कल बच्ची मरी, आज रोप रही धान
मुद्दा
कल बच्ची मरी, आज रोप रही धान
मनोज
कुमार झा
मुजफ्फरपुर, बिहार से
यह मुसहरों की बस्ती है. मेहनती और सीधे लोग, जबान के पक्के. कह दिया तो कह दिया.
झूठ की पेंचिदगियों से नावाकिफ और सत्ता की जटिलताओं से भी नावाकिफ. अब कुछेक
मुखिया-सरपंच बने हैं, मगर गरीबी इनसे चिपकी हुई है जैसे गाछ से छाल. पीपल के गाछ
हैं ये, दूसरों को छाया देने वाले. मिट्टी के काम में माहिर. खेत समतल करने से लेकर
ऊँची मेड़ तक बांधने में उस्ताद. मगर हर साल कोई न कोई इनके भीतर से गायब हो जाते
हैं, मौत के विशाल खोह में.
पाँच साल पंजाब जाकर खटते हैं, छठे साल जाने की हिम्मत नहीं और सांतवें साल इस
मिट्टी को अलविदा. हम मौत का अनुभव नहीं कर सकते, मगर किसी की सर्वकालिक अनुपस्थिति
में हमें मौत का स्याह चेहरा दिखता है. बदरंग मौत…! कब किसकी हो जायेगी पता नहीं.
मजबूत देह मगर भीतर न जाने कौन सी बीमारी डेरा डाले होगी. एक हफ्ते का अनाज भी घर
में नहीं. मौत के दिन अंत्येष्टि तक घर के लोग नहीं खाते, मगर मौत के क्षण में भी
खाने की चिन्ता बांट नहीं छोड़ती.
बरसात के दिनों में जलीय क्षेत्रों से घोंघा, सेतुआ चुन आते हैं. धान रोप आते हैं.
धान के लिए चूहे के बिल तक को कोड़ते हैं और उसके अंदर से अन्न निकाल लाते हैं.
आज बूधन सदाय की बेटी मरी है. तीन दिन से बुखार था. दो-दो रूपये की दवा लाकर खिलायी
मगर नहीं बची. आज खाना आया है, मल्लाहों की टोली से, ब्राह्मणों की टोली से भी. मगर
जो वो खुद खाते हैं, उनसे कमतर चीजें. सब्जी नहीं, रोटी के साथ नमक मिर्च. अंतिम
संस्कार करके सब आ गये हैं, बुचीया की माँ रो रही है, दो-तीन औरतें समझा रही हैं –
“दीनाभद्री की इच्छा, देवता की इच्छा को कौन टाल सकता है.”
बूधन चुप है. सुबह हो गयी. बूधन कहता है-“तुम रूक जाओ-जनी जात हो. हम मरद हैं, हम
धान रोपने जाते हैं, हमारा कलेजा सक्कत (सख्त) है.”
मगर एक आदमी के रोपने से पर्याप्त अनाज नहीं मिलेगा. पाँव नहीं उठ रहे हैं, बार-बार
बच्ची का चेहरा घूम रहा है. मेढ़ पर बैठ जाती है. टोले की एक लड़की कहती है- “हमको
जो मिलेगा, उसमें से आधा ले लेना चाची. तुम चली जाओ!” मगर घर भी काटने को दौड़ेगा.
हाथ साथ नहीं दे रहे. पाँव बोझिल हैं, मगर खेत में उतर गयी है. यह कौन-सा जीवन है!
कहाँ हैं हम अब तक ? अंगुलियों में बेटी की छुअन का अहसास बिल्कुल ताजा है मगर इन्हीं
से धान के बिचड़े उखाड़ने-रोपने हैं.
आधुनिक विकसित समाजों में भी मरणोन्मुख व्यक्तियों के प्रति रूख बहुत सुकून भरा नहीं
है. तकनीक उसी चीज पर अधिक बल देती है, जहाँ वह सफल है, मरणशीलता इसकी कमजोर कड़ी
है. वहाँ मरणोन्मुखता एकाकीपन की तरफ धकेल देती है. मगर हमारे पारंपरिक किंतु तेजी
से बदल रहे समाज में भी ऐसे लोगों से सामुदायिक लगाव के सूत्र बिखर गये हैं. मौत
हमारे अंगों के कार्यकलाप का शिथिल पड़ जाना मात्र नहीं है, यह लोगों के साथ के
जुड़ाव के तंतुओं का अंतिम रूप से टूट जाना है. कई बार ये तंतु मौत के वास्तविक क्षण
से पहले टूट जाते हैं.
बूदी सदाय की पत्नी का पेट फूलने लगा, दवा के दुकानदार ने कुछ दवाईयाँ दी, कुछ नहीं
हुआ. ब्लॉक के अस्पताल में कहा गया- लीवर की बीमारी है, दरभंगा जाओ. दरभंगा जाने के
पैसे नहीं थे. देवता पर छोड़ दिया गया. पेट फूलता गया और लोगों का लगाव कम होता गया.
फ्रांज काफ्का की कहानी ‘कायांतरण’ के मुख्य पात्र की तरह वह एकाएक मनुष्यता से कुछ
सीढ़ी नीचे लुढ़क गयी. कुछ दिनों के बाद झाड़ फूँक भी बन्द हो गया. बच्चे मुँह ताकते
रह गये और वह मौत के खोखल में बिला गयी, उस देश में जहाँ व्याग्रा-व्यग्र धनपिशाचों
की संख्या तेजी से बढ़ रही है.
ऐसा सिर्फ मुसहर टोली में ही नहीं होता. ब्राह्मणों के यहाँ भी मौत ऐसे ही कभी भी आ
जाती है, खासकर वृद्धों और महिलाओं की. ये भी गरीब ही थे, संस्कृत पढ़ते-रटते,
पुरोहिताई करते और अच्छे खाने के लिए गाँव-गाँव डोलते.
बाले मिसर के बारे में तो कहा जाता है कि उसके लिए चुड़ा कुटवाने की भी जरूरत नहीं
थी. वो सुगंधित धान के साथ ही धन खा जाता था. एक दो जमींदार परिवार थे बाकी उनके घर
पर खैनी लगाने, रस्सी बाँटने, हाँ में हाँ मिलाने वाले और वक्त पड़ने पर दूसरों से
लड़ने के लिए तैयार रहने वाले. अब इनमें से कुछ की संततियाँ नौकरी या व्यवसाय करने
लगे हैं.
मौत कभी भी किसी को आ सकती है, लोग कहते हैं. मगर दुर्भाग्य से यह कथन उस स्थिति को
ढक देता है जहाँ मौत को रोका जा सकता है. मृत्यु की गरिमा बचाई जा सकती है और
मरणोन्मुख लोगों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है.
यहाँ हैजा जब तब आता रहता था, हैजा अब भी अपने नाम से यहाँ आदिम भय जगाता है. इसके
आने को गाँव बिगड़ना कहते थे. मगर गाँव अब भी बिगड़ा हुआ है. 60 से उपर कोई बीमार पड़ता
है तो लोग कहते हैं- “पका आम है गिरना ही है.” औरतें मर्दों से बीमारी छिपाती हैं
और इलाज पर खर्चे का फैसला मर्द ही करते हैं.
एक बुजुर्ग कहते हैं – “आम पक कर गिरे तो अच्छा है, सड़कर नहीं.” मगर यहाँ आम किधर
से सड़ रहा है किसी को नहीं मालूम. जीवन और मृत्यु के बीच की दीवार धँस गयी है.
तटभ्रंश! एक किचड़ैल नदी लोटती चारों ओर.
मगर मनुष्य ऐसे ही हार नहीं मानता. 2003 के शीतलहर में मुसहर टोली की उपलब्धि आशा
की रौशनी बिखेरती है. उस साल बैला सदाय के घर जुड़वा बच्चे पैदा हुये थे. बच्चों की
माँ भी बीमार थी. ठंड हड्डियों को छील देने वाला था- ‘‘शिशिर की शर्वरी , हिंस्र
पशुओं भरी’’ उसके घर में ओढ़ने-बिछाने को कुछ नहीं था. जिनके घर में ओढ़ने-बिछाने के
होते हैं, उन्हीं के घर में तो डाँट-पात, लकड़ी भी होते हैं कि जलाकर ठंड से बचा जा
सके. मगर टोले ने ठान लिया कि बच्चों को बचाना है, जिनके पास जो था, वे वो लेकर आ
गये. कपड़ों और लकड़ियों के लिए दूसरे गाँव टोले घूम आये. (हाँ, माँगने के लिए घूम आना
ही बेहतर शब्द है, चूँकि संसाधन तो सबके हिस्से का है) रात भर अलाव जलता था, माँ को
भी आराम करने को कहा गया. औरतों ने आपस में बाँट लिया कि कौन किस समय से किस समय तक
जागेगी. अन्ततः शीतलहर को पछाड़ दिया. शीतलहर को तो एक दिन जाना ही था. मनुष्यों ने
प्रकृति-प्रदत्त साधनों और जिजीविषा के द्वारा ही प्रकृति के प्रकोप से निजात पायी.
अब ये बच्चे आठ-आठ साल के हैं. जब ये बड़े हों तो हम कामना करते हैं, काश स्थितियाँ
बदल जाएं.
27.09.2011, 16.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित