं होना चाहिए. आखिर यह सजायाफ्ता
के लिए जीवन-मरण का मामला है.
फांसी की सजा देनेवाले रात-दर-रात चैन की नींद सो सकते हैं पर जिसे यह सजा दी गई
है, उसे जीवन का एक-एक पल भारी लगता है. मौत की गंभीरता को देखते हुए ही हमारे
कानून में यह व्यवस्था की गई है कि न्यायालय द्वारा फांसी की सजा मुकर्रर कर देने
के बाद भी क्षमादान के लिए प्रार्थना की जा सकती है. इसीलिए राष्ट्रपति को यह
अधिकार दिया गया है. यह तर्क तो अपनी जगह है ही कि गलती न्यायालय से भी हो सकती है.
मियादी हो क्षमादान
क्षमादान की याचिका पर विचार करने की कोई अवधि तो निश्चित होनी ही चाहिए. मद्रास
उच्च न्यायालय ने जब राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी का नियत दिन स्थगित करने का
निर्णय किया तो उसका यह तर्क सही था कि मृत्युदंड की सजा पाए व्यक्ति को अनंतकाल तक
अधर में नहीं रखा जा सकता. अदालत ने कहा कि मौत का इंतजार करना एक-एक क्षण मृत्यु
की यातना का शिकार होना है.
अब तीनों सजायाफ्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर कहा है कि चूंकि
उनकी क्षमादान की याचिका पर निर्णय लेने में राष्ट्रपति को ग्यारह वर्ष लग गए,
इसलिए अब फांसी देने का कोई औचित्य नहीं रहा. न्याय में अतिशय विलंब होना भी न्याय
का नकार है. इन तीनों में परारिवालन का केस बहुत मार्मिंक है. जब उसे गिरफ्तार किया
गया था, तब वह सिर्फ 19 साल का था. उसने बीस साल जेल की एकांत कोठरी में बताए. अब
जा कर उसे फांसी पर चढ़ाने का दिन निश्चित किया गया है. इन बीस सालों की यातना का
कोई मूल्य नहीं है. अन्य दो अपराधियों के साथ उसने भी अदालत से प्रार्थना की है कि
फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया जाए.
विलंबित न्याय
वास्तव में यह राष्ट्रपति का दोष नहीं है कि विचार करने में इतना ज्यादा समय लग
गया. इस मामले में राष्ट्रपति अपने विवेक से कोई फैसला नहीं लेते. वह क्षमादान की
याचिकाओं को केंद्रीय सरकार के पास भेज देते हैं. यह केंद्रीय सरकार की संवेदनहीनता
है कि जिंदगी और मौत से जुड़े निर्णयों पर पुनर्विचार करने में एक दशक से भी ज्यादा
समय लग जाता है.
हमारी न्यायिक प्रणाली में विलंब होना, अतिशय विलंब होना साधारण बात है. इसके
बहुत-से कारण हैं लेकिन केंद्र सरकार को इतना समय क्यों लगना चाहिए? जाहिर है, उसके
पास बहुत-से काम होते है लेकिन एक आदमी मरने या न मरने के बीच झूल रहा है, क्या
उसके लिए यह अतिरिक्त सजा नहीं है? न्यायालय सजा देता है और सरकार उस पर सालों- साल
बैठी रहती है. यह न केवल न्यायालय का अपमान है बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था का अपमान
है. देश की प्रशासनिक शिथिलताओं को देखते हुए भी इस तरह के विलम्ब को क्षम्य नहीं
माना जा सकता.
11.09.2011, 00.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित