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माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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अशोक मिज़ाज की दो ग़ज़लें

साहित्य

 

अशोक मिज़ाज की दो ग़ज़लें


जगहें चाहे मिली तो क्या

अशोक मिज़ाज

सारे जहाँ में आपको शोहरत मिली तो क्या
घर छोड़ने के बाद ये दौलत मिली तो क्या

बेवक्त हमको आपकी रहमत मिली तो क्या
ज़िल्लत के बाद हमको हुकूमत मिली तो क्या

रस्मे वफ़ा निभाते रहे हम तमाम उम्र
हमको चकोर जैसी मुहब्बत मिली तो क्या

तनहाइयों में फिर कोई उलझन सताएगी
दिन भर की भाग दौड़ से फुर्सत मिली तो क्या

मरने की आरजू नहीं जीने की चाह है
तुमसे बिछड़ के हमको वो जन्नत मिली तो क्या

मेरी नज़र में फ़र्क न आया कभी मिज़ाज
चेहरे बदल बदल के वो औरत मिली तो क्या

क्या जाने
हवस परस्तों की शैतानियाँ ये क्या जाने
घरों पे बैठी हुई लड़कियां ये क्या जाने

ये घर ग़रीब का है या किसी अमीर का है
फ़लक से गिरती हुई बिजलियाँ ये क्या जाने

इक-आध रोज़ रंगे हांथों पकड़ी जाएँगी
गुलों पे बैठी हुई तितलियाँ ये क्या जाने

थकन हमारी हमी जानते हैं या कि खुदा
उतरती चढ़ती हुई सीढियां ये क्या जाने

हरेक शख्स यहाँ असलियत से वाकिफ है
सफ़ेद पोश बड़ी हस्तियाँ ये क्या जाने

बुढ़ापा उनपे भी आखिर कभी तो आएगा
जवान होती हुई पीढियां ये क्या जाने

हमारी जान की दुश्मन हैं हसरतें अपनी
गले में पड़ती हुई रस्सियाँ ये क्या जाने

11.09.2011, 14.27 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

suresh g [sureshgurjar73@gmail.com] indore - 2011-12-07 14:16:20

 
  बहुत सुंदर गजल लिखी है आपने अशोक भाई. बहुत-बहुत बधाई.  
   
 

hari ram ajmeri [] ajmer - 2011-10-10 08:06:13

 
  बहुत खूब .आपने क्या बात कह दी/आदमी की औकात बेबाक कह दी//तस्सव्वुर की बाते सब करते हैँ/आपने तो हकिकते हयात कह दी// 
   
 

kalavati [singhkalavati@gmail.com] bhopal - 2011-09-22 17:04:20

 
  क्या बात है... सुंदर रचना.  
   
 

Naseem [nansari2009@gmail.com] New Delhi - 2011-09-14 07:48:48

 
  बेवक्त हमको आपकी रहमत मिली तो क्या
ज़िल्लत के बाद हमको हुकूमत मिली तो क्या
बहुत खूब कहा है :)
 
   
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