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राहुल होने का मतलब

बाईलाइन

 

राहुल होने का मतलब

एम जे अकबर


उस भागते हुए पल में उसकी एक झलक दिखी- वह अरसा, जिसे टेलीविजन ने उन छवियों के लिए आरक्षित रखा है, जो पूरी तरह से शामिल नहीं की जा सकतीं. वह कार्डिफ की पवेलियन दीर्घा से राहुल द्रविड़ को निहार रही थी. राहुल अपनी आखिरी एक-दिवसीय पारी के बाद ड्रेसिंग रूम की अपनी सीमा की ओर बढ़ रहे थे. उनकी उछाल ऐसी थी, मानो पैरों में स्प्रिंग लगे हों, जो इस तथ्य को झुठला रही थी कि वे अपने करियर के ठंडे दौर में थे. उसके हाथ में तख्ती पर लिखा था, ‘आई लव यू राहुल’. अत्यंत दूर, पर उतना ही सामान्य.

rahul-dravid


यौवन की रेतघड़ी पर वह रीत चुकी थी और सहज रंग-ढंग को हासिल कर चुकी थी, जो खुशहाल भारतीय संतुष्टि से उपजता है, यानी न तो ज्यादा मोटी और न ही कृशकाय. जब असावधान-से द्रविड़ गुजरे, तो एक क्षण को उसका चेहरा गहरे लगाव से दमक उठा. उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि राहुल ने उस पर ध्यान दिया कि नहीं. उसने अपना बयान दे दिया था और इतना ही पर्याप्त था. उसकी आंखों ने एक कहानी कही : जब वह 19 की थी और राहुल 20 के, वह उनके प्यार में फिसल पड़ी थी. और यह उसका इजहारे-मोहब्बत था, करीब-करीब दो दशकों बाद- आखिरी संभव दिन में.

मुक्ति का ऐसा क्षण, जो पूरी तरह से निष्पाप था, क्योंकि इससे न तो उसकी जिंदगी में कुछ बदलने वाला था, न राहुल की जिंदगी में. वह राहुल की तुलना में 40 के ज्यादा करीब नजर आ रही थी, क्योंकि उसने पेशेवर क्रिकेट नहीं खेला था. लेकिन उसने इन तमाम बरसों में राहुल की ओजपूर्ण उपलब्धियों के हर्ष को साझा किया था और यह प्रतिनिधि सहभागिता की आखिरी श्रद्धांजलि थी, जिसके बगैर कोई भी खेल बेमतलब की कवायद ही होगा.

राहुल द्रविड़ का सुदीर्घ करियर महज उनके ड्राइंगरूम में टंगी उपलब्धियों या निजी म्यूजियम बन चुके उनके ठिकाने पर नहीं होगा, बल्कि यह होगा उन करोड़ों लोगों की यादों में, जो बड़े जुनूनी ढंग से इस बारे में बहस करेंगे कि उनकी सबसे शानदार पारियां कौन सी थीं, इस बारे में कि जब पराभव का चक्र ढलान बन गया, तब उन्होंने कैसे निर्लिप्त भाव अपनाया, 2011 में इंग्लैंड के इस विलक्षण फिनाले के बारे में, उन्होंने जो लड़ाइयां अकेले लड़ीं, उनकी यादों के भीतरी खंडहर लंबे समय तक कायम रहेंगे, और बेशक, उनकी सबसे बड़ी चूक- उस समय कप्तान का पद छोड़ना, जब इसकी कोई जरूरत ही नहीं थी.

यहां पर मैंने अपने फैसले को राहुल द्रविड़ के निर्णय पर थोपा है. वे संभवत: उसे चूक न मानते हों. लेकिन चूंकि एक प्रचंड प्रशंसक के तौर पर मैं द्रविड़ की दिग्गजता के एक हिस्से का अधिकारी हूं, कम से कम मेरा तो यही मानना है कि मेरे फैसले को उनके खुद के फैसले पर वरीयता दी जानी चाहिए.

यहां और भी होंगे- अपनी जानकारियों में मुझसे कहीं बेहतर, अपनी चटर-पटर में मुझसे कहीं वाचाल- वे उनके क्रिकेट की चिंगारियों और शांति से धधकती ज्वाला का विश्लेषण करेंगे. उनकी दीप्ति में पटाखों की धमक कभी नहीं रही. उनकी बल्लेबाजी सतत रोशनी से दमकती रही. टीम की जरूरत कितनी लंबी है, इसके आधार पर आप उनके रनों को भी माप सकते हैं. वे लॉर्डस में अपने शतक के दौरान सुबह जितने आत्मविश्वास से भरे थे, शाम को भी उतने ही आश्वस्त थे.

राहुल द्रविड़ लॉर्डस पर शतकीय अध्याय के बगैर अपने क्रिकेट का समापन नहीं कर सकते थे और उन्होंने किया भी नहीं. इसकी पूर्वरात्रि पर उनसे मेरी छोटी-सी मुलाकात हुई थी, शायद 15 मिनट या ऐसे ही कुछ समय के लिए, बस हम दोनों ही थे. लॉर्डस के उस शतक में कोई अलौकिक गुण था. वह एक दिन पहले उनके मन में विद्यमान था, एक झांकी के रूप में. यह झांकी वास्तविकता से ज्यादा वास्तविक थी, जो सूर्यादय के बाद प्रदर्शन की कला बन गई.

राहुल द्रविड़ को कभी डींग हांकना नहीं आया, क्योंकि वे जानते ही नहीं कि शेखी कैसे बघारी जाती है. इस खेल में दौलत का हमला और उनका करियर, दोनों साथ-साथ चले और उनका जितना अधिकार था, उन्होंने उतना हिस्सा हासिल किया. लेकिन उन्होंने धन की बौछार में अपनी गरिमा को बचाए रखा, जबकि खेल अब अपना रुतबा बढ़ाने वाले ऐसे लोगों से अटा पड़ा है, जो अप्रत्याशित नकदी रूपी झरने के नीचे नाच रहे हैं, इस एहसास के बगैर कि इस तरह वे अपनी इज्जत को भी उघाड़ रहे हैं.

विज्ञापनों में अपनी मौजूदगी में राहुल हमेशा थोड़े अनुपयुक्त से रहे. आत्मप्रचार उन्हें संकोची बना देता है. वे सादा-सामान्य रहे हैं. वे स्वच्छ रहे हैं. आत्मसमर्पण के लिए बेकरार हुए बगैर वे निष्पक्ष और निष्कपट रहे हैं. कोई जीनियस सहजज्ञान के बिना जन्म नहीं ले सकता, लेकिन उनकी प्रतिभा नैतिक मूल्यों के जरिए सान चढ़ी. हालिया कुछ पाखंडी आदरांजलियों ने राहुल को खिझाया होगा, खासतौर पर समकालीनों की, जिन्हें ईर्ष्या ने विध्वंसक बनाया.

हर जीनियस एक उल्कापिंड भी होता है. ढेरों उल्कापिंड आकाश में विचरण पर अड़े रहते हैं, जबकि उनकी काया अपनी चमक खो चुकी होती है और पूंछ राख में बदल चुकी होती है. राहुल द्रविड़ ऐसे समय में क्रिकेट छोड़ रहे हैं, जब यह ज्यादा उग्र दिशाओं में घनचक्कर हो चुका है, जब यह बहुत ज्यादा समझौतों की मांग करने लगा है. राहुल की प्रकृति के लिए ऐसा विचार नितांत अजनबी है. राहुल, हम तुमसे प्यार करते हैं- तुमने जो किया, सिर्फ उसके लिए नहीं, बल्कि जो तुम हो, उसके लिए भी.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
18.09.2011, 00.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

अतुल श्रीवास्‍तव [aattuullss@gmail.com/ atulshrivastavaa.blogspot.com] राजनांदगांव,, छत्‍तीसगढ - 2011-09-25 20:23:54

 
  बेहतरीन विश्‍लेषण।
भारतीय क्रिकेट की दीवार राहुल द्रविड को यूं ही नहीं कहा गया.... हर वक्‍त जब टीम को जरूरत पडी उन्‍होंने इसे साबित किया और मिस्‍टर भरोसेमंद की छवि को हर क्रिकेट प्रेमी के जेहन में मजबूत करते रहे।
.... ये उनकी विदाई की बेला थी। आखिरी वन डे में भी इस शख्‍स ने जिस शिद्दत से खेला वह सिर्फ और सिर्फ राहुल द्रविड ही कर सकते थे। टीम को जब जहां जरूरत पडी राहुल द्रविड ने वहां आकर टीम को संभाला। जिस नम्‍बर पर बैटिंग दी गई.... खुद को साबित किया।
आपसे सहमत कि उनकी चूक रही उस वक्‍त कप्‍तानी छोडना।
 
   
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