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लेकिन असली नायक कहां हैं?

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चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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एक बहानेबाज गृहमंत्री

बाईलाइन

 

एक बहानेबाज गृहमंत्री

एम जे अकबर


सब शांत हो जाइए. एक राहत की सांस लीजिए. हमारे बेमिसाल गृहमंत्री पी चिदंबरम ने आतंकवाद का जवाब ढूंढ़ लिया है. 13 जुलाई को मुंबई में हुए विस्फ़ोटों के बाद भी वे ऐसे ही जवाब के करीब पहुंच गये थे. अगर उनका जादुई नुस्खा काम नहीं कर पाया और मौत एक बार फ़िर दिल्ली लौट आयी, तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है. वैसे भी उनका कभी भी कोई दोष नहीं होता. फ़िर भी अगर कोई ऐसा सोचता है तो वह या तो मूर्ख है या फ़िर दुश्मन का एजेंट. (यहां मतलब जयललिता या बीजेपी के एजेंट से है.)

पी चिदंबरम


13 जुलाई को चिदंबरम ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि इन विस्फ़ोटों की वजह खुफ़िया एजेंसियों की नाकामी नहीं है. यह दोषारोपण आप शिवराज पाटील के कार्यकाल में कर सकते थे. अब नहीं. आजकल तो पुलिस को हर घंटे, हर दिन सूचनाएं मिल रही हैं. हो सकता है कि पाटील के दौर में ऐसी सूचनाएं हर दूसरे घंटे पहुंचती हों.अब सब घड़ी के मुताबिक चल रहा है. अगर ऐसा है तो आतंकी हमले रुक क्यों नहीं पा रहे हैं? आखिर खुफ़िया सूचनाओं की बौछार में इन नियोजित हमलों की जानकारी क्यों शामिल नहीं रहती.

कभी कोई चूक न करनेवाले चिदंबरम के पास इसका जवाब है. इसकी वजह यह है कि आतंकी अपने नापाक इरादों को ‘बेहद गुप्त अंदाज’ में अंजाम देते हैं. अरे वाह! मैंने नयी खोज कर ली. वे डरपोक आतंकवादी! उन्होंने बिन बताये ऐसे कारनामों को अंजाम देने की जुर्रत कैसे की!

अगली बार जब लाहौर में बैठा लश्कर-ऐ-तैयबा का मुखिया या भारत में कोई भी आतंकी सरगना विस्फ़ोट की तैयारी कर चुका हो तो वह इस बारे में चिदंबरम को पूरे विवरण के साथ एक पत्र भी लिखे. बेहतर हो, वह इसे कुरियर के जरिये भेजे. सामान्य डाक या मेल पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता. तब एक संदेह से परे साक्ष्य के आधार पर एक तोंदियल पुलिस कर्मचारी घटना स्थल पर पहुंच सकता है और बम को डिफ्यूज कर सकता है. वह एक प्रेस कांफ्रेंस कर सकता है और चिदंबरम की पदोन्नति की मांग पर देशव्यापी आंदोलन शुरू कर सकता है.

चिदंबरम एक बेहतरीन वकील रहे हैं और कोई यह नहीं मानता कि उनकी सहज बुद्धि उनके मौजूदा काम के लिहाज से कम है, या नाकाफ़ी है. तब आखिर क्यों वे इस तरह की मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करते हैं. क्या संकट की स्थिति हमारे मंत्रियों के बदतर को बाहर लाती है, न कि सबसे बेहतर को? क्या हमारे मंत्रियों को यह लगता है कि देश की जनता मूर्ख है? क्या उन्हें लगता है कि ‘आतंकवादी काफ़ी लुक-छिप कर अपने काम को अंजाम देते हैं’, जैसे बहाने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए काफ़ी हैं?

एक आम भारतीय काफ़ी सहनशील है. उसकी मांगें तर्कहीन या समझदारी से परे नहीं हैं. वह ऐसा नहीं मानता कि कहीं कोई जादुई छड़ी है, जिसे एक बार घुमा देने मात्र से से इस गंभीर समस्या का समाधान हो जायेगा. लेकिन ध्यान रखें वह मूर्ख भी नहीं है.

इस सरकार के कुछ महानुभावों को इस बात सबूत मिल गया है कि इस देश की जनता क्या सोचती है. खासतौर पर राहुल गांधी को, जिनको जनता ने उस समय घेर लिया और उनके खिलाफ़ नारेबाजी की, जब वे इस आतंकी हमले के पीड़ितों से मिलने अस्पताल गये थे. दुखद यह है कि जैसे-जैसे आतंकवादी अपने कृत्यों में ज्यादा हिंसक होते जा रहे हैं, हमारी पुलिस उतनी ही बेपरवाह होती जा रही है. वे जानते हैं कि उनके साथ कुछ भी नहीं होगा, वे कुछ भी करें तब भी.

आखिर जुलाई के मुंबई हमलों के बाद क्या किया गया है, सिवाय कुछ प्रतीकात्मक कदमों के. हालांकि हर हमले के बाद बिना सोचे-समझे प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाती हैं.

मैं यहां पुलिस से एक अपील करना चाहूंगा. कृपा करके संदिग्धों के बारे में रटे-रटे बयान या कंप्यूटर से निकलने वाली तसवीरें न जारी करें. सच्चाई यह है कि पुलिस के पास कोई सुराग नहीं होता और हमलों के अगले दिन जारी किये जाने वाले संदिग्धों के स्केच जांच में बस एक आपातकाल जैसे भाव को पैदा करने के लिए होते हैं. इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नही होता.

अगर पुलिस के पास सुराग होता तो बम विस्फ़ोट हुआ ही नहीं होता. जारी किये गये स्केचों के बारे में कहा जा रहा है कि ये घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा मुहैया करायी गयी जानकारी के आधार पर बनाये गये हैं. लेकिन यह कोई कैसे जान सकता है कि किसने वहां बम रखा था?

यह जाहिर है कि यह विस्फ़ोट आत्मघाती हमलावर का किया हुआ नहीं था. वैसे भी ऐसे स्केचों और वास्तविक संदिग्धों के बीच कोई समानता होने की स्थिति शायद ही होती है. एक बात पर ध्यान दें, इन स्केचों के चेहरों पर हमेशा एक दाढ़ी होती है. यह एक तरह की सांस्थानीकृत सांप्रदायिकता है, जिसके निशाने पर मुसलमान हैं. और यह दबे-छिपे रूप में भी नहीं है. हमलों के 48 घंटों के बाद गृह मंत्री कह रहे थे कि कुछ महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं, पर इनसे किसी परिणाम तक नहीं पहुंचा जा सकता. जहां तक जनता की भावना का सवाल है, फ़ैसला सुनाया जा चुका है.

मुख्य चिंता यह है कि हमारी पुलिस व्यवस्था अक्षमता से बुरी तरह से ग्रस्त हो गयी है. यह एक ऐसा तथ्य है जिसे देश को नुकसान पहुंचाने में लगे लोग भली-भांति जानते हैं. यहां एक सवाल है, जो संसद को अधजगी रातें दे सकता है- क्या भारत में आतंकवाद बिना जोखिम का कारोबार बन गया है?

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
11.09.2011, 00.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anil [anilkgoelg@rediffmail.com] Delhi - 2011-09-11 10:42:14

 
  Shivraj Patil was busy changing his dresses every hour when people were dying in Mumbai and our forces were busy fighting with terrorists in Taj Hotel and other places. Here is another INTELLIGENT home minister, sitting at the table where one day Sardar Patel had sat. We have voted such stupids, we are being ruled by the corrupt and incompetents like Sonia, Manmohan, Prafull Patel, Shiela etc., this is what we deserve. 
   
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