क्यों रुलाता है प्याज
मुद्दा
क्यों रुलाता है प्याज
देविंदर शर्मा
प्याज निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के ग्यारह दिन के भीतर ही ताकतवर प्याज
व्यापारियों की लॉबी के आगे सरकार को झुकने के लिये बाध्य होना पड़ा और प्याज निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया. प्याज
व्यापारियों ने किसानों के नाम पर हो-हल्ला मचाया. सरकार ने जिस तेज गति से अपने
कदम पीछे खींचे हैं, यह संकेत है कि सरकार खाद्य पदार्थों की महंगाई से लड़ने में आखिर क्यों विफल है.
पिछले लगातार चार साल से महंगाई आसमान पर है. मैंने इतना अधिक राजनीतिक दबाव कभी नहीं
देखा, जितना पिछले कुछ समय से महसूस कर रहा हूं. प्याज निर्यात पर अचानक प्रतिबंध
लगाने के विरोध स्वरूप नासिक के प्याज व्यापारियों ने प्याज की दैनिक बोली लगाने से
मना कर दिया था. महाराष्ट्र एनसीपी के मुखिया मधुकर पिछाड ने इस बारे में पहले
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वाणिज्य मंत्री आनन्द शर्मा को पत्र लिखा. महाराष्ट्र
के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने कृषि मंत्री राधाकृष्ण वी. पाटिल समेत कुछ
सहयोगियों को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सम्बंधित मंत्रियों से मिलने के लिए
नियुक्त किया था.
खबरों के अनुसार, पृथ्वीराज चव्हाण ने इस मामले में खुद प्रणव मुखर्जी से लॉबिंग की
थी और आनन्द शर्मा से प्याज निर्यात पर लगे प्रतिबंध को तुरन्त हटा लेने को कहा था.
केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने आंदोलनरत प्याज कारोबारियों को पीछे से समर्थन
दिया था. मंगलवार को बहुप्रतीक्षित अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह (ईजीओएम) की
बैठक प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में हुई जिसमें खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री
के.वी. थॉमस ने प्रतिबंध हटाते हुए घोषणा की. प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी)
475 डॉलर प्रति टन तय है, जबकि निर्यात की मात्रा पर कोई बंदिश नहीं है. उच्च
न्यूनतम निर्यात मूल्य के बावजूद भारी मात्रा में निर्यात की संभावना है.
खाद्य मंत्रालय के भय के उन कारणों को समझना चाहिए, जिसके चलते मंत्रालय ने प्याज
निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का निश्चय किया था. हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि
खुदरा बाजार में पिछले कुछ महीनों से प्याज की कीमतों में आश्चर्यजनक ढंग से इजाफा
हुआ है. इसका कोई न्यायोचित कारण नहीं कि उपभोक्ता 80 रूपए प्रति किलो के हिसाब से
प्याज खरीदे. खाद्य मंत्रालय का इस पर अत्यधिक चिन्तित होना स्वाभाविक ही था. अगस्त
के आखिरी हफ्ते में भारी बारिश के चलते महाराष्ट्र से प्याज के परिवहन में कमी आई
और इसका असर मध्य अगस्त में उपभोक्ताओं को देखने को मिला.
खाद्य मंत्रालय ने पहले तो एमईपी 45 डॉलर टन तक बढ़ाकर निर्यात रोकने की कोशिश की.
एमईपी 275 डॉलर टन की गई. फिर भी सरकार खुदरा मूल्यों को नियंत्रण करने में विफल रही
और जब खुले बाजार में प्याज 25 रूपए किलो तक हो गई, तब सरकार में खलबली मची.
पिछले तीन सालों से सितम्बर का महीना चिन्तित करने वाला महीना रहा है. पिछले साल
आरोप मढ़ा गया कि सितम्बर में प्याज का ज्यादा निर्यात किया गया, जिसके चलते प्याज
की उपलब्धता में कमी आई और दिसम्बर में उपभोक्ताओं की आंखों में आंसू आ गए. पिछले
साल खुले बाजार में प्याज की कीमतें 35 रूपए किलो से बढ़कर 60 रूपए किलो तक पहुंच
गई थी. वाणिज्य मंत्री आनन्द शर्मा ने कहा था कि जमाखोरी के चलते प्याज कीमतें बढ़ी
हैं, जबकि देश में प्याज का पर्याप्त भंडार है. इस साल भी जब प्याज की कीमतें ऊंची
होती दिख रही हैं, आनन्द शर्मा को यह कहते हुए रिकॉर्ड किया गया है कि इस मूल्य
वृद्धि की वजह जमाखोरी है.
मुझे याद है कि पिछले साल जब सरकार घबराहट में थी, तब नैफेड के मुखिया ने मूल्य
वृद्धि पर चिन्ता जताई थी. उन्होंने मीडिया से कहा था कि मोटे तौर पर बीस फीसदी से
अधिक आपूर्ति है, बारिश से नुकसान के बाद भी सितम्बर में फसल खड़ी है, ऎसे में,
कीमतें बढ़ने का कोई भी तर्क निरर्थक है.
सवाल तो यह है कि सरकार जमाखोरी को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पा रही है. वह भी
ऎसे समय, जब पिछले साल प्याज का उत्पादन अनुमानत: 145.62 लाख टन रिकॉर्ड किया गया
था. इस साल भी फसल अच्छी है और कुल उत्पादन 151.36 लाख टन होने का अनुमान है. पिछले
साल जब प्याज की कीमतें 50-60 रूपए किलो पर स्थिर थीं, तो आनन्द शर्मा ने अपने कुछ
मंत्रिमंडलीय सहयोगियों से मिलकर मल्टी ब्रांड रिटेल को खोलने के लिए समर्थन की
जरूरत पर दबाव डाला था. इस विचार-विमर्श में प्रणव मुखर्जी, गृह मंत्री चिदम्बरम और
रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी शामिल हुए थे. इसकी क्या जरूरत है? इस सवाल पर आनन्द
शर्मा का जवाब था, "नीतियां बनाना एक सतत प्रक्रिया है, हम बहुत ही प्रगतिशील हैं
और आगे की ओर देख रहे हैं."
भारत मल्टी ब्रांड रिटेल खोलने के लिए सभी अवरोध हटाने को लेकर जी-20 नेतृत्व के
दबाव में है. ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस के नेता नई दिल्ली यात्रा के दौरान
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इसके लिए दबाव बना चुके हैं. इसमें अविश्वास करने का
कोई कारण नहीं है कि यह प्रमाणित या स्थापित किया जा रहा है कि खुदरा कीमतों में
कमी लाने का एकमात्र विकल्प मल्टी रिटेल ब्रांड ही है.
मूल सवाल यह भी है कि सरकार खाद्य कीमतों पर नियंत्रण क्यों नहीं कर पा रही है.
प्याज कारोबारियों की ओर देखिए, किस तरह उन्होंने प्रतिबंध हटाने के लिए सरकार पर
दबाव डाला. तथ्य यह भी है कि महंगाई पर हमने ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं देखी
है. वजह साफ है. कोई भी राजनीतिक दल व्यापारियों को क्षुब्ध नहीं करना चाहता.
कारोबारियों के पास राजनीतिक बटुए की चाभी है. जमाखोरी और सट्टेबाजी के खिलाफ कड़ी
कार्रवाई का अर्थ होगा, उनकी आर्थिक रीढ़ को तोड़ना. ऎसे में हमें महंगाई के साथ
जीवनयापन करना सीखना होगा!
22.09.2011, 00.43 (GMT+05:30) पर प्रकाशित