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हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी तक

मुद्दा

 

हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी तक

हितेन्द्र पटेल


एक बहुप्रचारित कथन है- "ग्लोबल अपने पीछे एक लोकल बना लेता है." इस बात को ध्यान से समझ लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्वीकरण की आँधी में पुराने भारतीय गाँव का बदल जाना उसकी नियति थी. इन दिनों यह कहना और सोचना आम हो गया है कि हम अपना गाँव खो रहे हैं. जिस तरह की सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं उससे यह बात स्पष्ट है कि अब हम अपने गाँव को एक ऐसी इकाई में बदलते देख रहे हैं जो शहर बनने की प्रक्रिया में हैं. जितनी जल्दी उनका विकास होगा वे शहर की तरह हो जायेंगे.

गांव की सुबह


भारतीय संदर्भ में अब गाँव में रह रहे लोग गाँव के बारे में एक तरह से सोच रहे हैं और गाँव के जीवन की स्मृति के साथ लिखने वाले लोग दूसरी दृष्टि से. कईयों को यह लगता है कि गाँव के प्रति मोहग्रस्त लोगों के पास एक रूमानी दृष्टि है. इस रूमानी दृष्टि में चीजें किसी एक आदर्श की स्मृति के साथ रहती हैं या फिर किसी चरम स्थिति या आदर्श की ओर चीजें बढ रही होती हैं. लेखक और सिरफिरे किस्म के आदर्शवादी या संस्कृतिकर्मी ही गाँव को गाँव के रूप में बचाने की जरूरत पर ध्यान देते हैं. इस आलेख में गाँव की स्थिति, उसकी स्मृति, उसकी असलियत और संभाव्य स्थिति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की गयी है.

मूल बात पर आने के पूर्व इन पंक्तियों के लेखक की अपनी दृष्टि को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर देना उचित होगा. 1920 से 1960 के बीच पश्चिम में जो एक उपभोक्ता समाज पैदा हुआ उसके लिए किसी चीज का मूल्य उसकी उपयोगिता में निहित न रहकर उसकी 'साईन वेल्यू' पर ज्यादा निर्भर है. यह एक ऐसा समाज था जो प्राक आधुनिक समाजों से गुणात्मक रूप से भिन्न था. प्राक आधुनिक समाजों में चीजों की तुलना में कुछ मूल्य अधिक महत्त्व रखते थे. बोद्रिला के शब्दों में कहें तो समाज 'सिम्बॉलिक एक्सचेंज' पर अधिक आधारित था और उत्पादन पर कम. आधुनिक समाज में उत्पादन ज्यादा महत्त्वपूर्ण बना. अब उत्तर-आधुनिक समाज में पूँजी से भी ज्यादा महत्त्व टेक्नोलॉजी का हुआ और एक तरह से किसी भी चीज की महत्ता को समाज में जिस रूप में रखा जाता है उसी से उसका महत्त्व निर्धारण होता है. ऐसे में गाँव अपने भदेस रूप में किसी भी तरह से काम्य नहीं रह गया है और इस तरह का 'सिमुलेशन' (एक तरह से मूल्य बनाने का तंत्र) गाँव और गाँव से जुडी तमाम चीजों को दोयम दर्जे का प्रचारित करने लगा है. समाज में जब तक राष्ट्रवाद जैसी आधुनिक विचारधारा का प्रभाव रहता है तब तक गाँव की एक सुंदर कल्पना बनी रहती है. जैसे जैसे राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य कमजोर होते हैं गाँव बीते जमाने को ढोने वाला स्पेस बन जाता है जिससे जितनी जल्दी मुक्ति मिले उतना ही अच्छा.

पिछले दो दशकों में भारतीय गाँवों के चरित्र में जो बदलाव आये हैं, उसके कारणों और परिणामों पर विचार करने के पूर्व दो बातों का उल्लेख ज़रूरी है. प्रथम, क्या भारतीय ग्राम वैसे कभी थे जैसे राष्ट्रीय कल्पना के युग में उसे देखने की कोशिश हुई ? एक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि ये सपने के गाँव भारत में सिर्फ सपनों में ही रहे कभी वास्तविक गाँव से इस सपने का कोई जोड़ नहीं बना. यह नारों में, साहित्य में, सिनेमा में और शहर में रहने वाले शहरी की कल्पना में बसा हुआ गाँव था, जिसमें गाँव के किसान धरती का सीना चीरकर अपने खून पसीने से असली सोना- अनाज पैदा करते थे, पूरे समाज की चिंता करते थे, शांति से और संतोष से जीना चाहते थे. उन मेहनती किसानों को भारतीय जीवन, जीवन शैली के केन्द्र में रखकर कुछ इस तरह देखा गया कि गाँव के समाज की तमाम अंदरूनी कमजोरियाँ पार्श्व में चली गयीं. गाँव के प्रति इस रूमानी दृष्टि को हम भारत के बाहर के मुल्कों- विशेषकर रूस में भी पाते हैं जहाँ किसान जीवन को आदर्श और सच्चाई से जोड़कर देखा गया. आज इस धारणा पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

दूसरी बात जिसपर सोचा जाना चाहिए कि वैश्वीकरण के दौर के तर्कों ने ग्रामीण जीवन को किस तरह प्रभावित किया. यह एक बहुप्रचारित बात है कि वैश्वीकरण ने अंतर्राष्टीय पूँजी के इस विस्तार के युग में गाँवों को बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया और देखते ही देखते गाँव का पूरा चेहरा बदल गया, उसके मूल्य बदल गये और अब स्थिति ऐसी आ गयी है कि गाँव अब शहर जैसे ही हो गये हैं. इस पूरी प्रक्रिया पर आँसू बहाना लगातार जारी है लेकिन इस परिवर्त्तन के कारणों पर विस्तार से बहस कम ही होती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sanjay J [hindissj@gmail.com] parbhani - 2011-09-29 11:58:46

 
  वाकई लेख विचारोत्तेजक है. ! डॉ. आंबेडकर जी ने कहा- शहर की ओर चलो. शहर के रास्ते ही आगे बढ़ने के लिए उपकारक है !
....गाँव में हिंसा को, विषमता को समंजित करने का एक ढांचा था, जिसमें गाली देने वाला तकलीफ बाँटने के लिए भी आ जाता था और सुरक्षा देने के लिए भी.... वाक्य का पूर्वार्ध सही है, उत्तरार्ध गलत.
 
   
 

sarada [sarada banerjee@yahoo.com] kolkata - 2011-09-19 17:27:28

 
  गहरी सोच से संपन्न लेख है..गांव से जुड़ी रोमानी धारणा
शायद अभी तक मौजूद है...गांव की रुमानी धारणा सुंदर है पर 21वीं सदी में जब हाई-टेक वेराईटी की जयजयकार है,तब गांव का पिछड़ापन अखड़ता है। इसमें बदलाव ज़रुरी है एवं बदलाव के कारणों तथा दिशा की जांच आवश्यक है.
 
   
 

शहरोज़ Shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] Ranchi - 2011-09-19 13:47:09

 
  हीरामन अब राजा हिन्दुस्तानी का दिल रखता है. किसी भारतीय गाँव में सूरदास और होरी अब मिलें यह कठिन है और अगर मिले भी तो वे उस निर्णायक स्थिति में अब नहीं मिलेंगे, जिसका उस समाज पर कोई व्यापक प्रभाव हो.

हितेन्द्र पटेल ने बेहद बारीकी से चीज़ों को, स्थितियों को देखने और समझने की कोशिश की है. सिर्फ शहर ही नहीं गाँव का चरित्र भी बदला है.अब आप इसे अच्छा मानें या बुरा! ऐसा है और तेज़ी के साथ हालात और बदतर होते जायेंगे.लेकिन इस तबदीली में कहीं एक किरण ऐसी ज़रूर होगी, जिसके प्रकाश में भी भारतीय जीवटता अपने नए ठिकाने ढूंढ लेगी!
 
   
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